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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

शिक्षा क्या है एवमं शिक्षा की परिभाषा

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 शिक्षा क्या है एवमं शिक्षा की परिभाषा 

शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण साधन कहा जाता है। शिक्षा के द्वारा ही जैविकीय प्राणी को"सामाजिक प्राणी बनाया जाता है। समाजीकरण की यह प्रक्रिया व्यक्ति के जन्म से लेकर उसक मृत्यु तक चलती है। शिक्षा का कार्य मनुष्य को उसके पर्यावरण से परिचित कराकर उसके अनुकूल चलने की प्रेरणा देना है। शिक्षा का अर्थ मात्र स्कूल-कॉलेजों से ग्रहण की जाने वाली शिक्षा ही नहीं है, बल्कि किसी भी प्रकार के ज्ञान को, किसी भी स्थान पर, कभी भी आत्मसात कर लेना ही शिक्षा है। शिक्षा व्यक्ति को न केवल करणयी और अकरणीय का ज्ञान कराती है, बल्कि उसे विस्तृत सामाजिक जीवन से परिचित कराती है, बल्कि उसे विस्तृत विकसित माना जाता है, जबकि हम शिक्षा को न केवल बौद्धिक स्तर पर ग्रहण कर लेते हैं, बल्कि अपने विचारों तथा व्यवहारों में भी उसे स्थान देते हैं। शिक्षा मात्र समाजीकरण तक ही सीमित नहीं है। इसका अर्थ अत्यन्त व्यापक है। समाज में विपथगामी व्यवहार की स्थिति तब भी आ जाती है, जब व्यक्ति शिक्षा से वंचित रहकर समाज का व्यवस्थाओं को ठीक से समझ नहीं पाता है। जेम्स वेल्टन के अनुसार, "शिक्षा मानव समाज के वयस्क सदस्यों द्वारा आने वाली पीढ़ियों के स्वरूप को अपने जीवन-आदर्शों के अनुरूप ढालने का प्रयास है।'

 शिक्षा की परिभाषा

"शिक्षा को विभिन्न दृष्टिकोणों से परिभाषित किया गया है। इस संदर्भ में निम्नलिखित

परिभाषाएँ प्रमुख हैं शाब्दिक परिभाषा-"शिक्षा, अन्तः शक्तियों को उद्भासित करती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि "शिक्षा बालक के आन्तरिक ज्ञान,गुणों तथा शक्तियाँ एवं क्षमताओं का उद्घाटन है। शिक्षा द्वारा मनुष्य के अन्तर में निहित उन शक्तियों तथा गुणों का दिग्दर्शन होता है जिनको शिक्षा की सहायता के विना अन्दर से निकालना नितान्त असम्भव है। इस विचारधारा के समर्थकों की परिभाषाएँ निम्नवत् प्रस्तुत है

(1) एडीसन-"जब शिक्षा मानव मन पर कार्य करती है, तो वह उन सद्गुणों तथा पूर्णता को बाहर लाकर व्यक्त कर देती है।

(2) सुकरात-"शिक्षा का अर्थ संसार के सर्वमान्य विचारों को,जो व्यक्तियों के मस्तिष्क स्वभाव: होते हैं, प्रकाश में लाना है।

(3) महात्मा गांधी-शिक्षा में मेरा अभिप्राय बालक के शरीर, मन और आत्मा में अन्तर्निहित सर्वोत्तम शक्तियों के सर्वांगीण उद्घाटन से है।

(4) फ्रोबेल-"शिक्षा एक प्रक्रिया है, जो बालक की आन्तरिक शक्तियों को बाह्म बनाती है। शिक्षा स्वतंत्र विकास का प्रयल है-"बालक को स्वतंत्र रूप से विकास करने में सहायता पहुँचाना ही शिक्षा है। बालकों को प्रश्नों आदि से प्रेरित करके विषय-वस्तु के प्रति अभिरुचि सम्पन्न बना देना उत्तम शिक्षक का गुण है। श्रेष्ठ शिक्षा वही है जो बालक के ऊपर पड़ने वाले प्रभावों तथा

हस्तक्षेपों का निवारण करे। अतएव स्वतंत्र विकास का प्रयल ही शिक्षा है। इस परिभाषा के समर्थकों में से कुछ विचार निम्नवत् प्रस्तुत हैं (1) टैगोर-"शिक्षा का अर्थ मस्तिष्क को इस योग्य बनाना है कि वह सत्य को खोज कर समर्थ तथा उसे अपना बनाते हुए स्पष्ट कर दे। (2) टी.पी. नन-"शिक्षा बालक के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास है, जिसके द्वारा वह यथाशक्ति मानव जीवन को मौलिक योगदान कर सके। शिक्षा का ध्येय स्वाभाविक विकास में सुधार करना है- इस विचारधारा के विद्वानों का कहना है कि बालक के ऊपर अध्यापक के व्यक्तित्व तथा ज्ञान का प्रभाव अवश्य पड़ता है, वह कभी भी समस्त प्रभावों से रहित नहीं हो सकता। इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया के रूप में हमारे सामने आती है। एक ओर शिक्षक होता है, जो अपने व्यक्तित्व पर अपने विशिष्ट ज्ञान का भाव डालता है और दूसरी ओर बालक होता है, जो उस प्रभाव को ग्रहण करता है।

इस परिभाषा का समर्थन निम्नलिखित विद्वानों ने किया है

(1) एडम्स-"शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया है, जिसमें एक व्यक्तित्व दूसरे पर एक दूसरे के विकास में सुधार लाने के लिए कार्य करता है। वह प्रक्रिया चेतन तथा प्रयोजनयुक्त होती है। इसके दो साधन शिक्षक का व्यक्तित्व तथा ज्ञान का प्रयोग होते हैं।

(2) रस्किन-"आप किसी व्यक्ति को यह बताकर नहीं शिक्षित करते कि वह क्या नहीं जानता ह, अपितु उसे यह बताकर आप शिक्षा देते हैं जो कि वह नहीं है।

(3) स्ट्रेयर-शिक्षा वह है जो उस व्यक्ति के कार्यों में परिवर्तन उपस्थित कर देती है, जिसे शिक्षा दी जाती है।

(4) रॉस-"शिक्षा किसी ऐसे व्यक्ति का प्रभाव है जिसके अन्दर किसी विषय का कोई महान विश्वास भरा है। इस प्रभाव द्वारा अन्य व्यक्ति भी उस महान विश्वास को अपना लेता है। दूसरे व्यक्ति पर ऐसा प्रभाव डालने का उद्देश्य नहीं कहता है कि वह पहले व्यक्ति के विश्वास को स्वीकार कर ले। शिक्षा के स्वरूप शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहयोग मिलता है।

इसके विभिन्न रूप निम्न प्रकार है 

(1) साविधिक और आविधिक शिक्षा-सांविधिक शिक्षा व्यवस्थित एवं विधिवत् पाठशाला भादो में दी जाती है। इसमें बालक को निश्चित एवं समुचित ज्ञान देना ही शिक्षक का प्रमुख कार्य है। यह निश्चित समय पर दी जाती है। आ विधिक शिक्षा का आरम्भ बालक के जन्म से ही हो जाता है। उसके जीवन में विकास के साथ-साथ यह शिक्षा भी चलती है। यह मुख्यत: अनुकरण और अनुभवों पर आधारित है। इसकी कोई नियोजना नहीं होती है, इसलिए इसे अनुभव से प्राप्त की हुई शिक्षा भी कहते हैं।

(2) प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष शिक्षा-प्रत्यक्ष और परोक्ष शिक्षा में अध्येता के जीवन पर अध्यापक के व्यक्तित्व का पड़ने वाला सीधा प्रभाव आता है। जब अध्यापक प्रभावशाली व्यक्तित्व से वंचित होता है, तब उस अध्येता पर अपना प्रभाव डालने के लिए अप्रत्यक्ष साधनों के प्रयोग से शिक्षा को प्रभावित करना या सीखना, परोक्ष या अप्रत्यक्ष शिक्षा कहलाती है।

(3) सामान्य और विशिष्ट शिक्षा- सामान्य शिक्षा में बालक किसी विशेष व्यवसाय के लिए नहीं तैयार किया जाता बल्कि उसे जीवन का सामान्य व्यवहारिक ज्ञान दिया जाता है। विशिष्ट शिक्षा द्वारा बालक को किसी विशेष कार्य व व्यवसाय के लिए तैयार किया जाता है, यथा-डॉक्टर, इंजीनियर मूर्ति-निर्माता, चित्रकार, बढ़ई, दर्जी बनकर आदि।

4. सकारात्मक और निषेधात्मक शिक्षा-शिक्षक पूर्व निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जब निश्चित प्रयोग द्वारा बालों पर विशेष प्रभाव डालने का प्रयत्न करता है तो उसे निश्चयात्मक शिक्षा अव्वा विधेयात्मक शिक्षा कहते हैं जब अध्यापक अध्येता के सम्बन्ध में बिना किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य एवं शिक्षा योजना केवल उसके विकास के मार्ग को स्वच्छ करता रहता है, तो उसे निषेधात्मक शिक्षा कहते हैं।

(5) व्यक्तिगत और सामूहिक शिक्षा- इसमें अकेले बालकों को शिक्षा दी जाती है और उस पर शैक्षिक प्रभाव केन्द्रित किया जाता है। व्यक्तिगत शिक्षा योजना के विपरीत जब एक कक्षक रूप में अनेक बालकों को एक साथ शिक्षा दी जाती है तब हम उसे सामूहिक शिक्षा कहते हैं। शिक्षा यदि जीवन पर्यंत चलने वाली चेतना प्रक्रिया है, तो हमें यह कहना पड़ेगा कि बालक एवं मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक, दोनों क्षेत्रों में उसके बहुमुखी (अर्थात् सर्वांगीण) उन्नयन का द्वार खोलना ही शिक्षक का प्रमुख कार्य है।


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