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बुधवार, 16 सितंबर 2020

इंग्लैण्ड में राजतंत्र जीवित रहने के कारण

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इंग्लैण्ड में राजतंत्र जीवित रहने के कारण

संसदीय शासन प्रणाली होने के कारण इंग्लैण्ड में जो संवैधानिक सत्य है,वह राजनीतिक असत्य है। अर्थात् इस शासन प्रणाली में सिद्धान्त एवं व्यवहार में भेद है। वह सबसे अधिक सम्राट

अथवा साम्राज्ञी अधिकारों एवं उसकी स्थिति में पाया जाता है। संवैधानिक दृष्टि से वह राष्ट्राध्यक्ष के साथ-साथ शासनाध्यक्ष भी है। समस्त कार्यपालिका शक्तियों उसी में निहित हैं तथा उनका स्रोत है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से यह संवैधानिक अर्थात् नाममात्र का शासनाध्यक्ष है। उसकी कार्यपालिकीय शक्तियों का वास्तविक रूप से उपयोग प्रधानमंत्री सहित मन्त्रिपरिषद् करती है लोकतांत्रिक शासन प्रणाली तथा संसदीय प्रणाली के पूर्ण रूपेण विकसित होने के पूर्व साम्राट कार्यपालिका शक्ति का स्रोत होने के साथ-साथ उनका वास्तविक रूप से उपयोगकर्ता भी था। कुछ शताब्दियों पूर्व चह निरंकुश कार्यपालिका का प्रधान था। वर्तमान युग में व्यावहारिक दृष्टि से उसकी स्थिति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो गया है। सिद्धान्त एवं व्यवहार में इस अन्तर के कारण ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था में सम्राट और क्राउन (राजपद) दो शब्दों का प्रयोग होता है। दोनों में मूलभूत अन्तर है दोनों में अन्तर स्पष्ट करने से पूर्व क्राउन शब्द का अर्थ जानना आवश्यक है।

कॉटन का शाब्दिक अर्थ है "राजमुकुट" जो कि राजपद का प्रतीक है ब्रिटेन में राजपद को राजा से पृथक कर उसे सार्वजनिक संस्था के रूप में परिणित कर दिया है। संस्था के दो अंग है। 1. परम्परागत,2 जनतंत्रीय (मन्त्रिमंडल), परम्परागत अंग सम्राट है जो पद वंशानुगत है और जनतंत्रीय अंग में निर्देशानुसार शासन चलता है सम्राट केवल राज्य करता है और मंत्रिमंडल शासन। इसीलिए सम्राट के लिए कहा जाता है-"King can do no wrong."

राजपद-क्राउन)-क्राउन से तात्पर्य उस ताज या राजमुकुट से है जिसे ब्रिटेन का सम्राट या साम्राज्ञी सिंहासनरूढ़ होने के पश्चात् अपने सिर पर धारण करता है। पर संवैधानिक दृष्टि से यह शासन शक्ति का प्रतीक है जिसमें समस्त कार्यपालन व्यवस्थापन एवं न्यायपालन संबंधी शक्तियां निहित होती हैं। वर्तमान में राजपद संबंधी व्यवस्था के संबंध मे निम्नांकित तथ्य उल्लेखनीय है- 1.1969 के 'बिल ऑफ राइट्स' के अनुसार रोमन कैथोलिक परिवार से संबंधित कोई व्यक्ति राजपद ग्रहण नहीं कर सकता। राजा का विवाह भी कैथोलिक मतावलंबी महिला से नहीं हो सकता। 

2. 1701 के उत्तराधिकार कानून के अनुसार ही राजपद का उत्तराधिकार निश्चित होता है। 

3. 1867 के जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार अब राजा के देहावसान से संसद की कार्यविधि अप्रभावित रहती है।

4. 1937 एवं 1953 के रिजेन्सी अधिनियमों के द्वारा यह व्यवस्था की ई है कि राजा के अस्वस्थ होने या विदेश यात्रा के समय राजपरिवार के कुछ व्यक्तियों को काउन्सलर के रूप में नियुक्त करना होगा। 

5. राजपद पर आरूढ व्यक्ति के परिवार के लिए व्यय की व्यवस्था 1972 के दीवान सूचना अधिनियम के अधीन है। 1984 में महारानी को प्रदान की जाने वाली राशि में 3.7 प्रतिशत की वृद्धि की गई और अब उन्हें 38.5 लाख पौड वार्षिक मिलता है। 

राजा (सम्राट) एवं राजपद (क्राउन)-ब्रिटेन में राजतंत्र का अतीत अत्यन्त गौरवपूर्ण रहा है। समय के प्रवाह में राजतंत्र का लोकतंत्रीकरण हो गया है और राजा की शक्तियाँ सीमित हो गयी। राजपद में नीहित शक्तियों का उपयोग जनप्रतिनिधियों को सलाह पर किया जाने लगा। ऐसी स्थिति में राजा व राजपद में अन्तर महत्त्वपूर्ण हो गया है। ब्रिटिश संविधान की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सिद्धान्त एवं व्यवहार में अन्तर है म्लैडस्टन के अनुसार "ब्रिटिश शासन प्रणाली में भाषा के आधार पर जो अनेक सूक्ष्म भेद किये गये हैं उनमें राजा एवं क्राउन का अन्तरसर्वाधिक महत्वपूर्ण है।" राजा (सपाट) राजपद (क्राउन) में अन्तर-"राजा एवं राजपद के भेद को निम्नांकित आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है


1.चरित्र का अनार-राजा या रानी का चरित्र वैयक्तिक होता है, ये एक व्यक्ति होते है जबकि राजपद (क्रेन)का संस्थागत मंत्र होता है। वास्तविक शक्तियाँ राजपद में मोहित होती है। राजपद का पारक जो कि परियर्तत होता रहता है यह केवल इन शक्तियों का प्रयोग करता है। राजपद की शक्तियों अपरिमित होती हैं। जबकि रानी की शक्तियाँ सौमित है।

2 प्रकृति का अन्तर-राजपद क्राउन एक स्थायी पद है जबकि धारण करते। अस्थायी होते हैं। राजा नाशवान है जबकि क्राउन अमर है। ब्लैकस्टोन का राजा या रानी जो कि इसे कथन है, "हेनरी एडवर्ड या जार्ज मर सकते हैं पर राजा इन सबके बाद भी जीवित रहता है। इंग्लैंड में कहावत है, "राजा मर गया पर राजा युग-युग जिये।" 

3. स्वरूप का मंत्र-राजपद (क्राउन) राजा की तुलना में अधिक व्यापक है। राजपद सामूहिक का घोतक है जबकि राजा या रानी वैयक्तिक होते हैं- ऑग तथा जिंक के शब्दों में "क्राउन राज्य की सर्वोच्च कार्यपालक शक्ति है और राजा,मंत्रिमण्डल क्या संसद का सामूहिक नाम है।"

वेड एवं फिलिप्स ने राजपद की सामूहिकता को निम्नलिखित रूप से प्रयुक्त किया है "राजमुकुट क्राउन शब्द का अर्थ सरकार की सम्पूर्ण शक्तियों से है और या कार्यपालिका का पर्यायवाची है। राजपद की शक्तियों का प्रयोग राजा कुछ अवस्थाओं में अपने विवेक के अनुसार करता है। पर अन्य सभी कार्य वह केवल मंत्रियों के उत्तरदायित्त्व के आधार पर उनकी राय से करेगा।" 

4. राजपद (क्राउन) के दो पक्ष-राजमुकुट के दो पक्ष हैं-परम्परागत एवं प्रजातांत्रिक वंश परम्परागत सिद्धान्त पर आधारित राजतंत्र इसके परम्परागत पक्ष को प्रतिविम्बित करता है जबकि इसका व्यावहारिक एवं प्रजातांत्रिक पक्ष मंत्रिमण्डल, के द्वारा प्रतिबिम्बित होता है। जिसमें कि जनता के प्रतिनिधि होते हैं। राजा या रानी केवल परम्परागत पक्ष को ही प्रतिविम्बित करते हैं।

5. राजपद (क्राउन) ब्रिटिश राज्य का सांकेतिक रूप-ब्रिटिश संविधान में प्रायः सिद्धान्त एवं व्यवहार में अंतर पाया जाता है। अतीत में राजपद एवं उसके धारक के अधिकार एवं शक्तियों में कोई अन्तर नहीं था। परन्तु आज राजपद सर्वशक्तिमान है पर उसका धारक राजा या रानी मात्र औपचारिक शक्ति रखता है। उसके अधिकारों का वास्तविक प्रयोग संसद व मंत्रिमण्डल के द्वारा होता है। शक्ति का हस्तान्तरण वैधानिक आधार पर नहीं वरन् व्यावहारिकआधार पर हुआ है। इस प्रकार राजपद ब्रिटिश राज्य का सांकेतिक रूप है। 

क्राउन की शक्तियाँ अथवा अधिकार- ब्रिटेन में लोकतान्त्रिक प्रणाली के शुरुआत से पूर्व अर्थात् निरंकुश राजतंत्र में सम्राट और क्राउन में कोई विशेष अन्तर नहीं था। राष्ट्राध्यक्ष के रूप में वह सम्राट तथा शासनाध्यक्ष अर्थात् शासन शक्तियों के केन्द्र बिन्दु के रूप में वह क्राउन कहा जाता था लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना और विकास के बाद दोनों शब्दों में मूलभूत अन्तर हो गया है। आज भी सम्राट संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष दोनों ही है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से बह नाममात्र का अर्थात् मात्र संवैधानिक शासनाध्यक्ष है। शासनिक शक्तियाँ उसमें नीहित हैं परन्तु वह उनका वास्तविक दृष्टि से उपयोगकर्ता नहीं है। उसकी कार्यपालिका शक्तियों का उपयोग पार्लियामेंट अर्थात् संसद करती हैं।

दोनों के संवैधानिक और वास्तविक अधिकार ही क्राउन के अधिकार हैं। उसकी शक्तियों को हम निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियाँ अथवा अधिकार-जिसके अन्तर्गत चार प्रकार की शक्तियों अथवा अधिकार आते हैं-1) कानून तथा शान्ति एवं व्यवस्था की सुरक्षा (2) प्रशासन का दिया एवं निर्देशन (3) वैदेशिक सम्बन्धों का संचालन (4) उपनिवेशों का शासन। संवैधानिक दृष्टि से ये समस्त कार्यपालिका शक्तियां सम्राट में नीहित हैं तथा अपनी मन्त्रिपरिषद् सम्राट को परामा देने के लिए हैं परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से वह उसके नाम पर इन शक्तियों का वास्तविक रूप में उपयोग करती है। निरंकुश राजतंत्र में सम्राट शासन का स्वार्थ या तथा उसे निरंकुश शासनिक शक्ति प्राप्त थी। उसके और पार्लियामेंट के मध्य संघर्ष के फलस्वरूप निरंकुश राजतन्त्र का अन्न और लोकतन्त्रीय प्रणाली का स्थापना शुरू हुई तथा सम्राट के अनेक परमाधिकार छीन लिए गये और अनेक सौमित कर दिये गये। लोकतंत्रीय प्रणाली में महान् समाझौतों, परिनियमों तथा परम्पराओं के जरिये कार्यपालिका अधिकार सम्राट में निहित किये गये परन्तु मन्त्रिपरिषद् उनका वास्तविक उपयोगकर्ता हो गई है। संवैधानिक, तथ्य और राजनीतिक सत्य के बीच इस अन्तर के कारण ही सम्राट के अधिकार क्रोटन के अधिकार माने जाते हैं।

1.संवैधानिक दृष्टि से देश के कानूनों के पालन कराने, शक्ति व्यवस्था बनाये रखने तथा बाह्य आक्रमणों से देश की रक्षा करने का उत्तरदायित्व सम्राट पर है। सिद्धान्तः इस उत्तरदायित्व का पालन तथा इससे सम्बन्धित अधिकारों का उपयोग वह मंत्रिपरिषद के परामर्श से करेगा। व्यावहारिक दृष्टि से उसके इस उत्तरदायित्व से सम्बन्धित सभी अधिकारों का उपयोग प्रधानमंत्री सहित मन्त्रिपरिषद् करती है। प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति एवं पदच्युति तथा प्रशासन पर नियंत्रण की शक्तियाँ संवैधानिक दृष्टि से सम्राट में नीहित हैं। परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से मन्त्रिपरिषद् ठसके नाम पर इनका उपयोग करती है। वह आक्रमण से देश की रक्षा का उत्तरदायित्व और अधिकार सम्राट में नौहित है अत: वह राष्ट्रीय सेना का प्रधान सेनापति है। संवैधानिक दृष्टि से सैनिक अधिकारों की नियुक्त एवं पदच्युति तथा सैन्य संचालन का अधिकार उसी में नीहित है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से उसके इन अधिकारों का उपयोग रक्षा मंत्री सहित मन्त्रिपरिषद् करती है। इसी तरह सम्राट के वैदेशिक अधिकारोंका भी यही वास्तविक रूप से उपयोग करती है। 

2.विधायी शक्तियां अथवा अधिकार -संवैधानिक दृष्टि से विधायी शक्तियों का स्रोत सम्राट सहित पार्लियामेंट है। पार्लियामेंट द्वारा पारित किसी भी विधेयक पर लिखा रहता है कि परिनियम लामा और हाउस ऑय कॉमन्स के सदस्यों को अनुमति तथा उनके अधिकार से सम्राट द्वारा पारित किया गया है उसके हस्ताक्षर के पश्चात् ही कोई विधेयक विधि अथवा कानून का रूप धारण कर सकता है। व्यावहारिक दृष्टि से विधेयकों को पारित करने का अधिकार पार्लियामेंट को प्राप्त है तथा उसके द्वारा पारित विधेयक पर सम्राट को नियमित रूप से हस्ताक्षर करना पड़ता है। संवैधानिक दृष्टि से इसके अतिरिक्त सम्राट अनेक विधायी कार्य करता है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद उन्हें उसके नाम पर सम्पन्न करती है। संवैधानिक दृष्टि से पार्लियामेंट का अधिवेशन बुलाने, उसे स्थगित करने तथा उसका उद्घाटन करने का अधिकार सम्राट में नीहित है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से इनका उपयोग प्रधानमंत्री सहित मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से करता है। इस परामर्श शब्द का सौधा अर्थ यह है कि सम्राट के इन अधिकारों का भी वास्तविक उपयोग प्रधानमंत्री सहित मन्त्रिपरिषद् ही करती है। इस व्यावहारिक शासनिक व्यवस्था के कारण सपा का विधायनी अधिकार भी क्राउन विधायी अधिकार कहे जाते हैं। अपने अन्य विधायी अधिकारों का भी सम्राट प्रधानमंत्री सहित मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से उपयोग करता है। इस प्रकार व्यावहारिक दृष्टि से वे सभी क्राउन के अधिकार कहे जाते हैं।


3. न्यायिक शक्तियाँ अथवा अधिकार-सैद्धान्तिक दृष्टि से सम्राट न्याय का भी सोत तथा न्यायिक शक्तियाँ उसी में नौहित है। निरंकुश राजतंत्र में उसका सद्विवेक ही अन्तिम न्याय था। आज की लोकतान्त्रिक प्रणाली में भी सिद्धान्त सभी न्यायालय सम्राट के हैं तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनकी पदव्युति भी यही करता है। अपराधी व्यक्ति उसी के नाम पद दण्डित होते है। उपनिवेशों और डोमियिनों के मामलों की अन्तिम रूप से सुनवाई यही कुर्ता है। उसे क्षमादान और प्राविलम्बन का भी अधिकार प्राप्त है। आज यह सब कुछ मात्र कार्तिक रह गया है। व्यावहारिक दृष्टि से नियुक्ति, पदच्युति, क्षमादान तथा प्राविलम्बन आदि के कार्यों को प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद सम्राट के नाम पर करती है। न्याय करने का कार्य न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से करती है सिद्धान्त और व्यवहार में भेद के कारण सम्राट के न्यायिक अधिकार क्राउन के न्यायिक अधिकार कहे जाते हैं।


4. धार्मिक शक्तियाँ अथवा अधिकार-सम्राट ब्रिटेन के चर्च का भी प्रधान होता है अत: बच्चों के पादरियों तथा अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति करने और उनमें अनुशासन बनाये रखने का उसे अधिकार प्राप्त है। चर्च आव इंग्लैंड की नेशनल असेम्बली की कार्यवाइया का संचालन उसकी अनुमति से ही होता है सम्राट के ये अधिकार मात्र सैद्धान्तिमक है।

व्यावहारिक दृष्टि से मन्त्रिपरिषद् पार्लियामेंट की अनुमति से उसके नाम पर इन धार्मिक अधिकारों का प्रयोग करती है। इस प्रकार आज की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सम्राट के धार्मिक अधिकार भी क्राउन के अधिकार कहे जाते हैं।

निष्कर्ष-इन कार्यपालिका, विधायी, न्यायिक और अधिकारों के अतिरिक्त भी सम्राट को सैद्धान्तिक दृष्टि से कुछ छोटे-मोटे अधिकार प्राप्त हैं वह विशिष्ट व्यक्तियों के सम्मान का स्रोत है वह उन्हें उपाधियाँ आदि देकर राज्य की तरफ से उनका सम्मान करता है तथा उन्हें कला एवं साहित्य आदि को संरक्षण प्रदान करता है। वे अधिकार भी मात्र सैद्धान्तिक हैं। प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद उसके नाम पर वास्तविक रूप से इनका उपयोग करती है। यही कारण है कि उन्हें भी क्राउन पर का अधिकार कहा जाता है।

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