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बुधवार, 8 जुलाई 2020

व्यक्ति और समाज के बीच सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।

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व्यक्ति और समाज के बीच सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।

जहाँ भी जीवधारी हैं वहाँ समाज है, समाज के बिना जीवधारी नहीं रह सकते । जीवधारी और समाज का एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है। सभी जीवधारो समाज में पैदा होते हैं और रहते हैं। जीवन-मृत्यु का चक्र समाज की सीमाओं में ही गतिशील रहता है। प्रत्येक व्यक्ति समाज का अंग है। समाज हमारे चारों तरफ के पर्यावरण से भी बढ़कर है, यह हमारा स्वभाव है। यह हमारे अंदर और बाहा दोनों तरफ है। जानवरों में सबसे श्रेष्ठ मनुष्य है। मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता सामाजिकता है। अरस्तू के अनुसार-"मनुष्य स्वभाव और आवश्यकताओं से एक सामाजिक प्राणी है।"

जन्म के समय बच्चा एक मानवीय जानवर होता है। वह दूसरे मनुष्यों से बिल्कुल भी अलग होता है। इतनी भिन्नता होने पर भी वह अपने आप में एक इकाई है और इसीलिए उसे हम व्यक्ति कहते हैं। लेकिन मनुष्य के व्यवहार में जो विशेषताएँ होती हैं, उनका नवजात शिशु में अभाव होता है। बच्चा व्यवहारहीन होता है, परंतु जन्म के बाद इन सभी गुणों का समावेश उसमें होने लगता है। बच्चा दूसरे लोगों के साथ अपने सम्बन्ध जोड़ता है। समाज का सदस्य बनकर अपना व्यक्तित्व बनाता है। कुछ समाजशास्त्री व्यक्ति के जानवर से मनुष्य बनने की इस प्रक्रिया को समाजीकरण की संज्ञा देते है। मनुष्य समाज के बिना नहीं रह सकता और इसीलिये समाज उसकी अनिवार्य आवश्यकता है। दूसरी ओर व्यक्तियों के बिना समाज का अस्तित्व ही नहीं । व्यक्ति नहीं किये जा सकते। और समाज मुद्रा के दो पहलू हैं, जो पृथक् समाज व्यक्तियों का एक समूह है, जिसमें व्यक्ति सामाजिक सम्बन्धों को लेकर एकत्रित होते है। एक प्रकार से समाज सामाजिक सम्बन्धों की एक जटिल व्यवस्था है। समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके सदस्य इस बात का निरंतर अनुभव करते हैं कि वे एक समूह के सदस्य हैं। समाज में व्यक्ति को अपना व्यक्तित्व विकसित करने का दूसरा अवसर मिलता है। उसकी क्रियाएँ समाज के बन्धनों से बंधी रहती हैं। इस प्रकार समाज व्यक्तियों का एक संगठन है, जो मनुष्य की गति-विधि का मार्ग-दर्शन करता है। मानव जीवन गतिशील है। समाज में सामाजिक सम्बन्ध-समाज में सामाजिक सम्बन्ध होते हैं। ये सम्बन्ध विविध प्रकार के हैं। माता-पिता और बच्चे, पति और पत्नी, स्वामी व नौकर, अध्यापक व विद्यार्थी, दुकानदार और ग्राहक इन सम्बन्धों के कुछ उदाहरण हैं। यहाँ तक कि हमारे सामाजिक विरोधी सम्बन्ध भी सामाजिक कहलाते हैं।

 समाज में सामाजिक सम्बन्ध होने के निम्न कारण है 

(1) व्यक्तियों में समानता व्यक्तियों की समानता उनमें प्रेम, मित्रता और संगठन की भावना पैदा करती है। समाज के लिये सदस्यों में समानता होना आवश्यक है। समानता की बात कहकर हम यह अस्वीकार नहीं करते कि समाज में विभिन्नता नहीं होनी चाहिए लेकिन सदस्यों में विभिन्ता उतनी आवश्यक नहीं जितनी कि समानता।

(2) सदस्यों की अन्तःनिर्भरता-समाज में कोई भी सदस्य आवश्यकताओं को स्वयं पूरा नहीं कर सकता। अत: कोई भी सदस्य आत्म निर्भर नहीं है। उनमें पारस्परिक निर्भरता होती है। पुरुष और स्त्री,मालिक व मजदूर आदि एक दूसरे पर निर्भर हैं। एक देश अन्य देशों पर निर्भर है और इस प्रकार अन्तः निर्भरता समाज की एक प्रमुख विशेषता है। काम धंधों में विशिष्टीकरण आ जाने से यह पारस्परिक निर्भरता और भी बढ़ गयी है।

(3) सहयोग- समाज में सामाजिक सम्बन्धों को दृढ़ बनाने के लिए सहयोग की भावना अति आवश्यक है। सदस्यों में सहयोग होने से अंततोगत्वा समाज को बड़ा लाभ होता है। यदि सदस्यों में क्लेश की भावना रही, तो समाज विध्वंस की भूमि पर खड़ा हो जायेगा। समाज में रचनात्मकता की भावना अपेक्षाकृत अधिक बलवती होती है। किस अर्थ में मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है- व्यक्ति और समाज के पारस्परिक सम्बन्धों को समझने का मनुष्य का प्रयास आज नया नहीं है। प्रारम्भ से ही मनुष्य इस सम्बन्ध को समझने का प्रयास कर रहा है।

पाश्चात्य और भारतीय समाज में व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों को समझने के लिए दो परस्पर विरोधी और भ्रामक सिद्धांत प्रचलित हैं, जिन्हें हम "सामाजिक समझौता सिद्धांत" और सामाजिक आंगिक सिद्धांत" के नाम से पुकराते हैं।

(1) सामाजिक समझौते का सिद्धांत-हॉब्स ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार समाज के जन्म से पहले मनुष्यों की दशा बहुत खराब थी। वे एक भूखे भेड़िये की तरह थे। उसके जीवन में कोई साथी नहीं था। वह गरीब और दुःखी था। उसका जीवन बहुत कम था। हॉब्स के अनुसार-"मनुष्य का जीवन एकाकी, होन, पुणे स्पद, जंगली एवं अल्पकालीन था। मनुष्य ऐसी स्थिति मैं अधिक समय नहीं रह सकता था। उसने सुरक्षा, शांति और समृद्धि के लिए आपस में समझौता करना आवश्यक समझा । यहाँ से समाज का जन्म हुआ। इस प्रकार समाज मनुष्यों द्वारा बना हुआ एक संगठन मनुष्य ने समाज को बनाया और अपने सब अधिकार समाज को दे दिये। 18वीं शताब्दी के कुछ दार्शनिकों के अनुसार समाज पारस्परिक आर्थिक जीवन का एक युक्ति मुक्त बनावटी प्रयास है। इस विचारधारा को अर्थशास्त्री एडम स्मिथ और उनके अनुयायियों ने रखा। इसी शताब्दी के कुछ दार्शनिकों ने बताया कि मनुष्य जन्म से स्वतंत्र और समान पैदा हुआ है। इस सिद्धांत पर टिप्पणी करते हुए मेकाइवर ने लिखा है कि-"इस प्रकार के सिद्धांत समाज को व्यक्तियों के बीच में या व्यक्तियों और समाज के बीच में किये गये किसी मौलिक समझौते पर आधारित मानते हैं। इस सिद्धांत के अनुयायियों का यह कहना है कि व्यक्ति ने समाज से अपनी सुरक्षा चाही। कई बार यह सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति का आधार भी बताया जाता है। यह सिद्धांत बहुत प्रभावशाली था, लेकिन आज इसका वह प्रभाव नहीं रहा। आज भी व्यक्तियों का ऐसा समूह है, जो यह मानता है कि हमको अपनी इस बनावटी सामाजिक व्यवस्था को समाप्त करके प्राकृतिक अवस्था में पहुँच जाना चाहिए। वे निश्चित रूप से यह मानते हैं कि समाज में रहकर आज हम जिन नियमों में बँधे हैं, वे नियम हमारे द्वारा ही बनाये गझे हैं। भारत में विनोवा भावे ने शासन मुक्त शासन की कल्पना प्रस्तावित की है। उनका विचार है कि मनुष्य राज्य के नियंत्रण के अभाव में भी अपना कार्य चला सकता है। इस प्रकार सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रभाव आज भी हमें कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।

(2) सामाजिक आंगिक सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार समाज मनुष्य के शरीर के समान है। मनुष्य के समस्त शारीरिक अंग जो पारस्परिक सहयोग से काम करते हुए शरीर को स्वस्थ रखते है,किंतु शरीर केवल अंगों का संग्रहमात्र नहीं है समस्त अंगों में व्यापक, कितु उनसे स्वतंत्र एक सत्ता शरीर में सर्वोपरि होती है। उस सत्ता के न होने पर कोई अंग कार्य नहीं कर सकते। यदि समाज को हम शरीर मान लें, तो व्यक्ति समुदाय उसके अंग होंगे। जिस प्रकार शरीर का निर्माण कई व्यक्तियों के सहयोग का परिणाम है। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य समाज का एक अंग है, उसका जीवन, मृत्यु आदि समाज के अंतर्गत है।

आंगिक सिद्धांत पर मैकाइवर के अनुसार-"यह विचार (आंगिक सिद्धांत) समझौता सिद्धांत की तरह ही पुराना है। इसके अनुसार समाज एक जैविय व्यवस्था के समान है। यह एक विशाल अवयव है जिसकी संरचना एक माला के समान है। इसमें शरीर के अंगों की तरह व्यक्तियों में एकता होती है और उसमें भी विकास परिपक्वता और ह्यास के नियम लागू होते हैं। समाज के कोष उसके व्यक्ति हैं, उसके अंग और व्यवस्था की समितियां और संस्थाएँ हैं।"

समाज-शास्त्र के जन्मदाता ऑगस्त कॉम्टे भी आंगिक विचारधारा को आंशिक रूप से मानते हैं। इनके अनुसार-"समाज की एकता के लिए यह आवश्यक है कि सभी व्यक्ति शरीर के अंगों की तरह मिलकर समाज को बताएं।"

मनोवैज्ञानिकों ने आंशिक रूप से इस सिद्धांत को स्वीकार किया है। मनोवैज्ञानिक विलियम मैक्डूगल के अनुसार-"सम्पूर्ण समाज का एक मस्तिष्क होता है। इन्होंने इसे समूह का मस्तिष्क नाम दिया है। इस के अनुसार समाज एवं एक मस्तिष्क है और सभी सदस्यों के लिये यह समान रूप से सोचता है। आधुनिक समाजशास्त्री ओसवाल्ड स्पेंगलर ने अपनी पुस्तक "The Decline of the West, New York-1926 में इस सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए लिखा है कि "समाज मनुष्य शरीर की तरह जन्म और मृत्यु के चक्र से गुजरता है।

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