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बुधवार, 22 जुलाई 2020

वैदिक संस्कृति की मूलभूत विशेषताए

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वैदिक संस्कृति की मूलभूत विशेषताए 

ऋग्वेद या पूर्व वैदिक संस्कृति की विशेषताएं-ऋग्वैदिक काल से आशय उस समाज से है जबकि आर्य पंजाब तथा गंगा घाटी के उत्तरी भाग में फैले थे। ऋग्वेद एक उस समय का ऐसा ग्रन्थ है जिससे पूर्व वैदिक कालीन आर्यों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक स्थिति का विवरण मिलता है। जिस काल में ऋग्वेद की रचना हुई उस काल को सभ्यता को हम ऋग्वैदिक सभ्यता अथवा पूर्व वैदिक काल की सभ्यता के नाम से जानते हैं। इससे प्राप्त विवरण इस प्रकार हैं-

राज्य का स्वरूप (राजनीतिक दशा)

(1) राजतन्त्र-ऋग्वैदिक काल में राजतन्त्र राज्य का मुख्य स्वरूप था। ऋग्वेद में वर्णित कई कबीले राजा के आधीन थे। ऋग्वेद में राजा के लिए राजन शब्द का उपयोग हुआ है। ऐसा लगता है, राजा का पद पैतृक हो गया था और इसमें ज्येष्ठाधिकार का सिद्धान्त लागू होता था।

(2) कबीली प्रजातन्त्र-रामशरण शर्मा ने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि ऋग्वैदिक काल में कबीली प्रजातन्त्र था। गणतन्त्र के लिये तकनीकी शब्द 'गण का प्रयोग ऋग्वेद में 46 बार हुआ है। एक जगह गण के प्रधान को 'गणपति कहा गया है। एक स्थान पर राजन भी। लगता है, गणपति ने बाद में राजा का स्थान ले लिया हो। गणपति का चुनाव गण के सदस्यों द्वारा होता था-इसके बारे में कोई सन्दर्भ नहीं है। गण का आर्थिक आधार कृषि और पशुपालन तथा। गीत में नाच-गान होता था, ऐसी जानकारी भी नहीं मिलती। ऋग्वैदिक काल के अन्त में कबालीगान अलग प्रकार के होने लगे थे।

(3) राजत्त्व-राजत्त्व के उद्गम और प्रकृति के बारे में विभिन्न मत हैं। शुरू में, समाज के पितृसत्तात्मक वातावरण ने राजस्व को जन्म दिया। एच० जिमर और ए० एस० अलतेकर का ऐसा ही मत है। ऋग्वैदिक काल में कुटुम्ब का मुखिया कुलपति', बड़ा महत्त्वपूर्ण व्यक्ति होता था। उसका हुक्म सब मानते थे। कई कुल या कुटुम्ब मिलकर 'विश हुये और विश का मुखिया 'विशपति'। को विश के 'जन' बना और उसका मुखिया गणपति कहलाया। राजा का पद सर्वोपरि होता था। वह निरंकुश नहीं होता था। लगता है, उसके अधिकारों पर 'विदरथ, 'सभा, समिति जैसी लोकप्रिय परिषदों का नियन्त्रण था। उसे परम्पराओं के अनुसार चलना होता था। उसकी गैर-जिम्मेदारी पर पुरोहितों का नियंत्रण होता था उसके प्रमुख कार्य शासन. सैनिक तथा न्याय सम्बन्धी थे। राजा अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए प्रजा से 'बलि' (कर) लेता या। यह प्रथा वित्तीय प्रशासन की शुरुआत की ओर इशारा करती है।
सामाजिक दशा -समाज दो विरोधी प्रजातीय वर्ग या समूह में बँटा था। आधार था वर्ण अर्थात् रंगा एक वर्ग में आर्य थे जो गोरे थे, यज्ञ करते थे, अग्रि-पूजक थे और दूसरे वर्ग में दस्यु थे जो काले थे, लिंग उपासक थे। आर्य संस्कृत बोलते थे, दास या दस्यु अस्पष्ट भाषा बोलत थे और उनकी नाक चपटी होती थी। ऋग्वेद में ब्राह्मण और क्षत्रिय शब्दों का उपयोग हुआ है। परन्तु उस समय जाति प्रथा थी या नहीं, इस बारे में विद्वानों में मतभेद है। एन० के० दत्त और जी० एस० धुरये के अनुसार जाति प्रथा उस समय मौजूद थी। इसके विपरीत एच० जिगर की बुक एफ० मैक्समूलर और पी० वी काणे के मत हैं कि ऋग्वैदिक काल में जाति प्रथा नहीं थी। ऋग्वैदिक काल में ये जातियाँ जन्म के आधार पर नहीं बनी थीं। अपनी इच्छानुसार व्यक्ति किसे भी अपना सकता था। एक स्थान पर कवि कहता है-"मैं कवि हूँ मेरा पिता वैद्य, मेरी माँ अनाज कूटती है। हम अलग-अलग कामों से धन अर्जित करना चाहते हैं।" कवि इन्द्र से पूछता है-हे इन्द्र! मुझे लोगों का रक्षक बनाओगे या राजा? क्या तुम ऋणी बनाओगे या मुझे घन दोगे?"

मतलब एक ही व्यक्ति राजा भी हो सकता था और ऋणी भी ऋग्वेद में यह भी आया है कि देवापी अपने छोटे भाई शान्तनु, जो बाद में राजा हो गया था, का पुरोहित था। मतलब यह कि एक भाई राजा था और दूसरा पुरोहित।गहनों मेंलोपमुद्रा, योषा, वास्तव में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र व्यावायिक वर्ग थे कि जाति।

(1) कौटुंबिक जीवन-कौटुम्बिक जीवन का आधार पितृसत्तात्मक या ऋग्वेद में कई ऐसे सन्दर्भ आये हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि पिता का बच्चों पर पूरा नियंत्रण होताथा। एक विशेषता यह थी कि आतिथ्य सत्कार पर जोर दिया जाता था। आतिथ्य सत्कार भी पंच महायज्ञों में से एक था।

(2) विवाह-कोम्बिंग जीवन का आधार विवाह था। ब्रह्म विवाह का विशेष प्रचलन था। वैसे गान्धर्व, राक्षस, क्षात्र और असुर विवाह के संकेत मिलते हैं बाल विवाह तथा विधवा विवाह अज्ञात था। साधारणतया एक पत्नी रखने की प्रथा थी। नियोग होता था। वैश्या प्रथा प्रचलन के कुछ संकेत मिलते हैं।

(3) स्त्री दशा-स्त्री दशा अच्छी थी उनका भी उपनयन होता था विश्वारा, सिकता-निवावरी आदि विदुषियाँ थी।

(4) शिक्षा-लड़के और लड़की की शिक्षा उपनयन संस्कार से चालू होती थी वेदाध्ययन के लिए बच्चों को विशेष गुरुओं के पास जाना होता था शिक्षा मुखाग्र दी जाती थी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य चरित्र विकास होता था।

(5) आमोद-प्रमोद-आमोद-प्रमोद में रथदौड़ प्रमुख था। इसके अलावा शिकार, शतरंज, नाच, गान आदि अन्य आमोद-प्रमोद के साथ थे, ऋग्वेद में समन शब्द आया है। शमन शायद वह संस्था थी जो आमोद-प्रमोद का व्यवसाय करती थी।

(6) खान-पान-भोजन में दूध और उससे बनी वस्तुएँ मुख्य थीं। फल, सब्जी, घी आदि का भी प्रचलन था। मांस भी खाया जाता था। परन्तु गाय को अघन्य माना जाता था सोम और सुरा का भी प्रचलन था।

(7) वस्त्र आभूषण-वस्त्रों में वास, अधिवास, अटक, द्रापी निवि आदि मुख्य थे। कर्णशोभन, कुटीर, न्योचनी, खादी, निष्क, मणि आदि का प्रचलन था। आर्थिक दशा -ऋग्वैदिक कालीन आर्थिक दशा का मुख्य वैशिष्ट था. लोहा। ऋग्वेद में 'अयसे शब्द आया है। मोनियर विलियम्स, गेल्डनर, एम० एस० बेनी, पी० नीयो लल्लनजी गोपाल और एन० आर० बेनी ने अयस का मतलब लोहे से लिया है। इसके प्रचलन से कृषि का विकास हुआ, वन-सम्पदा का उपयोग हुआ, खनिजों का दोहन हुआ। कई सस्त भी लोहे से बने होंगे। खेती लोगों का मुख्य व्यवसाय था। हर गृहस्य उपजाऊ जमीन के मालिक होने की चाह रखता था। आर्य मूलतः कृषक थे और वे बैल गाय, घोड़ा, बकरी तथा ऊँट आदि पालते थे। उनकी सम्पत्ति इससे आंकी जाती थी कि उनके पास कितने पशु हैं। बदलते समय के साथ समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऋग्वैदिक आर्यों ने श्रम-विभाजन के सिद्धान्त को अपना लिया। धन्धों के अनुसार 4 वर्ग हो गये। ब्राह्मण लोग यज्ञ करने और शिक्षा देने और यज्ञ का कार्य करने लगे, क्षत्रिय लड़ाई का काम करने लगे, वैश्य खेती, पशुपालन और दूसरी कलाओं से सम्बन्ध रखने लगे। शूद्र निम्न प्रकार का कार्य करने लगे। इसके आलावा जिन लोगों ने बुनाई का पेशा अपनाया वे बुनकर कहलाने लगे जो लोग रथ, वेगन (अनस) तथा वोट (नाव) आदि बनाते थे वे बढ़ई कहलाने लगे। कर्मकार युद्ध और खेती में काम आने वाले औजार बनाने लगे। इनके अलावा सोने का काम करने वाले हिरण्यकार कहलाने लगे। कुम्हार, नाई, (वपन्नी) वैद्य आदि के भी अपने वर्ग हो गये। कृषि और उद्योग के आधिक्य या अतिरेक माल ने आन्तरिक और बाह्य व्यापार को प्रोत्साहित किया। पणी लोगों ने व्यापारी वर्ग बनाया ।वे जरूरतमंद लोगों को अधिक व्याज दर पर कर्ज देते थे। बाजार में मोल-भाव होता था। व्यापार समुद्री मार्ग से होता था या नहीं, इस बारे में विवाद है। व्यापार या कि कहा जाये विनिमय का माध्यम गाय था। परन्तु यह एक सुविधाजनक माध्यम नहीं था। यदि किसी वस्तु की कीमत आधी गाय हो तो उसका मूल्य नहीं चुकाया जा सकता था। गाय के बदले धातु एक अच्छा साधन हो सकती थी। स्वर्ण धातु का प्रचलन ऋग्वैदिक काल में था। परन्तु क्या सिक्कों का प्रचलन उस समय था? यह एक अहम् प्रश्न है। डी० आर० भंडारकर का कहना है कि ऋग्वेद में वर्णित निश्क और हिरण्डपिंड सिक्के थे।

धार्मिक दशा -आर्य प्राकृतिक ईश्वर जैसे-आकाश, सूर्य, वायु और अग्नि को ही मानते थे। बाद में जब वे अन्यों के सम्पर्क में आये तो वे सोम पंथ या सम्प्रदाय और निराकार या अमूर्त देवताओं, जैसे-वरुण को मानने लगे। 14 ई० पूर्व तक देव और असुर उपासकों में कोई बिरोध नहीं था। आर्य लोग प्रकृति के अजूबों से काफी प्रभावित थे। उन्हें उसमें कुछ पराशक्ति नजर आयी। सो वे प्राकृतिक चीजों को मानव रूप में पूजने लगे और उन्हे अमर मानने लगे। ऋग्वैदिक धर्म बहुदेववादी था, क्योंकि ऋग्वेद में कई देवों का वर्णन आया। देव' का मतलब देने वाला। सूर्य, चाँद देव हैं, क्योंकि ये सभी को प्रकाश देते हैं परन्तु विशिष्ट धार्मिक विचार के सन्दर्भ में बहुदेववादी सिद्धान्त शंकास्पद हैं अनेक देवों में से प्रत्येक की स्तुती की जाती है तो उसे सर्वोपरी माना जाता है, विश्व सृष्टि माना जाता है ऋग्वैदिक धर्म मूर्ति पूजा बाला धर्म नहीं था। कोई मन्दिर, कोई मूर्ति नहीं मिली है। अलबत्ता इन्द्र की मूर्ति का उल्लेख है। परन्तु कुषाण युग से पहले की कोई भी मूर्ति अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। बिना किसी मध्यस्थ के आदमी ईश्वर से सीधा सम्पर्क करता था। देवता और मनुष्य में व्यक्तिगत सम्बन्ध था। आर्यों के 33 देवता थे जिन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है-(i) आकाशस्थ, (ii) पार्थिव और (iii) स्वर्गस्थ। प्रथम श्रेणी के देवताओं में इन्द्र, रुद्र तथा मारुत का महत्त्वपूर्ण स्थान था। दूसरी श्रेणी के देवताओं में अग्नि तथा सोम मुख्य थे। तृतीय श्रेणी में दयूस, वरुण, अदिति, अश्विन तथा उपा आदि सम्मिलित थे। हड़प्पा एवं वैदिक संस्कृति में भिन्नता-हड़प्पाकालीन निवासियों को भारत का मूल निवासी माना जाता है, जबकि वैदिक संस्कृति के संस्थापक आर्यों के बारे में विश्वास है कि वे मध्य एशिया से भारत में आए थे। हड़प्पा सभ्यता का स्वरूप नगरीय था, जैसा कि इसकी नगर-योजना, जल निकास प्रणाली, धान्यागार आदि से प्रमाणित होता है। वैदिक संस्कृति ग्रामीण थी। ऋग्वैदिक काल में नगरों का लगभग बिलकुल ही अस्तित्व नहीं था। हड़प्पाकालीन लोग लोहे के प्रयोग के बारे में नहीं जानते थे। यह पूर्णतः एक ताम्र-कांस्य संस्कृति थी जबकि वैदिक संस्कृति लोहे के संदर्मों से परिपूर्ण है। ऋग्वेद में लोहे के लिए श्याम अयस शब्द का प्रयोग किया गया है। जिस घोड़े ने आर्यों के युदध पद्धति में निर्णायक भूमिका निभाई सिन्धु के लोगों को उसकी जानकारी भी नहीं थी सुरकोटदा एवं लोघल (गुजरात) से घोड़े की कुल हड्डियां तथा घोड़े की आकृति के एक जानवर की एक मिट्टी की पकाई गई मूर्ति मिली है और अभी तक यह निश्चित रूप से सिद्ध नहीं हो पाया है कि हड़प्पाकालीन लोगों द्वारा घोड़े का उपयोग किया जाता था। सिन्धु सभ्यता के लोग मूलतः शान्तिप्रिय थे उनके शस्त्र आदि स्वरूप के हैं। इसके विपरीत आर्य युद्धप्रिय लोग थे तथा सभी प्रकार के परम्परागत शस्त्रों और कवच से परिचित थे और उन्होंने एक पूर्ण विकसित युद्ध कला' में निपुणता प्राप्त कर ली थी। वैदिक धर्म हड़प्पाकालीन धर्म से भिन्न था। आर्य, वरुण, इन्द्र, अदिति तथा अनेक दूसरे देवों की पूजा करते थे जो प्रकृति के मुख्य-मुख्य स्वरूपों के प्रतीक थे वे यज्ञ करते थे और अपने देवों को दूध घी आदि अर्पित करते थे। अंत में सिन्धु सभ्यता और वैदिक संस्कृति भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास की दो प्राचीनतम् और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ है और भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विकास का मूलाधार को शक्तिशाली स्तम्भ हैं।

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