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मंगलवार, 15 सितंबर 2020

अभिसमयों क्या हैं ब्रिटिश संविधान में इसका महत्व

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अभिसमयों क्या हैं ब्रिटिश संविधान में इसका महत्व 

अभिसमय ब्रिटिश संविधान के अभिन्न अंग हैं शासन का संगठन उनकी बुनियादों पर इतनी दृढ़ता से टिका हुआ है उसके बिना संविधान यदि पंगु नहीं तो पूर्णत: अव्यावहारिक अवश्य हो जाता है। आधुनिक काल में ब्रिटिश संविधान का विकास संवैधानिक विधियों के रूप में ही रहा है; जो अभिसमयों पर ही आधारित है। ये प्रथाओं, परम्पराओं, समझौतों और व्यवहारों के रूप में है

जिन्हें न्यायालय का संरक्षण तो नहीं परन्तु अन्य अनेक प्रभावी अनुशक्तियाँ प्राप्त हैं। अभिसमय का अर्थ एवं परिभाषा-अंग्रेजी भाषा में अभिसमयों को 'conventions' कहा जाता है। शाब्दिक दृष्टि से convention का अर्थ असाधारण सभा होता है। परन्तु ब्रिटिश संविधान अथवा किसी अन्य संविधान के परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ इन प्रथाओं, परम्पराओं और व्यवहारों से लिया जाता है जो संविधान के अलिखित अंश तथा संवैधानिक व्यवस्था के अलिखित आधार स्तम्भ होते हैं। जे. एस. मिल ने अलिखित नियम, एन्सन ने संवैधानिक प्रथाएँ और डायसी ने संवैधानिक अभिसमय कहा है। डायसी ने इसको परिभाषित करते हुए लिखा है-"अभिसमय वे सिद्धान्त अथवा व्यवहार हैं जो यद्यपि संविधान के अन्तर्गत राजमुकुट, मंत्रियों तथा अन्य व्यक्तियों के साधारण व्यवहार को नियन्त्रित करते हैं तथापि वस्तु: ये कानून नहीं होता।"

प्रो० आग ने अभिसमयों को परिभाषित करते हुए लिखा है-"अभिसमय उन समझौतों आदतों या प्रचाओं से मिलकर बनते हैं जो राजनीतिक नैतिकता के नियम मात्र होने पर भी बड़ी से बड़ी सार्वजनिक सत्ताओं के दिन प्रतिदिन के सम्बन्धों और गितविधियों को अधिकांश भाग का नियमन करते हैं।"

ब्रिटिश संविधान में अभिसमय तथा उनका वर्गीकरण-इंग्लैण्ड के संविधान में अभिसमयों की बहुलता है तथा ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था मूलतः उन्हीं पर आधारित है यही कराण है कि ब्रिटिश संविधान को अलिखित संविधान के नाम से सम्बोधित किया जाता है। उसके अभिसमयों अथवा परम्पराओं के अग्रलिखित शीर्षकों के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है।

(1) सम्राट से संबंधित अभिसमय-(1) ब्रिटिश सम्राट कामन सभा में बहुमत दल के नेता को ही मंत्रिमंडल बनाने के लिये आमंत्रित करता है और उसी को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है। (2) सम्राट संवैधानिक अध्यक्ष होता है। (3) वह मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता नहीं करता है। (4) सम्राट मंत्रियों के परामर्श से प्रशासन कार्य करता है। (5) सम्राट संसद द्वारा पारित विधेयक को नामंजूर नहीं कर सकता। (6) प्रधानमंत्री के मांग करने पर सम्राट द्वारा संसद भंग की जाती है। (7) सम्राट कोई त्रुटि नहीं करता।

(2) मंत्रिमंडल संबंधी अभिसमय-1) मंत्रिमंडल अपने समस्त कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। (2) संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर मंत्रिमंडल को अपने से त्यागपत्र देना होगा। (3) प्रधानमंत्री कामन सभा (लोकसभा) का ही सदस्य होना चाहिये।

(3) संसद संबंधी अभिसमय-(1) ब्रिटिश संसद की द्विसदनीय व्यवस्था पूर्णतः अभिसमय पर आधारित है। (2) संसद का वर्ष में कम से कम एक अधिवेशन अवश्य होना चाहिये। (3) कानून बनने से पहले प्रत्येक विधेयक के तीन वाचन आवश्यक है। (4) धन "विधेयक सबसे पहले कामन सभा (लोक सभा) से शुरू किया जाता है। (4) लार्ड सभा जिस समय न्यायालय का कार्य करती है उस समय सिर्फ कानूनी लार्ड ही उसमें भाग ले सकते हैं। (5) विरोधी दल अपना एक अपना एक छाया-मंत्रिमंडल बनाता है। (6) लोक सभा अनुदान माँग में कमी या वृद्धि अस्वीकार भी कर सकती है। ) सम्राट संसद के संयुक्त अधिवेशन मे अभिभाषण देता है। (8) ब्रिटिश लोक सभा अध्यक्ष (स्पीकर) अपना पद ग्रहण करते समय राजनीतिक दलों से संबंध विच्छेद कर लेता है। आम चुनाव में उसका विरोध नहीं किया जाता है निर्वाचित होने पर फिर उसे ही "स्पीकर" बनाया जाता है। 

(4) राष्ट्रमंडल संबंधी अभिसमय-(1) राष्ट्रमंडल के सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन राजा/रानी करेंगे। (2) जब किसी उपनिवेश की ओर से लिखित प्रार्थना प्राप्त हो तभी संसद उस उपनिवेश के संबंध में कानून बनायेगी। (3) राष्ट्रमंडल संबंधी विषयों पर राजाHo अपने राष्ट्रमंडलीय मंत्री के परामर्श के अनुसार कार्य करेगा। 

विधि कानून एवं अभिसमय परम्परा में भेद-व्यावहारिक प्रशासन के क्षेत्र में अभिसमयों का पालन कानून की भाँति हो किया जाता है, लेकिन कानून और अभिसमय में महत्त्वपूर्ण भेद होता है। कानून एवं अभिसमयों में निम्नलिखित भेद इस प्रकार है- 

1.संस्कृति के आधार पर-कानून पीछे राज्य की प्रभुत्व शक्ति का दबाव होता है और इन्हें न्यायिक संरक्षण प्राप्त होता है। व्यक्ति के लिए कानून का पालन करना अनिवार्य होता है और अवज्ञा करने पर वह दण्ड का भागी होता है। लेकिन अभिसमय का पालन व्यक्ति को दण्डित नहीं किया जा सकता । इस प्रकार कानून के पीछे वैधानिक शक्ति का बल होता है, अभिसमय के पीछे मात्र नैतिक शक्ति का। इसी कारण अभिसमयों को राजनीतिक नैतिकता के नियम-मात्र कहा जाता है। 

2.रूप के आधार पर-कानून लिखित रूप में होते हैं, अभिसमय अलिखित रूप में होते हैं। इसके स्वरूप का यह भेद एक अन्य भेद के कारण बना है और वह यह है कि कानून लिखित होने के कारण सर्वविदित होते हैं और उन्हें सभी जानते हैं, किन्तु अभिसमयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपेक्षाकृत जागरुकता की आवश्यकता होती है।

3. अनिश्चितता के आधार पर-कानून में निश्चितता का भाव होता है और उसे विशेष समय में लागू किया जाता है। अभिसमय अस्पष्ट और अनिश्चित होते हैं और लागू किये जाने का कोई विशेष समय नहीं होता, एक विशेष प्रकार के व्यवहार ने अभिसमय रूप प्राप्त कर लिया है अथवा नहीं। इसके सम्बन्ध में अनेक वाद-विवाद हैं। 

4. निर्माण के आधार पर-कानून किसी कानून-निर्मात्री सत्ता की इच्छा पर निर्भर होते हैं, जिनका निर्माण एक विशेष पद्धति को अपनाकर किया जाता है। अभिसमय उदाहरण या व्यवहार के परिणाम होते हैं। जब एक विशेष प्रकार का व्यवहार अपनाया जाता है और एक व्यवहार उपयोगी सिद्ध होता है, तो कालान्तर में यह अभिसमय का स्थान प्राप्त कर लेता है। अभिसमयों का महत्त्व-ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों का विशेष महत्त्व है। 

उन्होंने एकात्मक शासन के अन्तर्गत लोकतांत्रिक प्रणाली संचालन सुलभ कर दिया। वे कानून अथवा विधि की भाँति जड़वत नहीं हैं। ये विधि की शुष्क अस्थियों पर माँस का काम करते हैं और इस प्रकार उन्होंने शासन के कठोर वैधानिक संगठन को बदलते हुए राजनीतिक विचारों तथा जनता की आवश्यकताओं के अनुसार उसे संशोधित कर दिया है। अभिसमय ब्रिटिश संविधान की प्रेरक शक्ति है। उन्होंने कार्यपालिका को लोकतान्त्रीकरण कर दिया है। लॉ=ला? का सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति प्रदान कर न्याय व्यवस्था का कायाकल्प कर दिया है। उपनिवेशों के सम्बन्ध में अभिसमय पर आधारित हैं। इस प्रकार ब्रिटिश संविधान अभिसमयों पर आधारित हैं, उनके चलते शासन तंत्र के संचालन में बड़ी सुगमता रहती है। इसके अतिरिक्त अभिसमयों में जन सम्प्रभु की उच्चता को स्थापति किया है। अभिसमयों की उपयोगिता अथवा महत्त्व सम्बन्ध में विद्वानों के विचार अनलिखित हैं के डॉ० जेनिंग्स के अनुसार-अभी समय दो प्रकार के कार्य करते हैं प्रथम ये परिवर्तित सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप शासन का ढालता हैं और द्वितीय इन्होंने शासक वर्ग को शासन संचालन की योग्यता प्रदान की है। प्रो० डायसी के अनुसार अभिसमयों के दो लक्ष्य अथवा महत्त्व है, प्रथम इन नियमों का निर्धारण जिसके आधार पर सम्राट अपने विवेक शक्तियों का प्रयोग करता है और द्वितीय पार्लियामेन्ट (संसद) और मंत्रिपरिषद द्वारा मतदाताओं की इच्छा की पूर्ति द्वारा महोदय ने अभिसमयों के महत्त्व को विस्तृत रूप से व्यक्त किया है। ये पार्लियामेन्ट के संघटन का निर्धारण करते हुए उनके दोनों सदनों तथा उनके और मंत्रिपरिषद के मध्य सम्बन्धों को निश्चित् तथा उनका नियमन करते हैं। 

2. अभिसमय अल्पसंख्यक के अधिकारों की रक्षा करते हैं । 

3. इन्होंने राजनीतिक दलों एवं शासन के मध्य संबंधों का निर्धारण किया है। वे शासन व्यवस्था को परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तनशील और लचीला बनाते हैं। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर सारांश तः यह कह सकते हैं ब्रिटेन की एकात्मक शासन व्यवस्था और संसदीय शासन प्रणाली का व्यावहारिक रूप अभिसमयों अथवा परम्पराओं ने प्रदान किया है। संपूर्ण ब्रिटिश संवैधानिक प्रणाली मूलतः इन्हीं पर आधारित है। आधुनिक युग में ब्रिटिश संविधान का संवैधानिक विधियों के रूप में विकास हो रहा है। ये संवैधानिक विधियाँ भी अभिसमयों पर आधारित हैं।

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