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बुधवार, 30 सितंबर 2020

मुगलकालीन भारत में महिलाओं की दशा

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मुगलकालीन भारत में महिलाओं की दशा

मुगलकालीन भारत एवं आज के भारत में बहुत कुछ साम्यता थी। यह पूर्ण सत्य है कि उस समय न तो रेलें थी एवं न ही पक्की सड़के। इसके अतिरिक्त और कोई बहुत बड़ी भिन्नता नहीं थीं। देहात बहुत अधिक थे एवं वन उस समय के बहुत घने थे। उस समय के समृद्ध नगरों में आगरा, फतेहपुर सीकरी, दिल्ली, इलाहाबाद, मुल्तान, लाहौर अहमदाबाद, बनारस, ढाका और अजमेर इत्यादि थे तथा उस समय कलकत्ता, बम्बई, मद्रास जैसे नवीन नगर नहीं थे। मुस्लिम समाज- मुसलमान दो प्रकार के थे। एक वे जो अरब, फारस एवं अन्य देशों से नौकरी तथा व्यापार के लिए भारत आये थे। दूसरे प्रकार के वे मुसलमान थे, जो पहले तो हिन्दू थे लेकिन बाद में सल्तनत एवं मुगलकालीन शासकों द्वारा मुस्लिम बना लिये गये थे। यह मुस्लिम समाज मुख्यतः तीन वर्ग में विभाजित किया जाता सकता है- शासक वर्ग, अभिजात वर्ग एवं जन साधारण वर्ग । 

वहीं दूसरी ओर कुछ मुस्लिम विद्वान उमरा वर्ग, उलेमा वर्ग एवं जनसाधारण वर्ग में विभक्त करते हैं। यदि हम सूक्ष्म अध्ययन करें, तो हम मुगलकालीन मुस्लिम समाज को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है- शासक वर्ग, उलेमा वर्ग, मध्यम वर्ग, शिल्पकार, कृषक तथा छोटे व्यवसाय में लगे हुए लोग तथा निम्नवर्ग। शासक वर्ग में बादशाह एवं उसके परिवार के सदस्य एवं निकट सम्बन्धी तथा उमरा आदि सम्मिलित थे। इनकी स्थित बहुत अच्छी थी द्वितीय वर्ग उलेमा की स्थिति भी बहुत अच्छी थी। तीसरा वर्ग मध्यम वर्ग था जिसमें शिक्षक, ज्योतिषी, हकीम, कवि, व्यापारी, साधारण अमीर, मध्यस्थ जमींदार, वेतन भोगी, राज्य कर्मचारी इत्यादि थे। 

इनकी दशा में सल्तनत काल की अपेक्षा काफी सुधार हुआ तथा इन्होंने मुगलकालीन देश के आर्थिक विकास में मुख्य भूमिका निभायी। चौथा वर्ग शिल्पकारों कृषकों तथा छोटे व्यवसाय में लगे हुए लोगों का था। इनकी दशा भी ठीक-ठाक थी तथा वे सुखमय जीवन व्यतीत करते थे पाँचवें वर्ग में मुस्लिम समाज का निम्न वर्ग था जिसके अंतर्गत श्रमिक भूमिहीन कृषक, बेरोजगार, दास इत्यादि थे। ये वर्ग अन्य वर्गों पर आश्रित थे तथा इनकी आर्थिक दशा सन्तोषजनक नहीं थी।

हिन्दू समाज- हिन्दू समाज भी जाति, धर्म, मत एवं व्यवसाय के आधार पर विभाजित था। वर्ण व्यवस्था के अनुसार यह समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र में विभाजित था। ब्राह्मणों का क्षेत्र धार्मिकता के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्र से भी जुड़ा था। मुगल शासकों ने भी उन्हें आश्रय प्रदान किया था विशेषकर उन्हें दिवाने विजारत में सेवा का अवसर प्रदान किया गया। हिन्दू शासक वर्ग में स्वायत्त अर्द्धस्वतन्त्र राजपूत अथवा किसी भी हिन्दू जाति के शासकों की गणना की जा सकती थी। अकबर के शासनकाल से लेकर 18वीं शताब्दी के पूर्व ही तक अनेक हिन्दू शासक मनसबदारी, करदाताओं, पेशकश देने वालों के रूप में साम्राज्य से सम्बद्ध थे। राजपूत शासक मुगल शासन के अन्तर्गत भी अपने राज्यों में आन्तरिक शासन को संचालित करने में पूर्णत: स्वतन्त्र थे। कई मुगल शासकों ने इन्हें इनकी योग्यता के अनुसार उपाधियाँ, सूचक चिह्न, जागीरें, वेतन तथा उपहार भी प्रदान किये। हिन्दू समाज का द्वितीय वर्ग विभिन्न सम्प्रदायों के सन्तों, धर्म प्रचारकों, भिक्षुओं एवं सन्यासियों का था। 

हिन्दू समाज का तिसरा वर्ग मध्यम वर्ग था जिसमें कवि साहित्यकार, लेखक ज्योतिष, व्यापारी समुदाय, दलाल, सर्राफ, साहूकार, वैद्य, विधिशास्त्री, शिक्षक, सैनिक एवं राजकीय विभागों में कार्यरत कर्मचारी इत्यादि थे। निम्न वर्ग की दशा बहुत दयनीय थी जो सदियों से उच्चवर्ग की सेवा करके अपना जीवनयापन कर रहे थे मुगलकाल में हिन्दुओं में मूर्ति पूजा भी होती थी अकबर एवं जहाँगीर के काल में धार्मिक स्वतन्त्रता हिन्दुओं की दी गयी थी। खान-पान- हिन्दुओं और मुसलमानों में सामान्य जनता का खान-पान मांस को छोड़कर लगभग एक ही जैसा था। 

अकबर के काल में रविवार के दिन पशुवध पर रोक था। जहाँगीर ने तो रविवार एवं बृहस्पतिवार दोनों दिन पशु वध पर रोक लगा दो। मुसलमानों के भोजन में गेहूँ तथा जौ की बनी हुई रोटी,रागनी, चावल, कबाब, जुजबिरयान, कीमा पुलाव एवं फालूदा मुख्य था। इनके यहाँ छुआएत नहीं था। हिन्दू में ब्राह्मण वर्ग शाकाहारी होते थें, किन्तु पंजाब एवं बंगाल इसका अपवाद है। राजपूत भी मांस खाते थे इनके भोजन में रोटी, चावल, दाल सब्जी तथा विशेष अवसरों पर पूड़ी कचौड़ी आदि मुख्य थी। हिन्दुओं के यहाँ छुआूत का विचार बहुत था। 

यहाँ तक निम्नवर्ग का व्यक्ति किसी उच्चवर्ग के व्यक्ति को छु भी नहीं सकता था। मद्यपान भी प्रचलित था, जो शराब अंगूर ताड़ी, खजूर तथा महुआ आदि से बनायी जाती है। मुगलकालीन शासकों ने शराब की भर्त्सना की एवं औरंगजेब ने मद्यपान पर प्रतिबंध भी लगाया था। अन्य मादक द्रव्यों में अफीम पोस्ता, तम्बाकू गाँजा आदि का सेवन किया जाता था हुमायूँ भी अफीम का शौकीन था। हिन्दू लोग प्रायः गाँजा, भाँग तथा तम्बाकू का प्रयोग करते थे। वेशभूषा- मुगल बादशाह वेषभूषा के प्रति बहुत सजग थे हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, तथा शाहजहाँ वस्त्रों के विशेष शौकीन थे। 

वे सिल्क के कपड़े जिनपर सोने का काम हुआ रहता था धारण करते थे, किन्तु औरंगजेब सादी वेशभूषा का प्रयोग किया करता था अमीर वर्ग के वस्त्र में कुलह, कबा, शलवार, चूड़ीदार पायजामा मुख्य था। इसी तरह उच्च हिन्दू वर्ग की वेशभूषा बहुत आकर्षक थी। ब्राह्मण की पहचान धोती. तिलक, जनेऊ थीं मुस्लिम स्त्रियाँ शलवार, चूड़ीदार पायजाया, कमीज और दुपट्टा प्रयोग करती थीं। परदा योग्य स्त्रियाँ बुरका का प्रयोग करती थीं। हिन्दू स्त्रियाँ साड़ी एवं अंगिया का प्रयोग करती थी भारतीय स्त्रियाँ लँहगा, चोली तथा अंगिया पहनती थीं। 

मनोरंजन के साधन-मुगल काल में शासक से लेकर प्रजा तक सभी की आमोद-प्रमोद में विशेष रुचि थी जिसके विभिन्न साधन थे। दंगल, पोलो, घुड़दौड़ कबूतर बाजी, तीतरबाजी, बुलबुल बाजी, पशुयुद्ध, गजयुद्ध, शिकार, शतरंज ताश, चौपड़, नर्द, पचीसी एवं बाग बगीचे आदि मनोरंजन के साधन थे। मुगल शासकों को शिकार बहुत प्रिय था। शिकार के प्रबन्ध के लिए 'अमीरे शिकार' के अधीन शिकार विभाग की स्थापना की गयी नृत्य एवं संगीत भी मनोरंजन का प्रमुख साधन था। अकबर के नवरत्नों में संगीतकार तानसेन का नाम विशेष उल्लेखनीय है लेकिन बादशाह औरंगजेब संगीत का विरोधी था। 

त्योहार एवं मेले- मुगलकाल में राष्ट्रीय त्योहारों में शासक के जन्मोत्सव का त्योहार, नवरोज एवं मीना बाजार प्रमुख थे। मुस्लिम त्योहारों में शब-ए-बरात, ईद-उल-फितर, ईद-उल-जुहा, मोहर्रम, बारावफात, ईद मिलाद, आखिरी चहार, शम्बा, चेहल्लम इत्यादि मुख्य त्योहार थे। हिन्दुओं में त्योहारों की संख्या बहुत अधिक थी। हिंदुओं के त्योहारों में होली, रक्षाबन्धन, दशहरा, दीपावली, बसन्त पंचमी, शिवरात्रि रामनवमी, जन्माष्टमी इत्यादि मुख्य थे। हिन्दुओं के मेले काशी प्रयाग, मधुरा, अयोध्या, गया, द्वारिकापुरी आदि तौर स्थानों पर विशेष अवसरों पर लगते थे। मुस्लिमों के मेले सोफियों की मजार पर लगते थे, जिसमें अजमेर, पानीपत, दिल्ली, सरहिन्द, बहराइच टनकपुर का नाम विशेष उल्लेखनीय है। 

विवाह-मुसलमान तथा हिन्दुओं दोनों के लिए विवाह का मुख्य महत्त्व था। बादशाह अकबर ने विवाह के लिए लड़कों की आयु 16 वर्ष एवं लड़कियों को 14 वर्ष घोषित की। 

मुसलमानों में विवाह के दो प्रकार होते थे- निकाह एवं मृत विवाह। धर्म के अनुसार एक मुस्लिम चार विवाह कर सकता है। हिन्दुओं में विवाह एक पवित्र संस्कार माना जाता था उच्च वर्ग में बहुविवाह प्रथा भी प्रचलित थी लेकिन जनसाधारण वर्ग में एक ही विवाह प्रचलित था। मृतक संस्कार- मुस्लिमों में श्वों को दफनाया जाता था तथा हिन्दुओं में जलाया जाता था। मुसलमानों में मृतकों के लिए मरने के तीसरे दिन सोएम तथा चालीसवें दिन चेहल्लुम नामक संस्कार किया जाता था। हिन्दुओं में श्राद्ध एवं तेरहवीं मुख्य मृतक संस्कार था। महिलाओं (स्त्रियों) की दशा-इस्लाम में मानव समानता पर जोर दिया गया इस्लाम धर्म के पैगम्बर मोहम्मद साहब ने भी स्त्री-पुरुष को समान माना है, लेकिन वास्तविक रूप में अन्य धर्मों के समान इस्लाम में भी पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के अधिकार संकुचित ही हैं। 

मुगल कालीन भारत में भी महिलाओं की स्थिति पुरुषों की अपेक्षा निम्नतर ही थी। जहाँ तक हिन्दू स्त्रियों का सवाल है उनका पूरा जीवन संरक्षण में ही व्यतीत होता था मुगल मुस्लिम समाज में विभिन्न वर्गों की स्त्रियों की दशा भी भिन्न थी। शासक वर्ग के स्त्रियों की दशा अन्य वर्गों की स्त्रियों की दशा से अच्छी थी। मुस्लिमों में हरम (अंतःपुर) होता था जहाँ उनकी पत्नियाँ एवं राज परिवार की अन्य महिलाएं रहती थीं। उनकी सेवा में अनेक दासियाँ एवं महिला सेविकाएँ होती थीं। शासक की माता प्रथम महिला एवं उसकी पत्नी का विशेष स्थान था। हरम में स्त्रियों की शिक्षा का भी प्रबन्ध होता था। 

इन स्त्रियों को उपधियाँ, जागीर, नकद धनराशि एवं परितोषिक भी मिलता था। राजपरिवार की स्त्रियों के मनोरंजन के लिए गायिका नर्तकियाँ एवं सभी कलाओं में निपुण महिलाएँ भी रहती थीं। मुगल राजपरिवार की महिलाओं में हुमायूँ की पत्नी हमीदा बनू बेगम, अकबर की पत्नी सलीमा बेगम, जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ, शाहजहाँ की पत्नी मुमताज महल, बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम, तथा शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा एवं रोशनआरा को विशेष सम्मान प्राप्त था। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने ऐतिहासिक ग्रन्थ हुमायूँनामा की रचना की तथा शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा भी एक उच्चकोटि की कवयित्री थी। हमीदा बानो बेगम ने हुमायूँ के मकबरा तथा नूरजहाँ ने एत्माद्दौला के मकबरे का निर्माण करवाया। 

नूरजहाँ की माता असमत बेगम ने गुलाब के इत्र का अविष्कार किया। उच्च उमरा वर्ग की गणना भी शासक वर्ग में की जाती थीं। इनकी स्त्रियों को भी मुस्लिम शासक की स्त्रियों के समान सुख एवं सुविधाएं प्राप्त थी। हिन्दू शासक वर्ग में स्वायत्त शासक, जमींदार, एवं उच्च उमरा शामिल थे इनकी स्त्रियों का जीवन भी वैभवपूर्ण था। मध्यम वर्ग के अन्तर्गत शिक्षक, हकीम, ज्योतिष, साधारण अमीर, मध्यस्थ जमींदार, व्यापारी, वेतनभोगी राजकीय कर्मचारी आदि शामिल थे। इस वर्ग की मुस्लिम एवं हिन्दू स्त्रियों की दशा समान थी तथा वे भी कई प्रकार की सुख-सुविधाओं का उपभोग करती थीं।

शिल्पकार, कृषक एवं छोटे व्यवसायी वर्ग की स्त्रियों की दशा मध्यम वर्ग से निम्नतर थी। इस वर्ग की मुस्लिम एवं हिन्दू स्त्रियों अपने पति के व्यवसायों में भी सहयोग देती थीं। जहाँ तक निम्न वर्ग की स्त्रियों का सवाल है तो उनकी दशा दयनीय थी। ये स्त्रियाँ उच्च एवं मध्यम वर्ग के परिवारों में सेवा करके अपना जीविकोपार्जन करती थीं।

सामाजिक प्रथाओं का जहाँ तक प्रश्न है मुस्लिमों के आगमन के पूर्व भारत में पर्दा प्रथा का अभाव था। लेकिन जब मुस्लिमों का आगमन हुआ तो हिन्दुओं ने अपनी रक्त शुद्धता बनाये रखने के लिए पर्दा प्रथा पर जोर दिया। मुसलमान में पर्दाप्रथा का विशेष महत्त्व था। यहाँ तक कि मुगल वंश के उदार शासक अकबर के समय भी पर्दाप्रथा पर जोर दिया गया। अकबर के समकालीन इतिहासकार बदायूनी ने लिखा है, "यदि कोई स्त्री बिना बुरका या बिना परदा किये हुए सड़कों या बाजारों में घूमती हुई पायी जाती थी तो उसको वेश्यालय भेज दिया जाता या जहाँ वह वेश्या के पेशे को ग्रहण कर लेती थी"। पर्दा प्रथा इतनी जोर पकड़ चुकी थी कि शासक वर्ग की स्त्रियों का इलाज उनके कपड़े को सूंघ कर किया जाता था, क्योंकि वैद्य अघवा हकीम उनका स्पर्श नहीं कर सकते थे।

समाज में एक अन्य रूढ़िवादी प्रथा सती प्रथा थी, जो पति की मृत्यु के बाद होती थी। हिन्दू समाज के अनुसार पति की मृत्यु के पश्चात् पत्नी को बहुत ही दयनीय जीवन जीना पड़ता था, अथवा उसे पति की चिता के साथ जलना पड़ता था। पति के साथ जलने की इस प्रक्रिया को सती प्रथा कहते हैं। अधिकांश स्त्रियों दयनीय जीवन की अपेक्षा पति के साथ जलना ही पसन्द करती थीं, क्योंकि रूढ़िवादी प्रथा के अनुसार यह पुण्य का काम माना जाता था। जौहर प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह, दहेज प्रथा, दास प्रथा, देवदासी प्रथा तथा वेश्यावृत्ति प्रथा एवं स्त्रियों के अधिकारों का हनन करने वाली कई प्रथाएँ समाज में प्रचलित थीं। जौहर प्रथा राजपूत स्त्रियाँ राजपूतों के हारने के पश्चात् मुस्लिमों से अपने सतीत्व की रक्षा के लिए करती थीं। 

जिसमें स्त्रियों का सामूहिक चिता प्रवेश होता था। बहुविवाह प्रथा उच्चवर्ग के हिन्दू एवं मुस्लिमों में प्रचलित थी। समाज की सबसे बड़ी बुराई बाल विवाह एवं दहेज प्रथा थी। दासों को रखना उच्च वर्ग के लोगों के लिए सम्मान माना जाता था। देवदासी प्रथा तो दक्षिण भारत के मन्दिरों में प्रचलित थी। जहाँ हिन्दू लोग अपने आराध्य देवता को अपनी पुत्रियों को समर्पित कर दिया करते थे। कालान्तर में देवदासी प्रथा का दूषित रूप सामने आया जब मन्दिर के पुरोहितों ने देव दासियों का यौन-शोषण प्रारम्भ कर दिया मुगल काल में ही स्त्री अधिकारों का शोधण करने वाली एक अन्य प्रथा वेश्यावृत्ति प्रचलित थी। इस प्रथा से राज्य की आय में भी बढ़ोत्तरी होती थी, जिससे इस पर रोक लगाना और कठिन हो गया। अकबर ने वेश्याओं के रहने के लिए शहर से बाहर एक स्थान बनवाया जिसे शैतानपुरी कहा जाता था।

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