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मुगल काल में फारसी साहित्य के विकास

मुगल काल में फारसी साहित्य के विकास 

मध्यकाल में मुगल सम्राट साहित्य के संरक्षक थे और इसकी विविध शाखाओं के विकास को उन्होंने खूब प्रेरणा दी। सम्राट ही नहीं हुमायूँ की माता से लेकर औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा तक अन्तपुर की स्त्रियां भी कला और साहित्य की संरक्षिकाएँ थीं। वे सुन्दर वस्तुओं, उद्यानों, चित्रकारी के कामों, जरी के कामों और सुन्दर भवनों को अधिक पसन्द करती थीं। बाबर और जहाँगीर ने स्वयं अपनी-अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। अकबर के राज्याश्रय में अनेक विचार और विद्वान् समृद्ध हुए और उन्होंने रुचिकर एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की। 

अकबर में विद्वनों के प्रति उत्तम आदर व श्रद्धा की भावना थी तथा धर्मों और दार्शनिक कार्यों में उसका प्रगाढ़ स्नेह था। इसके फलस्वरूप एशिया के विविध प्रश्नों के विद्वान् कवि और साहित्य उसकी राजसभा में एकत्र हुए थे। फारसी साहित्य-अकबर के काल का फारसी साहित्य तीन भागों में विभक्त किया जाता है-

(अ) ऐतिहासिक ग्रन्थ (ब) अनुवाद और (स) काव्य ग्रन्थ इस युग के ऐतिहासिक ग्रन्थ मुल्ला दाद द्वारा रचित तारीख-ए-हल्की अबुल फजल द्वारा रचित 'आईने-ए-अकबरी' और 'अकबरनामा', और बदायूँनी द्वारा लिखी हुई 'मुन्तखब-उल-तवारीख', निजामुद्दीन अहमद की 'तबकात-ए-अकबरी', फौजी सरहिन्दी का 'अकबरनामा' और अब्दुल वकी का 'मासिर-ए-रहीमी है। अकबर के समय का फारसी का सबसे प्रसिद्ध लेखक अबुल फजल था। उसकी रचनाएँ विचारात्मक और राजनीतिक आधार पर होती थी। वह एक बड़ा विद्वान, कवि, लेखक, निबन्धकार, समालोचक, और इतिहासज्ञ था हिन्दुओं के उच्च साहित्य का फारसी में अनुवाद करने की दृष्टि से भी वह प्रख्यात था। 

अकबर की आज्ञा से संस्कृत और अन्य भाषाओं के अनेक ग्रन्थों का अनुवाद फारसी में हुआ था। अनेक मुस्लिम विद्वानों ने महाभारत के विविध भागों का फारसी में अनुवाद किया और 'रज्मनामा के नाम से इनका संकलन हुआ। 1589 ई. में बदायूँनी ने रामायण का अनुवाद पूर्ण किया, हाजी, इब्राहिम सरहिन्दी ने अथर्ववेद का अनुवाद किया, फैजी ने गणित के ग्रन्थ 'लीलावती का अनुवाद और मुहम्मद खाँ गुजराती ने ज्योतिष पर लिखे एक निबंध का फारसी भाषा में अनुवाद किया कुछ यूनानी और अरबी भाषा के ग्रन्थ भी फारसी में अनुवादित हुए। इस युग में गद्य और पद्य दोनों में ग्रन्थों की रचना हुई। 

अकबर के संरक्षण में अनेक कवियों ने अच्छे काव्य ग्रन्थों की रचना की। इन कवियों में सबसे अधिक प्रसिद्ध गाली, फैजी, गजलों का लेखक मुहम्मद हुसेन, नजीरी और कसीदों के लेखक सैयद जलालुद्दीन उर्फी थे। गिजाली के प्रमुख ग्रन्थ, 'मीर-तुलकेनात', 'नक्श-ए-वदीद और इसरार ए-मतलब हैं। अकबर के दरबार का यह प्रतिभाशाली कवि था। फैजी भी राजसभा का प्रनुख कवि था परन्तु वह फारसी भाषा में हिन्दू धर्मों के अनुवाद के नाते अधिक प्रसिद्ध था। अब्दुर्रहीम खान ए-खाना जो दरबार का प्रसिद्ध अमीर था, फारसी भाषा का प्रसिद्ध विद्वान् और कवि भी था। जहाँगीर की साहित्य में बड़ी रुचि थी, और वह भी विद्वानों को राज्याश्रय देता था।

वह विद्वानों का आदर करता था। उसके दरबार को सुशोभित करने वालों में गयासवेग, नवखा, नियामतुल्ला और अब्दुल हक प्रसिद्ध थे। उसके शासन काल में कतिपय इतिहासकार भी थे। राजकुमार दाराशिकोह के विद्वत्ता पूर्ण ग्रन्थ फारसी भाषा के श्रेष्ठ ग्रन्थ हैं। उसने भगवद्गीता, उपनिषद् और योगवशिष्ठ का फारसी में अनुवाद किया तथा 'खुलासत-उल-तवारीख जैसे ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखे गये।

ऐतिहासिक ग्रन्थ भी लिखे गये थे। शाहजहाँ ने भी विद्वानों को राज्याश्रय देने में अपने पिता का अनुकरण किया। अनेक कवियों और धर्मशास्त्रज्ञों के अतिरिक्त, पादशाहनामा के रचयिता अब्दुल हसन लाहौरी और 'शाहजहाँनामा' के लेखक इनायत खान जैसे प्रसिद्ध और मौलिक ग्रन्थ भी लिखे। कट्टर सुन्नी होने पर भी औरंगजेब मुस्लिम धर्मशास्त्रों और न्यायशास्त्र का उच्च कोटि का विद्वान् था। 

उसके आदेशानुसार 'फतवा-ए-आलमगिरी की रचना हुई। उसके शासन काल में आलमगीरनामा', 'मासिर-ए-आलमगिरी हिन्दी साहित्य-हिन्दी में 1526 ई. के बाद प्रसिद्ध महाकाव्य पद्मावत के रचयिता नलिक मुहम्मद जायसी प्रथम प्रसिद्ध लेखक हुए। इस ग्रन्थ में चित्तौड़ की रानी पद्मिनी की कहानी है। अकबर का शासन काल हिन्दी साहित्य के लिए स्वर्णयुग प्रमाणित हुआ। हिन्दी कविता में अकबर को तीव्र अभिरुचि और राज्याश्रय ने हिन्दी साहित्य को खूब प्रोत्साहित किया। अकबर की शानदार राज्यों पर शासन सुधारकों ने एक नवीन युग का सूत्रपात किया सोलहवीं सदी का उत्तरार्द्ध कल्पना की प्रचुरता और दिव्य अभिव्यक्ति का युग था। यह उन साहसी कार्यों का काल था जिसने मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट शक्तियों को प्रदर्शित किया। 

कवियों, विचारकों लेखकों और विद्वानों ने देशज भाषाओं के साहित्य को देदीप्यमान कर दिया। अकबर के दरबारियों में राजा बीरबल, राजा मानसिंह, राजा भगवान दास और पृथ्वीराज राठौर प्रसिद्ध कवि थे। राजा टोडरमल ने हिन्दुओं के धर्मशास्त्र पर एक पिचारपूर्ण पुस्तक लिखी है और हिन्दी में कविता भी रची हैं पृथ्वीराज राठौर वेलिकृष्ण राज के लेखक थे। परन्तु अकबर ने दरबारियों में सबसे अधिक लब्धप्रतिष्ठ व प्रतिभासम्पन्न कवि अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना था जिसके दोहे आज भी अधिक अभिरुचि और उत्साह से पढ़े जाते हैं। इसके द्वारा लिखित रहीम सतसई का हिन्दी साहित्य में आदरणीय स्थान है। नरहरि, करण, हरीनाथ और गंग भी अकबर के दरबार में प्रसिद्ध हिन्दी लेखक और कवि थे।

इस युग का अधिकांश साहित्य धार्मिक था। कृष्ण या राम की जीवन कथाएँ ही इस युग की अधिकांश कविता के विषय थे। कृष्ण उपासक के अनेक लेखक जमुना नदी की घाटी व्रजभूमि में रहते थे। इसमें से आठ प्रसिद्ध व्यक्तियों को 'अष्टछाप' नाम दिया गया है, जिनमें सूरदास सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। इन्होने ब्रज भाषा में अपनी काव्य रचना करके अपने ग्रन्थ 'सूरसागर में कृष्ण के प्रारम्भिक जीवन की क्रीड़ाओं का वर्णन किया और कृष्ण तथा उनकी प्रेमिका राधा के सौन्दर्य पर अपने छन्दों की रचना की है। 

इनके सरस तथा मार्मिक छन्द अपनी मधुरता और हृदयहारिता के लिए हिन्दी साहित्य की अनुपम कृति हैं। इन्होंने ब्रज भाषा का प्रयोग कर उसे साहित्य का रूप दिया। अष्टछाप के अन्य प्रसिद्ध कवि नन्ददास, कृष्णदास, परमानन्ददास, कुम्भनदास व चतुर्भुजदास है। हिन्दी का प्रसिद्ध कृष्ण भक्त कवि रसखान, वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलदास का शिष्य था और वह अनेक सरस छन्दों का रचयिता था। राम मार्गी लेखकों में सबसे अधिक प्रसिद्ध तुलसीदास थे। जिन्होंने लोगों की बोलचाल की भाषा में रामचरितमानस लिखा और इसलिए उन्हें भारत का कवि कहा जा सकता है। वे उच्च कोटि के कवि ही नहीं थे वरनू एक आध्यात्मिक गुरू भी थे।

 जिनका नाम आज भी घर-घर में श्रद्धापूर्वक लिया जाता है और लाखों मनुष्य उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थ राम गीतावली', 'कृष्ण गीतावली', 'विनय पत्रिका', 'पार्वती मंगल', 'जानकी मंगल', 'दोहावली', 'वैराग्य संदीपनी' हैं। परन्तु उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ 'रामचरितमानस' है जो राम के गुण गौरव की गाथा है। यह काव्य प्रतिभा का दिव्य महाकाव्य ही नहीं, अपितु लोगों का धार्मिक ग्रन्थ भी है जिसकी ओर हिन्दी के प्रमुख भाषा-भाषी सभी व्यक्ति आध्यात्मिक प्रेरणा के लिए देखते हैं और जिनकी नैतिकता के नियम राजा से रंक तक सभी लोगों की जिहा पर रहते हैं। वास्तव में रामायण लाखों लोगों का 'बाइबिल' ग्रन्थ है साहित्यिक कृति और धार्मिक अभिव्यक्ति, दोनों ही दृष्टियों से तुलसीदास जी को रामायण सर्वोत्कृष्ट है। 

तुलसीदास जी ने अपनी अलौकिक प्रतिभा के बल पर राम कथा को धर्म तथा साहित्य के सर्वोत्कृष्ट शिखर पर पहुँचा दिया, गुमराह जनता का मार्ग दर्शन किया और हिन्दुत्व की रक्षा की। तुलसीदास जी का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्त्व विलक्षण है। उन्होंने हिन्दू धर्म की सम्प्रदायों और विभेदों से रक्षा की, क्योंकि रामचरितमानस का मर्म राम की उपासना को सर्वोत्कृष्ट बताने पर भी इतना विशाल था कि उसने सभी सम्प्रदायों को अपना लिया था और भक्ति को अधिक दृढ़ रूप से प्रेरणा दी थी। केशवदास, सेनापति और त्रिपाठी बन्धुओं ने शाहजहाँ और औरंगजेब के शासन में काव्य कला को व्यवस्थित करने के सफल प्रयत्न किये। केशव दास ने साहित्य की मीमांसा शास्त्रीय पद्धति पर करके काव्य रचना का पांडित्यपूर्ण आदर्श प्रस्तुत किया।

इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ 'रामचन्द्रिका' है। इसी युग के अन्य प्रसिद्ध कवि सुन्दर, सेनापति, भूषण देव और बिहारी हैं। भूषण ने अपने हिन्दू समुदाय के यश गौरव की गाथाएँ गायी और शिवाजी तथा छत्रसाल बुन्देला ने उन्हें राज्याश्रय दिया। इनके प्रमुख ग्रन्थ 'शिवावावनी 'छत्रसाल शतक और 'शिवराज भूषण हैं। सुन्दर कवि ने सुन्दर श्रृंगार की रचना की। इनकी कवि प्रतिभा से प्रभावित होकर सम्राट शाहजहाँ ने इन्हें महा कविराय की उपाधि दी थी। विहारी का प्रमुख ग्रन्थ बिहारी सतसई है जिसमें सात सौ दोहे हैं। ये बड़े मार्मिक और हृदयग्राही हैं। बंगला साहित्य-इस युग में बंगाल में दिव्य, अलौकिक वैष्णव साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ। 

बंगाल साहित्य की अनेक शाखाओं जैसे पद, गीत, भजन और चैतन्य के जीवन चरित्रों ने बंगाल के लोगों के हृदय को प्रेम और उदारता की भावनाओं से ओत-प्रोत ही नहीं किया वरन् इन्होंने इस युग के प्रान्तीय-सामाजिक झांकी भी प्रदर्शित की है। इसी काल में भागवत और बड़े-बड़े महाकाव्यों के बंगला में अनेक अनुवाद हुए और चंडी देवी तथा मनसादेवी के गुणगान में ग्रन्थ लिखे गये। इस काल में बंगाल के काशीराम दास, मुकुन्दराम चक्रवर्ती और धनाराम जैसे कवि हुए। भारतचन्द्र और रामप्रसाद के ग्रन्थ मुगल साम्राज्य के पतन के बाद लिखे गये। इनके अतिरिक्त, अन्य हिनद मुसलमान कवियों ने भी अपनी कृतियों द्वारा बंगला साहित्य की सेवा की।

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