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बुधवार, 8 जुलाई 2020

वर्ग की अवधारणा,आधार, विशेषताए

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वर्ग की अवधारणा,आधार, विशेषताए  

सामाजिक वर्ग का तात्पर्य उन व्यक्तियों के समूह से होता है, जिनकी किसी समाज में समान स्थिति होती है। जब समाज में कुछ लोगों में एक सामान्य समानता होने के कारण उनकी स्थिति मेंं समानता होती है तो इन समान स्थिति प्राप्त व्यक्तियों के समूह को वर्ग कहते हैं उदाहरण के लिए हमारे देश में उच्च कोटि के राजनीतिज्ञों, अधिकारियों पूंजीपतियों कलाकारों इत्यादि के उच्च कोटि के कार्यों के परिणामस्वरूप समाज में उनको ऊँची स्थिति समझी जाती है इन सब समान स्थिति वाले लोगों से जो एक सामाजिक समूह बनता है उसे वर्ग कहते हैं चूंकि इस वर्ग के सदस्यों को समाज में ऊँची स्थिति होती है, अत: इस वर्ग को उच्च वर्ग (Upper Class) कहते हैं इस प्रकार सामाजिक स्थिति के लोगों के एक समूह को सामाजिक वर्ग कहते हैं।

1.मैकाइवर तथा पेज-"एक सामाजिक वर्ग एक समुदाय का कोई भी हिस्सा (या भाग) है जो सामाजिक स्थिति के आधार परअन्य लोगों से विभक्त किया जा सके।"

2. ऑगवर्न तथ निमकाफ-"एक सामाजिक वर्ग उन व्यक्तियों का योग है जिसका आवश्यक रूप से एक निश्चित समाज में समान सामाजिक पद है।"

3.लेपियर-"एक सामाजिक वर्ग सुस्पष्ट सांस्कृतिक समूह है जिसे कि सम्पूर्ण जनसंख्या में एक विशेष स्थान अथवा पद प्रदान किया जाता है।

सामाजिक वर्गों के आधार-

(1) परिवार और नातेदारी वर्ग निर्धारण में सहायक है। उच्च वर्गों का निर्माण महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रिश्तेदारी पर आधारित है।

2) शिक्षा भी वर्ग का निर्धारण करती है। शिक्षित व्यक्ति को अशिक्षित से ऊँचा माना जाता है।

(3) धर्म भी वर्ग के निर्धारण का आधार है। धर्म को मानने वाले आस्तिक एवं न मानने वाले नास्तिक वर्ग में रखे जाते हैं।

(4) वर्ग निर्धारण का आधार व्यक्ति का निवास स्थान भी है।

(5) उत्पादन साधन भी वर्ग निर्धारण का आधार है। जमीदार, सामन्त, पूँजोपति ठत्पादन साधनों के स्वामी होने से उच्च वर्ग की सदस्यता पाते रहे हैं।

(6) धन सम्पत्ति प्रत्येक समाज वर्ग निर्धारण का प्रमुख आधार है।

(7) वर्ग निर्धारण में आय के स्रोत और प्रकृति का बड़ा महत्व है। वर्ग की विशेषताएँ- वर्ग की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) सोपानक्रम में एक से अधिक वर्ग होते हैं यथा विद्यार्थी वर्ग, अध्यापक वर्ग प्रशासक वर्ग और श्रमिक वर्ग आदि। इनका समाज में एक विशिष्ट स्थान होता है।

(ii) वर्ग के सदस्यों को कुछ निश्चित सुविधाएँ प्राप्त होती हैं।

(iii) एक वर्ग के सदस्य दूसरे वर्ग के सदस्यों के प्रति श्रेष्ठता अथवाहीनता की भावना रखते और प्रदर्शित करते है।
(iv) सभी वर्ग एक दूसरे से एक निश्चित सीमा तक अन्तः सम्बन्धित होते हैं।

(v) वर्ग चेतना में अपने वर्ग के प्रति हम की भावना पायी जाती है।

(vi) समाज सदैव वर्गों में विभाजित रहा है और इन वर्गों में संघर्ष होता रहा है।

(vii) रहन-सहन का स्तर प्रत्येक वर्ग में समान होता है, देश और काल इसके अपवाद है।

(viii) वर्ग के अनेक आधार होते हैं। जैसे राजनैतिक आधार, धार्मिक, आधार, शैक्षणिक आधार आदि वर्ग में विभिन्न लिंग और आयु के व्यक्ति भी हो सकते हैं। सामाजिक वर्गों की विशेषता- एक सामाजिक वर्ग ऐसे व्यक्तियों का योग होता है, जिनको एक दिए हुए समाज में अनिवार्य रूप से समान सामाजिक स्थिति होती है। इनमें जन्म का महत्व नहीं होता है। यह सर्वथा मुक्त व्यवस्था है। वर्ग में चेतना पायी जाती हैं तथा वर्ग की सदस्यता अर्पित की जाती है। यह स्तरीकरण एक प्रकार से संचालित व्यवस्था है, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी योग्यता, कार्यकुशलता एवं गुणों के आधार पर एक विशेष सामाजिक स्थिति और उससे सम्बन्धित सभी अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। गतिशीलता इस स्तरीकरण की प्रमुख विशेषता है, अत: कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर इस सामाजिक स्तरीकरण में उच्च प्रस्थिति अर्जित कर सकता है तथा किसी भी उच्च स्थिति में प्रयत्न करना छोड़ देने पर वर्ण व्यवस्था में नीचे जा सकता है।

जाति एवं वर्ग में अन्तर


1) जाति के सदस्य एक सामान्य परम्परागत व्यवसाय करते हैं, जबकि वर्ग के सदस्यों का कोई परम्परागत व्यवसाय नहीं होता है।

(2) जाति की उत्पत्ति का एक निश्चित आधार होता है, जबकि वर्ग की उत्पत्ति का कोई निश्चित आधार नहीं होता है।

(3) जाति का दायरा संकीर्ण होता है, जबकि वर्ग का दायरा विस्तृत होता है।

(4) जाति व्यवस्था के अंतर्गत अनेक जातियों में विवाह संबंधी प्रतिबंध पाए जाते हैं, जबकि वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत विवाह संबंधी प्रतिबंध नहीं पाए जाते हैं।

(5) जाति एक अंतर्विवाही समूह या अंतर्विवाही समूहों का संकलन है जिसका एक सामान्य नाम होता है। जाति को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यवसाय, शिक्षा आदि के आधार पर नहीं बाँटा जाता है, जबकि जन्म के अतिरिक्त प्रत्येक प्रकार के प्रचलित समूहों को वर्ग कहा जाता है और इन्हें आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यवसाय शिक्षा आदि के आधार पर बाँटा जाता है।

(6) जाति का निर्धारण जन्म के समय हो हो जाता है तथा इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता हैं, जबकि समय-समय पर वर्ग का निर्धारण होता रहता है अत: यह परिवर्तनीय है।

(7) जाति की सदस्यता आनुवांशिक है, जबकि वर्ग की सदस्यता आनुवांशिक नहीं है।

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