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मध्यकालीन भारत में भक्ति आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्त

मध्यकालीन भारत में भक्ति आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्त 

भक्ति आन्दोलन सामान्य परिचय मध्यकालीन भारत अर्थात् सल्तनत युग के सांस्कृतिक युग को जिन दो तत्वों ने विशेष रूप से प्रभावित किया, उनमें से प्रमुख है- भक्ति आन्दोलन और सूफी मत। इन दोनों आन्दोलनों ने समाज की आधार शिला (दिशा) को बदल दिया। प्राचीन युग में हिन्दुओं का मानना था कि मोक्ष प्राप्ति अथवा जन्म-मरण के बन्यन से मुक्त होने के तीन मार्ग है-ज्ञान, कर्म और भक्ति मध्यकाल में अनेक ऐसे विचारक हुए जिन्होंने भक्ति को अधिक महत्त्व दिया और इस तरह एक नूतन आन्दोलन का सूत्रपात हुआ, जिसे कि भक्ति आन्दोलन के नाम से सम्बोधित किया जाता ही सामान्यतया यह आन्दोलन पूर्ण रूप से वेतन नहीं था और न ही इसके अभ्युदय का कार इस्लाम था, जैसा कि भ्रम वश कुछ लेखक मानते हैं। 

वास्तव में मूर्तिपूजा के विरोधी मुस्लिम धर्म प्रचारकों की उपस्थिति के कारण जिन्होंने हिन्दू धर्म एवं विचारों का खण्डन किया, उसे इस आन्दोलन को और अधिक प्रेरणा मिली। इस आन्दोलन का इतिहास शंकराचार्य के समय से आरम्भ होता है, जिन्होंने हिन्दू धर्म को एक ठोस और दार्शनिक आधार प्रदान किया। उन्होंने अद्वैत की स्थापना को और मोक्ष प्राप्ति हेतु ज्ञान पर अधिक बल दिया, किन्तु साधारण लोगों ने हृदय से उनके विचारों का स्वागत नहीं किया साधारण जनता के मस्तिष्क को हिन्दू धर्म की ओर आकृष्ट करने के उद्देश्य से मध्यकालीन विचारकों ने तीसरे मार्ग, अर्थात् भक्ति को अधिक महत्त्व दिया। भक्ति आन्दोलन के सामान्य सिद्धान्त- रामानन्द, कबीर, चैतन्य, गुरु नानक, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य और तुलसी आदि ने भक्ति का प्रतिपादन किया। यद्यपि उनके सिद्धान्तों और शिक्षाओं में पर्याप्त मतभेद था, परन्तु कुछ ऐसी मूलभूत बातें धीं जिनको सभी भक्त स्वीकार करते थे। यह सिद्धान्त स्वीकारात्मक और नकरात्मक दोनों ही थे। यहाँ इन दोनों सिद्धान्तों का वर्णन किया जा रहा है स्वीकारात्मक सिद्धान्त-भक्ति-आन्दोलन के स्वीकारात्मक सिद्धान्त निम्नलिखित थे 

1. ईश्वर की एकता में विश्वास - भक्ति-आन्दोलन के सभी महापुरुषों ने इस बात को स्वीकार किया था कि ईश्वर एक है। सभी महापुरुषों ने ईश्वर की एकता में विश्वास प्रकट किया। यद्यपि लोग विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करते थे, परन्तु मक्तों ने उसी एक ईश्वर के दर्शन किए।

2. ईश्वर के प्रति अपार प्रेम-सभी भक्तों ने ईश्वर प्रेम पर बल दिया। इन सबका विश्वास था कि भक्ति और ज्ञान द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती है और ईश्वर के प्रति अपार प्रेम हो सकता है।

3.आत्म-समर्पण की भावना- सभी महापुरुषों ने यह शिक्षा दी कि अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णरूप से समर्पित कर दो और ईश्वर तुम्हारी सहायता अवश्य करेगा सांसारिकता में लोन न हो और उस समय परमात्मा के प्रति अपने जीवन को समर्पित कर दो। 4. गुरू की महत्ता का वर्णन- सभी महापुरुषों ने गुरू को अधिक महत्त्व प्रदान किया।

4.उनका मत था कि गुरु ही ईस्वर-प्राप्ति इसमें ज्ञान का संचार करता है।

5. हृदय की स्वच्छता पर बल-सभी महापुरुषों का यह विचार था कि स्वच्छ हृदय के द्वारा ही ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है। जिस व्यक्ति का हृदय कलुषित है, वह कभी भी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। 6. मानवतावादी भावना का प्रभाव- सभी महापुरुष मानवतावादी की भावना से प्रभावित पे। 

उन्होंने विश्व-बंधुत्व का पाठ पढ़ाया। उनका मत था कि समस्त जीव उस एक ही परमात्मा के अंश हैं और हम सबके अन्दर एक ही आत्मा विद्यमान है। नकारात्मक सिद्धान्त-भक्ति आन्दोलन के नकारात्मक सिद्धान्त निम्नलिखित थे 

1. सामाजिक कुरीतियों पर आघात- तत्कालीन समाज में कुरीतियाँ और भ्रमपूर्ण मान्यताएँ विद्यमान थीं। सभी धार्मिक महापुरुषों ने प्रचलित अंधविश्वास ने आलोचना को और सामाजिक कुरीतियों का विरोध करके ईश्वर की भक्ति पर बल दिया।

2. जातिवाद और वर्गभेद का विरोध- सभी महापुरुषों ने जातिवाद और वर्गभेद का विरोध किया। उन्होंने यह मत प्रकट किया कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह नीच जाति का क्यों न हो, यदि स्वच्छ हृदय से ईश्वर की आराधना करता है तो वह सुगमता से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। उनकी दृष्टि में न कोई उच्च धा और न कोई निम्न। इन्हीं ईश्वर प्रेमियों के लिए ईश्वर की भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ थी। 

3. जन सामान्य की भाषा पर जोर- भक्ति-आन्दोलन के पूर्व संस्कृत भाषा में विशाल का साहित्य का सृजन हो चुका था और इस भाषा को विशेष महत्त्व दिया गया था। भक्तों का मत या तो उदय की भाषा ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने किसी विशेष भाषा पर बल नहीं दिया और जन सामान्य एवं स्थानीय भाषाओं में ईश्वर-भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।

भारतीय समाज पर भक्ति आन्दोलन का प्रभाव भक्ति आन्दोलन का भारतीय समाज पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही जातियों के विचारों एवं कार्य विधियों में से परिवर्तन ला दिया। प्रमुख रूप से भक्ति आन्दोलन के निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर हुए 

1. हिन्दू-मुसलमान एकता की भावना-भक्ति आन्दोलन के लगभग सभी सन्तों ने हिन्दू-मुसलमान के मध्य भेद समाप्त करने पर विशेष बल दिया और दोनों जातियों के व्यक्तियों को प्रेम की दृष्टि से देखा। इस कारण भक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप हिन्दू-मुस्लिम एकता अधिकता के साथ स्थापित हो सकी। 

2. सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त-भक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप समाज में फैली कुप्रथायें लगभग समाप्त-सी हो गयी। भक्ति आन्दोलन के सभी सन्तों ने पशु-बलि, मद्यपान आदि कुरीतियों का विरोध किया था, भक्ति और ज्ञान को ईश्वर प्राप्ति का साधन बताया था । 

3. एकेश्वरवाद का प्रचार-भक्ति आन्दोलन के सभी सन्तों ने एकेश्वरवाद का उपदेश दिया। ईश्वर और अल्लाह को एक बताया किन्तु उसे प्राप्त करने का मार्ग भिन्न बताया। इन उपदेशों का जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा। श्री टाइटस ने लिखा है, "हिन्दुओं की ईश्वर सम्बन्धी वे सिर-पैर की कल्पनाओं के विपरीत इस्लाम स्पष्ट, सुनिश्चित तथा सरल धर्म था, इसलिए अनेक हिन्दुओं को उसने प्रभावित किया और उन्होंने उसे धर्म-सम्बन्धी बहुत-सी जटिल समस्याओं का हल समझाया।" 

4.हिन्दू संस्कृति की रक्षा-दिल्ली के सुल्तानों ने हिन्दुओं के बहुत से साहित्य को नष्ट कर दिया था। भक्ति आन्दोलन से प्रभावित होकर हिन्दू भक्तों ने अनेक धार्मिक ग्रन्थों की रचना की। इस प्रकार हिन्दू संस्कृति की रक्षा हो सकी और उसका विकास भी सम्भव हो सका।

5. धार्मिक स्वतन्त्रता की भावना का महत्व-भक्ति आंदोलन के परिणामस्वरूप धार्मिक स्वतन्त्रता का अत्यधिक मात्रा में प्रसार हुआ था सभी व्यक्ति अपने धर्म का पालन स्वतन्त्रता के साथ करने लगे।

6. राष्ट्रीय भावना का प्रसार-भक्ति आन्दोलन से राष्ट्रीय भावना जाग्रत हुई। भारतीय संस्कृति और धर्म में भारतवासियों का प्रेम बढ़ा। 

7. निम्न जातियों का उत्थान-भक्ति आन्दोलन के सन्तों के उपदेशों से प्रभावित होकर निम्न जाति के व्यक्तियों ने धार्मिक क्षेत्र में भाग लेना आरम्भ कर दिया। उन्हें ज्ञात हो गया कि हरी दर्शन का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही नहीं सभी जातियों को समान रूप से प्राप्त है। 

8. हिन्दुओं की सामाजिक स्थिति में सुधार-भक्ति आन्दोलन का महान् प्रभाव हिन्दुओं की सामाजिक स्थिति पर पड़ा। दिल्ली के सुल्तानों के व्यवहार एवं मुसलमानों की अनैतिकता ने हिन्दुओं की जिस सामाजिक स्थिति को समाप्त कर दिया था, भक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप हिन्दुओं को वह पुनः प्राप्त हो सकी तथा हिन्दू धर्म की रक्षा सम्भव हो सकी।

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