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मंगलवार, 14 जुलाई 2020

थॉमस हाब्स के संप्रभुता सम्बन्धी विचार

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थॉमस हाब्स के संप्रभुता सम्बन्धी विचार


थामस हाब्स द्वारा प्रतिपादित सम्प्रभुता सम्बन्धी अवधारणा (सिद्धान्त) उसके सामाजिक समझौता सम्बन्धी सिद्धान्त से प्रभावित है समझौते द्वारा स्थापित सम्प्रभु सर्वोच्च सत्ता सम्पन्न और निरंकुश है। उसका प्रत्येक आदेश कानून और उसका प्रत्येक कार्य न्यायपूर्ण है। उसे जनता के जीवन को नियन्त्रित करने की असीमित अधिकार प्राप्त है तथा जनता को किसी भी प्रकार से उसे चुनौती देने का था उसका विरोध करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। हाब्स के अनुसार "जनता का एक मात्र कार्य संप्रभु के आदेशों का पालन करना है चाहे जे आदेश दैवीय और प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध ही क्यो न हों। जनता के लिए उनका पालन करना ही न्यायपूर्ण एवं वैध है सम्प्रभु को जनता की सम्पत्ति छीनने का यहाँ तक की उसके प्राण लेने का अधिकार भी है क्योंकि जनता की सम्पत्ति और प्राण उसकी सत्ता से ही सुरक्षित है।"

सम्प्रभुता सिद्धान्त को सर्वप्रथम प्रतिपादित करने का श्रेय बोदी को प्राप्त है परन्तु उसके इन सिद्धान्त में विरोधाभास है जिसके कारण वह पूर्णतः स्पष्ट नहीं है। बोंदा एक तरफ तो सम्प्रभुता को सर्वोच्च एवं निरपेक्ष शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है तथा दूसरी तरफ राज्य की इस शक्ति पर प्राकृतिक एवं दैवीय कानूनों और लोगों की निजी सम्पत्ति के अधिकार का प्रतिवन्ध लगा देता है। इसके विपरीत हॉब्स सम्प्रभुता को सम्पूर्ण अविभाज्य और असीम मानता है। इस प्रकार हाब्स को सम्प्रभुता की असीमित सम्प्रभुता के सिद्धान्त अवधारणा पर आधारित है। हारमोन के अनुसार "हाब्स का सम्प्रभु बोंदा के सम्प्रभु की अपेक्षा पूर्ण शक्ति से युक्त है।" संक्षेप में हाब्स का सम्प्रभ शासन और प्रशासन के सभी क्षेत्रों में सर्वोच्च और निरंकुश है और राज्य सत्ता का प्रयोग करके नागरिकों ने अपनी इच्छानुसार कार्य कराने के लिए बाध्य कर सकने का अधिकारी और सामर्थ्यवान है। अत:सेवाइन का कथन है कि, "हाब्स ने उन समस्त अयोग्यताओं से पूर्णतः मुक्त कर दिया जिन्हें बोंदा ने आवश्यक रूप से बनाये रखा था।" हाव्स की सम्प्रभुता सम्बन्धी अवधारणा को अग्रलिखित बिन्दुओं को व्यक्त किया जा सकता है

1. असहनीय कष्टमय, संघर्षमय और अराजकता पूर्ण प्राकृतिक अवस्था से क्षुब्ध और त्रस्त व्यक्तियों के बीच स्वेच्छा से हुए समझौते के फलस्वरूप सम्प्रभु और निरंकुश राज्य का जन्म हुआ।

2.लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य को जन्म दिया तथा उन्होंने प्राकृतिक अवस्था के अपने समस्त अधिकार सौंप दिये। इस प्रकार राज्य उस समझौते से अलग है तथा सभी लोग उसके पूर्णत: अधीन हैं। वह किसी के अधीन नहीं है। लोग उसकी प्रजा हैं तथा सभी लोग उसकी आज्ञा का अनिवार्यतः पालन करने के लिए बाध्य हैं।

3. प्रजा पर शासन करने की राज्य की यह सीमित शक्ति सम्प्रभुता है।

4. इस शक्ति के कारण कोई भी व्यक्ति राज्य अथवा शासक के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर
सकता है।

5. यह असीमित शक्ति है जिस पर किसी भी दैवी एवं प्राकृतिक कानून, संवैधानिक कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून का प्रतिबंध नहीं हो सकता है। वह सभी दृष्टियों से प्रतिबन्धमुक्त है।

6. किसी भी व्यक्ति अथवा शक्ति को उसके पथ- प्रदर्शन का अधिकार नहीं है। वह केवल अपने विवेक से निर्देशित होता है। 7. उसका कोई भी कार्य अवैधानिक नहीं क्योंकि वह कानून का स्रोत है। लोगों ने समझौते के माध्यम से उसे विधि निर्माण का असीमित अधिकार प्रदान किया है। उसे केवल विधियों के निर्माण का ही नहीं अपितु उसकी व्याख्या का भी पूर्ण अधिकार है।

8. प्रजा के प्रति उसका कोई दायित्व नहीं होता है तथा उसके किसी भी कार्य के विरुद्ध कोई भी शिकायत नहीं की जा सकती है। उसे ही प्रजा को अधिकार देने तथा उससे उसे वंचित करने का अधिकार है।

9. इस शक्ति के कारण राज्य अपने अन्तर्गत की समस्त सम्पत्ति का स्वामी हो सकता है। वह चाहे प्रजा को सम्पत्ति से वंचित कर तथा उस पर कर लगा सकता है।

10. वह केवल आन्तरिक क्षेत्र में ही नहीं अपितु अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी पूर्ण स्वतंत्र होता है।

11.सम्प्रभु को नैतिकता के आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह (नैतिकता) उसी की देन है तथा वह (सम्प्रभु) उससे ऊपर है। प्राकृतिक अवस्था में कुछ भी नैतिक और अनैतिक नहीं था। समझौते के फलस्वरूप राज्य तथा समाज का निर्माण हुआ और तत्पश्चात् नैतिकता की धारणा का जन्म हुआ। राज्य के नियमों के अनुसार चलना ही नैतिकता है।

12. वह केवल कानून का ही नहीं न्याय का भी स्रोत है। उसका निर्णय अंतिम है। उसे चुनौती नहीं दी जा सकती है।

13.वह अविभाज्य और अदेय है। वह एक ही व्यक्ति अथवा समूह में निहित होती है। उसे न तो विभाजित किया जा सकता और न वह किसी दूसरे को दी ही जा सकती है।

14. इस शक्ति के कारण ही प्रजा सम्प्रभु शासक को किसी भी हाल में दण्डित नहीं कर सकती है। इसके विपरीत वह अपने विरोधियों को कुचलने के लिए कोई भी कदम उठा सकता है। थामस हाब्स ने सम्प्रभुता के जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है, उसकी विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि वह समिति, सर्वोच्च, अविभाज्य, अदेय और अपृथक्करणीय, शक्ति है। इस शक्ति के कारण ही राज्य आंतरिक और बाहा, दोनों ही दृष्टियों से पूर्णतः स्वतंत्र और अप्रतिबन्धित होता है। हाब्स के इस सिद्धान्त की विवेचना के संदर्भ में यह बात स्पष्ट कर देनी आवश्यक है कि यह राजा और शासक में, चाहे वह निरंकुश राजा या व्यक्तियों की एक सभा हो, कोई अन्तर नहीं मानता है। उसके अनुसार व्यावहारिक दृष्टि से राज्य की सम्प्रभु शक्ति वस्तुतः शासक की असीमित, सर्वोच्च, अविभाज्य, अदेय और अपृथक्करणीय शक्ति है इसी के साथ यह बात भी उल्लेखनीय है कि वह सम्प्रभु को जनता के जीवन के विरुद्ध कुछ भी करने की अनुमति नहीं देता है। यदि वह शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने तथा लोगों के जीवन की रक्षा करने में विफल रहता है तो उसके विरुद्ध विद्रोह की अनुमति देता है।

हाब्स के सम्प्रभुता सिद्धान्त की आलोचना -

(1)इस सिद्धान्त के माध्यम से हाब्स न तो राजतंत्र विरोधियों और न तो राजतंत्र के समर्थकों को ही प्रसन्न कर सका। उसके इस सिद्धान्त के दोनों ही पक्ष आलोचक हैं। इसकी निम्नलिखित आलोचना की जाती हैं यह निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता और तानाशाही का मार्ग प्रशस्त करता है। यह स्वतंत्रता पर आयात करता है।

(2) इस सिद्धान्त के अन्तर्गत उसने राज्य और शासक में कोई अंतर नहीं किया है। राज्य की सम्प्रभु शक्ति स्तुति शासक की ही निरंकुश और स्वेच्छाचारी शक्ति है।

(3) क्लेरेंडन सहित सभी राजतंत्रवादी इस आधार पर इसके आलोचक हैं कि यह उस स्थिति में राज्य के विरुद्ध विद्रोह की अनुमति देता है जब वह जीवन की रक्षा करने और शान्ति व्यवस्था बनाये रखने में विफल रहता है। इन आलोचनाओं के बावजूद उसका यह सिद्धान्त राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। हाब्स ने सर्वप्रथम सम्प्रभुता का स्पष्ट रूप प्रस्तुत किया। इन आलोचनाओं के बाद भी हाब्स की राजनीतिशास्त्र में सबसे बड़ी देन उसकी सम्प्रभुता के सिद्धान्त का स्पष्ट प्रतिपादन है। उसके इस सिद्धान्त के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। वाहन ने उसके सम्बन्ध में लिखा है-"हाब्स प्रथम लेखक था जिसने सम्प्रभुता के विचार के पूर्ण महत्त्व को
समझा और उसके स्वरूप, मर्यादाओं, कार्यों आदि की सूक्ष्म विवेचना कर उसकी विस्तृत व्याख्या दी। उसके इस योगदान के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक चिन्तन सदैव ऋणी रहेगा।

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