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सितंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मुगलकालीन भारत में महिलाओं की दशा

मुगलकालीन भारत में महिलाओं की दशा मुगलकालीन भारत एवं आज के भारत में बहुत कुछ साम्यता थी। यह पूर्ण सत्य है कि उस समय न तो रेलें थी एवं न ही पक्की सड़के। इसके अतिरिक्त और कोई बहुत बड़ी भिन्नता नहीं थीं। देहात बहुत अधिक थे एवं वन उस समय के बहुत घने थे। उस समय के समृद्ध नगरों में आगरा, फतेहपुर सीकरी, दिल्ली, इलाहाबाद, मुल्तान, लाहौर अहमदाबाद, बनारस, ढाका और अजमेर इत्यादि थे तथा उस समय कलकत्ता, बम्बई, मद्रास जैसे नवीन नगर नहीं थे। मुस्लिम समाज- मुसलमान दो प्रकार के थे। एक वे जो अरब, फारस एवं अन्य देशों से नौकरी तथा व्यापार के लिए भारत आये थे। दूसरे प्रकार के वे मुसलमान थे, जो पहले तो हिन्दू थे लेकिन बाद में सल्तनत एवं मुगलकालीन शासकों द्वारा मुस्लिम बना लिये गये थे। यह मुस्लिम समाज मुख्यतः तीन वर्ग में विभाजित किया जाता सकता है- शासक वर्ग, अभिजात वर्ग एवं जन साधारण वर्ग ।  वहीं दूसरी ओर कुछ मुस्लिम विद्वान उमरा वर्ग, उलेमा वर्ग एवं जनसाधारण वर्ग में विभक्त करते हैं। यदि हम सूक्ष्म अध्ययन करें, तो हम मुगलकालीन मुस्लिम समाज को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है- शासक वर्ग, उलेमा वर्ग, मध्

मुगल काल में फारसी साहित्य के विकास

मुगल काल में फारसी साहित्य के विकास  मध्यकाल में मुगल सम्राट साहित्य के संरक्षक थे और इसकी विविध शाखाओं के विकास को उन्होंने खूब प्रेरणा दी। सम्राट ही नहीं हुमायूँ की माता से लेकर औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा तक अन्तपुर की स्त्रियां भी कला और साहित्य की संरक्षिकाएँ थीं। वे सुन्दर वस्तुओं, उद्यानों, चित्रकारी के कामों, जरी के कामों और सुन्दर भवनों को अधिक पसन्द करती थीं। बाबर और जहाँगीर ने स्वयं अपनी-अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। अकबर के राज्याश्रय में अनेक विचार और विद्वान् समृद्ध हुए और उन्होंने रुचिकर एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की।  अकबर में विद्वनों के प्रति उत्तम आदर व श्रद्धा की भावना थी तथा धर्मों और दार्शनिक कार्यों में उसका प्रगाढ़ स्नेह था। इसके फलस्वरूप एशिया के विविध प्रश्नों के विद्वान् कवि और साहित्य उसकी राजसभा में एकत्र हुए थे। फारसी साहित्य-अकबर के काल का फारसी साहित्य तीन भागों में विभक्त किया जाता है- (अ) ऐतिहासिक ग्रन्थ (ब) अनुवाद और (स) काव्य ग्रन्थ इस युग के ऐतिहासिक ग्रन्थ मुल्ला दाद द्वारा रचित तारीख-ए-हल्की अबुल फजल द्वारा रचित 'आईने-ए-अकबरी' और 'अ

मुगलों के अधीन चित्रकला के विकास उनकी विशेषता

मुगलों के अधीन चित्रकला के विकास उनकी विशेषता मुगलकालीन शासक चित्रकला का हृदय से स्वागत करते थे। यद्यपि कुरान में चित्रकला का निषेध किया गया है। 13वीं शताब्दी में चित्रकला का प्रारम्भ मंगोल विजेताओं ने फारस में किया था। यह चीनी कला का प्रान्तीय रूप था और इस पर भारतीय, बौद्ध, ईरानी, वैक्ट्रियाई और मंगोलियन विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा था। कुछ ऐसा आभास होता है कि जब बाबर हैरात में आया तब उसे इस प्रकार की चित्रकला का परिचय मिला, बाद में बाबर ने इस कला को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। हुमायूँ का भी उसके निर्वासन काल में फारस के उच्चकोटि के चित्रकारों से परिचय हुआ। हुमायूँ गायन, कविता और चित्रकला का प्रेमी था।  1550 ई० में हुमायूँ काबुल से दो चित्रकारों को बाध्य करके अपने साथ ले आया था। ये चित्रकार मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद थे। अकबर और हुमायूँ दोनों ने इन विद्वानों से चित्रकला का अभ्यास किया। अकबर इस मंगोलिया चित्रकला को अपने साथ भारत में लाया और अपने दरबार में स्थान दिया। यद्यपि प्राचीन भारतीय कलाओं को संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ था फिर भी उसकी परम्परा चली आ रही थी। एलोरा और अजन्ता की चि

खिलजी एवं तुगलक शासकों के अधीन वास्तुकला के विकास

खिलजी एवं तुगलक शासकों के अधीन वास्तुकला के विकास  सल्तनत काल (1206-1526 ई०) में कला के क्षेत्र में वास्तुकला (स्थापत्य) का सर्वाधिक विकास हुआ। जिस समय तुकों ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय मध्य एशिया में विभिन्न जातियाँ वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली का विकास कर चुकी थीं। इस शैली का विकास स्थानीय कला शैलियों, ईरान, अफगानिस्तान, ट्रान्स सियाना, मेसोपोटामिया, मेरी, उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण-पश्चिमी यूरोपीय देशों और मुस्लिम एरिया की कला-शैलियों के सम्मिश्रण से हुआ था। 12 वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में तुर्क आक्रमणकारी वास्तुकला की जो शैली भारत लाये वह पूर्णरूपेण न तो इस्लामी थी और न अरबी। गुम्बज, ऊँची मीनार, मेहराब और तहखाना (भूमिगृह) इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। विशेषताएँ- तुकों के भारत आगमन के समय यहाँ भी वास्तुकला की एक विकसित शैली विद्यमान थी। तुर्क विजेता थे। अत: ठन्होंने यहाँ जो इमारतें निर्मित कराई उनमें अपने विचारों और प्रचलित कला शैली का प्रयोग किया। परन्तु ये मध्य एशियाई इमारतों का प्रतिरूप भारत में बनाने में सफल नहीं हुए। उनके भवनों पर भारतीय कला परम्परा का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। फलस्वर

भारत में सूफीवाद प्रभाव और भूमिका

भारत में सूफीवाद  प्रभाव  और  भूमिका सूफी मत की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मृतभेद है। प्रसिद्ध इतिहासकार यूसुफ हुसैन का अभिमान है कि इसका जन्म इस्लाम से हुआ और इसमें बाहर के विचारों और रिवाजों का कोई प्रभाव नहीं हुआ। डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का विचार है कि सूफीवाद पर हिन्दू विचारों और रिवाजों का अत्यधिक प्रभाव है। प्रो० के० ए० निजामी भी इससे सहमत है। सूफी शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ लोग कहते हैं कि इसकी उत्पत्ति "सफा" शब्द से हुई, जिसका तात्पर्य है-"पवित्र। कुछ अन्य का विचार है कि इसकी उत्पत्ति "सूप" से हुई जिसका आशय है-"ऊन"। इनका मानना है कि मुहम्मद साहब के पश्चात् जो सन्त उनी कपड़े अर्थात् सूफ पहनकर अपने मत का प्रचार बारते थे, वे सूफी कहलाये। कुछ अन्य विद्वान् इसकी उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द "सोफिया" से मानते हैं, जिसका आशय है "ज्ञान"। एक अन्य विद्वान् के अनुसार मदीना में मुहम्मद साहब द्वारा बनाई गई मस्जिद के बाहर "सफा" करने वाले और खुदा की आराधना करने वाले सूफी कहलाये ऐसी मान्यता है कि सूफियों क

मध्यकालीन भारत में भक्ति आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्त

मध्यकालीन भारत में भक्ति आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्त  भक्ति आन्दोलन सामान्य परिचय मध्यकालीन भारत अर्थात् सल्तनत युग के सांस्कृतिक युग को जिन दो तत्वों ने विशेष रूप से प्रभावित किया, उनमें से प्रमुख है- भक्ति आन्दोलन और सूफी मत। इन दोनों आन्दोलनों ने समाज की आधार शिला (दिशा) को बदल दिया। प्राचीन युग में हिन्दुओं का मानना था कि मोक्ष प्राप्ति अथवा जन्म-मरण के बन्यन से मुक्त होने के तीन मार्ग है-ज्ञान, कर्म और भक्ति मध्यकाल में अनेक ऐसे विचारक हुए जिन्होंने भक्ति को अधिक महत्त्व दिया और इस तरह एक नूतन आन्दोलन का सूत्रपात हुआ, जिसे कि भक्ति आन्दोलन के नाम से सम्बोधित किया जाता ही सामान्यतया यह आन्दोलन पूर्ण रूप से वेतन नहीं था और न ही इसके अभ्युदय का कार इस्लाम था, जैसा कि भ्रम वश कुछ लेखक मानते हैं।  वास्तव में मूर्तिपूजा के विरोधी मुस्लिम धर्म प्रचारकों की उपस्थिति के कारण जिन्होंने हिन्दू धर्म एवं विचारों का खण्डन किया, उसे इस आन्दोलन को और अधिक प्रेरणा मिली। इस आन्दोलन का इतिहास शंकराचार्य के समय से आरम्भ होता है, जिन्होंने हिन्दू धर्म को एक ठोस और दार्शनिक आधार प्रदान किया। उन्होंने अद

भारतीय संस्कृति पर इस्लाम संस्कृति का प्रभाव

भारतीय संस्कृति पर इस्लामिक संस्कृति का प्रभाव भारतीय संस्कृति पर जहाँ तक इस्लामी संस्कृति के प्रभाव का प्रश्न है कमोवेश दोनों संस्कृतियों पर एक दूसरे का प्रभाव अवश्य पड़ा। कुछ विद्वान् मानते हैं हिन्दू संस्कृति ने अपेक्षाकृत मुस्लिम संस्कृति को प्रभावित किया और अपनी गहरी छाप मुस्लिम संस्कृति पर लगायी। इसके विपरीत दूसरा मत यह है हिन्दू संस्कृति बहुत सीमा तक मुस्लिम रीति-रिवाज, आचार-विचार और प्रचाओं आदि से प्रभावित हुई है हाँ यह सत्य है दोनों संस्कृतियों ने एक दूसरे को अपनी-अपनी विशेषताओं द्वारा प्रभावित किया है। एक धर्म का दूसरे धर्म पर प्रभाव पड़ा। राजनीति, विज्ञान, चिकित्सा, मनोविज्ञान, ज्योतिष गणित इत्यादि अनेक क्षेत्रों में यह आपसी प्रभाव आज भी दृष्टिगोचर होता है। आरम्भ में हिन्दू और मुस्लिम दोनों संस्कृतियों में संपर्क रहा परन्तु ऐसा संघर्ष स्थायी नहीं हो सका, दोनों में समन्वय होना आवश्यक था। यह समन्वय हुआ। दोनों संस्कृतियों के एक दूसरे पर प्रभाव को विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया है इन विद्वानों में हेवेल महोदय, डॉ० तारा चन्द, टाइटन महोदय, डॉ० एल० एल० श

शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा भारतीय समाज पर उसके प्रभाव

शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा भारतीय समाज पर उसके प्रभाव शंकराचार्य का दार्शनिक चिन्तन हिन्दू धर्म के अन्तर्गत चार प्रमुख ज्योतिर पीठों को स्थापित करने वाले शंकराचार्य का नाम अग्रणी है। आप का जन्म केरल प्रान्त के अलवर नदी (मालावार तट के उत्तरी किनारे पर स्थिति कलादि ग्राम में 788 ई० के लगभग हुआ। आप के पिता शिवगुरु नम्बूतिरि ब्राह्मण थे। आप की माता का नाम आर्यम्वा था। बचपन में पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनके पालन पोषण का भार उनकी माता पर ही आ पड़ा। माता आर्यम्वा ने आपकी शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया। शंकर अत्यन्त प्रखर बुद्धि के छात्र थे। कहा जाता है कि जब वे तीन वर्ष के थे, तभी उन्होंने अपनी मातृभाषा मलयालम का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। पाँच वर्ष की उम्र में आपका उपनयन संस्कार हुआ तथा उन्हें शिक्षा-प्राप्ति हेतु गुरुकुल भेजा गया। दो वर्षों में ही आपने सम्पूर्ण वेदों तथा शास्त्रों का अध्ययन समाप्त कर लिया। इसके बाद वे घर लौटकर शिक्षा देने का कार्य करने लगे। एक कुशल अध्यापक के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। इनकी ख्याति शंकर केरल के तत्कालीन राजा ने उन्हें अपने दरवार का पण्डित

चोल कालीन कला पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी

चोल कालीन कला पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी  चोल युगीन कला- दक्षिण भारतीय कला के अन्तर्गत चोलयुगीन कला अपने पूर्व युग की कला से भी बहुत आगे बढ़ गई थी। चोल वंशी महान् शासकों की विजय पताका दक्षिण भारत के एक बड़े भू-भाग में ही नहीं भारतीय सागर को द्वीपों पर भी फहरा रही थी। जहाँ तक चोलकालीन कला का प्रश्न है इन शासकों के समय में दक्षिण में अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। तंजौर का विशाल राजराजेश्वर मन्दिर इसी काल में निर्मित हुआ था। चिदम्बरम् मदुरै और कांची के अनेक विशाल एवं भव्य मन्दिर इसी काल में निर्मित हुए। ये सभी दक्षिणापत्य (द्रविण) शैली के हैं इन पर मूर्ति कला का बहुमुखी एवं व्यापक चित्रण मिलता है। चोल कालीन मूर्तिकला पौराणिक धर्मों का विस्तृत आयाम प्रस्तुत करती है। प्रतिमाओं के निर्माण में ग्रेनाइट पत्थर का विशेष प्रयोग हुआ है। मूर्तियों के कला एवं भावपक्ष दोनों का अद्भुत समन्वय विशेष उल्लेखनीय हैं। बारहवीं शती के शुरुआत में मैसूर में होयसल वंश का शासन था।  इस वंश के शासनकाल हलेविड में होयसलेश्वर मन्दिर का निर्माण हुआ। उस पर पौराणिक कथाएँ बारीकी से उकेरी हुई है। बाहर से यह विशाल मन्द

इंग्लैण्ड में राजतंत्र जीवित रहने के कारण

इंग्लैण्ड में राजतंत्र जीवित रहने के कारण संसदीय शासन प्रणाली होने के कारण इंग्लैण्ड में जो संवैधानिक सत्य है,वह राजनीतिक असत्य है। अर्थात् इस शासन प्रणाली में सिद्धान्त एवं व्यवहार में भेद है। वह सबसे अधिक सम्राट अथवा साम्राज्ञी अधिकारों एवं उसकी स्थिति में पाया जाता है। संवैधानिक दृष्टि से वह राष्ट्राध्यक्ष के साथ-साथ शासनाध्यक्ष भी है। समस्त कार्यपालिका शक्तियों उसी में निहित हैं तथा उनका स्रोत है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से यह संवैधानिक अर्थात् नाममात्र का शासनाध्यक्ष है। उसकी कार्यपालिकीय शक्तियों का वास्तविक रूप से उपयोग प्रधानमंत्री सहित मन्त्रिपरिषद् करती है लोकतांत्रिक शासन प्रणाली तथा संसदीय प्रणाली के पूर्ण रूपेण विकसित होने के पूर्व साम्राट कार्यपालिका शक्ति का स्रोत होने के साथ-साथ उनका वास्तविक रूप से उपयोगकर्ता भी था। कुछ शताब्दियों पूर्व चह निरंकुश कार्यपालिका का प्रधान था। वर्तमान युग में व्यावहारिक दृष्टि से उसकी स्थिति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो गया है। सिद्धान्त एवं व्यवहार में इस अन्तर के कारण ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था में सम्राट और क्राउन (राजपद) दो शब्दों का प

अभिसमयों क्या हैं ब्रिटिश संविधान में इसका महत्व

अभिसमयों क्या हैं ब्रिटिश संविधान में इसका महत्व  अभिसमय ब्रिटिश संविधान के अभिन्न अंग हैं शासन का संगठन उनकी बुनियादों पर इतनी दृढ़ता से टिका हुआ है उसके बिना संविधान यदि पंगु नहीं तो पूर्णत: अव्यावहारिक अवश्य हो जाता है। आधुनिक काल में ब्रिटिश संविधान का विकास संवैधानिक विधियों के रूप में ही रहा है; जो अभिसमयों पर ही आधारित है। ये प्रथाओं, परम्पराओं, समझौतों और व्यवहारों के रूप में है जिन्हें न्यायालय का संरक्षण तो नहीं परन्तु अन्य अनेक प्रभावी अनुशक्तियाँ प्राप्त हैं। अभिसमय का अर्थ एवं परिभाषा-अंग्रेजी भाषा में अभिसमयों को 'conventions' कहा जाता है। शाब्दिक दृष्टि से convention का अर्थ असाधारण सभा होता है। परन्तु ब्रिटिश संविधान अथवा किसी अन्य संविधान के परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ इन प्रथाओं, परम्पराओं और व्यवहारों से लिया जाता है जो संविधान के अलिखित अंश तथा संवैधानिक व्यवस्था के अलिखित आधार स्तम्भ होते हैं। जे. एस. मिल ने अलिखित नियम, एन्सन ने संवैधानिक प्रथाएँ और डायसी ने संवैधानिक अभिसमय कहा है। डायसी ने इसको परिभाषित करते हुए लिखा है-"अभिसमय वे सिद्धान्त अथवा व्यव

LOCKDOWN में घर बैठे ONLINE आसानी से पैसा कमाए।

LOCKDOWN में घर बैठे ONLINE आसानी से पैसा कमाए।   COVID-19 महामारी ने मानव गतिविधि के हर क्षेत्र को बाधित कर दिया है और पृथ्वी पर लगभग सभी के पेशेवर और सामाजिक जीवन को अपंग बना दिया है।इसलिए हम इस लेख में घर बैठे आराम से अच्छे पैसे कमाने के तरीके बताएंगे।  कमाई का पैसा आमतौर पर पारंपरिक 'ऑफ़लाइन' मार्ग से जुड़ा और प्रतिबंधित रहा है। इंटरनेट हमारे जीवन के एक बड़े हिस्से को संभालने के साथ, अधिक लोग अपनी आय बढ़ाने के लिए ऑनलाइन आय बढ़ाने के तरीकों की तलाश कर रहे हैं, माध्यमिक आय धाराओं के साथ। आपको उस प्लेटफ़ॉर्म का ध्यान रखना चाहिए जिसे आप चुनते हैं। जबकि ऑनलाइन पैसा कमाने के कई तरीके हैं, इनमें से कुछ नकली हो सकते हैं। इसके अलावा, पैसे कमाने के लिए ऑनलाइन रास्ते का उपयोग करते समय एक बड़ी राशि जल्दी से अर्जित करने की अपेक्षा न करें। अब घर पर अधिक समय और / या सामान्य रूप से अधिक खाली समय शामिल करने की स्थिति के साथ, शायद कुछ के लिए कम काम के घंटे, आप में से कुछ के हाथों पर कुछ खाली समय हो सकता है। यहां कुछ ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म, वेबसाइट और टूल दिए गए हैं जो आपको ऑनलाइन पैसे कमाने में