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स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है?

स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है?

स्वतन्त्रता शब्द अंग्रेजी पर्यायवाची लिवर्टी शब्द से बना है। इस शब्द की उत्पत्तिका रूप ले लेगी,समाज में अराजकता का बोलबाला हो जायेगा, मत्स्य न्याय का साम्राज्य फैल जायेगा। यह स्वतंत्रता का सकारात्मक अर्थ है। सकारात्मक अर्थ में स्वतंत्रता अनुशासन युक्त जीवन तथा ऐसे अवसरों की उपस्थिति है जिसमें जीवन का सर्वाधिक विकास सम्भव हो प्रसिद्ध विद्वान् हुर्बट स्पेन्शर ने स्वतन्त्रता को परिभाषित करते हुए लिखा है-"प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य को करने के लिए स्वतन्त्र है जिस कार्य को करने की वह इच्छा करता है यदि वह किसी अन्य व्यक्ति की समान स्वतन्त्रता का हनन नहीं करता।" प्रो० लास्की के अनुसार,-"आधुनिक सभ्यता में व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रशन्नता की गारण्टी के लिए जो सामाजिक परिस्थितियाँ आवश्यक है, उनके अस्तित्व में किसी प्रकार के प्रतिबन्ध के अभाव का नाम ही स्वतंत्रता है।" मैकेन्जी के कथानुसार, "स्वतन्त्रता सव प्रकार के प्रतिवन्धों के अभाव को नहीं कहते, अपितु अयुक्तियुक्त, प्रतिबन्धों के स्थान पर युक्तियुक्त प्रतिबन्धों की स्थापना को ही स्वतन्त्रता कहा जाता है।" ग्रीन का कहना है कि, स्वतंत्रता उन कार्यों को करने अथवा उन वस्तुओं के उपभोग करने की शक्ति है जो करने तथा उपभोग करने योग्य है।" पेन के शब्दों में, "स्वतन्त्रता उन बातों के करने का अधिकार है जो दूसरों के अधिकारों के विरुद्ध नहीं है।" इस प्रकार, स्वतंत्रता का अर्थ जानने के समय हमें दो तथ्यों का समन्वय करना है व्यक्ति को अधिक से अधिक सुविधा तथा समाज का हित। अतः समाज रखते हुए व्यक्ति को अधिक से अधिक अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए। समाज-कल्याण द्वारा मर्यादित व्यक्ति के इसी अधिकार को हम स्वतंत्रता का सही अर्थ कह सकते हैं। स्वतंत्रता तथा कानून के मध्य सम्बन्ध कानून और स्वतंत्रता के मध्य सम्बन्ध के बारे में दो विचार हैं कुछ ऐसे विद्वान हैं, जो मानते है कि स्वतंत्रता व कानून एक-दूसरे के परस्पर के हित को ध्यान में विरोधी हैं। इन विचारकों के कथनानुसार कानून का अर्थ है बन्धन या सीमा, जो स्वाभाविक रूप से स्वतंत्रता के लिए घातक का विरोध है। स्वतंत्रता प्राकृतिक तथा नैसर्गिक है। किसी भी प्रकार का कृत्रिम बन्धन स्वतंत्रता की पवित्रता तथा उसकी महत्ता को समाप्त कर देता है। व्यक्तिवादियों के कथनानुसार, "राज्य एक आवश्यक बुराई है।" सरकार को नागरिकों के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए।। अराजकतावादी तो राज्य को बिल्कुल ही समाप्त कर देना चाहते हैं। विलियम गाडविन ने तो स्पष्ट रूप से कहा, "कानून सबसे हानिकारक संस्था है।

1 )" एडम स्मिथ तथा कई अन्य अर्थशास्त्रियों ने भी पूर्ण आर्थिक स्वतन्त्रता की मांग की है। वे आर्थिक व्यवस्था को खुली प्रतियोगिता के सिद्धान्त पर आधारित करना चाहते हैं।

(2) कुछ ऐसे विचारक हैं, जो कानून को स्वतंत्रता की अपेक्षा ज्यादा महत्त्व देते हैं। आदर्शवादी या समाजवादी विचारकों के अनुसार, व्यक्ति साधन है और राज्य साध्य। अतः राज्य के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कुर्वानी की जा सकती है। कतिपय विचारकों के अनुसार, मनुष्य स्वाभाविक रूप से अपराधी प्रवृत्ति का है। अगर उसे पूर्ण स्वतन्त्रता दे दी जाती हैं, तो समाज में संघर्ष, कलह और द्वैष का साम्राज्य फैल जायेगा तथा राज्य में अपराधियों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो जायेगी। अतः राज्य का व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पूर्ण अधिकार होना चाहिए। राज्य से किसी भी समय तथा किसी भी स्थिति में नियन्त्रित या मर्यादित कर सकता है। इसलिए, कुछ विद्वानों ने यह कहा है कि कानून स्वतन्त्रता का साधक है।

उपर्युक्त दोनों मतों में आंशिक सत्यता ही है। कानून न तो स्वतन्त्रता का बाघक है और न साधक ही। वास्तव में, कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं। कानून स्वतन्त्रता की मर्यादा और पवित्रता की रक्षा करता है। सच्ची स्वतंत्रता कानून की सहायता के बिना पनप नहीं सकती। कानून उन स्थितियों का सृजन करता है, जिनके अन्तर्गत स्वतन्त्रता पूरी तरह पनप सकती है और विकसित हो सकती है। लॉक के कथनानुसार, "जहाँ कानून नहीं है, वहाँ स्वतंत्रता नहीं है।" हॉकिंग्स ने तो यहाँ तक कह डाला है कि, "व्यक्ति जितनी अधिक स्वतंत्रता चाहता है, उतना ही अधिक उसे शासन के सम्मुख झुकना पड़ता है।"

व्यक्ति समाज में रहता है। समाज में रहकर ही वह स्वतन्त्रता का उपभोग करता है। समाज के बाहर स्वतंत्रता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए वह कानून की अवहेलना करके स्वतंत्रता का पोषण नहीं कर सकता। कानून स्वतंत्रता का मित्र है, वह उसके उद्भव और विकास दोनों में सहायक सिद्ध होता है।

प्रत्यक कानून को हम स्वतंत्रता का सहायक नहीं कह सकते। कुछ ऐसे कानून हैं, विशेषकर अधिनायकों द्वारा बनाये हुए कानून, जो मनमानेपन के समर्थक हैं तथा जिनके द्वारा समाजिक हित की कोई सम्भावना नहीं हैं। ऐसे कानून शासनरत इने-गिने कुछ स्वार्थी और चालवाज राजनीतिज्ञों की स्वार्थ सिद्धि के लिए बनाये जाते हैं। इन कानूनों के द्वारा स्वतन्त्रता पर आघात पहुंचा है। अतः इन कानूनों को मानने के लिए नागरिकों का बाध्य नहीं किया जा सकता। आदर्शवादी विचारक टी०एच०ग्रीन ने भी कुछ स्थितियों में कानून का विरोध करने का समर्थन किया है। प्रो० लॉस्की के मतानुसार, वे कानून ही स्वतन्त्रता के पोषक और सहायक है, जो मनुष्य की आत्मोत्रति में किसी प्रकार की रुकावट नहीं डालते। लॉस्की ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है, "प्रत्येक कानून आदेश ही नहीं, अनुरोध भी है।" इन वातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक और सहायक है।

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