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सोमवार, 6 जुलाई 2020

वियना (1815) महासम्मेलन के प्रमुख उद्देश्य

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 वियना (1815) महासम्मेलन के प्रमुख उद्देश्य 

वियना (1815) की व्यवस्था का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। उत्तर वियना कांग्रेस (वियना महासम्मेलन) नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के कारण यूरोप के मानचित्र को बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था। उसने अपनी सुविधा के लिये एक प्रदेश को नीचा करके दूसरे प्रदेशों के साथ सम्मिलित कर दिया था परन्तु जब 1814 ई० में उसे वाटरलू के युद्ध में परास्त करके एक छोटे से निर्जन पहाड़ी द्वीप सेण्ट हेलेना' में भेज दिया गया था लुई 18वें को राजसिंहासन पर बैठा दिया था तब यूरोपियन मित्र राष्ट्रों के सामने यह समस्या खड़ी हुई कि यूरोप के मानचित्र का किस प्रकार पुनर्निर्माण किया जाय, मित्र राष्ट्र इस समस्या को हल करने के लिये आस्ट्रिया की राजधानी वियना में एकत्रित हुये यह एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी, इससे पूर्व ये यूरोपीय राष्ट्रों को इतनी कठोर समस्या का सामना नहीं करना पड़ा था। इस सम्मेलन में अधिकतम सदस्य यूरोप में क्रांति को बिल्कुल समाप्त करना चाहते थे वाटरलू के युद्ध से पूर्व ही जब नेपोलियन को एल्बाद्वीप में निर्वासित कर दिया गया था तभी मित्र राष्ट्रों ने इस समस्या को हल करने के लिये प्रयत्न किया परंतु यह किसी को अनुमान नहीं था कि नेपोलियन वापस लौट आयेगा और यूरोप में हलचल मचायेगा। उसके पुनः लौट आने से मित्र राष्ट्रों के प्रयत्न असफल हो गये। अंत में नेपोलियन के पतन के पश्चात से मित्र राष्ट्र ने पुनः वियना में एक सम्मेलन किया। इस विशाल सम्मेलन में यूरोप के सभी छोटे-बड़े व्यक्तियों, शासकों, सेनापतियों तथा राजनीतिज्ञों ने भाग लिया। यूरोप में इतना बड़ा सम्मेलन कभी नहीं हुआ था। इस सम्मेलन में अनेक राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इंग्लैण्ड के लार्ड कैलसरे, लार्ड वेलेजली, रूस का जार, अलेक्जेण्डर प्रथम, प्रशा का वेतन वाम स्टीन, सम्राट विलियम तृतीय हाडेनबर्ग, केपोडी इस्ट्रिया, मंत्री नेसलरेड तथा पोप के प्रतिनिधि आदि इस सम्मेलन में सम्मिलित हुये। फ्रांस की ओर से बालोतरा सम्मिलित हुआ था इन बड़े-बड़े राज्यों के अतिरिक्त डेनमार्क, स्वीडन, बबेरिया और विरटेम्बर्ग के शासक तथा अन्य छोटे-छोटे राज्य भी इस सम्मेलन में सम्मिलित हुये थे काँग्रेस वियना में होने के कारण आस्ट्रिया के प्रधानमंत्री मेटरनिक को इस सम्मेलन का प्रधानमंत्री बनाया गया। वियना कांग्रेस के सिद्धांत- (1) वैधता या पुनः स्थापना-यूरोपीय देशों की जो सीमायें और शासक राजवंश फ्रांसीसी क्रांति से पूर्व या नेपोलियन के अभ्युदय से पहले थे, उन्हें पुनः स्थापित कर दिया जाये।

इसी को वैधता का सिद्धान्त कहा जाता है। पुरानी सीमाओं को ही वैध समझा गया और वैध रूप

से पुराने राजवंशों का ही उन पर अधिकार होना चाहिये। (2) शक्ति संतुलन-इस सिद्धान्त के अनुसार सेक्सनी का प्रदेश प्रशा को देने से इंकार किया जाय क्योंकि प्रशा को यह प्रान्त दे देने से वह अधिक शक्तिशाली बन जाता तथा यूरोप के लिये संकट का कारण बन जाता। यूरोप की जनता अभी तक उन भीषण युद्धों को न भूल सकी थी जिन्होंने उन्हें बर्बाद कर दिया था, अब वह युद्ध से घबरा गयी थी। अतः फ्रांस के सीमांत देशों हालैण्ड, बबेरिया, स्विट्जरलैंड और सार्डिनिया आदि देशों का विस्तार करके उन्हें शक्तिशाली बना दिया। इस सिद्धान्त के द्वारा बहुत से राज्यों को समाप्त करके शत्रुओं को साम्राज्य में सम्मिलित कर दिया गया। (3) क्षतिपूर्ति-तीसरा सिद्धान्त क्षतिपूर्ति का था। जिन राज्यों ने नेपोलियन को पराजित करने में अपने जन-धन को व्यय किया था, वे उसकी क्षतिपूर्ति चाहते थे यह क्षतिपूर्ति उन राज्यों के खर्चों पर की जानी चाहिये, जिन्होंने नेपोलियन का साथ दिया था। वियना कांग्रेस की कार्यप्रणाली कांग्रेस की कोई उचित कार्यप्रणाली नहीं थी। उसका कार्य करने का कोई व्यवस्थित ढंग नहीं था। दावतों, नाचघरों तथा नाटक का आनन्द लेते हुये बड़ी-बड़ी जटिल समस्याओं का निर्णय कर दिया जाता था। उसी समय विभिन्न राज्यों की सीमायें तथा राज्य के उत्तराधिकारी जनता की इच्छाओं का कोई ध्यान नहीं करते थे, विजित प्रदेशों में लूट मची थी जिसको जो अच्छा लगता था, वही ले जाता था। चार बड़े राष्ट्र रूस, इंग्लैण्ड, प्रशा तथा आस्ट्रिया लूट का माल अधिक से अधिक लेने के प्रयत्न कर रहे थे इंग्लैण्ड, फ्रांसीसी उपनिवेशों को हङप करना चाहता था। न करने की इच्छा थी। वारसा का डच पर रूस की दृष्टि थी। प्रशा के राजा की सेक्सनी प्राप्त करने की इचछा थीआस्ट्रिया, जर्मनी व इटली के विभिन्न प्रदेशों पर अधिकार करना चाहता  था। फ्रांस विजित देश था और इसके बड़े-बडे प्रदेशों को छीनने का ये लोग प्रयत्न कर रहे थे। फ्रांस का प्रतिनिधि चाहता था कि उसको कम से कम युद्ध व्यय की राशि देनी पढे। इस प्रकार सब अपने स्वार्थों में लगे थे तथा अन्य छोटे-छोटे शासक अपने खोये हुये प्देश पाने के लिये इंग्लैण्ड, आस्ट्रिया, रूस व प्रशा का साथ दे रहे थे अंत में 18 जून 1815 ई० में आस्ट्रिया, रूस, इंग्लैण्ड, प्रशा और फ्रांस के प्रतिनिधियों ने आपस में निर्णय करके कानून पास कर दिया। इसके मुख्य निर्णय निम्नलिखित थे वियना कांग्रेस के निर्णय- पोलैण्ड-सबसे पहला विवाद पोलैण्ड को लेकर हुआ। नेपोलियन ने वारसा की ग्रांडडची नामक एक अलग राज्य बना दिया था। पहले यह पोलैण्ड का एक भाग था। रूस के जार ने आस्ट्रिया और प्रशा से वादा किया था कि वर्षा की ग्रांडडची को समाप्त करने के बाद सारे पोलैण्ड को स्वयं ही हड़पना चाहा। उसने कहा कि आस्ट्रिया को इसके बदले में इटली का कुछ भाग, प्रशिया को सैक्सनी का पूरा प्रदेश दे दिया जाय। इतना ही नहीं जार ने पहले पोलैण्ड में अपनी सेना भेज दी और फिर अपना प्रभाव वियना काँग्रेस में पेश किया। प्रशिया ने इस प्रस्ताव को मान लिया उसे सैक्सनी का विशाल प्रदेश जो मिल रहा था परन्तु आस्ट्रिया और ब्रिटेन ने इसका दृढ़ता से विरोध किया। यहाँ तक कि आपस में युद्ध की नौबत आ पहुँची। अंत में तालीरा के प्रयत्न से यह समझौता हुआ कि प्रशिया को सारा सैक्सनी नहीं, बल्कि उसका कुछ भाग दे दिया जाय। पोलैण्ड का बड़ा भाग रूस को दे दिया, परंतु गैलिशिया, आस्ट्रिया के और पोसेन तथा कोरिडोर प्रशिया के पास रहा। फ्रांस-फ्रांस में बूर्बो वंश का शासन पुनः स्थापित कर दिया गया। लुई 18वाँ वहाँ का राजा बना। फ्रांस की वही सीमा तय की गयी, जो सन् 1789 में क्रांति से पहले थी उसे फ्रैंच गायना, मार्तिनिक तथा बूर्बो का द्वीप भी दे दिये । क्रांतिकारी तत्त्वों का दमन करने के लिये 1 लाख ब्रिटिश सेना फ्रांस में रखी गयी इसका खर्चा फ्रांस को देना पड़ा। ब्रिटेन-ब्रिटेन ने नेपोलियन को पराजित करने में जन और (उससे भी बढ़कर) धन की बड़ी सहायता की थी। अब उत्तर सागर में हेल्गोलैंड, भूमध्य सागर में माल्टा, सेन्टलूसिया, टोबैगो और मारिशस द्वीप फ्रांस से छीनकर ब्रिटेन को दे दिये गये। स्पेन के ट्रीनीडाड और होंडुरास तथा हालैण्ड के सीलोन (श्रीलंका) केंप कालोनी और गाय का कुछ भाग ब्रिटेन को दे दिया गया। ये सब द्वीप ब्रिटेन की नौ सैनिक शक्ति के लिये बहुत उपयोगी थे। रूस-रूस को पोलैण्ड का बड़ा भाग मिल गया। स्वीडन से उसे फिनलैण्ड मिला। आस्टिया-आस्ट्रिया को बाबेरिया टाइरोल और साल्जर्ब मिला। पोलैण्ड का गैलेशिया प्रदेश उसके अधिकार में रहा। बेल्जियम का जो प्रदेश आस्ट्रिया के पास था वह उससे लेकर बदले में उसे इटली में लोम्बार्डी, वैनेशिया इलीरियन प्रदेश दलमेशिया और कटारो का बंदरगाह दिया दया। प्रशिया-प्रशिया को सबसे अधिक लाभ हुआ। उसे उत्तरी सेक्सी, पोसेन, कोरिडोर और थोर्न मिला। राइन नदी का कोलोन, त्रिवे और एक्सला शापेल वाला प्रदेश और स्वीडिन पॉपिरोनिया भी उसे में प्रभाव बढ़ गया। मिल गया। इससे उसका राज्य क्षेत्र दुगुना हो गया और उसका दक्षिण जर्मनी इटली-इटली के अनेक राज्यों को पुनः स्थापित किया गया। पोप का राज्य उसे लौटा दिया गया। नेपल्स में फिर बूर्बो वंश का राज्य स्थापित हुआ। पीडमांट और जिनोआ का गणराज्य सार्डिनिया को दे दिया गया। टस्कनी और मौडेना में पुराने राज्य वंश फिर स्थापित राज्य नेपोलियन की पत्नी मारिया लुइसा को दे दिया गया। इसलिये कि वह आस्ट्रिया के सम्राट की पुत्री थी, इटली का काफी बड़ा भाग आस्ट्रिया को दे दिया गया। स्पेन-स्पेन में फिर बूर्बो वंश का राज्य स्थापित किया गया ट्रीनीडाड द्वीप ब्रिटेन ने ले लिया था। पुर्तगाल-नेपोलियन के युद्ध में पुर्तगाल ने ब्रिटेन का साथ दिया था, पर उसे कुछ नहीं मिला। हालैण्ड तथा बेल्जियम-हालैण्ड को बेल्जियम के साथ मिला लिया गया और इन दोनों पर औरेन्ज वंश का शासन स्थापित किया गया। स्वीडेन और डेनमार्क-स्वीडन का पोमैरिनिया प्रदेश प्रशिया को और फिनलैण्ड रूस को दे दिया गया। इसके बदले में नार्वे को डेनमार्क से छीनकर स्वीडन को दे दिया गया। जर्मनी-जर्मन के 38 राज्यों को संगठित करके एक जर्मन राज्य संघ बनाया गया। इस राज्य का एक संसद होती थी जिसका अध्यक्ष आस्ट्रिया का सम्राट फ्रांसिस प्रथम बनाया गया।

जर्मनी के एकीकरण की ओर यह पहला कदम था। यूरोप के राज्यों का इस प्रकार से नये रूप में पुनर्गठन करने के अलावा वियना काँग्रेस ने कुछ अन्य निर्णय भी किये इनमें से प्रथम प्रथा को समाप्त करना तथा द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय कानून बनाने का प्रयत्न उल्लेखनीय है। दास प्रथा का विरोध-अठारहवीं शताब्दी में दास प्रथा प्रचलित थी। सन् 1807 ई० में ब्रिटेन, सन् 1813ई० में स्वीडन और सन् 1814 ई० में हालैण्ड ने अपने यहाँ दास प्रथा - को समाप्त कर दिया था। सन् 1815 में वियना कांग्रेस के लिये दासता के विरुद्ध प्रस्ताव पास करके घोषणा की कि दास प्रथा, सभ्यता और मानव अधिकारों के प्रतिकूल है। परन्तु इस प्रस्ताव पर अमल करना न करना राज्यों की अपनी इच्छा पर छोड़ दिया गया। अन्तर्राष्ट्रीय कानून-वियना काँग्रेस ने एक अन्तर्राष्ट्रीय कानून बनाया, जिसमें यूरोप की नदियों में नौका परिवहन के और विविध राज्यों द्वारा समुद्रों के उपयोग के बारे में और राज्यों के पारस्परिक व्यवहार के विषय में नियम-निश्चित किये गये थे। वियना कांग्रेस का महत्त्व-वियना काँग्रेस 'दो युगों का संधि स्थल कही जाती है। यहाँ पुराना युग समाप्त होकर नया युग प्रारंभ हो गया। इससे उन राज्यों को यह बात समझ में आ गयी कि बातचीत और समझौते द्वारा भी राजनीतिक समस्याओं को हल किया जा सकता है। वियना कांग्रेस ने यूरोप में शांति स्थापित करके जनता को चैन की सांस लेने का अवसर दिया।

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