सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

खिलजी एवं तुगलक शासकों के अधीन वास्तुकला के विकास

खिलजी एवं तुगलक शासकों के अधीन वास्तुकला के विकास 

सल्तनत काल (1206-1526 ई०) में कला के क्षेत्र में वास्तुकला (स्थापत्य) का सर्वाधिक विकास हुआ। जिस समय तुकों ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय मध्य एशिया में विभिन्न जातियाँ वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली का विकास कर चुकी थीं। इस शैली का विकास स्थानीय कला शैलियों, ईरान, अफगानिस्तान, ट्रान्स सियाना, मेसोपोटामिया, मेरी, उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण-पश्चिमी यूरोपीय देशों और मुस्लिम एरिया की कला-शैलियों के सम्मिश्रण से हुआ था। 12 वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में तुर्क आक्रमणकारी वास्तुकला की जो शैली भारत लाये वह पूर्णरूपेण न तो इस्लामी थी और न अरबी। गुम्बज, ऊँची मीनार, मेहराब और तहखाना (भूमिगृह) इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।

विशेषताएँ-तुकों के भारत आगमन के समय यहाँ भी वास्तुकला की एक विकसित शैली विद्यमान थी। तुर्क विजेता थे। अत: ठन्होंने यहाँ जो इमारतें निर्मित कराई उनमें अपने विचारों और प्रचलित कला शैली का प्रयोग किया। परन्तु ये मध्य एशियाई इमारतों का प्रतिरूप भारत में बनाने में सफल नहीं हुए। उनके भवनों पर भारतीय कला परम्परा का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। फलस्वरूप सल्तनत काल में वास्तुकला की जो शैली विकसित हुई यह न तो पूर्णतः विदेशी थी और न स्वदेशी। इस शैली में भारतीय और विदेशी कला शैलियों में समन्वय स्थापित हुआ। 

हंस के अनेक कारण थे। पहला कारण यह था कि सुल्तानों को भवन-निर्माण के लिये भारतीय कलाकारों से काम लेना पड़ा। उनसे अनजाने ही अनेक वस्तुएं मुस्लिम इमारतों से समाविष्ट हो गयीं। इसके अतिरिक्त विजेता तुकों ने अपनी मस्जिदों और महलों के निर्माण में भारत में नष्ट किये गये हिन्दू और जैन मंदिरों की सामग्रियों का प्रयोग किया। मुस्लिम और हिन्दू कला शैलियों में स्पष्ट अंतर था तथापि विवरण में उनमें कुछ समानता है। अत: कभी-कभी उन्होंने हिन्दू और जैन मंदिरों की चौरस छतों को तोड़कर उनके स्थान पर गुम्बज और मीनार बनवाकर उन्हें मस्जिदों का रूप प्रदान किया। मार्शल का मत है कि मंदिरों और मस्जिदों में यह समानता है कि दोनों में एक खुला आँगन होता है कि जिसके चतुर्दिक कमरे और साम्भों की पंक्तियाँ होती हैं। ऐसे मंदिरों को आसानी से मस्जिद का रूप दिया जा सकता है। अतः विजेताओं ने अपने उद्देश्य को प्राप्ति के लिये उनका उपयोग अवश्य किया होगा। दोनों कला शैलियों में सजावट वह तत्त्व था, जो दोनों में समान था।

सल्तनत कालीन प्रमुख इमारतें-सल्तनत कालीन इमारतों में सर्वप्रथम उल्लेखनीय है कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित कुव्वत-उल-इस्लाम नामक मस्जिद यह 1195 ई० में बननी आरम्भ हुई थी तथा 1199 ई० में पूर्ण हुई। इसका निर्माण एक हिन्दू चबूतरे पर अनेक हिन्दू मंदिरों के अवशेषों से हुआ था। इसके शिखर, स्तम्भ और मध्य मूल भाग हिन्दू मन्दिरों के अंग रह चुके थे। इसमें इस्लामी शैली की मात्र एक विशेषता प्राप्त होती है और वह है मुस्लिम डिजाइन और सजावट संयुक्त सामने पत्थर की एक जाली। उस पर कुरान की आयतें भी उत्कीर्ण हैं। इस युग की दूसरी इमारत अजमेर का 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' नामक मस्जिद है। यह भी ऐबक द्वारा निर्मित है। मूलरूप में यह विग्रहराज द्वारा बनवाया गया एक संस्कृत विद्यालय है। इसके ऊपरी हिस्से को तोड़कर गुम्बज और मेहराब निर्मित की गयी है। 

कुतुबमीनार संभवतः इस काल की सबसे प्रसिद्ध इमारत है। 1199 ई० में ऐबक द्वारा दिल्ली में इसका निर्माण कराया गया था। इल्तुतमिश द्वारा बनवायी गयी सबसे महत्त्वपूर्ण इमारत 'सुल्तानगढ़ी' के नाम से प्रसिद्ध उसके बड़े बेटे का मकबरा है। इस पर हिन्दू कला शैली का प्रभाव है। इल्तुतमिश के काल में इस्लामी प्रभाव बढ्ने लगता है। उसने कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद में एक पत्थर की जाली का निर्माण कराया और खाई दिन के मकबरे में कुछ परिवर्तन कराये। बलबन द्वारा बनवाई गयी इमारतों में लाल महल प्रसिद्ध है। दिल्ली में बना ठसका मकबरा शुद्ध इस्लामी शैली का है। इस मकबरे के दरवाजे के महाराजा शुर इस्लामी शैली का उदाहरण है अलाउद्दीन खिलजी ने अनेक इमारतों का निर्माण कराया। उसके द्वारा बनाई गयी इमारतों में जपैयतखाना मस्जिद जो निजामुद्दीन औलिया के मकबरे के समीप है और कुतुबमीनार के पास स्थित अलाई दरवाजा विशेष प्रसिद्ध है। इन दोनों इमारतों पर इस्लामी प्रभाव अधिक दिखलाई पड़ता है।

तुगलक वंश के शासक गुलाम और खिलजी वंश के शासकों के समान सुन्दर इमारतों का निर्माण न करा सके। संभवतः इसके दो कारण थे-धन की कमी और धार्मिक कट्टरता। आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव के शब्दों में, "उनकी इमारत सरल, शुष्क तथा कर्कश हैं।" तुगलक शाह का मकबरा, तुगलकाबाद का नगर और फिरोजशाह कोटला तुगलक वास्तुकला के प्रमुख उदाहरण हैं। सैयद और लोदी वंश के शासन काल में अधिक इमारतों का निर्माण नहीं हुआ। सिकन्दर लोदी के वजीर द्वारा बनवायी 'मोठ मस्जिद' इस काल की स्थापत्य कवियों में सर्वश्रेष्ठ है। सल्तनत काल में विभिन्न प्रान्तीय राज्यों में भी मस्जिद महल और मकबरे बने। मूल रूप में ये दिल्ली की शैली में ही बने, परन्तु दिल्ली की इमारतों के समान ये भव्य और शानदार नहीं थे क्योंकि प्रान्तीय शासक दिल्ली के सुल्तानों की भाँति धन खर्च नहीं कर सकते थे। 

बंगाल, गुजरात, मालवा, जौनपुर, कश्मीर और दक्षिण में अनेक भवनों का निर्माण हुआ। सुल्तान की इमारतों में शाह यूसुफ-डल-गर्दिजी का मकबरा, माहौल हक का स्मारक, समसुद्दीन का मकबरा और रुकते आलम का मकबरा उल्लेखनीय हैं। बंगाल की प्रमुख इमारतें जफर खाँ गाजी की मस्जिद और मकबरा, पांडे की मदीना मस्जिद, जलालुद्दीन, मुहम्मदशाह का मकबरा, गौड़ का दक्खिन दरवाजा, लोटन मस्जिद आदि हैं।

गुजरात की इमारतों में अहमदाबाद की जामा मस्जिद, अहमद शाह का मकबरा, महमूद बेगड़ा की मस्जिद उल्लेखनीय हैं। मालवा इमारतों में धारा की दो मस्जिदें माण्डु की जामा मस्जिद, हिंडोला महल, जहाज महल और हुसंग शाह का मकबरा, बाज बहादुर और रूपमती के महल प्रसिद्ध हैं। जौनपुर की प्रसिद्ध मस्जिदें अटाला मस्जिद, जामा मस्जिद और लाल दरवाजा मस्जिदें हैं। कश्मीर में श्रीनगर की मन्दनी का मकबरा, श्रीनगर की जामा मस्जिद, शाह हमदान की मस्जिद आदि महत्त्वपूर्ण इमारतें बनीं। दक्खिन में बहमनी सुल्तानों द्वारा निर्मित गुलबर्गा तथा बीदर की मस्जिद, बीजापुर का मुहम्मद आदिलशाह का मकबरा, दौलताबाद की चार मीनार, बीदर का महमूद गवाँ का विद्यालय आदि प्रमुख हैं इस युग की हिन्दू स्थापत्य कृतियाँ प्रभाव से मुक्त हैं।

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam 1857 के महान विद्रोह (1857 के भारतीय विद्रोह, 1857 के महान विद्रोह, महान विद्रोह, भारतीय सेप्पी विद्रोह) को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। 1857 आंदोलन एक राष्ट्रीय उभर रहा था, जो भारतीयों के दिल में एक मजबूत आग्रह से प्रेरित था, जिससे देश मुक्त हो गया। यह ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय एकल घटना थी। यह भारत में सदी के पुराने ब्रिटिश शासन का नतीजा था। भारतीयों के पिछले विद्रोहों की तुलना में, 1857 का महान विद्रोह एक बड़ा आयाम था और यह समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ लगभग अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करता था। यह विद्रोह कंपनी के सिपाही द्वारा शुरू किया गया था। इसलिए इसे आमतौर पर 'सेप्पी विद्रोह' कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ सिपाही का विद्रोह नहीं था। इतिहासकारों ने महसूस किया है कि यह एक महान विद्रोह था और इसे सिर्फ एक सिपाही विद्रोह कहने के लिए अनुचित होगा। हमारे इतिहासकार अब इसे विभिन्न ना