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बुधवार, 16 सितंबर 2020

भारत में सूफीवाद प्रभाव और भूमिका

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भारत में सूफीवाद प्रभाव और भूमिका

सूफी मत की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मृतभेद है। प्रसिद्ध इतिहासकार यूसुफ हुसैन का अभिमान है कि इसका जन्म इस्लाम से हुआ और इसमें बाहर के विचारों और रिवाजों का कोई प्रभाव नहीं हुआ। डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का विचार है कि सूफीवाद पर हिन्दू विचारों और रिवाजों का अत्यधिक प्रभाव है। प्रो० के० ए० निजामी भी इससे सहमत है। सूफी शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ लोग कहते हैं कि इसकी उत्पत्ति "सफा" शब्द से हुई, जिसका तात्पर्य है-"पवित्र। कुछ अन्य का विचार है कि इसकी उत्पत्ति "सूप" से हुई जिसका आशय है-"ऊन"। इनका मानना है कि मुहम्मद साहब के पश्चात् जो सन्त उनी कपड़े अर्थात् सूफ पहनकर अपने मत का प्रचार बारते थे, वे सूफी कहलाये। कुछ अन्य विद्वान् इसकी उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द "सोफिया" से मानते हैं, जिसका आशय है "ज्ञान"। एक अन्य विद्वान् के अनुसार मदीना में मुहम्मद साहब द्वारा बनाई गई मस्जिद के बाहर "सफा" करने वाले और खुदा की आराधना करने वाले सूफी कहलाये ऐसी मान्यता है कि सूफियों की

उत्पत्ति इस्लाम के वाहदत-उल-उदूद सिद्धान्त से हुई। जिसका अर्थ है "ईश्वर अर्थात् अल्लाह एक है" और वह संसार की सब जातियों के पीछे है। यह सिद्धान्त सेख-मुहीउद्दीन-इब्ल-उल बर्नी ने दिया और इस सिद्धान्त को ही भारत में मान्यता मिली। प्राचीन युग में खनकाहों सूफियों का महान् केन्द्र रहा। सुफीवाद के सिद्धान्त-नवीं सदी में जब सूफी मत का धर्म के रूप में आविर्भाव हुआ, तो इसके लिए कुछ नियम तथा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया। सूफी साधनों ने परमात्मा, आत्मा तथा सृष्टि, आदि की विवेचना की। संक्षेप में, सूफीवाद के सिद्धान्तों को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया जा सकता है

1. परमात्मा के सम्बन्ध में सूफी साधकों का विचार था कि परमात्मा एक है। उनका मानना था कि यह अद्वितीय पदार्थ जो निरपेक्ष है, अगोचर है, अपरिमित है और नानात्व से परे हैं, वही परम सत्य है।

2. आत्मा को सूफी साधक ईश्वर का अंग मानते हैं। वह सत्य प्रकाश का अभिन्न अंग है, परन्तु मनुष्य के शरीर में उसका अस्तित्त्व खो जाता है। सूफी साधकों की दृष्टि में आत्मा में दो गुण प्रधान होते हैं, नफ्स तथा रूह। इन दोनों में सदैव संघर्ष होता है।

3. जगत् के सम्बन्ध में सूफी साधकों का विचार है कि जय परमात्मा ने हकीकतुल मुहम्मदिया पर दृष्टि डाली तव गलकर वह सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि तथा नक्षत्रों के रूप में उत्पन्न हुई। नूरुल मुहम्मदिया पर दृष्टि डालने से अग्नि, हवा, जल और पृथ्वी का निर्माण हुआ। सूफी साधक जगत् को माया से पूर्ण नहीं देखते थे। 

4. मनुष्य के सम्बन्ध में सूफी साधकों का विचार था कि मनुष्य परमात्मा के सभी गुणों को अभिव्यक्त करता है।

5. सूफी साधकों ने पूर्ण मानव को अपना गुरु (मुर्शीद) माना। विना आध्यात्मिक गुरु के वह कभी कुछ नहीं प्राप्त कर सकता है।

6. प्रेम को प्रायः सभी धर्मों में परमात्मा को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है। सूफियों ने भी इसी प्रेम के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने की आशा की।

भारत में सूफी मत-महमूद गजनवी की पंजाब विजय के उपरान्त सूफी-सन्त भारत आये। उनमें सबसे पहले शेख इस्माइल था जो लाहौर आया। उसके बाद शेख अली-बिन-उस्मान-अल-हजवैरी था, जो दातागंज बख्श के नाम से विख्यात हुआ। सैय्यद सूफी मत का विस्तार शनैः-शनैः हुआ। उस काल में कई नूतन सम्प्रदाय और आन्दोलन प्रारम्भ हुये जो हिन्दू धर्म और इस्लाम के मध्य का रास्ता बतलाते थे। उनमें चिश्ती, सोहरावर्दी, फिरदौसी, कादिरी और नक्शाबन्दी सिलसिले अथवा सम्प्रदाय महत्त्वपूर्ण हैं।

चिश्ती सिलसिले-चिश्ती सिलसिले का अजमेर शरीफ और राजधानी के कुछ नगरों तथा पंजाब, उत्तर-प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा और दक्षिण में विस्तार हुआ। इस सिलसिले की स्थापना ख्वाजा अब्दुल चिश्ती ने हिरात में की थी। इस सिलसिले को ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (1141- 1236) भारत लाया वह भारत के सूफियों में सबसे बड़ा था। उसने अधिकतर निम्न जातियों के लोगों में काम किया। मुहम्मद चिश्ती के कई शिष्य और अनुयायी थे, उनमें से शेख हमीमउद्दीन, शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी आदि उल्लेखनीय हैं। शेख फरीदुद्दीन मसकूदगजे शाबूर नाम का भी एक प्रसिद्ध सूफी हुआ। बाबा फरीद का शिष्य हजरत निजामुद्दीन औलिया 1238-1325 भी इस सम्प्रदाय के प्रमुख व्यक्तियों में है। 1258 ई० में वह दिल्ली आया और उसने वहाँ धार्मिक कार्य किया। उसकी समाधि निजामुद्दीन नई दिल्ली में है। शेख हमीदुद्दीन नागौरी ने नागौर के स्थान पर महत्त्वपूर्ण चिश्ती सिलसिले का केन्द्र बनाया। शेख नासिरुद्दीन महमूद चिश्ती सिलसिले का एक बड़ा सूफी सन्त हुआ जिसे 'दिल्ली का चिराग' भी कहा जाता है। सिराजुद्दीन अली सीराज ने चिश्ती सिलसिला बंगाल में चलाया। सल्तनत युग के बाद मुगल युग में सूफी सन्तों का चिश्ती सिलसिला अपना पहले जैसा प्रभाव नहीं रख सका किन्तु बना रहा।

चिश्ती सिलसिले के सूफी सन्त सादगी और पवित्रता का जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने अपनी इच्छा से निर्धनता को स्वीकार किया था उनका विचार था कि भावनाओं पर काबू रखना चाहिए। वे उदार विचारों के थे और ईश्वर के प्रति प्रेम और मनुष्य मात्र की सेवा में विश्वास करते थे। उनका विश्वास अद्वैतवाद में था। चिश्ती सिलसिले के सन्त कभी-कभी भूखे मरने लगते थे परन्तु वे अमीरों और सुल्तानों से याचना नहीं करते थे। निजामुद्दीन औलिया के जीवन में कई ऐसे अवसर आये जब उन्हें रात में भूखे रहना पड़ा। वे अपनी इच्छाओं के दमन में विश्वास करते थे। ईश्वर प्राप्ति के लिए वे अहं को मिटाना आवश्यक समझते थे। सोहरावर्दी सिलसिले (सम्प्रदाय)-इस सिलसिले की स्थापना शेख शहाबुद्दीन सोहरावर्दी 1145-1234 ने की। उन्होंने अपने शिष्यों को भारत भेजा और वे भारत के उत्तरी-पश्चिमी भागों में बस गये। उनमें से एक शेख बहाउद्दीन जकारिया सोहरावर्दी का था जिसने मुल्तान में खानकाह बनवाया। वह निर्धनता के जीवन में विश्वास नहीं करता था। उसका विचार था कि इस्लाम के सभी रिवाजों को शक्ति से मदद की जाये। बड़ी संख्या में अमीर उसके अनुयायी थे। उसे सम्राटों और अमीरों से बहुत से उपहार मिले। उसके देहान्त के बाद सोहरावर्दी सिलसिला दो भागों में बैट गया। एक का कार्यक्षेत्र मुल्तान था और दूसरे का सिन्ध। शेख जकारिया सुहरावर्दी का पुत्र बद्रुद्दीन आरिफ मुल्तान शाखा का मुखिया था। जलालुद्दीन सुख बुखारी उच्च शाखा का अध्यक्ष था। सुहरावर्दी सिलसिले में पंजाब, बंगाल और सिन्ध में तीन महत्त्वपूर्ण केन्द्र बनाये। इस सिलसिले के सन्त हिन्दुओं को मुसलमान बनाने पर बल देते थे। चिश्ती सिलसिले और सुहरावर्दी सिलसिले में कुछ भेद और अन्तर था सोहरावर्दी सन्त अमीरों और सुल्तानों से मेल-जोल रखते थे किन्तु चिश्ती सन्त उनसे परे रहते थे। चिश्ती सन्तों को जो धन मिलता था उसे वे बाँट देते थे। वे सब एक कमरे में रहते थे। सोहरावर्दी सिलसिले के लोग अलग रहते थे। चिश्ती सिलसिले अधिक लोकप्रिय हुआ। 

फिरदौसी सिलसिले (सम्प्रदाय)-फिरदौसी सोहरावर्दी सिलसिले की एक शाखा थी और उसका कार्यक्षेत्र बिहार था। इस सिलसिले को अरीफुद्दीन मैया ने लोकप्रिय बनाया। उसका विचार था कि ईश्वर से मिलाने का अर्थ यह नहीं है कि एक साधारण से मिलन और एक चीज का दूसरी चीज से मिलन, इसका अर्थ है संसार के प्रति निवृत्त की भावना को ईश्वर से मिलन का सबसे छोटा रास्ता निम्न वर्ग के लोगों की सहायता करना है।

कादिरी सिलसिले (सम्प्रदाय)-इस सिलसिले का संस्थापक शेख अब्दुल कादिर जिलानी 1077-1166 था। यह सिलसिला 15वीं शताब्दी में भारत आया। शाह नियामत उल्लाह और मखदूम मुहम्मद जिलानी ने इसे लोकप्रिय बनाया। यह सिलसिला मुगल काल में ही पनपा। नक्शबंदी सिलसिला (सम्प्रदाय)-इस सिलसिले का ख्वाजा पीरअनुयायियों ने भारत में चलाया। ख्वाजा बाकी बिल्लाह (1563-1630) ने इसे लोकप्रिय बनाया। मुहम्मद के इसके अनुयायियों ने शरीयत पर बल दिया और अन्य वात्तों का विरोध किया। यह सिलसिला भी मुगल काल में ही पनपा।

दक्षिण-भारत में सूफी मत-सूफी मत दक्षिण भारत में भी फैला। प्रो० खलिक अहमद निजामी का विचार है कि दक्षिण चिश्ती सिलसिले की नींव शेख बुरहानुद्दीन गरीब ने रखी जो निजामुद्दीन औलिया का शिष्य था। उसने दौलताबाद को अपना स्थायी केन्द्र बनाया शेख हुसैनी गेसूदराज ने भी दक्षिण भारत में चिश्ती सिलसिले का प्रचार किया। उसके प्रभाव से गुलबर्गा में इस्लामी ज्ञान के प्रचार के हेतु एक विशाल मदरसा स्थापित हुआ जो 200 वर्ष तक सूफी सिलसिले का केन्द्र बना रहा। उसके प्रभाव से ही बहमनी राज्य के कई शासकों ने उदार नीति का अनुसरण किया।

भारत में सूफी मत का प्रभाव अथवा भूमिका-सूफी मत को मुहम्मद तुगलक और फीरोज तुगलक के शासन काल में धक्का लगा। इन सुल्तानों ने सूफियों की बड़ी निन्दा की। मुगल काल में भी सूफी मत उन्नति न कर सका। इसके बावजूद यह स्वीकार किया जायेगा कि सूफी मत का प्रभाव अत्यन्त व्यापक रहा। इसके प्रभाव के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद है। डॉ० आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का विचार है कि सूफी मत ने बाद में हिन्दुओं को वुहत अधिक प्रवावित किया किन्तु आरम्भ में हिन्दू सूफियों से हटकर रहे। डॉ० ए० सी० बनर्जी का विचार है कि सूफी मत ने भारत में इस्लाम को प्रोत्साहन दिया। डॉ० आर० सी० मजूमदार का विचार है कि जिन हिन्दुओं पर सूफियों का प्रभाव पड़ा वह स्थायी सिद्ध न हुआ। यूसुफ हुसैन का विचार है कि सूफियों ने लोगों के मन को शान्ति प्रदान की। कुछ विद्वानों का विचार है कि भारतीय संस्कृति और साधना के सम्पर्क में आने पर सूफियों ने इस संस्कृति से बहुत कुछ ग्रहण किया। साहित्यिक जगत् को सूफियों की महान देन है। बाबा फरीद ने पंजाबी साहित्य को समृद्ध बनाया। कुतवन मंझन जीनी और नूर मुहम्मद जैसे सूफियों का साहित्य अवधी में है। सूफी मत और सूफियों ने बदलते हुए सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में लोगों को रहने की शक्ति प्रदान की।

सूफियों की कृतियों का फल यह हुआ कि इस्लाम में उदार और गतिशील तत्त्वों को प्रेरणा मिली। सूफियों ने गरीबों की सेवा करना अपना कर्तव्य समझा। भारत में खानकाहों का उदार वातावरण हिन्दू-मुसलमान को प्यार देने में सफल हुआ। सूफियों ने जनता का ध्यान बार-बार भाई चारे को ओर दिलाया। मध्ययुग में भारत में जमाखोरी, दास-प्रथा, काला-बाजारी और वैश्यावृत्ति आदि की जो सामाजिक बुराइयाँ आ गयी थीं उन्हें दूर करने का प्रयास किया। डॉ० यूसुफ हुसैन का विचार है कि सूफी सन्तों ने सामूहिक जीवन को एक नवीन धरातल पर ढालने का प्रयास किया जिसमें सभी लोग अपनी धार्मिक-आध्यात्मिक उन्नति कर सकें। प्रो० रिजवी का कथन है कि सूफियों ने लोगों का विश्व प्रेम का पाठ पढ़ाया। भारत में दिल्ली, अजमेर, मुल्तान, सिन्ध, फतेहपुर सीकरी और दक्षिण में अनेक स्थानों पर सूफी सन्तों के समाधि-स्थान आज भी लोगों की श्रद्धा के स्थान है।

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