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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

विश्व के प्राकृतिक प्रदेशों का विभाजिन तथा उनकी प्रमुख विशेषताए

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विश्व के प्राकृतिक प्रदेशों का विभाजिन तथा उनकी प्रमुख विशेषताए 

प्राकृतिक प्रदेशों के सीमांकन के आधार (Criteria of Delimitation of Natural Regions).

प्राकृतिक प्रदेशों का सीमांकन समान प्राकृतिक लक्षणों के आधार पर किया जाता है। प्राकृतिक तत्वों में जलवायु सर्वशक्तिशाली होती है जिस पर अक्षांशीय तथा धरातलीय स्थिति का महत्वपूर्ण प्रभाव पाया जाता है। जलवायु का मिट्टी तथा प्राकृतिक वनस्पति एवं जन्तु जगत पर प्रभाव ही नहीं बल्कि नियंत्रण भी देखने को मिलता है। इस प्रकार यदि जलवायु को प्राकृतिक प्रदेशों के सीमांकन का मुख्य आधार मान लिया जाय तो भी इनके सीमांकन में अन्य सम्बंधित तत्वों का सहारा लिया जा सकता है। विश्व के प्राकृतिक प्रदेशों के सीमांकन में निम्नलिखित तत्वों को मापदण्ड के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। (1) अक्षांशीय एवं महाद्वीपीय स्थिति (Latitudinal and Continental Location) प्राकृतिक प्रदेशों के निर्धारण में अक्षांशीय स्थिति तथा महाद्वीपीय स्थिति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्राकृतिक प्रदेशों के निर्धारण के प्रमुख तत्व जलवायु के निर्धारण में अक्षांशीय स्थिति सर्वप्रमुख होती है और महाद्वीपीय स्थिति सहायक कारक के रूप में कार्य करती है। यही कारण है कि प्राकृतिक प्रदेश, जलवायु प्रदेश, प्राकृतिक वनस्पति प्रदेश आदि अक्षांशों का अनुकरण करते हैं और उनका विस्तार पूर्व-पश्चिम दिशा में मिलता है। टुण्डा प्रदेश टैगा प्रदेश, भूमध्य रेखीय प्रदेश आदि इनके दृष्टांत हैं। महाद्वीपीय स्थिति का आशय महासागर की तटीय स्थिति, अंतः महाद्वीपीय स्थिति, द्वीपीय स्थिति आदि से है। महाद्वीपीय स्थिति के अनुसार प्राकृतिक पर्यावरण (जलवायु,प्रा० वनस्पति आदि)में पर्याप्त भिन्नता है जो भिन्न प्राकृतिक प्रदेशों को जन्म देते हैं। समान अक्षांशीय स्थिति में महाद्वीपीय स्थिति के कारण भिन्न प्राकृतिक प्रदेश उत्पन्न होते हैं। जलवायु (Climate) जलवायु प्राकृतिक पर्यावरण का सर्वाधिक प्रभावशाली कारक है। तापमान, आर्द्रता एवं वर्षा, प्रचलित पवनें तथा परिवर्तिता (variability) जलवायु के प्रमुख तत्व हैं जो भौतिक तथा जैविक क्रियाशीलता को नियंत्रित करते हैं। इन्हीं जलवायु तत्वों के सम्मिलित प्रभाव से ही किसी प्रदेश की वनस्पति तथा जीवमंडल का निर्धारण होता है। यही कारण है कि विश्व के विभिन्न प्रदेश जलवायु प्रदेशों का ही अनुसरण करते हैं और प्राकृतिक प्रदेशों का नामकरण अधिकांशतः जलवायु दशाओं के अनुसार ही किया जाता है। मृदा प्रकार तथा वनस्पतियों के प्रकार के निर्धारण में जलवायु की प्रमुख भूमिका होती है। प्राकृतिक दशाओं के साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य, निवास, व्यवसाय तथा क्रियाओं को प्रभावित करने वाले कारकों में जलवायु का महत्व सर्वोपरि है। फसलों की किस्म, उत्पादन विधि, उत्पादन आदि पर जलवायु का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है। उष्णार्द्र भूमध्य रेखीय प्रदेश, उष्ण मानसूनी प्रदेश, उष्ण मरूस्थलीय प्रदेश, भूमध्यसागरीय प्रदेश, टैगा प्रदेश, टुण्ड़ा प्रदेश आदि का सीमांकन मुख्यतः जलवायु दशाओं के आधार पर ही देखा जाता है। प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation) प्राकृतिक वनस्पति पर मुख्यतः जलवायु और मिट्टी का प्रभाव पाया जाता है। इस पर जलवायु प्रभाव इतना अधिक होता है कि यह जलवायु की सहचरी बन जाती है। सामान्यतः समान प्रकार के जलवायु प्रदेश में समान प्रकार की वनस्पतियों का विकास होता है। प्राकृतिक वनस्पति के अंतर्गत वृक्ष, झाड़ियां, घासें.शैवाल,लाइकेनयालिकेन (Lichen) सभी समाहित होते हैं पर्यावरणीय संतुलन में सर्वाधिक योगदान पेड़ पौधों का ही होता है। इतना ही नहीं, विभिन्न प्रदेशों में रहने वाले मनुष्य के भोजन, वस, आश्रय (गृह) आदि अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय रूप से प्राप्त पेड़-पौधों से ही होती है। मनुष्य के विभिन्न प्रकार के व्यवसायों जैसे कृषि, पशुपालन या पशुचारण, आखेट, विनिर्माण उद्योग आदि का निर्धारण भी प्रादेशिक वानस्पतिक प्रकार द्वारा ही होता है इस प्रकार विश्व के प्राकृतिक प्रदेशों के सीमांकन में प्राकृतिक वनस्पति को उपयुक्त मापदण्ड के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। हरबर्टसन ने विश्व के बृहत प्राकृतिक प्रदेशों के सीमांकन में प्राकृतिक वनस्पति को ही प्रमुख आधार बनाया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जलवायु की भांति प्राकृतिक वनस्पति भी प्राकृतिक प्रदेशों के सीमांकन का महत्वपूर्ण आ विश्व के बृहत प्राकृतिक प्रदेश (Major Natural Regions of the World) विश्व के प्राकृतिक प्रदेशों का निर्धारण सर्वप्रथम 1905 में ब्रिटिश भूगोलवेत्ता ए0 जे0 हरबर्टसन ने किया था। उन्होंने अपने वर्गीकरण में प्राकृतिक वनस्पति को प्रमुख मापदण्ड स्वीकार किया था। यद्यपि परवर्ती वर्षों में प्रदेशों के सीमांकन में अपनाये गये मापदण्डों में कुछ संशोधन भी किये गये किन्तु विश्व के बृहत प्राकृतिक प्रदेशों का सीमांकन एवं व्याख्या हरबर्टसन के आधार पर बताए गये ढंग से सरलतापूर्वक की जा सकती है हरबर्टसन ने विश्व को कुल 15 बृहत प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त किया था।

प्राकृतिक प्रदेशों की संख्या तथा उनके क्षेत्रीय विस्तार के विषय में भूगोलवेत्ताओं में मतान्तर भी देखे जाते हैं। अतः यहाँ सामान्य रूप से मान्य वर्गीकरण को ही प्रयुक्त किया गया है। इस प्रकार विश्व के बृहत प्राकृतिक प्रदेश निम्नलिखित हैं:

उष्ण कटिबंधीय प्रदेश (Tropical Regions) -

1.भूमध्य रेखीय प्रदेश

2.सवाना प्रदेश या सूडान तुल्य प्रदेश

3.उष्ण मानसूनी प्रदेश

4.उष्ण मरूस्थलीय या सहारा तुल्य प्रदेश गर्म शीतोष्ण कटिबंधीय प्रदेश (Warm Temperate Regions)

5.भूमध्यसागरीय प्रदेश

6.शीतोष्ण मरूस्थलीय प्रदेश

7.चीन तुल्य प्रदेश शीत शीतोष्ण प्रदेश (Cool Temperate Regions)

8.पश्चिम यूरोप तुल्य प्रदेश

9.प्रेयरी तुल्य प्रदेश

10. सेन्ट लारेन्स तुल्य प्रदेश

11.टैगा तुल्य प्रदेश

12.टुण्ड्रा तुल्य प्रदेश

13.उच्च पर्वतीय प्रदेश स्थिति एवं विस्तार भूमध्यरेखीय या विषुवत रेखीय प्रदेश भूमध्य रेखा के दोनों 202062/र- क्षिO:

अक्षांश के मध्य स्थित हैं। कहीं-कहीं इस प्रदेश का विस्तार 10° उत्तरी और 10° दक्षिणी अक्षांश तक
भी खाया जाता हैइसके अंतर्गत दक्षिण अमेरिका में अमेजन एवं ओरीनोको घाटी, मध्य अमेरिका अफ्रीका में कांगो बेसिन, गिनी की खाड़ी का तटीय भाग और एशिया का दक्षिणी-पूर्वी भाग (मलाया इंडोनेशिया, फिलीपींस आदि) सम्मिलित है। भूमध्य रेखीय प्रदेश का सर्वाधिक विस्तार अमेजन बेसिन में है, अतः इसे अमेजन तुल्य प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है।


प्राकृतिक दशाएँभूमध्य रेखा के निकट स्थित होने के कारण यहाँ वर्ष पर्यंत सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ती हैं और उच्च तापमान पाया जाता है। औसत तापमान 27° सेल्सियस रहता है किन्तु वार्षिक तापांतर सामान्यतः 3° सेल्सियस से कम पाया जाता है। यहाँ सदैव ग्रीष्म ऋतु रहती है और शीत ऋतु का अभाव पाया जाता है। दिन और रात की लम्बाई में बहुत थोड़ा अंतर पाया जाता है। दैनिक तापांतर भी 5° से 10° के मध्य रहता है। इस पेटी में हवाओं के अभिसरण के कारण वायुदाब उच्च रहता है और हवाएं शांत रहती हैं अथवा अत्यंत मन्द गति से पश्चिम से पूर्व की ओर चलती हैं। प्रतिदिन दोपहर के पश्चात सामान्यतः अपरान्ह तीन-चार बजे मेघ गर्जन तथा बिजली की चमक के साथ भारी वर्षा होती है। यह संवाहनिक वर्षा कहलाती है जो प्रायः प्रतिदिन समय पर होती है।इन प्रदेशों में औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी0 से अधिक होती है किन्तु कहीं-कहीं 300 से 500 सेमी0 तक भी वर्षा हो जाती है।

उष्णार्द्र जलवायु के कारण भूमध्य रेखीय प्रदेशों में चौड़ी पत्ती वाले सदापर्णी (सदाबहार)वन विकसित होते हैं जिन्हें सेल्वा (Selvas) के नाम से जाना जाता है। वृक्ष अधिक घने और लम्बे होते हैं जिनके शीर्ष छतरीनुमा होते हैं जिसके कारण सूर्य प्रकाश सामान्यतः भूमि तक नहीं पहुँच पाता है। भूमध्य रेखीय वनों को वर्षा वन (rain forest) कहते हैं। इनकी लकड़ी अत्यंत कठोर और मजबूत होती है। इन वनों में महोगनी, रोज उड़, गटापाची, बेंत, ताड़, सिनकोना, एबोनी, बांस, रबड़ आदि के वृक्ष उगते हैं। उन वृक्षों की लड़कियाँ इमारती प्रयोग के लिए उत्तम होती हैं। इन वनों के वृक्ष 60 से 80 मीटर तक ऊँचे होते हैं और अनेक प्रकार की लताएं इन्हें जकड़े रहती हैं। भूमध्य रेखीय वनों में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु पाये जाते हैं। वृक्षों पर रहने वाले जीवों में बंदर, चीटियां, चमगादड़, तितलियाँ, पक्षियाँ, छिपकली, गिरगिट आदि प्रमुख हैं। भूमि पर रैंगने वाले जीवों में सांप, अजगर आदि मुख्य हैं। भूमि पर रहने वाले बड़े जानवरों में गैंडा, हाथी, जंगली सुअर, शेर, चीत, उद्दिलाव आदि प्रमुख हैं। दलदली भागों तथा जलाशयों में कीड़े-मकोड़े, मेढ़क, मच्छर, मक्ख्यिाँ , दरियाई घोड़ा, मगरमच्छ, मछलियाँ आदि जीव पाये जाते हैं। भूमध्यरेखीय वर्षा वनों में अनेक जहरीले जीव जैसे मक्खियाँ, मच्छर, सांप आदि पाये जाते हैं। मानव प्रतिक्रिया भूमध्य रेखीय प्रदेश अस्वास्थ्यकर उष्णार्द्र जलवायु, अति सघन वनों से आच्छादित होने, जहरीले जीवों की अधिकता आदि के कारण आर्थिक विकास की दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक पिछड़े क्षेत्र हैं। वनाच्छादित इन प्रदेशों में जनसंख्या का निवास बहुत कम है। जनसंख्या वनों के सीमांत भागों, नदियों तथा समुद्र तटीय भागों तथा द्वीपों पर संकेन्द्रित है। मलेशिया और पूर्वी समूह में इण्डोनेशिया तथा फिलीपींस अधिक घने बसे हुए तथा अपेक्षाकृत विकसित देश हैं। स्थायी कृषि भूमि के अभाव तथा वन भूमियों की अधिकता से भूमध्य रेखीय प्रदेशों में अधिकांशतः स्थानांतरणशील कृषि (shift ing agriculture) और बागाती कृषि (plantation agriculture) का प्रचलन अधिक है। चावल, मक्का , गाना, मसाले, चाये, कहवा, कोको, सिनकोना, अनानास, रबड़, ताड़, नारियल आदि इन प्रदेशों की प्रमुख कृषि उपजें हैं। बागाती कृषि के अंतर्गत रबड़, चाय, कहवा, नारियल, गरम मसालों आदि की
 कृषि की जाती है।

घने वनों तथा दलदली भूमि के कारण भूमध्य रेखीय प्रदेश के देशों में स्थलीय यातायात (रेल, सड़क) का विकास अत्यंत सीमित है। अनेक स्थानों पर नदियां ही मार्ग प्रसस्त करती हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया में मलेशिया तथा इंडोनेशिया में सड़कों तथा रेलमार्गों का विकास अन्य भागों की तुलना में अधिक हुआ है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों से रबड़, चाय, कहवा, गरम मसालों, नारियल के तेल एवं गिरियों, हाथी दांत, चीनी, टिन आदि का निर्यात अन्य प्रदेशों को किया जाता है। भूमध्य रेखीय वन प्रदेशों के विभिन्न भागों में कई प्रकार की आदिम जातियां निवास करती हैं जो बिल्कुल सत्य है और जंगली जीवन व्यतीत करती हैं। अफ्रीका के कांगो बेसिन में पिग्मी दक्षिण अमेरिका के अमेजन बेसिन से बोरा एवं रेड इण्डियन, मलाया एवं थाईलैण्ड में सेमांग तथा सकाई नामक आदिम जातियाँ पायी जाती हैं। पिग्मी नीग्रिटों प्रजाति से सम्बंधित हैं जिनका कद अत्यंत छोटा (132 सेमी0 या 52 इंच) होता है जिसके कारण इन्हें बौना भी कहते हैं। ये काले रंग के लोग पेड़ों पर रहते हैं और जंगली पशु पक्षियों के शिकार तथा वृक्षों के फल, फूल, पत्रों, कन्दमूलों आदि से भोजन प्राप्त करते हैं। सेमांग और सकाई जातियाँ भी नीग्रिटों प्रजाति से सम्बंधित हैं और मलाया तथा थाईलैण्ड के जंगलों में रहती हैं। वनों से कन्दमूल, फल आदि एकत्र करने के साथ ही ये लोग जलाशयों से मछलियाँ पकड़ने तथा छोटे पशुओं जैसे सुअर, बन्दर, चूहों, गिलहरियों आदि का शिकार भी करते हैं। दक्षिण-पूर्वी एशिया में मलाया, इण्डोनेशिया तथा फिलीपीन्स अधिक सुगम्य स्थिति तथा प्राचीन एवं आधुनिक संस्कृतियों से प्रभावित होने के परिणामस्वरूप अन्य भूमध्यरेखीय प्रदेशों की तुलना में अधिक विकसित हैं। इण्डोनेशिया का जावा द्वीप सर्वाधिक विकसित और सघन बसा हुआ द्वीप है। यहाँ व्यापारिक बागाती तथा सामान्य कृषि, टिन आदि खनिज सम्पदा के विदोहन तथा पेट्रोलियम के भण्डार मिलने से आर्थिक विकास की गति और समृद्धि में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सिंगापुर, जकार्ता, कुआलालमपुर, मनीला, मिन्डनाओ, सुराबामा आदि पूर्वी द्वीप समूह के महत्वपूर्ण नगर हैं। अफ्रीका में नाइजीरिया के दक्षिणी भाग में भी आर्थिक विकास के अनुरूप जनसंख्या का बसाव अपेक्षाकृत अधिक है। यहाँ पूर्वी द्वीप समूह की भाँति नगरीकरण भी अपेक्षाकृत अधिक हुआ है।


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