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विधान मण्डलों (व्यवस्थापिका)द्वारा निर्मित विधि निर्माण

 विधान मण्डलों (व्यवस्थापिका)द्वारा निर्मित विधि निर्माण

न्याय की अवधारणा (प्रत्यय) न्याय समाज दर्शन की ऐसी बुनियादी धारणा है जिस पर सामाजिक चिन्तन के प्रारंभ से विचार होता रहा है। इतिहास में न्याय की अनेक प्रकार से व्याख्या हुई है। कभी उसे 'जैसी करनी वैसी भरनी' का पर्याय माना जाता रहा है तो कभी उसे ईश्वर की इच्छा और पूर्व जन्मों के कृत्यों का फल। आधुनिक न्यायशास्त्र में न्याय का अर्थ सामाजिक जीवन की वह अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के आचरण का समाज के व्यापक कल्याण के साथ समन्वय स्थापित किया गया हो। स्वभावतः प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु अपने आचरण करता है, पर उसका आचरण न्यायपूर्ण तभी समझा जा सकता है, जब उसका आचरण समाज को भी कल्याण के पथ पर अग्रसर करने वाला हो। सारांशतः न्याय का आशय समाज के व्यापक कल्याण की सिद्धि है। उस व्यापक कल्याण की सिद्धि, जो व्यक्तियों के अलग-अलग कल्याण से भिन्न हो। न्याय की धारणा के प्रमुखता दो आधार है-स्वतंत्रता और समानता।

न्याय के अर्थ का विभाजन न्याय के अर्थ को मुख्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है

1.व्यापक अर्थ।

2.संकीर्ण अर्थ।

1. व्यापक अर्थ-इसके अन्तर्गत न्याय को मानव तथा समाज के समस्त आचरणों के सन्दर्भ में देखा जाता है। इस रूप में यह सदाचार अथवा अच्छाई के रूप में माना जाता है। इसको नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, इत्यादि दृष्टिकोणों से देखते हुए समाज में न्याय-अन्याय, अच्छाई बुराई, धर्म-अधर्म, सदाचार-दुराचार आदि के नियमों, मूल्यों तथा आचरणों के मापने का पैमाना माना जाता है। इसी व्यापक अर्थ में, न्याय को प्लेटो और अरस्तू के दर्शन में स्थान मिला है। यहाँ न्याय की अवधारणा सत्य तथा नैतिकता की धारणा के समरूप समझी जाती है। इसके आधार पर मानव के सारे आचरणों एवं सम्बन्धों की परख की जाती है। यहाँ न्याय व्यक्ति से सम्बन्धित न होकर सामाजिक व्यवस्था से सम्बन्धित है। न्याय का व्यापक अर्थ न्याय को एक प्रक्रिया अर्थात् कानूनी न्याय के रूप में नहीं देखता।

2.संकीर्ण अर्थ-इसके अन्तर्गत न्याय को कानून के साथ में जोड़कर देखा जाता है। यहाँ न्याय एक प्रक्रिया के रूप में दिखाई देता है। न्याय को व्यक्ति के रूप में देखा जाता है अर्थात् क्या व्यक्ति को उचित न्याय मिल रहा है या नहीं? कानून बनाने के तरीके, न्यायसंगत कानून, अदालती स्वतन्त्रता तथा निष्पक्ष न्यायिक व्यवस्था, कानून तथा अदालतों के समक्ष प्रत्येक नागरिक की समानता इत्यादि के सन्दर्भ में न्याय को देखा जाता है। यह मुख्यतः न्याय का कानूनी दृष्टिकोण है।

न्याय की परिभाषा-विभिन्न विद्वानों ने न्याय की परिभाषा निम्न प्रकार से दी है मलेरिया के अनुसार, "न्याय उन मान्यताओं और प्रक्रियाओं का योग है जिसके माध्यम से प्रत्येक मनुष्य को वे सभी अधिकार और सुविधाएँ जुटाई जाती हैं जिन्हें समाज उचित मानता है। जे.एस.मिल के अनुसार,"न्याय नैतिक नियमों के कुछ वर्गों का नाम है जो अधिक स्पष्ट रूप में मानव कल्याण की आवश्यकताओं से सम्बन्धित है और इसी कारण जीवन के पथ प्रदर्शन के लिए किन्हीं भी अन्य विषयों की तुलना में वह अधिक निश्चित दायित्व है।"

न्याय की अवधारणा का विकास-क्रम भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों ही राजनीतिक दर्शनों में न्याय की धारणा को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है जिसका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है भारतीय राजनीतिक चिंतन में न्याय की अवधारणा न्याय को भारतीय चिन्तन में प्राचीन काल में अत्यधिक महत्त्व दिया गया था। प्राचीन भारतीय चिन्तन की विशेषता यह रही है कि भारत में उस काल में ही न्याय की उस कानूनी धारणा को स्वीकार कर लिया गया था जो पाश्चात्य दार्शनिकों ने आधुनिक काल में दी है। मन, बृहस्पति, शुक्र, सोमदेव व कौटिल्य ऐसे ही चिन्तक थे आज हम जिन विवादों को दीवानी व फौजदारी की दो श्रेणियों में बाँटते हैं मन ने इसे अति प्राचीन काल में ही विभाजित कर दिया था। कौटिल्य के अनुसार, "न्याय ही राज्य का प्राण होता है तथा जो राज्य अपनी प्रजा के लिए निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था नहीं करता, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।"

पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन में न्याय की अवधारणा प्लेटो के पहले प्राचीन यूनान में न्याय के तीन रूप विद्यमान थे-परम्परावादी, उग्रवादी तथा अनुभववादी। परम्परावादी सिद्धांत का प्रतिपादन सिफलिस तथा पोलिमार्कस ने किया। उसके अनुसार, "जब व्यक्ति, अपना कर्ज चुकाता है, शत्रुओं से शत्रुवत् तथा मित्रों से मित्रवत् व्यवहार करता है तो वह न्याय के पथ पर है।"

उदारवादी सिद्धान्त-इस सिद्धान्त का प्रतिपादन थैसीमेक्स ने किया। उसके अनुसार, न्याय 'शक्तिशाली का हित' होता है। न्याय का अर्थ है कानून के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। सत्तारूढ लोग अपने हित में कानून की रचना करते हैं। अत: इससे शक्तिशाली लोगों का हित होता है।"

अनुभववादी सिद्धान्त-ग्लाडकन ने अनुभववादी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था उसके अनुसार, "न्याय दुर्बलों का हित होता है। न्याय की अनुपस्थिति में बलवान दुर्बलों को सताते हैं। दुर्बलों ने पारस्परिक समझौता करके बलवान के अत्याचारों को रोकने लिए नियम बनाये।"

प्लेटो ने अपने से पहले प्रचलित न्याय के सम्बन्ध में धारणा के सर्वथा विरुद्ध विचार प्रकट किये। उसने अपने सम्पूर्ण दर्शन का आधार ही न्याय को बनाया और अपनी अमर कृति 'रिपब्लिक' में न्याय को इतना प्रमुख स्थान दिया कि उसके नाम का उपशीर्षक ही 'न्याय से सम्बन्धित (Conceming Justice) रख दिया। प्लेटो ने न्याय शब्द का प्रयोग नैतिक अर्थ में किया है। प्लेटो ने न्याय के दो रूप बताते हैं-व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय। वह मानवीय आत्मा में तीन तत्त्व देखता है- इन्द्रिय, तृष्णा, शौर्य तथा बुद्धि।

उसके अनुसार-"प्रत्येक राज्य में तीन वर्ग होते हैं-शासक वर्ग, सैनिक वर्ग और उत्पादक वर्ग। ये तीनों मानवीय आत्मा के उपरोक्त तीनों तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।"

प्लेटो की दृष्टि में, 'न्यायिक व्यक्ति वह है जो अपनी विशिष्ट प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करे तथा आदर्श और न्याय राज्य वह है जिसमें शासक, योद्धा व श्रमिक अपने-अपने निर्दिए कार्य करते हैं। इस प्रकार न्यायी व्यक्ति को समझने के लिए व्यक्ति के वृहत् स्वरूप राज्य में विद्यमान न्याय को समझना चाहिए। अरस्तु के अनुसार, न्याय के दो रूप होते है- पहला, वितरणात्मक न्याय तथा दूसरा, सुधारात्मक न्याय। वितरणात्मक न्याय-वह होता है जिसमें राजनीतिक पदों की प्राप्ति की योग्यता राज्य के प्रति की गयी सेवा के अनुरूप हो।

 सुधारात्मक न्याय-इसका अर्थ यह है कि दो नागरिकों के पारस्परिक सम्बन्धों को निर्धारित करते हुए सामाजिक जीवन को सुव्यस्थित रखा जाए। सेंट ऑगस्टाइन, "न्याय को ईश्वरीय राज्य का सर्वप्रथम तत्त्व मानता है। तेरहवीं शताब्दी से थॉमस एक्विनास के 'कानून और न्याय को परस्पर सम्बन्धित माना है।
न्याय के सार्वलौकिक तथा स्थिर आधार तत्त्व या सिद्धान्त-न्याय बहुत कुछ सीमा तुक व्यक्ति को अपने विश्वास और अपनी धारणा पर निर्भर करता है। फिर भी कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो न्याय की सभी धारणाओं में विद्यमान हैं और जिन्हें न्याय के आधार तत्त्व कहा जा सकता है। बट ने अपनी पुस्तक (Political Theory) में 'आधार तत्वों का उल्लेख निम्नलिखित आधार पर किया है

1.सत्य-रेडवाच के अनुसार, न्याय का प्रत्यक्ष सम्बन्ध केवल अच्छाई से होता है, सत्य से नहीं सत्य तो विज्ञान का क्षेत्र है। लेकिन वास्तव में सत्य न्याय का एक बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

2. मूल्यों के आधारभूत क्रम की सामान्यता विभिन्न मामलों के विषय में विचार करते हुए हमारे द्वारा न्याय की एक ही धारणा को लागू किया जाना चाहिए। यह नितान्त अनुचित होगा कि हमारे द्वारा एक मामले में न्याय की एक धारणा को और दूसरे मामले में न्याय की किसी अन्य घारणा को लागू किया जाए

3. कानून के समक्ष समानता का व्यवहार-कानून के सामने सभी समान होने चाहिए और उनके प्रति समानता का व्यवहार किया जाना चाहिए। एक ही प्रकार की स्थितियों में मनमाने ढंग से भेद करना अन्यायपूर्ण है। किन्हीं भी व्यक्तियों के साथ, धर्म, जाति लिंग के आधार पर भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति की उन्नति तथा विकास के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।

4.स्वतन्त्रता-ठचित रुकावटों के अलावा मनुष्य की स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगायी जानी चाहिए। मनमाने ढंग से व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रुकावट लगाना अन्यायपूर्ण है। शासक के अपने स्वार्थ या शक्ति को बनाये रखने के लिए ही व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर कोई रुकावटें नहीं लगायी जानी चाहिए।

5. प्रकृति की अनिवार्यता के प्रति सम्मान-जो कार्य व्यक्ति की समाy से बाहर है और जो कार्य प्रकृति की ओर से व्यक्ति के लिए असम्भव है उन्हें करने के लिए व्यक्ति को मजबूर करना न्याय भावना के विरुद्ध है। अतः जिन कानूनों या आदेशों का पालन करना मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है, ऐसे कानूनों के आदेशों की अवहेलना करने पर व्यक्ति को दण्ड देना या उसकी निन्दा करना भी अन्यायपूर्ण है। स्थानीय, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सभी क्षेत्रों में न्याय को प्राप्त करने के लिए उपर्युक्त पाँच सिद्धांतों का पालन आवश्यक है। न्याय स्वयं में स्वतंत्र धारणा है। यह प्रत्येक सामाजिक अवस्था के सामाजिक आचरण के आचार नियमों के आधार पर निश्चित होता है। प्रत्येक समाज में न्याय की अपनी पृथक् धारणा है जो उस समाज के समग्र आचार-व्यवहार, सम्बन्धों आदि की अच्छाई-बुराई मापने की कसौटी बन जाती है। न्याय का मूल भाव जोड़ना, लगाना, बन्धन अथवा ग्रन्थि है। प्रसिद्ध राजनीतिक विद्वान बार्कर के कथानुसार, "यह प्रधानतः मनुष्यों को मानवीय सम्बन्धों की संगठित व्यवस्था में जोड़ने का कार्य है।"

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