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सोमवार, 6 जुलाई 2020

संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य एवं सिद्धांत

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संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य एवं सिद्धांत 

 संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य एवं सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O) का उद्देश्य उसके घोषणा-पत्र में सन्निहित है घोषणा-पत्र की प्रस्तावना में यह लिखा है कि "हम संयुक्त राष्ट्र के लोगों का यह दृढ़ निश्चय है कि हम आने वाले पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से जिसने हमारे समय में दो बार समूची मानवता के ऊपर दुःख थोपा है, बचाने का प्रयत्न करेंगे हम मनुष्य के मौलिक अधिकारों और छोटे तथा बड़े राष्ट्रों की समानता में विश्वास प्रकट करते हैं। अतएव ऐसी परिस्थितियों को स्थापित करने के लिए जिनमें न्याय, सन्धियों और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अन्य साधनों के प्रति सम्मान की भावनाओं को बनाये रखा जा सके, सामाजिक प्रगति और अच्छे जीवन के स्तर को, प्रोत्साहन देने के लिए तथा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सहिष्णुता और शांतिपूर्ण जीवन को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिए तथा अपनी शक्तियों को अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की स्थापना के लिए प्रयोग करने के लिए यह प्रतीक्षा करते हैं कि हम एक-दूसरे के साथ इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सदैव सहयोग करेंगे। एतदर्थ हमारी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ के इस घोषणा-पत्र को स्वीकार किया है और इसलिए हम संयुक्त राष्ट्र संघ नामक संगठन की स्थापना करते हैं। प्रस्तावना के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ के संविधान की पहली घारा में भी उसके उद्देश्यों का वर्णन किया गया है। इस घारा में लिखा है कि संघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सरक्षा को बनाये रखना, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को विकसित करना, अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के निराकरण में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्राप्त करना, इन कार्यों के बीच समन्वय स्थापित करना है जो इन लक्ष्यों की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सकें।

संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्य एवं भूमिका संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति स्थापित करने संबंधी कार्यों का मूल्यांकन उसकी सफलता एवं असफलता के आधार पर ही किया जा सकेगा विभिन्न राजनीतिक विवादों को निपटाने में इस संगठन को सफलता प्राप्त हुई है लेकिन कुछ प्रमुख विवादों; जैसे-कश्मीर, वियतनाम, अरब-इजराइल आदि का यह संगठन समाधान नहीं कर पाया। वैसे प्रत्येक बड़े संघर्ष के पश्चात् उसने युद्ध विराम कराने की भूमिका निभाई है। यह बात सत्य है संयुक्त राष्ट्र संघ को राजनीतिक विवादों के हल में उतनी सफलता नहीं मिली जितनी आर्थिक एवं रचनात्मक कार्य के क्षेत्रों में। उसने एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों की स्थिति संवारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विश्व भर के बच्चों, विकलांगों और नेत्रहीनों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ जो कुछ कर रहा है वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। उसके सहयोग के फलस्वरूप ही विभिन्न देशों में ऐसी बीमारियों का नामोनिशान नहीं रहा जिनसे पहले लाखों लोग प्रतिवर्ष असमय ही कालकवलित हो जाते थे संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना से लेकर अब तक मानवता को तृतीय महायुद्ध का भीषण रूप देखने को नहीं मिला, नि: सन्देह इसका श्रेय संयुक्त राष्ट्र संघ को दिया जाना चाहिए। भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पं०नेहरू के शब्दों में, संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनेकों बार हमारे उत्पन्न होने वाले संकटों को युद्ध में परिणित होने से बचाया है। इसके बिना हम आधुनिक विश्व की परिकल्पना नहीं कर सकते हैं।" यदि यह संस्था असफल होती तो मानव सभ्यता के समक्ष विनाश के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं होता। यह भावी पीढ़ी की सुरक्षा की गारण्टी एवं विश्व संघर्षों को रोकने का सेफ्टीवाल्व है। संयुक्त राष्ट्र संघ का मूल्यांकन उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ एक अधिक उत्कृष्ट संस्था प्रमाणित हुई। संसार के सभी श्िशाली देश इसके सदस्य हैं और इसके सदस्य संस्था में प्रतिवर्ष वृद्धि होती जाती है। आज विश्व का कोई देश ऐसा नहीं है जो इसके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित न हुआ हो। परन्तु इन बातों के होते हुए भी इसकी कुछ ऐसी असफलतायें हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती आधुनिक शीतयुद्ध के कारण संघ राष्ट्रों को स्वार्थपरता तथा संघर्ष व केन्द्र स्थल बन गया है। संघ की स्थापना शंति की रक्षा करने के लिए हुई थी और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि शांति को समस्या स्पष्ट रूप से निःशस्त्रीकरण की समस्या से सम्बद्ध है। इस समस्या को सुलझाने में संघ अभी तक सफल नहीं हुआ है निश्चय हो यह संघ की सबसे बड़ी सफलता है। इसके अतिरिक्त संघ के पास अपने निर्णयों को कार्यान्वित करने के लिए कोई साधन नहीं है। संसार को कुछ महान् शक्तियों ने संघ का प्रयोग अपनी स्वालिप्सा को पूरा करने के लिए किया है। यह काल भी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। विश्व को ज्वलंत समस्याओं का संघ निराकरण करने में असमर्थ रहा है और महाशक्तियाँ अपने स्कार्फ के वशीभूत निर्णय लागू करने में सफल हो जाती हैं इनसे बड़ी लज्जा और कलंक को क्या बात हो सकती है।

परन्तु इन सफलता की तुलना में उसकी सफलतायें नगण्य नहीं है। आर्थिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी क्षेत्रों में उसने जो कुछ भी किया है वह असंदिग्ध रूप से सराहनीय है। इसके अतिरिक्त उसने बहुत से अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में सफलता प्राप्त की है। इससे वस्तुतः संघ की सबसे बड़ी सफलता यह है कि युद्ध के लिए उपयुक्त वातावरण के होते हुए भी उसने आज तक तृतीय युद्ध की सम्भावनाओं को दूर रखने में सफलता प्राप्त की है। इसमें सन्देह नहीं है कि अपनी विफलताओं के होते हुए वह मनुष्य द्वारा स्थापित श्रेष्ठ अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। यह ठीक है कि वह उससे सुचारु रूप से काम नहीं कर रहा है जैसा उसे करना चाहिए था, परन्तु इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं है। राष्ट्र संघ तो निश्चित वाक्यों की प्राप्ति के लिए एक साधन मात्र है और वह साधन तब तक ठीक काम नहीं कर सकती जब तक कि उसको प्रयोग में लाने वाले लोग उन लक्ष्यों के प्रति सत्यनिष्ठ न हों। अत: समस्या का अंतिम हल तो तभी हो सकता है जबकि मानव स्वभाव में आवश्यक रूप से सुधार हो जाये। एक प्रतिनिधि संस्था होने के नाते संघ से सब विकार प्रतिबिम्बित होते हैं जिनका आये दिन अपने व्यक्तिगत जीवन में अनुभव करते हैं अत: आवश्यकता इस बात कि है कि समूची मानव जाति में सहयोग और मातृत्त्व की भावनाओं को विकसित किया जाये और इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संघ एक उपयोगी संस्था है यह एक निर्विवाद तथ्य है। नूतन चुनौतियाँ-द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की प्रारम्भिक एवं आज की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में कई आधारभूत परिवर्तनर हुए हैं अब शीत-युद्ध समाप्त हो चुका है किन्तु उदीयमान नई विश्व-व्यवस्था में अमरीकी दादागीरी एवं धौंस का खतरा बढ़ गया है। सोवियत सत्ता के अवसान के बाद अमेरिका और अन्य पश्चिमी शक्तियों के लिए शीतयुद्ध भले ही खत्म हो गया है लेकिन तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ शीत-युद्ध और तेज हो गया है वस्तुतः अब संघर्ष विकसित तथा गरीब देशों के बीच है अंकटाड एवं समुद्री कानून सम्मेलनों में उनके मतभेदों को स्पष्टतौर से देखा गया है। उक्त संदर्भ में निर्धन देशों के कच्चे माल की चित कीमत, समुद्री सम्पदा के दोहन का उनका बराबरी का अधिकार, उनके लिए तकनीकी ज्ञान की व्यवस्था, आदि मुदे नवीन चुनौतियां हैं जिनको पूरा करना समानता एवं न्याय पर आधारित नवीन अर्थव्यवस्था के लिए अति आवश्यक है। विश्व में अबाध गति से बढ़ती परमाणु शस्त्रों की होड़ को रोकने के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है। इन सभी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए। निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व-शांति एवं सुरक्षा की स्थापना के लिए एक महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय पंचायत की भूमिका अदा की है विश्व राजनीति के बदलते स्वरूप से कदम मिलाते हुए अर्थात् उसने राजनीतिक एवं सुरक्षात्मक चुनौतियों के कम होने पर अनेक आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी के क्षेत्र में विकास एवं सहयोग कार्यक्रम आरम्भ कर अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की भावना को जागृत किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि संयुक्त राष्ट्र संघ अनेक विश्व समस्याओं को सुलझाने में आंशिक सफलता ही प्राप्त कर पाया है फिर भी इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उसने कई नाजुक मामलों में हाथ डालकर विश्व समाज को महायुद्ध के विनाश से बचाया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दुनिया के समस्त राष्ट्र आपसी सहयोग, विश्वास एवं समझ के आधार पर विश्व संगठन को भरपूर समर्थन देने लगे तो अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा का स्वप्न साकार हो सकता है।

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