यहां आप राजनीतिक विज्ञान, इतिहास, भूगोल और वर्तमान मामलों और नौकरियों के समाचार से संबंधित उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री प्राप्त कर सकते हैं.

बुधवार, 16 सितंबर 2020

भारतीय संस्कृति पर इस्लाम संस्कृति का प्रभाव

कोई टिप्पणी नहीं :

भारतीय संस्कृति पर इस्लामिक संस्कृति का प्रभाव

भारतीय संस्कृति पर जहाँ तक इस्लामी संस्कृति के प्रभाव का प्रश्न है कमोवेश दोनों संस्कृतियों पर एक दूसरे का प्रभाव अवश्य पड़ा। कुछ विद्वान् मानते हैं हिन्दू संस्कृति ने अपेक्षाकृत मुस्लिम संस्कृति को प्रभावित किया और अपनी गहरी छाप मुस्लिम संस्कृति पर लगायी। इसके विपरीत दूसरा मत यह है हिन्दू संस्कृति बहुत सीमा तक मुस्लिम रीति-रिवाज, आचार-विचार और प्रचाओं आदि से प्रभावित हुई है हाँ यह सत्य है दोनों संस्कृतियों ने एक दूसरे को अपनी-अपनी विशेषताओं द्वारा प्रभावित किया है। एक धर्म का दूसरे धर्म पर प्रभाव पड़ा। राजनीति, विज्ञान, चिकित्सा, मनोविज्ञान, ज्योतिष गणित इत्यादि अनेक क्षेत्रों में यह आपसी प्रभाव आज भी दृष्टिगोचर होता है। आरम्भ में हिन्दू और मुस्लिम दोनों संस्कृतियों में संपर्क रहा परन्तु ऐसा संघर्ष स्थायी नहीं हो सका, दोनों में समन्वय होना आवश्यक था। यह समन्वय हुआ। दोनों संस्कृतियों के एक दूसरे पर प्रभाव को विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया है इन विद्वानों में हेवेल महोदय, डॉ० तारा चन्द, टाइटन महोदय, डॉ० एल० एल० श्रीवास्तव तथा डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार के नाम विशेष उल्लेखनीय है। इन विद्वानों में कुछ विद्वानों का विवेचन आगे किया जा रहा है। डॉ. ताराचन्द का विचार है कि हिन्दू धर्म साहित्य, कला और विज्ञान मुसलमानों के सम्पर्क से बहुत कुछ बदल गया। हेवेल का विचार है कि मुस्लिम-विजय के बावजूद हिन्दू न बदले और वे पहले की भाँति ही रहते थे उनकी आत्मा वैसी की वैसी हो रही और ठनकी मानसिक एवं नैतिक स्वतन्त्रता बनी रही। इस्लाम का प्रभाव गहन न था और मुसलमानों एवं हिन्दुओं की संस्कृतियों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। 

टाइटन महोदय का विचार है कि हिन्दू धर्म ने इस्लाम पर अधिक प्रभाव डाला। इस सम्बन्ध में भी मतभेद है कि इस्लाम ने किस सीमा तक हिन्दुओं पर प्रभाव डाला। डॉ. ताराचन्द का विचार है कि हिन्दुओं का अद्वैतवाद इस्लाम की ही देन है और शंकराचार्य ने अद्वैतवाद का सिद्धान्त मुसलमानों से ही ग्रहण किया दूसरी ओर डॉ० ए० एल० श्रीवास्तव का कहना है कि आदि शंकराचार्य ने इस्लाम अद्वैतवाद का सिद्धान्त इस्लाम से ग्रहण किया होता, तो वे मूर्ति पूजा का भी खण्डन करते। अद्वैतवाद का बीजुतियों में भी मिलता है और यह सिद्धान्त इस्लाम से नहीं लिया गया। 

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उच्च वर्ग के हिन्दुओं ने मुस्लिम-विजेताओं के प्रति उदारता का व्यवहार रखा था. साथ ही हिन्दू और मुसलमान सन्तों ने भी इस बात का प्रचार किया कि हिन्दू और इस्लाम धर्म, दोनों एक ही ध्येय को प्राप्त करने हेतु दो मार्ग हैं। उन्होंने भक्ति एवं पवित्रता पर विशेष बल दिया मुसलमानों ने हिन्दुओं के धर्म-परिवर्तन का प्रयास किया फलस्वरूप हिन्दुओं ने स्वयं को बचाने के लिए खान-पान और विवाह आदि के नियम कठोर बना दिये। इस्लाम के कुछ संतों का प्रभाव हिन्दुओं पर पड़ा। सूफी सन्तों के उपदेशों से हिन्दू भी प्रभावित हुए और उन्होंने शूद्रों और आदतों के प्रति अपने व्यवहार में परिवर्तन किया। इुर पा कि मुस्लिम सुल्तान अथवा उनके अमीर मुस्लिम-विजय के फलस्वरूप भारतीय समाज ने जातीय नियमों को कठोर बना दिया। ऐसा इसलिए किया गया कि हिन्दू मुसलमान न बन जाये हिन्दू विद्वानों और महात्माओं ने स्मृतियों आदि पर टीकाएँ लिखी जिससे कि हिन्दू समाज के नियम समय के अनुकूल हो जाये। इस युग में हिन्दुओं में पुत्री हत्या की प्रथा भी प्रारम्भ हुई। हिन्दुओं ने मुसलमानों से बचने के लिए यह प्रथा चलाई, उन्हें हिन्दुओं की लड़कियों को यलातृपूर्वक ठाकर न ले जायें और उनसे विवाह न करें।

इस्लाम के प्रभाव के फलस्वरूप भारतीय समाज में पर्दे की प्रथा भी आयो। मुसलमानों के भारत आगमन के पूर्व भारत में स्त्रियाँ पर्दे में नहीं रहती थीं मुसलमानों के भारत में आने से हिन्दुओं को यह डर हो गया कि यदि कोई सुल्तान अथवा अमीर किसी हिन्दू लड़की को देख लेगा तो यह उसे उठाकर ले जा सकता है। इस विपति से बचने के हेतु ही हिन्दुओं ने प्दि की प्रथा को अपनाया। मुसलमानों में पर्दे की प्रथा का प्रचलन पहले से ही पा इसका प्रभाव हिन्दुओं पर भी हुआ और उन्होंने इस प्रथा को अपनाया। सल्तनत युग में बाल-विवाह की प्रथा भी प्रचलित हुई। हिन्दुओं ने अपनी कन्याओं का विवाह बाल्यावस्था में करने की प्रथा इस हेतु अपनाई कि मुस्लिम शासक और अधिकारी उनको जबरदस्ती उठाकर न ले जाये। यासीन मुहम्मद का विचार है कि हिन्दू स्त्रियों का अपहरण आम बात थी और उसे जेहाद समझा जाता या। यह प्रथा मुस्लिम-विजय का ही परिणाम थी।

इस्लाम के युग में भारतीय समाज में जौहर और सती-प्रथा भी प्रारम्भ हुई जब मुसलमानों ने भारत पर विजय प्राप्त की तो, जो भी स्त्रियों उनके हाथ आयों उनसे उन्होंने विाह कर लिया। अपने सतीत्व को बचाने के लिए हिन्दू स्त्रियों ने जौहर की प्रमा को अपनाया। जब उन्हें विश्वास हो जाता कि मुसलमान युद्ध में जीते जाएंगे तो अपने को बचाने के लिए ये आग की लपटों में जलकर मर जाती थीं। जब अलाउद्दीन खिली चित्तौड़ के किले पर विजय प्राप्त करके अन्दर गया तो उसे राजपूत नारियों को राख मिली। भारत में मुस्लिम आगमन के पूर्व दास-प्रथा अत्यंत संकुचित रूप में प्रचलित पी परन्तु मुस्लिम-विजय के बाद यह प्रथा साधारण हो गयी। इसका प्रमुख कारण यह था कि दास-प्रथा मुसलमानों में आम थी। प्रत्येक मुस्लिम सुल्तान और अमीरों के पास दास और दासियाँ होती यो। दिल्ली के सुल्तानों के पास दास बड़ी संख्या में थे। यहाँ तक कि उनके लिए एक अलग विभाग था। अलाउद्दीन खिलजी के पास 84,000 दास थे और फौरोज तुगलक के पास दो लाख से अधिक इस दास-प्रथा का प्रभाव हिन्दुओं पर भी पड़ा। राजपूतों ने दासियों को दहेज में देना प्रारम्भ कर दिया। हिन्दुओं के उच्च वर्ग के लोगों की पोशाक, खान-पान और सामाजिक रीति-रिवाज पर भी इस्लाम का प्रभाव पड़ा। अचकन और सलवार हिन्दुओं का भी पहनाया हो गया। यह वस्त्र मुस्लिम अमीर पहनते थे और हिन्दुओं ने उनकी नकल की। हिन्दुओं के उच्च वर्ग के लोगों के भोजन में भी परिवर्तन हुआ। मुसलमान मांसाहारी थे और उनकी नकल हिन्दुओं ने भी की। पुलाव, कबाब और कोफ्ता आदि हिन्दुओं में भी प्रचलित हो गये शिकार खेलने का भी रिवाज बन गया।

आर्थिक क्षेत्र में इस्लाम का कम प्रभाव पड़ा। यद्यपि मुस्लिम विजेताओं ने हिन्दुओं की जमीन छीन ली किन्तु हिन्दू पहले की भांति ही उनकी काश्त करते रहे। मुसलमानों के पास खेती करने का समय नहीं था और यह कार्य हिन्दुओं के हाथ में ही रहा। परिवर्तन केवल यह हुआ कि हिन्दुओं के स्थान पर मुसलमान जमीनों के स्वामी बन गये। किन्तु खेती हिन्दू ही करते रहे। मुसलमानों ने उद्योग एवं व्यापार को हिन्दुओं के हाथों में ही रहने दिया। इस कार्य के लिए उनके पास न तो समय ा और न ही उनको उसमें रुचि थी परिणाम यह हुआ कि आर्थिक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की यातनाएँ दी गयीं और उन पर कड़े कर लगाये। मुस्लिम-विजय से भारत के व्यापार पर भी प्रभाव पड़ा। भारत का व्यापार मुस्लिम और अन्य देशों से बढ़ा।

यह ठीक है कि आरंभ में हिन्दू और मुसलमान अलग रहे किन्तु अन्ततोगत्वा उन्होंने नई परिस्थितियों में अपने को डाल लिया, परिणामस्वरूप हिन्दुओं ने फारसी और अरबी पढ़ना प्रारम्भ किया। समय बीतने पर अनेक हिन्दू सरकारी कार्यो के लिए नियुक्त किए गए। इस सम्बन्ध में चन्द्रभानु ब्राह्मण का नाम उल्लेखनीय है अनेक फारसी, अरबी और तुर्की भाषाओं के शब्द भारतीय भाषाओं में आ गये। हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के फलस्वरूप एक नई भाषा उर्दू का जन्म हुआ समय बीतने पर उर्दू जनता की भाषा बन गयी। भारत में मुस्लिम-विजय के फलस्वरूप हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला का जन्म एवं विकास हुआ। 

मुसलमानों ने मन्दिरों की सामग्री और हिन्दू शिल्पियों को सहायता से अनेक मस्जिद, मकबरे आदि का निर्माण करवाया वास्तुकला के क्षेत्र में दोनों जातियों ने एक दूसरे की अच्छाइयों को ग्रहण किया। डॉ० ताराचन्द का विचार है कि कारीगरी तो अधिकतर हिन्दुओं की रही परन्तु मुसलमानों ने कुछ तब्दीलियाँ कर लो। डॉ० आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का विचार है कि हिन्दुओं ने मुसलमानों से सुन्दर और लाभकारी चीजों को ग्रहण करने में संकोच नहीं किया। परिणामस्वरूप, हिन्दू इमारतों पर मुस्लिम वास्तुकला का प्रभाव पड़ा।

संगीत के क्षेत्र में भी भारतीय समाज पर इस्लाम का गहरा प्रभाव पड़ा। हिन्दू और मुस्लिम संगीतनों ने एक-दूसरे की शैली का अपना कर जिस नवीन पद्धति का निर्माण किया वह पूर्णतः भारतीय बन गयी। भारतीय वीणा और इरानी तमूरे के मिश्रण से सितार बना। इस्लाम के प्रभाव से ही मृदंग, तबला बना।

मुस्लिम शासकों को बगीचे लगाने में बहुत रुचि थी, इसलिए इस क्षेत्र में विशेष उप्रति हुई। तालाबों, सरनों एवं चश्मों पर इस्लामी प्रभाव देखा जाता है।

कोई टिप्पणी नहीं :

टिप्पणी पोस्ट करें