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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

विधि (कानून) से आप क्या समझते हैं?

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विधि (कानून) से आप क्या समझते हैं?


कानून (विधि) का अर्थ समाज में शान्ति एवं व्यवस्था कायम रहे इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्तियों का परस्पर व्यवहार कुछ नियमों द्वारा संचालित हो, यदि उन नियमों की कोई अवहेलना करे तो उसे दण्ड का प्रावधान हो। अतः कानून मानव व्यवहार के वे नियम है जो राज्य द्वारा निर्मित किए जाते हैं और उसी के द्वारा उसे क्रियान्वित (लागू )किया जाता है। दूसरे शब्दों में राज्य द्वारा निर्मित इन कानूनों का पालन करना प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य ही नहीं अपितु आवश्यक भी है। यदि वह राज्य द्वारा बनाये गये इन कानूनों का पालन नहीं करता तो कानून की दृष्टि में वह अपराधी है तथा उसे दण्ड दिया जाना चाहिए। कानून के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करते हुए एक विद्वान ने लिखा है राज्य का मूलभूत कर्तव्य मनुष्य के कल्याण एवं नागरिकों के व्यक्तित्व के विकास में सहायता देना है। यह कार्य राज्य तभी कर सकता है जब राज्य के सभी निवासी अर्थात् नागरिक अपने दैनिक जीवन में कुछ सामान्य नियमों का पालन करे। राज्य द्वारा निर्धारित किए गए इन नियमों को ही कानून की संज्ञा दी जाती है। कानून की परिभाषा कानून शब्द अत्यन्त व्यापक है तथा इसका विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है। विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से कानून की परिभाषा की है। इनमें से कोई कानून के किसी पक्ष पर बल देता है तो कोई किसी पक्ष पर। विद्वानों द्वारा कानून शब्द की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी गयी है

प्लेटो के अनुसार-"कानून रूढ़ियों के वर्ग की वस्तु है।"

अरस्तू के अनुसार-"कानून एक ऐसा तर्क है जिस पर इच्छाओं का कोई प्रभाव नहीं पढ़ता है।"

आस्टिन के अनुसार-"कानून सम्प्रभु के आदेश है।"

हालैण्ड के अनुसार-"कानून मनुष्य के बाह्य आचरण के वे व्यापक नियम है, जिन्हें सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राजनीतिक सत्ता लागू करती है।"

वुडरो विल्सन के अनुसार-"कानून निश्चित विचार तथा स्वभाव का अंश है, जिसे सरकार की शक्ति लागू करती है।"

डियूग्वे के अनुसार-"आधारभूत अर्थ में कानून उन आचरणों के नियमों के समूह को कहते हैं, जिनका पालन साधारण मनुष्य सामाजिक जीवन से प्राप्त सुविधाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए करता है।"

उपर्युक्त परिभाषाएँ देखने से ज्ञात होता है कि कानून की सर्वसम्मत कोई भी परिभाषा नहीं है। लेकिन इनका विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि ये राज्य द्वारा लागू किये जाने वाले नियम हैं या सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं। कानून प्रगतिशील होता है तथा अपने आप को जनता के नैतिक, आर्थिक और धार्मिक वातावरण के अनुकूल बनाता है। कानून अनिवार्य होता है उसे प्रभावी बनाये जाने के लिए शक्ति का भी प्रयोग किया जाता है। कानून के आवश्यक तत्त्व-कानून निम्नलिखित पाँच आवश्यक तत्व होते हैं।

(i) नागरिक समाज का अस्तित्व जहाँ कानून लागू किया जाये।

(ii) एक प्रभुसत्ता पूर्ण सत्ता (राज्य) का होना जो कि कानून बनाने एवं लागू करने का कार्य करें।

(iii) निर्मित तथा स्वयं विकसित नियमों की शृंखला जो व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों यथा व्यक्ति एवं समुदाय के सम्बन्धों का नियमन करे।

(iv) मनुष्य के बाहा आचरण से सम्बन्धित कानून मनुष्य के बाह्य आचरणों से सम्बन्धित होते हैं। उसके दिल में क्या है, इससे कानून का सम्बन्ध नहीं।

(v) सामाजिक जीवन की रक्षा तथा वृद्धि के लिए इनका पालन करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। कानून के स्रोत-कानून के सोत से तात्पर्य उन साधनों से है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कानून (विधि) निर्माण में सहायता देता है आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्यों में प्रायः

विधान मण्डल द्वारा कानून का निर्माण होता है पर विधान मण्डल के अलावा भी कानून फे अनेक स्रोत होते हैं जिनका वर्णन आग्रलिखित शीर्षकों के आधार पर किया जा सकता है-

1) परम्परा तथा रीति-विराज-रीति-रिवाज का कानून का सबसे प्राचीनतम रोत है। प्रारम्भिक समय में जब लेखन कला अतात थी और समस्याएँ इतनी जटिल न घी, आपसी जोड़ों का निर्णय परिवार, कुल अथवा जाति की परम्परा के अनुसार किया जाता था। इन परम्पराओं की मान्यता थी, सामाजिक व्यवस्था ठीक रखने की दृष्टि से इन परम्पराओं का आदर होता था, जब कोई परम्परा समाज में पूर्ण रूप से व्याप्त हो जाती थी तो कानून भी उसी के अनुसार बना लिये जाते थे। कोई भी शासन में जनता की रीति-रिवाजों में होने वाले परिवर्तन के साथ-साथ कानून में भी परिवर्तन कर दिये जाते थे मैकाइवर के शब्दों में "कानून के विशाल ग्रन्थ में राज्य केवल कुछ नये वाक्य लिखता है और कहीं-कहीं एक आधा पुराना काट देता है। जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने शरीर को फिर से नहीं बना सकता वैसे ही राज्य भी किसी समय सम्पूर्ण कानून का पुनर्निर्माण नहीं कर सकता, इंग्लैण्ड आदि देशों में आज भी वहाँ का संविधान रीति-रिवाजों और प्रधाओं पर आधारित है। इस प्रकार हम देखते हैं कि कानून सम्बन्धी बहुत सी सामग्री हमें प्रचलित रीति-रिवाजों से प्राप्त होती है।

(2) धर्म-धर्म भी कानून के विकास में बुहत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। प्राचीन काल में धर्म मनुष्य के सामाजिक जीवन का प्रमुख स्तम्भ था। ईश्वर को समस्त सत्ता और कानून का स्रोत माना जाता था। उस समय धर्म व कानून इतने घुले-मिले थे कि जीवन के क्षेत्र में धर्म प्रधान था। आज भी हिन्दुओं के कानून-मनुस्मृति तथा मुस्लिम कानून-सरैयत के आधार पर बने हुए हैं। इस तरहह धर्म भी कानून का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

(3) न्यायालयों के निर्णय-प्राचीन समय में कभी-कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि धर्म तथा परम्पराओं में संघर्ष उत्पन्न हुआ, समाज का एक वर्ग परम्पराओं की दुहाई देने लगा, दूसरा वर्ग धर्म की। अस्तु, ऐसे संघर्षों का निर्णय समाज के बुद्धिमान लोगों पर छोड़ा गया। इस निर्णायक व्यक्ति के निर्णय भविष्य के लिए एक परम्परा बन गये इसी प्रथा से आज भी न्यायालय अपने निर्णयों द्वारा कानून के निर्माण में महत्त्वपूर्ण हाथ बँटाते हैं। होम के शब्दों में

"न्यायाधीश कानून का निर्माण करते हैं और उसे करना भी चाहिए।" न्यायधीश कानूनों की व्याख्या तो करते ही हैं, लेकिन जहाँ कानून अस्पष्ट एवं दुरूह होता है वहाँ वे नैतिकता व विवेक के आधार पर निर्णय देते हैं। यह निर्णय भविष्य के लिए उदाहरण बन जाते हैं इस प्रकार न्यायाधीशों के निर्णय कानून के उद्गम स्थल हुए।

(4) कानूनी टीकाएं-कानूनी वाद-विवाद तथा बड़े-बड़े न्याय शास्त्रियों और कानून वेत्ताओं की टीकाएँ भी कानून का एक महत्त्वपूर्ण उद्गम है। टीकाकार कानूनों के मूल तत्त्वों को विवेचना करते हैं, उनकी कमियां बताते हैं, तथा उनमें संशोधन के सुझाव देते हैं न्यायालयों के न्यायाधीश इन टीकाओं को मान्यता देते हैं तथा निर्णय देते समय इनका आदर के साथ उल्लेख करते हैं। इस प्रकार कानून की टीकाएँ कानून के विकास में सहायक होती हैं। ब्लैक स्टोव, डायसी, एन्सन, कोक इत्यादि विधिवेताओं की नौकाएं कानून की बात मानी गयी हैं।

(5) व्यावहारिक एवं न्यायपूर्ण निर्णय-कभी-कभी ऐसे मामले प्रस्तुत होते हैं जिन पर प्रचलित कानून ठीक प्रकार से लागू नहीं हो पाते। ऐसे मामलों में अपना निर्णय देने में न्यायाधीशों को औचित्य या व्यावहारिकता का आश्रय लेना पड़ता है तथा निर्णय देना पड़ता है। ये निर्णय न्याय पूर्ति तो करते हैं बल्कि उसे प्रचलित भी बनाते हैं। इस प्रकार न्यायपूर्ण निर्णय कानून के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

(6)विधि निर्माण-आज के युग में कानून का सबसे महत्त्वूपर्ण सोत विधि निर्माण है। संवैधानिक रीति से बने हुए कानून जनता की इच्छा के प्रतीक होते हैं। ये कानून प्रत्येक राज्यों मैं वहाँ की व्यवस्थापिका सभाओं द्वारा बनाये जाते है लोकतन्त्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि होती है। जनता की प्रतिनिधि व्यवस्थापिका होती है। आज संसार में व्यवस्थापिका कानून का इतना महत्वपूर्ण स्रोत हो गयी है कि अन्य स्रोत से दव गये हैं। व्यवस्थापिका के महत्त्व पर प्रकाश डारते हुए सर हेनरीमेन ने लिखा है-"सभ्य समाज में व्यवस्थापिका ही कानून का मूलभूत स्रोत हैं।" विल्सन महोदय ने विधि निर्माण सम्बन्धी व्यवस्थापिका के अधिकार को और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा है-"विपि (कानून) निर्माण के सभी सोत शनैः शनैः एक महान् और गहरे तथा विस्तृत विधान स्रोत में समाहित होते जा रहे हैं। अत: उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह सिद्ध होता है वर्तमान युग में विधि अथवा कानून का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सोत विधान मण्डलों (व्यवस्थापिका)द्वारा निर्मित विधि निर्माण है।

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