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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार

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साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार

साम्राज्यवाद सम्बन्धी विचार- मार्क्सवाद पर किये जाने वाले आक्षेपों से मार्क्सवाद की रक्षा करने के लिए लेनिन ने सन् 1916 में "साम्राज्यवाद पूँजीवाद की चरम अवस्था पुस्तक लिखी इस पुस्तक में उसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया साम्राज्यवाद पूंजीवाद की उच्चतम व्यवस्था है। लेनिन के इस सिद्धान्त को साम्राज्यवादी पूँजीवाद' के नाम से सम्बोधित किया जाता है। उसने दृढ़ता से यह प्रतिपादित किया कि मार्क्स का पूँजीवाद का सिद्धान्त पूर्णत: सही है और उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन अथवा संशोधन करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। लेनिन इस स्थिति में चार कदम आगे बढ़कर यह कहता है कि मावर्स के पूँजीवाद के विकास सम्बन्धी जो निष्कर्ष निकाल थ व मूल रूप से सहीं हैं, केवल कुछ नवीन घटनाओं के कारण वे परिणाम ढक से गये हैं 'एकाधिकार वित्त पूँजीवाद' और 'साम्राज्यवाद की उत्पति इस प्रकार की घटनायें हैं। लेनिन का विचार था कि साम्राज्यवाद पूँजीवाद की उच्चतम तथा अंतिम अवस्था है। लेनिन के अनुसार आधुनिक साम्राज्यवाद का आधार आर्थिक है। साम्राज्यवाद प्रगतिशील राष्ट्रों के बीच कच्चे माल की प्राप्ति तथा निर्मित माल की खपत करने के लिए बाजारों पर अधिकार करने की नीति का परिणाम है क्योंकि अधिकाधिक लाभ उसी स्थिति में संभव है जबकि उत्पादन अधिक हो तथा वाजारों पर एकाधिकारात्मक नियंत्रण हो। बड़े-बड़े पूँजीपति परस्पर मिलकर औद्यौगिक समितियों का निर्माण कर लेते है और धीरे-धीरे प्रगतिशील राष्ट्र आर्थिक राष्ट्रीयता की नीति का अनुसरण करके विभिन्न स्थानों पर उपनिवेश स्थापित कर लेते हैं जो क्रमश: साम्राज्यवाद के शिकार हो जाते हैं। साम्राज्यवाद की प्रकृति एक बहुरूपिये जैसी है। वह कभी तो सैनिक विजय के रूप में और कभी अविकसित अथवा अल्पविकसित देशों पर अधिकार कर लेने के रूप में प्रगट होती है,कभी वह आर्थिक साम्राज्यवाद का छद्म वेश घारण कर लेती है। लेनिन का निष्कर्ष-लेनिन ने साम्राज्यवाद के सम्बन्ध में निम्न निष्कर्ष निकाले है जो अग्रलिखित है-

1. पूँजीपति पिछड़े देशों में पूँजी लगाते है और वहाँ के कच्चे माल को नियंत्रित करने तथा तैयार माल बेचने के लिए उन देशों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करते हैं। पिछड़े देशों को राजनीतिक दृष्टि से उपनिवेश बनाने के बाद अधिक मुनाफा अर्जित करने के लिए उनका शोषण प्रारम्भ करते है जिससे उपनिवेश के लोगों की निरंतर बढ़ती जाती है।

2.पूँजी को उद्योगों में लगाने तथा उत्पादित माल की बिक्री के लिए बाजार ढूँढने के निमित्त पूंजीपतियों के मध्य राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता नही होती, अपितु प्रतियोगिता अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होती है। इस प्रतियोगिता का परिणाम होता है युद्ध।

3.लेनिन के अनसार साम्राज्यवाद मृतप्राय पूँजीवाद है जिसमें अनेक अन्तर्विरोध है जो स्वयं इसे नष्ट करने में सहायक होंगे। साम्राज्यवाद का पहला अन्तर्विरोध है पूँजी तथ श्रम के मध्य अन्तर्विरोध। पूँजीपति निरन्तर श्रमिकों का शोषण करने की प्रवृत्ति रखते हैं, परिणामस्वरूप उपनिवेशों के श्रमिकों की वर्ग चेतना बढ़ेगी और वे शोषण से अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करने लगेंगे। साम्राज्यवाद का दूसरा अन्तर्विरोध है विभिन्न साम्राज्यवादी शक्तियों तथा उद्योगपतियों के मध्य अन्तर्द्वन्द्व क्योंकि उनके मध्य उपनिवेशों के खोज के निमित प्रतियोगिता होती रहती है। यह साम्राज्यवादी देशों के मध्य युद्धों को जन्म देती है। और युद्ध साम्राज्यवादियों के विनाश का कारण बनते हैं।

4.लेनिन ने यह निष्कर्ष निकाला कि साम्राज्यवाद पूँजीवाद की अन्तिम मंजिल है और साम्राज्यवाद नष्ट होने जा रहा है। जहाँ साम्राज्यवाद पूँजीवाद का विस्तार करता है वहाँ वह सर्वहारा वर्ग का भी विस्तार करता है राष्ट्रीयता के नाम पर लड़े जाने वाले राष्ट्रीय युद्ध विशुद्ध यर्ग युद्ध बन जाते हैं। इनमें मजदूर पूंजीवाद का विद्या करके साम्यवाद की स्थापना करते हैं। लेनिन ने इस प्रकार यह प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया कि मावर्स का सिद्धान्त विल्कुल ठीक घा पूँजीवाद का पतन अवश्यम्भावी है।

क्रांन्ति सम्बन्धी विचार -लेनिन एक क्रान्तिकारी विचारक था। उसने ब्नस्टाइन जैसे संशोधनयादियों का प्रबल विरोधी था। उसका निजीमत था कि समाजवाद की स्थापना क्रान्ति के अतरिक्त अन्य किसी साधन से संभव नहीं है। उसने माक्क्स की शिक्षाओं के क्रान्तिकारी स्वरूप पर ही बल दिया। उसने मार्क्सवाद को क्रान्ति के दर्शन में परिवर्तित कर दिया क्योंकि वह स्वयं एक महान् क्रान्तिकारी था और उसके क्रान्तिकारी स्वरूप का प्रवल समर्थक उसके क्रान्तिकारी मार्क्सवाद की अग्रलिखित विशेषतायें हैं -

क्रांति की अनिवार्यता-अपनी प्रारम्भिक रचनाओं जैसे 'दास कैपिटल में तथा 'साम्यवादी घोषणापत्र' में मार्क्स का झुकाव क्रांति की ओर है जब कि बाद की रचनाओं में वह 'विकासवादी' होता गया। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में मार्क्स यह मानने लगा था कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे औद्योगिक दृष्टि से अत्यन्त उन्नत देशों में समाजवाद की स्थापना क्रांति के बिना क्रमिक विकास द्वारा संभव है। अत: उस समय मार्क्स के अनेक अनुयायी और संशोधनवादी यह स्वीकार करने लगे थे कि मार्क्स के सिद्धान्त का प्रचार शान्तिपूर्ण रीति से होना चाहिए। बर्नस्टीन का तो स्पष्ट मत था कि पूँजीवाद से समाजवाद का आवर्तन धीरे-धीरे और क्रमिक सुधारों द्वारा ही संभव है, परन्तु लेनिन तो क्रान्तिकारी दार्शनिक था। वह रूस में क्रांति की परिस्थितियों उत्पन्न होने की प्रतीक्षा नहीं कर सकता था। विकासवादी तरीकों से सोवियत रूस में साम्यवाद लाने में वर्षों बीत जाते। लेनिन ने कहा, 'क्रान्ति होती नहीं क्रान्ति की जाती है। उसने 6 नवम्बर, 1917 को बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति को क्रांति का आह्वान करते हुए 'काल टु दि रिवोल्यूशन' प्रसारित किया था। वेन्स्टीन इसे क्रान्तिकारी मार्क्सवादी साहित्य के दस्तावेजों में सबसे रोचक दस्तावेज मानता है। इस दस्तावेज में लेनिन ने कहा, "आज रात अथवा शाम तक क्रांति हो जानी चाहिए अन्यथा इतिहास क्रांतिकारियों को कभी क्षमा नहीं करेगा कि उन्होंने उस समय प्रमाद दिखाया, जब वे विजयी हो सकते थे क्रान्तिकारियों के लिए यह एक अपराध होगा। यदि वे इस क्षण को गंवा देते हैं.. शासन काँप रहा है। हर कीमत पर इसे विनष्ट करना चाहिए।"

सारांश: लेनिन क्रान्ति की अनिवार्यता में विश्वास करता था। कुछ मार्क्सवादियों का मानना था कि समाजवादी क्रान्ति जोरों की एक घटना होगी और इसी में पूँजीवाद का सफाया हो जायेगा। यथार्थवादी लेनिन ने इस भ्रम का खण्डन किया उसके अनुसार समाजवादी क्रान्ति राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल का एक लम्बा घमासान चक्र होगी और इसमें तीव्र वर्ग-संघर्ष, गृहयुद्ध, क्रान्ति तथा प्रति-क्रान्ति होंगी।

2.क्रान्ति की रणनीति- लेनिन एक महानतम् क्रान्तिकारी था। 1905 तथा 1917 में रूस में जो राज्यक्रान्तियाँ हुई थी उनके सिद्धान्तों का प्रतिपादन लेनिन के द्वारा किया गया था। 1905 की क्रान्ति की असफलताओं के पश्चात् भी लेनिन ने उसके महत्त्व को स्वीकार किया। लेनिन के अनुसार क्रांति करना एक कला है, इसके कुछ नियम होते हैं, इन नियमों में पारंगत व्यक्ति ही क्रांति को सफल बना सकते हैं। वह पूरी तैयारी के विना केवल जोश से शुरू की जाने वाली क्रान्तियों का विरोधी था। लेनिन ने क्रान्ति के कुछ नियम बताये हैं जो अनलिखित है

(1) प्रारंभ में क्रान्ति की शुरूआत ही न की जाय, परन्तु यदि शुरूआत आवश्यक हो तो उसके उद्देश्यों की पूर्ति होने तक लगातार उसमें लगे रहना चाहिए।

(2) क्रांतिकारियों को अपनी स्थिति के स्थान तथा समय का सही अनुमान लगा लेना चाहिए यदि ऐसा न होगा तो शत्रु को संगठित होने का मौका मिल जायेगा।

(3) शत्रु पर उस समय अप्रत्याशित आक्रमण करना चाहिए जब उसकी सेनाएँ विभिन्न स्थानों पर विखरी हुई हों। लेनिन के अनुसार क्रांति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए पेशेवर प्रशिक्षित क्रान्तिकारिया का दल संगठन किया जाना चाहिए। प्रशिक्षित मुट्ठी भर क्रान्तिकारी हजारों मजदूरों से अधिक अच्छा काम कर सकते हैं।

दल और सर्वहारा की क्रान्ति- साम्यवादी दल क्रांति का हरावल दस्ता- मार्क्स के अनुसार पूँजीवाद के विरुद्ध क्रान्ति के पश्चात् 'सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद' की स्थापना होगी, परन्तु व्यवहार में लेनिन ने उसे साम्यवादी दल के अधिनायकत्व में बदल दिया। लेनिन 'मार्गदर्शक सिद्धान्त (Vanguard Theory)का प्रतिपादन है। उसने कहा कि, "श्रमिक वर्ग अशिक्षित और सुस्त होता है। उनमें संगठन, जागरूकता और चैतन्यता की भावना भरने वाला एक छोटा दायरा ही हो सकता है। यह दायरा है- साम्यवादी दल का लेनिन के अनुसार साम्यवादी दल श्रमिकों का मार्गदर्शक' है, उनका पथप्रदर्शक है।"

लेनिन ने साम्यवादी दल के संगठन एवं कार्य के लिए 'प्रजातान्त्रिक केन्द्रवाद' के सिद्धान्त को जन्म दिया। इस सिद्धान्त के अनुसार पार्टी संगठन में नीचे की इकाइयों से लगाकर सबसे ऊँची इकाई तक प्रत्येक में चुनाव एवं कार्य प्रजातान्त्रिक तरीके से होंगे नीचे की इकाई ऊपर की इकाई का निर्वाचन करेगी। यह पूर्ण प्रजातान्त्रिक पद्धति है, परन्तु यह प्रजातान्त्रिक पद्धति केन्द्रवाद' पर आधारित है। इसका आशय है कि साम्यवादी दल की हर नीचे की इकाई ऊपर की इकाई के आदेश मानने के लिए पूर्णतया वाघ्या होगी। लेनिन के अनुसार दल की सदस्यता क्रान्तिकारी कार्यों में कर्म रूप से लगे व्यक्तियों तक ही सीमित रहनी चाहिए। दल का संगठन प्राकृतिक चयन की पद्धति से चुने गये सर्वोत्तम, नि:स्वार्थ, लगनशील, पूर्ण चेतना से युक्त तथा दूरदर्शी व्यक्तियों से किया जाना चाहिए। यद्यपि दल के ये व्यक्ति स्वयं श्रमिक वर्ग के नहीं होंगे, अपितु मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवी व्यक्ति होंगे, इस दृष्टि से वे सर्वहारा वर्ग से पृथक् होंगे तथापि उन्हें एकमात्र चिन्ता सर्वहारा वर्ग की खुशहाली तथा उन्हें शोषण से मुक्त करने की होगी। यह अत्यधिक अनुशासित, संगठित, दृढनिश्चयी और क्रांति शास्त्र में पारंगत क्रांतिकारियों का संगठन होगा। इस प्रकार लेनिन के अनुसार क्रांति की सफलता के लिए साम्यवादी दल का लौह संगठन अपेक्षित है। इस देश का कार्य होगा कि श्रमिकों के अन्दर राजनीतिक चेतना भरे और उन्हें संघर्ष के लिए तैयार करे।

राज्य सम्बन्धी विचार-सर्वहारा वर्ग की अधिनायकता- लेनिन की रचना 'स्टेट एण्ड रिवोल्यूशन' के दो सामान्य तथा प्रमुख प्रयोजन थे। लेनिन की शुरू से ही यह कोशिश रही थी कि वह मार्क्सवाद को सामाजिक क्रान्ति के दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करे और उसे संशोधनवादी तथा विकासवादी समाजवाद की समस्त विकृतियों से पूर्णतया मुक्त कर दे। दसरा प्रयोजन था राज्य के स्वरूप का प्रतिपादन करना, जहाँ तक लेनिन के राज्य सिद्धान्त का सम्बन्ध है, बुनियादी बात यह है कि राज्य का चाहे कैसा भी रूप हो. उसके अनसार वह वर्ग संघर्ष को प्रगट करता है। वर्ग संघर्ष अनिवार्य है। वर्ग संघर्ष का समाधान केवल वर्गविहीन समाज में ही संभव है। पूँजीवादी वर्ग राज्य में पूँजीवादी मजदूर वर्ग का शोषण करता है, इसलिए यह असम्भव है कि इस वर्ग को शक्ति के द्वारा पदच्युत कर दिया जाय। इसलिए शान्तिपूर्ण सामाजिक विकास का कोई भी सिद्धान्त अथवा वर्ग संघर्ष को दूर करने की कोई भी नीति केवल भ्रम है। एंगेल्स ने कहा था कि, "समाजवाद के अन्तर्गत राज्य तिरोहित हो जायेगा। लेनिन ने एंगेल्स के इस सूत्र का विकास किया, उसने कहा कि इस सूत्र को गलती से ही विकास अथवा घीमी नौति के पक्ष में प्रयुक्त किया गया था। इस सूत्र का वास्तविक अर्थ यह है कि श्रमिक वर्ग क्रान्ति के द्वारा पूँजीवादी राज्य को उखाड़ देगा। इसके बाद वह संक्रमण कालीन राज्य की स्थापना करेगा। यह राज्य सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद होगा। धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों श्रमिक वर्ग सच्चे

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