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बुधवार, 30 सितंबर 2020

मुगलों के अधीन चित्रकला के विकास उनकी विशेषता

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मुगलों के अधीन चित्रकला के विकास उनकी विशेषता

मुगलकालीन शासक चित्रकला का हृदय से स्वागत करते थे। यद्यपि कुरान में चित्रकला का निषेध किया गया है। 13वीं शताब्दी में चित्रकला का प्रारम्भ मंगोल विजेताओं ने फारस में किया था। यह चीनी कला का प्रान्तीय रूप था और इस पर भारतीय, बौद्ध, ईरानी, वैक्ट्रियाई और मंगोलियन विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा था। कुछ ऐसा आभास होता है कि जब बाबर हैरात में आया तब उसे इस प्रकार की चित्रकला का परिचय मिला, बाद में बाबर ने इस कला को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। हुमायूँ का भी उसके निर्वासन काल में फारस के उच्चकोटि के चित्रकारों से परिचय हुआ। हुमायूँ गायन, कविता और चित्रकला का प्रेमी था। 

1550 ई० में हुमायूँ काबुल से दो चित्रकारों को बाध्य करके अपने साथ ले आया था। ये चित्रकार मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद थे। अकबर और हुमायूँ दोनों ने इन विद्वानों से चित्रकला का अभ्यास किया। अकबर इस मंगोलिया चित्रकला को अपने साथ भारत में लाया और अपने दरबार में स्थान दिया। यद्यपि प्राचीन भारतीय कलाओं को संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ था फिर भी उसकी परम्परा चली आ रही थी। एलोरा और अजन्ता की चित्रकारी देखकर प्राचीन चित्रकारी का ज्ञान हो आता है। अकबर के समय चीनी चित्रकारी और भारतीय चित्रकारी एक-दूसरे में समाने लगी फिर धीरे-धीरे एक हो गयी। इस प्रकार शनैः-शनैः विदेशी कला का नाम मिट गया और वह भारतीय कला के नाम से विख्यात होने लगी मुगलकालीन चित्रकला के विकास का पता सरलता से मुगलकालीन लाइब्रेरियों से लग जाता है। 

दास्ताने अमीर हमजा, तारीखे खनदानी तैमूरिया और पटना की खुदा वश की लाइब्रेरी में रखे हुए वादशाह नाम के पत्रकारों की चित्रकारी उस समय के क्रमिक विकास की द्योतक है। दास्ताने अमीर हुमजा को मोर सैयद अली ने और ख्वाजा अब्दुस्समद ने 1550 ई० और 1560 ई० के बीच में चित्रित किया था। इन चित्रकारी पर फारसी और चीनी का प्रभाव पूर्णरूपेण दिखाई पड़ता है। अकबर ने 1569 ई० और 1585 ई० में हिन्दू तथा चीनी चित्रकारों द्वारा फतेहपुर सीकरी के महलों को दीवारों पर सुन्दर-सुन्दर चित्रकारी करवाई थी। इससे ज्ञात होता है कि उस समय तक चित्रकला की पर्याप्त उन्नति हो गयी थी।

अकबर के दरबार में अच्छे-अच्छे चित्रकार आने लगे थे, इसका एकमात्र कारण था अकबर का संरक्षण प्रदान करना। जो चित्रकार अकबर के दरबार में आते थे उनमें हिन्दू चित्रकारों की संख्या अधिक थी और यह चित्रकार अन्य चित्रकारों से योग्य भी थे। विदेशी चित्रकारों में कुछ फारसी चित्रकार भी अधिक योग्य थे। फारसी चित्रकारों में अब्दुस्समद, फरक वेग, खुशरूकुली तथा जमशेद आदि का नाम अधिक उल्लेखनीय है। अकबर के दरबार में 17 कलाकार बहुत ही योग्य थे जिनमें 13 हिन्दु कलाकार थे और अन्य विदेशी। हिन्दू कलाकारों में निम्नलिखित के नाम उल्लेखनीय है- दसवन्त, बसावन, सांवलदास, ताराचन्द्र, जगन्नाय, लालकेस, मुकन्द और हरिवंश आदि। अबुल फजल ने इन कलाकारों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। उसने लिखा है कि, “अकवर के दरवार में सौ से अधिक निपुण एवं प्रसिद्ध चित्रकार थे। इनमें से पूर्णता प्राप्त करने वालों में अघकचरों की संख्या अधिक थी। इनमें से हिन्दू कलाकारों की संख्या अधिक थी, क्योंकि हिन्दू कलाकारों की चित्रकला आशा से अधिक अच्छी होती थी। वास्तव में उनके समान संसार में बहुत कम चित्रकार थे।"(आईने अकबरी) अकबर ने चित्रकला का एक अलग विभाग खोला था। यह विभाग ख्वाजा अब्दुस्समद की अध्यक्षता में था। 

अकबर इस विभाग की स्वयं देख-रेख करता था और काफी सहायता देता था। इस विभाग के चित्रकारों को मनसब भी दिये जाते थे। ये चित्रकार शाही नौकर समझे जाते थे। सम्राट की इस ओर काफी रुचि थी। इसी कारण चित्रकारी का एक स्कूल खोला गया था। इस स्कूल का नाम भारतीय राष्ट्रीय चित्रकला स्कूल था इस स्कूल के सदस्य केवल भारतीय ही न थे, बल्कि विदेशी सदस्य भी थे। इन सब सदस्यों का सम्मिलित उद्योग कला की उन्नति के लिए होता था। अकबर तथा उसके दरबारियों के चित्र खींचे जाते थे और वे चित्र संग्रह में सुरक्षित रखे जाते थे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अकबर ही नहीं, जहाँगीर भी चित्रकला का सुन्दर पारखी और संरक्षक था। जहाँगीर को जो उच्च कोटि के चित्र पसन्द आ जाते थे वह उनके लिए बड़े से बड़ा मूल्य देने को तैयार रहता था।

जहाँगीर स्वयं ही उच्चकोटि का चित्रकार था, उसे दूसरों की चित्रकारी पहचानने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। जहाँगीर चित्रकारी देख करके ही चित्रकार का नाम बता देता था। जहाँगीर 'तुजुके जहाँगीरी' में स्वयं लिखता है कि यदि अनेक कलाकारों द्वारा एक ही चित्र एक से अधिक चित्र बनाये जायें तो भी मैं प्रत्येक कलाकारों की चित्रकारी अलग-अलग बता दूंगा। यदि एक ही चित्र अनेक चित्रकारों द्वारा बनाया जाये तो भी उस चित्र के भिन्न-भिन्न अंगों के बनाने वाले चित्रकारों का नाम बता दूंगा।

जहाँगीर के दरबार में हिन्दू चित्रकारों में विशनदास, मनोहर, माधव, तुलसी और गोवर्धन आदि प्रसिद्ध, निपुण तथा अनुपम चित्रकार थे। इन चित्रकारों के अतिरिक्त आगा रजा, अब्दुल मुहम्मद नादिर, मुहम्मद मुराद और उस्ताद मंसूर प्रमुख चित्रकार थे। ये चित्रकार अपनी हसन,

योग्यता एवं निपुणता के लिए प्रारख्यात थे। जहाँगीर चित्रकला का अच्छा ज्ञान था। इसके उत्कट प्रेम और उत्साह के कारण चित्रकला चरम सीमा पर पहुँच गयी थी। जहाँगीर ने चित्रकला के उस स्कूल को उन्नति के शिखर पर पहुँचा दिया जिसकी नींव अकबर ने डाली थी। यद्यपि शाहजहाँ चित्रकला को संरक्षण देता रहा लेकिन उसमें अपने दादा और पिता की भाँति कला पारखी प्रवृत्ति नहीं थी। उसमें कला के प्रति उत्कृष्ट प्रेम नहीं था। उसकी दृष्टि सौन्दर्य पारखी दृष्टि नहीं थी। हाँ इतना अवश्य था कि शाहजहाँ चित्रकला के बजाय स्थापत्य कला का अधिक प्रेमी था। उसे आभूषण और जवाहरात आदि अधिक प्रिय थे। शाहजहाँ के समय में नाना प्रकार के रंगों और छाया के स्थान पर सोने-चाँदी की झलक की प्रधानता थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि जहाँगीर के समय में चित्रकला की जो उन्नति हुई थी, शाहजहाँ के काल में उसका पतन हो गया। चित्रकारों की संख्या वजाय बढ़ने के घटने लगी थी। चित्रकारों की संख्या घटने के साथ ही चित्रकला की भी काफी अवनति हुई। शाहजहाँ के दरवार में इने-गिने दो चार ही चित्रकार रह गये थे। फकीर ठल्लातु मीर हाशिम, अनूप चित्रा आदि ही दरबारी चित्रकार थे। शाहजहाँ का सबसे बड़ा पुत्र दारा कला का प्रवल संरक्षक था, लेकिन उसकी मृत्यु हो जाने से कला पर बड़ा घातक प्रहार हुआ।

औरंगजेब के समय में कला का पतन हो गया औरंगजेब चित्रकला का घोर विरोधी था, क्योंकि वह कट्टर मुसलमान था। कुरान के आदेशों पर चलने वाला था। कुरान में चित्रकला का निषेध है। औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा के महलों की चित्रकारी विगढ़वा दी और सिकन्दरा में अकबर के मकबरे पर चित्रों को बिगड़वा कर मन पर सफेदी करवा दी।

इस समय भी कुछ चित्रकार सम्राट की आज्ञा के विरुद्ध चित्र बनाते रहे। चित्रकार सम्राट की उदासीनता के कारण अवय, मैसूर, हैदराबाद और बंगाल के प्रान्तों के दरबारों में चले गये। लखनऊ और पटना के दरबारों ने योग्य कलाकारों को संरक्षण दिया। राजपूताने में चित्रकला उन्नति करती रही, पनपती रही। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के कांगड़ा की भी चित्रकारी देखने में इसकी एक शाखा टेहरी गढ़वाल की चित्रकारी थी। कुशल आलोचकों ने इन कलाओं की बड़ी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।

जहाँगीर का शासनकाल मुगल चित्रकला के स्वर्ण युग के रूप में- दिल्ली सल्तनत के शासकों ने चित्रकला को संरक्षण नहीं दिया था। मुगल साम्राज्य की स्थापना के बाद चित्रकला का विकास तेजी से अग्रसर हुआ। कला पारखियों ने भारतीय चित्रकला की तकनीकी तथा चित्रकारी के तरीके के आधार पर उसका वर्गीकरण किया है। हिन्दू शैली को राजपूत और मुस्लिम शैली को मुगल शैली का नाम दिया गया है। विभिन्न शैलियों को कलम के नाम से जाना जाता है। राजपूत चित्रकला के दो प्रमुख प्रतिभाजन हैं-जयपुर कलम और कांगड़ा कलम और मुगल चित्रकारी कई कलमों में विभक्त है। जैसे-दिल्ली, लखनऊ, पटना, कश्मीरी, दखिनी ईरानी, कलम। ईरानी और भारतीय प्रभावों का सुंदर सामंजस्य अकबर के शासनकाल में हुआ। जहाँगीर के शासनकाल में भारतीय शैली ने विदेशी त्त्वों को पूरी तरह आत्मसात कर लिया। जिससे एक राष्ट्रीय शैली उभर कर सामने आई। जहाँगीर के शासनकाल में चित्रकला की सर्वाधिक उन्नति हुई। अकबर के समय तैयार पृष्ठभूमि का पूर्ण परिपाक जहाँगीर के समय देखने में आया। अब तक सामंजस्य का कार्य पूर्ण

होकर अपने विशिष्ट रूप में आ गया था। विषय वस्तु से लेकर रंगों तक सर्वत्र कृत्रिमता जाती रही और उसके स्थान पर प्राकृतिक सौन्दर्य व स्वाभाविकता का पुट उभर कर सामने आया। अतः

जहाँगीर के शासनकाल (1605-1627 ई०) को मुगल चित्रकला का स्वर्ण युग कहा जाता है। जहाँगीर स्वयं चित्रकला में रुचि लेता था। वह इसका कुशल पारखी था। किसी चित्र को देखकर यह बता सकता था कि इसके विभिन्न भाग यदि अलग-अलग व्यक्ति के द्वारा बनाये गये हैं  तो कौन-सा भाग किस चित्रकार ने बनाया है। चित्रकला में उसकी उत्कट रुचि का वर्णन गिरीरो, (1609 ई०) विलियम हाकिन्स और सर टामस रो सदृश यात्रियों ने भी किया है। जहाँगीर के शासनकाल में चित्रकला में काफी प्रगति हुई। विषय और विधि दोनों में नवीनता व सजीवता आई। अब ऐतिहासिक पाण्डुलिपियों के चित्रांकन के स्थान पर प्रकृति चित्रण को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। पशु-पक्षियों और पेड़ -पौधों के जीवन्त चित्र बनाये गये। इन चित्रों के चारों ओर बेल-बूटेदार हाशिए बनाये गये। जिससे चित्रों को अद्भुत सौन्दर्य मिल सके। इस प्रयास में कभी-कभी तो हाशिए ही इतने सुन्दर बन गये कि मूल पृष्ठभूमि में चला गया और ऐसा लगने लगा कि चित्रकार का ध्येय हाशिए बनाना ही था।

जहाँगीर के शासनकाल में चित्रकला की एक और प्रमुख विशेषता यह रही कि अब व्यक्ति चित्र बहुत बड़ी संख्या में बनाये जाने लगे। हरम की बैगमों तक के चित्र बनाये गये। अकबर की तरह उसने भी हिन्दू चित्रकारों को प्रश्रय प्रदान किया। उस समय के कुशल चित्रकारों में अबुलहसन, नादिर-उज्जा , साजिवाहन, फर्रुख वेग, उस्ताद मंसूर, विशन दास, मनोहर, गोवर्धन, दौलत मुहम्मद, नादिर, उस्ताद मुराद इत्यादि प्रमुख थे। अबुल हसन उस समय का श्रेष्ठतम चित्रकार माना जाता है। उसके पिता ईरान के विख्यात चित्रकार आका रजा थे। अबुल हसन की प्रशंसा जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में की है। अबुल हसन के चित्रों में खास कल्पना और भावना है, तूलिका का लालित्य व चित्रांकन की कोमलता है। बैलगाड़ी जैसे साधारण विषयों में भी इसी तरह चित्रण किया गया है कि उससे चित्रकार की बड़ी सूक्ष्म निरीक्षण प्रतिभा झलकती है। कहीं भी आवश्यकता से अधिक अलंकार नहीं है और न ही अकाल्पिक प्रदर्शन। 

मुगल चित्रकला जहाँगीर के समय में अपने शिखर पर पहुँच गयी जहाँगीर इस कला का कुशल पारखी था। मुगल शैली में मनुष्यों के चित्र बनाते समय एक ही चित्र में विभिन्न चित्रकारों द्वारा मुख, शरीर तथा पैरों को चित्रित करने का रिवाज था। जहाँगीर का दावा था कि वह किसी चित्र में विभिन्न चित्रकारों के अलग-अलग योगदान को पहचान सकता था। शिकार, युद्ध और राजदरबार के दृश्यों को चित्रित करने के अलावा जहाँगीर के काल में मनुष्यों तथा जानवरों के चित्र बनाने की कला में विशेष प्रगति हुई। इस क्षेत्र में मंसूर का बहुत नाम था। मनुष्यों का चित्र बनाने का भी काफी प्रचलन था।

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