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बुधवार, 16 सितंबर 2020

शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा भारतीय समाज पर उसके प्रभाव

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शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा भारतीय समाज पर उसके प्रभाव

शंकराचार्य का दार्शनिक चिन्तन हिन्दू धर्म के अन्तर्गत चार प्रमुख ज्योतिर पीठों को स्थापित करने वाले शंकराचार्य का नाम अग्रणी है। आप का जन्म केरल प्रान्त के अलवर नदी (मालावार तट के उत्तरी किनारे पर स्थिति कलादि ग्राम में 788 ई० के लगभग हुआ। आप के पिता शिवगुरु नम्बूतिरि ब्राह्मण थे। आप की माता का नाम आर्यम्वा था। बचपन में पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनके पालन पोषण का भार उनकी माता पर ही आ पड़ा। माता आर्यम्वा ने आपकी शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया। शंकर अत्यन्त प्रखर बुद्धि के छात्र थे। कहा जाता है कि जब वे तीन वर्ष के थे, तभी उन्होंने अपनी मातृभाषा मलयालम का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। पाँच वर्ष की उम्र में आपका उपनयन संस्कार हुआ तथा उन्हें शिक्षा-प्राप्ति हेतु गुरुकुल भेजा गया। दो वर्षों में ही आपने सम्पूर्ण वेदों तथा शास्त्रों का अध्ययन समाप्त कर लिया। इसके बाद वे घर लौटकर शिक्षा देने का कार्य करने लगे। एक कुशल अध्यापक के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। इनकी ख्याति शंकर केरल के तत्कालीन राजा ने उन्हें अपने दरवार का पण्डित बनाने के उद्देश्य से अपने मंत्रियों को भेजा। शंकराचार्य ने यह निमन्त्रण ठुकरा दिया। केरल नरेश स्वयं इनके सम्मुख उपस्थित हुआ। उसने शंकर को एक हजार अशर्फियाँ भेंट की तथा अपने लिखे है तीन नाटक दिखाये। शंकराचार्य ने नाटकों को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की किन्तु अशर्फियों लेने से मना कर दिया। राजा इनकी प्रशंसा करते हुए अपने राज्य में लौट गया। आठ वर्ष की आय में शंकर ने अपनी माता की आज्ञा लेकर संन्यास ग्रहण कर लिया। कहा जाता है कि उनकी माता ने इस शर्त पर उन्हें संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा दी कि वे घर पर स्वयं ठपस्थित होकर उनका मृतक संस्कार सम्पन्न करेंगे।

गृहत्याग के बाद शंकराचार्य सर्वप्रथम नर्मदा नदी के तट पर आये जहाँ गौड़पाद के शिष्य गोविन्द योगी को उन्होंने अपना पहला गुरु बनाया। उनसे शंकर ने संन्यास की दीक्षा ली तथा आत्मविद्या का उपदेश ग्रहण किया। गुरु ने उन्हें 'परमहंस की उपाधि प्रदान की। गुरु से उपदेश ग्रहण कर शंकर शीघ्र ही एक सिद्ध महात्मा बन गये। अब उन्होंने गोविन्द योगी से अपने ज्ञान के प्रचार की आज्ञा माँगी। उन्होंने शंकराचार्य को सबसे पहले काशी जाने का आदेश दिया। काशी पहुँचकर वे भगवान शंकर की आराधना एवं अपने ज्ञान के प्रचार के कार्य में लग गये। उनकी प्रसिद्ध चतुर्दिक फैल गयी। कहा जाता है कि एक बार स्वयं भगवान शंकर ने उनकी परीक्षा ली तथा अद्वैत मत का ज्ञान कराया

ज्ञान प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा से शंकर ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक के विभिन्न तीर्थस्थलों का व्यापक भ्रमण किया बौद्ध जैन, कापालिक, स्मार्त तथा अन्य अनेक सम्प्रदायों के आचार्य के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। नमर्दा नदी के तट पर माहिष्मती में उनका मण्डन मिश्र तथा उनकी पत्नी के साथ शास्त्रार्थ हुआ। इन दोनों ने अपनी हार स्वीकार की तथा शंकर के शिष्य बन गये। एक मत के अनुसार प्रयाग में प्रख्यात दार्शनिक कुमारिल भट्ट से भी शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ था। कुछ विद्वान् इस मत को स्वीकार नहीं करते। शंकर के जीवनीकार आनन्दगिरि ने लगभग पचास सम्प्रदायों के आचार्यों का ठल्लेख किया है जिनसे उनका शास्त्रार्थ हुआ था। सभी को शंकर ने पराजित कर अपनी आध्यात्मिक दिग्विजय का लक्ष्य पूरा किया। उन्होंने कई बार मालाबार तट की भी यात्रा की। वहाँ उन्होंने सुधार आन्दोलनों का सूत्रपात किया। उनके सुधारों के समय से ही कोल्लम् संवत् (825 ई०) का प्रारम्भ माना जाता है। उनके द्वारा हिन्दू धर्म के प्रवल प्रचार प्रसार से बौद्ध धर्म को ठेस लगी तथा उसका विलोप हो गया। अपने कार्यों को मूर्त रूप देने के लिये शंकराचार्य ने उत्तर में केदारनाथ, दक्षिण में शृंगेरी, पूर्व में पुरी तथा पश्चिम में द्वारका में प्रसिद्ध मठों की स्थापना की। श्रृंगेरी में रहते हुए ही शंकर को अपनी माता की बीमारी का समाचार मिला। शंकर उन्हें देखने गये। इनकी माता अत्यन्त प्रसन्न हुई तथा उन्हीं के सामने उनकी मृत्यु हो गयी। अपनी प्रतिज्ञा के अनुरूप शंकर ने संन्यास धर्म तोड़कर अपने ही हाथों से माता का दाह कर्म किया। शंकराचार्य मात्र बत्तीस वर्ष तक जीवित रहे। उनकी मृत्यु 820 ई० के लगभग हुई। अद्वैतवाद-शंकराचार्य संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे उनका मत अद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध है। यह उपनिषदों के बहुत निकट है। प्रस्थानत्रयी अर्थात् उपनिषद, ब्रह्मसूत्र तथा गीता पर लिखे गये भाष्यों के द्वारा शंकर ने अपने मत का प्रतिपादन एवं समर्थन किया है। उपनिषदों में वर्णित विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तों को एक सूत्र में परोपकार उन्होंने उनको एक क्रमबद्ध दर्शन का रूप प्रदान किया है। अद्वैत वेदान्त अथवा अद्वैतवाद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) निखिल सृष्टि में एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है। (2) यह दृश्यमान जगत् माया का कार्य होने के कारण मिथ्या है। (3) जीव (आत्मा) तथा ब्रह्म में कोई भेद नहीं है।

ब्रह्म-अद्वैत मत के अनुसार सृष्टि में एकमात्र तात्त्विक पदार्थ ब्रह्म ही है। वह एक ऐसी सत्ता है जो सर्वव्यापी निराकार, निर्विकार, अविनाशी, अनादि, चैतन्य तथा आनन्द स्वरूप है। शंकर ने ब्रह्म का अस्तित्व प्रमाणित करने के लिये किसी युक्ति अथवा प्रमाण की आवश्यकता नहीं समझी है। वह प्रमाणों का विषय नहीं है। वह ज्ञान का भी विषय नहीं है। ज्ञान का विषय वह हो सकता है जिसे सीमित या परिच्छिन्न किया जा सके। ब्रह्म चँकि असीम एवं अपरिच्छिन्न है, अतः वह ज्ञान का विषय नहीं हो सकता है। अपनी आत्मा के अस्तित्त्व से ही व्रह्म की सिद्धि हो जाती है-सर्वस्यात्मत्वात् ब्रह्मास्तित्त्व सिद्धिः। श्रुतियाँ भी उसके अस्तित्त्व का प्रमाण हैं जिनके अनुसार एक को जानने से सब कुछ ज्ञात हो जाता है। पारमार्थिक दृष्टि से विचार करने पर ब्रह्म सभी विशेषणों से परे हो जाता है। शंकर इसे 'परब्रह्म कहते हैं। यहीं ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप है। ब्रह्म के अतिरिक्त तथा इसके अन्तर्गत कोई शक्ति नहीं है। उसमें किसी भी गुण का आरोप नहीं किया जा सकता है। माया, यद्यपि उसकी शक्ति है फिर भी वह माया से लिप्त नहीं है। वह अनन्त एवं अद्वितीय है। व्यावहारिक दृष्टि से ब्रह्म में जिन गुणों तथा उपाधियों का आरोप किया जाता है वह उनका तटस्थ लक्षण है। सृष्टि का कर्ता, पालक एवं संहारक होना उसका औपाधिक (आगन्तुक) गुण है, वास्तविक स्वरूप नहीं है। इससे पृथक् ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है जिसमें वह अद्वैत, निर्गुण एवं निर्विकार है। शंकर इसे स्पष्ट करने के लिए नट की उपमा देते हैं। एक साधारण नट रंगमंच पर राजा की भूमिका प्रस्तुत करते हुए विभिन्न प्रकार के राजोचित कार्य करता है। उनका राजत्त्व नाटक के चलते रहने तक ही है, बाद में वह सामान्य नट बन जाता है। यहाँ नाटक की दृष्टि से नट में जो राजोचित गुण मिलते हैं, वे उसके तटस्थ लक्षण हैं, जो उसके वास्तविक स्वरूप को बाधित नहीं करते। वास्तव में वह व्यक्ति नट ही है जो उसका स्वरूप लक्षण है। इसी प्रकार ब्रह्म तटस्थ लक्षण धारण कर जगत् की रचना करता है तथा सगुण हो जाता है। किन्तु परमार्थतः वह निर्गुण और निर्विकार ही है। यही उसका स्वरूप लक्षण है जो किसी भी प्रकार की उपाधियों के द्वारा बाधित नहीं किया जा सकता। शंकर के अनुसार जो तत्व ज्ञानी लोग हैं वे ब्रह्म को इसी रूप में देखते हैं। तथा उसके विशेषणों तथा उसकी उपाधियों को मिथ्या मानते हैं। 

आत्मा-आत्मा ब्रह्म का ही पर्याय है तथा दोनों में कोई भी भेद नहीं है। एक ही परम तत्त्व आन्तरिक रूप से आत्मा तथा बाह्य रूप से ब्रह्म है। अद्वैत मत के अनुसार यह स्वयं सिद्ध है तथा इसका अस्तित्त्व सिद्ध करने के लिये कोई प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। सभी को अपने अस्तित्त्व का बोध होता है। यह कोई नहीं कहता है कि मैं नहीं हूँ। ब्रह्म के समान ही यह सत्, चित् तथा आनन्द स्वरूप है चैतन्य इसका आगन्तुक गुण नहीं है, बल्कि इसका स्वरूप ही है। आत्मा के अस्तित्त्व को कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि अस्वीकार करने वाला स्वयं आत्मा ही है। इसके विषय में कोई शंका भी नहीं की जा सकती, क्योंकि यह सभी संशयों का आधार है। उपनिषदों में बार-बार ब्रह्म तथा आत्मा की एकता बताई गयी है।

शंकर के अनुसार ब्रह्म या आत्मा पारमार्थिक सत्ता है, जबकि ईश्वर तथा जीव व्यावहारिक सत्ताएँ हैं। भौतिक दृष्टि से ईश्वर तथा जीवन में अन्तर है। दोनों में स्वामी तथा सेवक का सम्बन्ध है। ईश्वर नियन्ता है तथा जीव शासित है। जीव कर्ता तथा भोक्ता है, पाप-पुण्य प्राप्त करता है तथा वही सुख-दुःख का अनुभव करता है। इसके विपरीत ईश्वर इन उपाधियों से रहित है। वह सर्वज्ञ, शक्तिमान तथा पूर्ण है। वह जीव के भोगों को भोगवाने वाला है। ईश्वर तथा जीव दोनों ही ब्रह्म के रूप हैं जिनमें पारमार्थिक सत्ता वही है। जिस प्रकार अन्धकार में रस्सी में साँप तथा सीप में रजत का आभास हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानवश अद्वैत ब्रह्म या आत्मा में जीव का आभास हो जाता है। 

माया का सिद्धान्त-अद्वैत मत में माया, अज्ञान अथवा अविद्या का महत्त्वपूर्ण स्थान है जिसके माध्यम से जगत् को विवृत करने का प्रयास किया गया है। शंकर ने माया तथा अविद्या का प्रयोग प्रायः समान अर्थ में किया है। वे 'अध्यास' को अविद्या कहते हैं। जहाँ जो वस्तु नहीं है, वहाँ उसे कल्पित करना ही अध्यास है। रस्सी में सर्प की प्रतीति अध्यास का एक उदाहरण है। इसी प्रकार ब्रह्म के अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीति है वह माया या अविद्या है। माया की दो शक्तियाँ हैं-आवरण तथा विक्षेप। पहले के द्वारा वह सत्य को ढंक लेती है तथा दूरी के द्वारा वह उस पर दूसरी वस्तु को आरोपित कर देती है। इसी के कारण ब्रह्म ईश्वर तथा आत्मा जीव बन जाता है।

जगत् की सृष्टि-शंकर के अनुसार जगत् मायावी ईश्वर का कौतुक मात्र है जो अपनी क्रीडा के हेतु इसकी रचना करता है। ब्रह्म निर्गुण तथा निर्विशेष होने से जगत् का कारण नहीं हो सकता। अत: यह संसार माया का ही कार्य है। माया अपनी आवरण शक्ति से ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को ढंक लेती है तथा विक्षेप शक्ति से ठसमें नाम रूपात्मक जगत् का अध्यास कर देती है। सांख्य मत के समान शंकर भी सत्कार्यवाद के इस सिद्धान्त को मान्यता प्रदान करते हैं कि कार्य अपने कारण से भिन्न नहीं होता। किन्तु सांख्य मत के अनुसार जहाँ कारण का कार्य में वास्तविक परिवर्तन होता है वहाँ शंकर के अनुसार यह परिवर्तन आभासमात्र है, कार्य में कोई भी विकास नहीं उत्पन्न होता। इसे 'विवर्तवाद की संज्ञा दी गयी है। इसके अनुसार किसी कार्य के उत्पन्न होने पर उसके कारणभूत द्रव्य में कोई विकार नहीं आता। वस्तु: सभी विकार आभास मात्र होते हैं। यह माया या अविद्या ही है जो सत् में असत् का आभास कराती है। यह परिवर्तनशील जगत् आभास मात्र है। इस प्रकार अद्वैत मत के अनुसार निर्विकार ब्रह्म वह अधिष्ठान है जिसके ऊपर माया दृश्य जगत् का अध्यास कर देती है। ब्रह्म की सत्ता सभी में विद्यमान है। यह स्वयंप्रकाश है। अत: सत् एवं चैतन्यस्वरूप ब्रह्म ही अपने को नाना रूपों में प्रकट कर सकता है। 

शंकर ने तीन प्रकार की सत्ता में स्वीकार की हैं-

(1) प्रतिभासित सत्ता-किसी वास्तविक वस्तु में जो मिथ्या प्रतीति या आभास हो जाता है उसे प्रतिभासित सत्ता कहते हैं, जैसे रस्सी से सर्प की प्रतीति। ज्ञान के उदय के साथ ही इसका अन्त हो जाता है।

(2) व्यावहारिक सत्ता-जिन विषयों को हम साक्षात् देखकर उनका ज्ञान प्राप्त करते हैं वे इसके अन्तर्गत आते हैं। यह सत्ता प्रतिभासित की अपेक्षा अधिक यथार्थ होती है, किन्तु यह अंतिम सत्य नहीं है। संसार की सभी दृश्यमान वस्तुयें इसी के अन्तर्गत हैं। 

(3) पारमार्थिक सत्ता-यह सर्वथा एक समान एवं अवाधित होती है (एकरूपेण हि अवस्थितो योऽर्थः सः परमार्थः) यही ब्रह्म या आत्मा है।

शंकर संसार को पूर्णरूपेण मिथ्या नहीं मानते। उनके अनुसार व्यावहारिक दृष्टि से यह सत्य है। इसी से हमारा लोक व्यवहार चलता है, किन्तु यह दृष्टि सामान्य मनुष्यों की है। ज्ञानियों की दृष्टि में तो एकमात्र सत्ता ब्रह्म ही है तथा अन्य सभी उसी के विवर्त हैं। बन्धन तथा मोक्ष-भारतीय वेदान्त दर्शन बन्यन तथा मोक्ष की समस्या पर विचार करता है। शंकर के अनुसार मोक्ष मानव जीवन का परम पुरुषार्थ है। जो इसे प्राप्त नहीं करता वह 'आत्महा' है। यह संसार असत्य तथा दुःखों से भरा पड़ा। केवल ब्रह्म ही सत्, चित् तथा आनन्द (सच्चिदानन्द) है। जीव अपने विशुद्ध रूप से ब्रह्म ही है किन्तु अविद्या या अज्ञान के कारण यह अपना समीकरण शरीर, मन आदि से स्थापित कर लेता है और अपने को कर्ता एवं भोक्ता मानने लगता है। यह संसार के नाना सुख-दुःखों को भोगता है तथा विभिन्न कर्मों को करता है। जीव भ्रान्त होकर संसार तथा ठसके विषयों को सत्य समझने लगता है। शरीर को आत्मा मानकर मनुष्य संसार-चक्र में घूमता रहता है। शंकर के अनुसार आत्मा का अपने विशुद्ध स्वरूप में स्थित होना ही मोक्ष है।

शंकर ने मोक्ष के अधिकारी के लिये निम्नलिखित साधनों से युक्त होना अनिवार्य बताया है 

(1) से नित्य और अनित्य पदार्थों का बोध होना चाहिए। 

(2) उसे लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के भोगों की इच्छा को त्याग देना चाहिए।

(3) उसे शम, दम, श्रद्धा, समाधान उपरति तथा तितिक्षा इन छ: साधनों से युक्त होना चाहिये। शम तथा दम का अर्थ क्रमशः मन तथा इन्द्रियों के संयम और नियन्त्रण से है। वेदान्त में निष्ठा रखना श्रद्धा है। चित्त को ज्ञान के साधन में नियुक्त करना पमाधान तथा निषिद्ध कार्यों से विरत होना उपरति है। सर्दी, गर्मी आदि सहन करने की शक्ति को तितिक्षा कहा गया। गीता में भी वर्णित है कि सर्दी-गर्मी तथा सुख-दुःख देने वाले इन्द्रय और विषयों के संयोग क्षणभंगर तथा अनित्य हैं, अतः तुम उनको राई करो। जिस पुरुष को ये व्यथित नहीं करते वही मोक्ष के योग्य होता है।

मोक्ष के साधक में इसके लिए प्रबल कण्डा होनी चाहिए। उपयुक्त साधनों का 'साधन चतुष्ट्य की संज्ञा दी गई है। इनसे युक्त व्यक्ति ही ज्ञान तथा उसके माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है इन चतुर्थ साधनों से युक्त व्यक्ति को किसी ऐसे योग्य गुरु की शरण में जाना चाहिए जो स्व ब्रह्मज्ञाता हो। इस प्रकार शंकर गुरु की महत्ता की स्कार करते हैं । शंकर में अपने अद्वैत का प्रतिपादन अत्यन्त युक्ति परक ढंग से किया। भारतीय दर्शनों में उनका दर्शन शिरोमणि है तथा संसार के दार्शनिक भी इसेस अत्यन्त सम्मान देते हैं । शंकर की तर्क शक्ति अत्यन्त प्रबल थी। उन्होंने अपने मत को सिद्ध करने के लिए अपने समकालीन दार्शनिकों के मतों का अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से खण्डन किया वेदों की महत्ता को स्वीकार करते थे वेदों के ज्ञान काण्ड का उन्होंने समर्थन किया, परन्तु कर्मकाण्डों के ये कट्टर विरोधी थे। अतः उन्होंने हिन्दू धर्म के अन्तर्गत फैली कर्मकाण्ड सम्बन्धी कुरीतियों का घोर विरोध किया।

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