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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

वैयक्तिक अध्ययन पद्धति का उल्लेख

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वैयक्तिक अध्ययन पद्धति का उल्लेख

 वैयक्तिक अध्ययन पद्धतिः- वैयक्तिक अध्ययन पद्धति एक अत्यन्त गहन अध्ययन पद्धति है। इसको एक इकाई के गहन अध्ययन के आधार पर सम्पूर्ण का अध्ययन करने की पद्धति कहा जा सकता है। इसका व्यवस्थित रूप में सर्वप्रथम प्रयोग श्री० हरवर्ट स्पेंसर ने किया, यद्यपि प्रो० लीप्ले भी इस क्षेत्र में अग्रिम माने जाते है। वैयक्तिक अध्ययन का अर्थ : इस पद्धति के अन्तर्गत एक इकाई विशेष को लेकर चाहे वह कोई व्यक्ति हो अथवा कोई संस्था या कोई समुदाय, उसका प्रत्येक दृष्टिकोण से गहन अध्ययन किया जाता है। श्रीमती पी0 वी0 यंग के अनुसार, "वैयक्तिक अध्ययन किसी सामाजिक इकाई - चाहे वह एक व्यक्ति, परिवार, संस्था, सांस्कृतिक वर्ग अथवा सम्पूर्ण समुदाय हो - के जीवन के अनुसंधान व उसकी विवेचना करने की एक पद्धति को कहते है। सर्वश्री बीसंज एवं बीसंज के शब्दों में, "वैयक्तिक अध्ययन गुणात्मक विश्लेषण का एक स्वरूप है जिसमें एक व्यक्ति अथवा एक परिस्थिति या एक संस्था का अत्यन्त सावधानी सहित तथा सम्पूर्ण निरीक्षण किया जाता है।

इस पद्धति को एक उदाहरण द्वारा अति सरलता से समझा जा सकता है। जिस प्रकार एक वकील अपने द्वारा किए गये किसी भी केस को न्यायालय में पेश करने से पहले उसके बारे में प्रत्येक प्रकार की जानकारी प्राप्त कर लेता है, चाहे वह जानकारी उसे किसी भी स्रोत से प्राप्त हो। उसी प्रकार एक सन्यासी के अध्ययन के लिये उसके सम्पूर्ण जीवन का अध्ययन करना है। एक सामाजिक अनुसन्धानकर्ता को ठन परिस्थितियों का अध्ययन करना पड़ेगा जिनके कारण वह सन्यासी बना। हो सकता है कि वह अपने जीवन में बहुत भारी अपराधी रहा हो या कोई और महान घटना भी हो सकती है। इन सबका अध्ययन करने के लिए अध्ययनकर्ता को न केवल व्यक्ति (संन्यासी) से ही सूचनाएं प्राप्त करनी होंगी वरन् उसके परिवार के अन्य सदस्यों मित्रों, पड़ोसियों व जानकारों से भी अनेकों सूचनाएं प्राप्त करनी होगी, इतना ही नहीं, उसकी शैक्षिक संस्थाएँ, दफ्तर, फर्म आदि, जिससे भी उसका सम्बन्ध रहा हो, से भी सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती है। साथ ही, उसकी डायरियाँ, उसके द्वारा रचित कविताएँ, लेख, पुस्तकें एवं उसकी रूचि की फिल्मी पत्रिकाएँ, उसके दिलचस्प कार्य -कलापों आदि से भी अनेक महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त हो सकती है जोकि उसके व्यक्तिगत जीवन के अध्ययन में सहायता प्रदान करें। संक्षेप में यही वैयक्तिक अध्ययन-पद्धति है।

वैयक्तिक अध्ययन की विशेषताएँ : उपरोक्त विवेचना के आधार पर इस पद्धति की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं को इस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं

(1) इस पद्धति के अन्तर्गत सम्बन्धित इकाई का अति गहन अध्ययन किया जाता है और उस रूप में गहन सूचनाएं एकत्रित करने का प्रयोग किया जाता है,

(2) इस पद्धति के अन्तर्गत अनुसन्धानकर्ता एक समय में केवल एक ही इकाई का अध्ययन करता है, चाहे वह इकाई एक व्यक्ति अथवा एक संस्था या कोई समुदाय क्यों न हो,

(3) यह पद्धति उस विशेष इकाई जिसका कि अध्ययन करना है, के किसी विशेष पक्ष या पहलू को नही अपितु उसके सभी पहलुओं को अध्ययन का केन्द्र बनाता है,

(4) इस पद्धति के अन्तर्गत गुणात्मक अध्ययन किया जाता है न कि परिमाणत्मक।

वैयक्तिक अध्ययन की कार्य प्रणाली :

1) इसमें सर्वप्रथम अध्ययन किए डाने वाले इकाई के स्वरूप की विवेचना की जाती है और उसके प्रत्येक पहलू की स्पष्ट व्याख्या भी कर ली जाती है और यह भी निश्चित कर लिया जाता है कि हमें कितनी इकाइयों का अध्ययन करना है।

(2) इसके पश्चात उन इकाइयों का एक-एक करके गहन व सम्पूर्ण अध्ययन किया जाता है। प्रत्येक घटना को समय या काल के सन्दर्भ में समझने का प्रयल किया जाता है।

(3) इस प्रकार के अध्ययन के दौरान घटनाओं के निर्धारक कारकों का पता लगाने का प्रयत्न किया जाता है अर्थात उन तथ्यों या कारकों को ढूँढ निकाला जाता है जिसके कारण वह घटना घटित हुईं है अथवा एक स्थिति-विशेष की वर्तमान दशा पैदा हुई।

(4) अन्त में इस प्रकार प्राप्त तथ्यों या आंकड़ों का विश्लेषण करके कुछ सामान्य निष्कर्ष निकाले जाने हैं।

वैयक्तिक अध्ययन पद्धति का महत्व : 

(1) इस पद्धति के द्वारा इकाइयों का गहन अध ययन होने के कारण उनके सम्बन्ध में वास्तविक निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

(2) यह पद्धति अति गहन अध्ययन पर बल देती है और इस कारण विषय की सतह तक पहुंचना सम्भव होता है।

(3) चूंकि इस पद्धति में डायरिया, पत्रों, जीवन-इतिहास आदि का गहन अध्ययन किया जाता है इसलिए इस पद्धति के द्वारा व्यक्तिगत अनुभवों, भावनाओं और मनोवृत्तियों का अत्यन्त वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव होता है।

(4) इस पद्धति का एक यह भी महत्व है कि इसके द्वारा जो समाग्री साबित की जाती है वह अपने में सम्पूर्ण होती है।

पद्धति की सीमाएँ - इस पद्धति की अपनी कुछ सीमाएँ भी है जैसे-

 (1) इसमें केवल कुछ ही इकाइयों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिया जाता है अत: उन्हें सामान्य रूप से यथार्थ नहीं माना जा सकता ।

(2)इससे अवैज्ञानिक और असंगठित पद्धति भी कहा गया है क्योंकि इसमें इकाइयों के चुनाव एवं सूचना संकलन करने पर किसी भी प्रकार का नियन्त्रण नही रहता है।

(3) इस पद्धति में पक्षपात आने की सदैव पूर्वसम्भावना रहती है क्योंकि इस में अनुसन्ध कुर्ता अक्सर अपने अनुभव और पूर्वधरणाओं को भी सम्मिलित कर लेता है।

(4) इस पद्धति के द्वारा घटनाओं की वास्तविकताओं का पता बहुत कम चल पाता है क्योंकि सूचनाओं को प्राप्त करने के स्रोत जैसे-डायरिया, पत्र, जीवन- इतिहास आदि सवयं दोषपूर्ण और व्यक्ति को अपनी कल्पनाओं और भावनाओं में रंग होते हैं।

(5) यह पद्धति अत्यधिक खर्चीली एवं समय नष्ट करने वाली पद्धति है।

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