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उत्तर वैदिक कालीन का सामाजिक आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन

उत्तर वैदिक कालीन का सामाजिक आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन 

उत्तर वैदिक सभ्यता- वैदिक युग के अन्तर्गत उत्तर वैदिक सभ्यता अर्थात् वैदिक काल से हमारा आशय उस काल से है जिसमें तीन वेद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद-ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक तथा उपनिषदों की रचना हुई। इसमें आर्य सभ्यता का विकास एवं विस्तार हुआ। वह पंजाब से आगे शेष उत्तरी भारत और फिर दक्षिण भारत में भी फैलने लगी। इस सभ्यता के अधिकांश सिद्धान्त ऋग्वैदिक सभ्यता के समान हैं तथापि आर्यों के स्वजातीय अनुभव और ज्ञान तथा विजातीय सम्पर्क ने उसे अधिकाधिक समृद्धि करना प्रारंभ किया। सामाजिक स्थिति- अध्ययन की सुविधा के लिए उत्तर वैदिक कालीन सामाजिक दशा को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है

(1) पारिवारिक जीवन-उत्तर वैदिक कालीन समाज भी पितृप्रधान था तथा संयुक्त परिवार-प्रथा का प्रचलन था।

(2) मनोरंजन-उत्तर वैदिक कालीन लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन नृत्य एवं संगीत था। गायन एवं वादन दोनों ही प्रकार के संगीत का प्रचलन था। प्रमुख वाद्य बांसुरी इत्यादि थे। संगीत के अतिरिक्त रथ-दौड़ भी अत्यन्त लोकप्रिय था। पासों के द्वारा जुआ खेलने के भी उल्लेख मिलते हैं।

(3) भोजन व पेय-दूध, दही, घी, चावल, जी गेहूं एवं चना उत्तर वैदिककालीन लोगों का प्रमुख भोजन था। सरसों के बीज का खाने में व्यापक रूप से प्रयोग होता था उत्तर वैदिक काल में भी ऋवैदिक काल के समान मांस खाया जाता था। सरा का भी इस काल में प्रयोग होता था।

 (4) वेशभूषा एवं सौन्दर्य प्रसाधन-उत्तर वैदिक काल में नारी (Under-Garment) वास (Lower-Garment) एवं अधिवास (Upper-Garment) यह-तीन तरह के कपड़े धारण करने की परम्परा थी। ऊनी कपड़ों को भी लोग पहनते थे स्त्री व पुरुष दोनों ही आभूषण-प्रेमी थे। आभूषण सोने एवं चाँदी के बने होते थे।

(5) शिक्षा-उत्तर वैदिक काल में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ परिवर्तन हुए। आध्यात्मिक एवं सांसारिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना ही सम्भवतः शिक्षा का प्रमुख ध्येय था। उपनयन संस्कार के पश्चात् विद्यार्थी को गुरु के आश्रम में मेजा जाता था जहाँ गुरु व शिष्य के मध्य सीधा सम्पर्क रहता था जिससे गुरु शिष्य परम्परा की मर्यादा कायम रहती थी।

(6) जाति-प्रथा-उत्तर वैदिक काल में वर्ण जन्म पर आधारित होकर वंशानुगत हो गया। इस प्रकार जो धर्म की व्यवस्था जानते थे, ब्राह्मण कहलाएँ। इसी प्रकार युद्ध में कुशल व राजनीति में अधिकार रखने वाले, क्षत्रिय तथा शेष सारी जनता वैश्य कहलायी जिसमें व्यवसायी एवं कृषक थे। इस व्यवस्था का निम्नतम वर्ग शूद्र था, जो अनार्य थे तथा ठनका काम शेष तीनों वर्गों की सेवा करना था। इस प्रकार की सेवा व्यवस्था में ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों का स्थान वैश्य व शूद्र से बहुत ऊँचा था।

(7) आश्रम व्यवस्था-आर्यों ने मानव जीवन को सौ वर्ष मानकर उसे चार आश्रमों में विभाजित किया था (अ) ब्रह्मचर्य आश्रम-इसमें मनुष्य कठोर नियमों का पालन करते हुए, विद्या एवं ज्ञान की प्राप्ति हेतु गुरू के समीप ही रहता था और वहाँ 25 वर्ष की अवस्था तक रहता था। (ब) गृहस्थ-आश्रम-ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात् मनुष्य गृहस्थ-आश्रम में प्रवेश करता था तथा सामाजिक एवं धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह करता था। इस आश्रम में भी मनुष्य 25 वर्ष व्यतीत करता था। (स) वानप्रस्थ आश्रम-इस आश्रम के अन्तर्गत मनुष्य गृहस्थी से स्वयं को अलग कर त्याग एवं तपस्या का जीवन व्यतीत करता था। इस आश्रम में रहकर आध्यात्मिक जीवन के बारे में चिन्तन करता था। (द)संन्यास आश्रम-इस आश्रम में मनुष्य समस्त सांसारिक बन्धनों का त्याग कर ब्रह्म चिन्तन करते हुए मुक्ति के लिए तैयारी करता था।

(৪) विवाह-उत्तर वैदिक काल में विवाह एक पवित्र संस्कार माना जाता था विवाह के विभिन्न तरीकों (आठ प्रकार के विवाह) का उत्तर वैदिक काल तक प्रचलन नहीं हुआ था तथा विवाह यौवन-प्राप्ति के पश्चात् ही किया जाता था। बाल विवाह प्रथा के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, बहु-विवाह (Polygamy) का इस काल में प्रचलन था, परन्तु यह प्रथा मुख्यतया राज-परिवारों तक ही सीमित थी। विधवा-विवाह के भी उत्तर वैदिक काल में उल्लेख मिलते हैं। यद्यपि अन्तर्जातीय विवाह भी उत्तर वैदिक काल में होते थे, परन्तु मुख्यतः विवाह सजातीय ही होते थे।

आर्थिक स्थिति-उत्तर वैदिक कालीन लोगों के आर्थिक जीवन को निम्नलिखित शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है

(1) कृषि-उत्तर वैदिक कालीन लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था खेती के तरीकों, बीज, फसल आदि के क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण विकास हुआ था। हल का प्रयोग भी किया जाता था। गेहूँ, चावल व जौ उस युग की प्रमुख फसलें थीं। कृषि ही लोगों की जीविका का प्रमुख आधार था।

(2) पशुपालन-उत्तर वैदिक काल में भी पशुपालन अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था। अधिक से अधिक गायों का पालन वैभव की प्रमुख पालतू पशु थे। निशानी समझा जाता था। गाय, भैंस, बकरी, बैल,प्रमुख पालतु पशु थे।

(3) गृह-उद्योग एवं व्यवसाय-उत्तर वैदिक काल तक अनेक व्यवसायों की उत्पत्त हो चुकी थी। तत्कालीन साहित्य से जुलाहे, सुनार, कुम्हार, लोहार, चर्मकार, रथकार, मछुए, नर्तक आदि अनेक व्यवसायों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।

(4) व्यापार एवं वाणिज्य-उत्तर वैदिक काल में आन्तरिक एवं वैदेशिक दोनों प्रकार का व्यापार प्रगति पर था। साधारणतया व्यापार विनिमय प्रणाली के द्वारा ही होता था, किन्तु ऋग्वैदिक काल के समान गाय भी विनिमय का माध्यम थी। इस युग में मुख्य मुद्रा को शतमान' कहा जाता था। इस युग में समुद्री व्यापार भी किया जाता था जो सम्भवतः बेबीलोन के साथ होता था। आन्तरिक व्यापार में भी यातायात के साधनों का विकास होने के कारण सामान बैलगाड़ी, नावों आदि से ढोया जाने लगा था।

धार्मिक स्थिति- उत्तर वैदिक काल की धार्मिक स्थिति में अत्यधिक परिवर्तन हुआ। इस युग में धार्मिक व्यवस्था भी अत्यन्त जटिल हो गयी थी

(1) यज्ञ-उत्तर वैदिक काल की धार्मिक स्थिति में परिवर्तन हुआ व लोगों ने अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए देवताओं के मंत्रों से अपने वशीभूत करना चाहा, अत: वैदिक मंत्रों के महत्त्व में भारी वृद्धि हुई। वेदवाद के साथ-साथ कर्मकाण्ड का भी विकास हुआ। परिणामस्वरूप यज्ञ अत्यधिक जटिल होने लगे। यज्ञों में बलि का महत्त्व भी बढ़ने लगा।

(2) देवताओं की स्थिति में परिवर्तन-ऋग्वैदिक काल के प्रमुख देवता (इन्द्र, वरुण आदि) अब उतने प्रधान न रहे। उनके स्थान पर प्रजापति, विष्णु व रुद्र (शिव) प्रमुख देवता बन गए। प्रजापति को यज्ञों का स्वामी माना गया। विष्णु को भी प्रधान यज्ञ-पुरुष माना जाने लगा। रुद्र की पूजा अब शिवजी, पशुपति व महादेव के रूप में होने लगी।

(3) दर्शन-कर्मकाण्ड की जटिलता एवं अत्यधिक यज्ञों का विपरीत प्रभाव हुआ। धीरे धीरे विद्वान व बौद्धिक लोग धार्मिक रीति-रिवाजों के प्रति उदासीन होने लगे। अनेक क्षत्रिय व ब्राह्मण शक्ति एवं ज्ञान की खोज के लिए प्रयत्नशील हो गए। फलस्वरूप उपनिषदों की उत्पत्ति हुई।

राजनीतिक स्थिति -उत्तर वैदिक कालीन साहित्य से तत्कालीन राजनीतिक स्थिति पर व्यापक प्रभाव पड़ा

(1) शक्तिशाली राजतंत्रों का उदय-इस युग की प्रमुख विशेषता शक्तिशाली राजतन्त्रों का उदय होना था। राजतंत्र के उदय होने का प्रमुख कारण साम्राज्यवाद की भावना का विकास होना था। इस काल में राजतन्त्रात्मक प्रणाली की ही बहुलता थी।

(2) राजा के अधिकार-ऐतरेय ब्राह्मण से ज्ञात होता है कि राजा के पद का जन्म अराजकता एवं युद्ध में विजय श्री प्राप्त करने के लिए हुआ था। इस युग में यद्यपि राजा का पद पैतृक होता था, परन्तु कभी-कभी उसका निर्वाचन भी किया जाता था विशाल साम्राज्यों के उदय के कारण राजाओं की शक्ति में भी वृद्धि हुई जिसकी पुष्टि राज्याभिषेक की बढ़ी हुई महत्ता से होती है।

(3) प्रशासनिक पदाधिकारी-उत्तर वैदिक काल में राज्य में अनेक विभागों की रचना की गयी थी जिनमें प्रमुख वित्त-विभाग, निरीक्षण विभाग, आरक्षण एवं सेना विभाग, स्थानीय शासन-विभाग थे। राजा मंत्रियों की सहायता से शासन संचालित करता था। इन मंत्रियों को उत्तर वैदिक काल में रतलं' कहते थे। ये रतलं निम्नलिखित थे-पुरोहित (धार्मिक-कृत्य करने वाला), राजन्य (राजवंश एवं शासक वर्ग का प्रतिनिधि), महिषी (पटरानी), वावाता (प्रिय रानी), युवराज, सूत (सारथी), सेनानी (सेना का प्रधान), ग्रामणी (ग्राम का प्रधान), क्षत्रिय (राजप्रसादों का रक्षक), संग्रहीता (कोषाध्यक्ष), भागधुक् (कर संग्रहकर्ता), अक्षावाप (आय-व्यय का लेखा-जोखा करने वाला) आदि प्रमुख अधिकारी थे।

(4) सभा एवं समिति-राजा को स्वेच्छाचारिता एवं निरंकुशता पर प्रतिबंध लगाने वाली संस्थाएँ सभा एवं समिति' थीं। उत्तर वैदिक काल में राज्यों को सीमाएँ विस्तृत हो जाने के कारण इन संस्थाओं का प्रभाव ऋग्वैदिक काल की तुलना में कुछ कम हो गया था, परन्तु फिर भी सभा एवं समिति अवसर आने पर राजा को उसकी सीमाएँ स्पष्ट करा देती थीं। न्याय प्रशासन -न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था तथा उसकी सहायतार्थ अन्य अधिकारी भी होते थे। न्यायाधीशों को स्थापित कहा जाता था उत्तर वैदिक कालीन प्रमुख अपराध चोरी, डकैती, व्यभिचार, हत्या, घोखाघड़ी आदि थे। गाँव में छोटे-छोटे अपराधों का ग्रामवादिन नामक अधिकारी निर्णय करता था। न्याय की दिव्य प्रथा इस युग में भी प्रचलित थी। पूरे राज्य में एक समान नागरिक संहिता थी। अपराधों के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था थी।

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