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साम्राज्यवाद से आप क्या समझते हैं उन्नीसवीं शताब्दी में अफ्रीका का विभाजन साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का परिणाम था?

साम्राज्यवाद से आप क्या समझते हैं उन्नीसवीं शताब्दी में अफ्रीका का विभाजन साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का परिणाम था? 


 साम्राज्यवाद प्रगतिशील राष्ट्रों के मध्य कच्चे माल की प्राप्ति तथा निर्मित माल की खपत करने हेतु बाजारों पर अधिकार करने की नीति का परिणाम है क्योंकि अधिकाधिक लाभ उसी स्थिति में संभव है जब उत्पादन अधिक हो तथा बाजारों पर एकाधिकारात्मक नियन्त्रण हो। बड़े बड़े पूंजीपति परस्पर मिलकर किसी राष्ट्र अथवा देश में औद्योगिक समितियों का निर्माण करते हैं और धीरे-धीरे प्रगतिशील राष्ट्र आर्थिक राष्ट्रीय नीति का अनुसरण करके विभिन्न स्थानों पर उपनिवेश स्थापित कर लेते हैं जो क्रमशः साम्राज्यवाद के शिकार हो जाते हैं। साम्राज्यवाद की प्रकृति बहुरूपिये सदृश है वह कभी सैन्य विजय के रूप में और कभी अविकसित अथवा अल्पा विकसित देशों में पर अधिकार कर लेने के रूप में प्रकट होती है। कभी वह आर्थिक साम्राज्यवाद का छद्म वेश धारण कर लेती है। लेनिन ने साम्राज्य को परिभाषित करते हुए लिखा है साम्राज्यवाद पूँजीवाद की उच्चतम तथा अंतिम अवस्था है।

19वं शताब्दी का प्रथम चरण औपनिवेशिक उदासीनता का युग या इससे पूर्व बड़े राष्ट्रों ने अत्यन्त उत्साह के साथ उपनिवेश की स्थापना की, किन्तु बाद में उनको निराशा हुई। एक एक करके सभी उपनिवेश मातृ देशों से स्वतन्त्र होने लगे तथा लोगों को ऐसा लगा कि उपनिवेश अलाभकारी है। 1870 के बाद इस युग का अन्त हो गया। फिर यूरोप में नूतन साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद का जन्म होता है। यह साम्राज्यवाद प्राचीन साम्राज्यवाद से पृथक् था। प्राचीन साम्राज्यवाद का उद्देश्य व्यापारवाद या जबकि नूतन साम्राज्यवाद का उद्देश्य व्यापारिक के साथ राजनीतिक भी था नूतन साम्राज्यवाद यूरोप में औद्योगिक विकास का परिणाम था जिसके कारण पारस्परिक प्रतिस्पर्धा अपने चरम सीमा पर पहुँच गयी और यूरोप से बाहर कच्चा माल प्राप्त करने के लिए तथा तैयार माल खपाने के लिए नये उपनिवेशों की आवश्यकता महसूस हुई। इस नये (नूतन) साम्राज्यवाद ने बड़े-बड़े राष्ट्रों को फिर साम्राज्यवाद के मार्ग पर ला खड़ा किया। 1880 के उपरान्त नूतन (नवीन) साम्राज्य ने काफी जोर पकड़ा। प्रथम महायुद्ध के पूर्व तक यूरोपीय महाशक्तियों में संसार के पिछड़े क्षेत्रों पर अधिकार जमाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। यूरोपीय राज्यों ने संपूर्ण अफ्रीका को आपस में बांट लिया। इस होड़ में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी प्रमुख प्रतिद्वन्दी चे पर यूरोप के छोटे छोटे देश भी अपने लोभ को नहीं रोक सके।

अफ्रीका का विभाजन, अफ्रीका का विभाजन 18751876 से 1914) नवीन साम्राज्यवाद के युग की एक असाधारण घटना थी। केवल 25-30 वर्षों की एक छोटी अवधि में ही इस महाद्वीप के विभाजन का कार्य सम्पन्न हो गया। विभिन्न राष्ट्र मैदान में उतर आये। उन्होंने तेजी से अफ्रीका महाद्वीप के विभिन्न भागों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। विभाजन आसान क्यूँ रहा?

अफ्रीका का विभाजन आसान यूँ रहा है-(i) अफ्रीका के शासकों या सरदारों ने इस बात का (बिल्कुल) विरोध नहीं किया, (ii) वे सौधे एवं अशिक्षित थे; वे किसी बात को समझते नहीं थे, (fii) शराब की कुछ बोतलों पर या चमकते हुए कुछ उपहारों पर उन्होंने अपनी जमीनें यूरोपियनों को सौंप दी, (v) वे इतने असमर्थ और असहाय रहे कि पेरिस, लन्दन आदि में बैठे हुये साम्राज्यवादियों ने उनके प्रदेशों को नक्शे पर ही बाँट लिया और उन्हें पता तक नहीं चला। विभाजन की होड़ तेज कव से?

1875 से पहले अफ्रीका के केवल एक छोटे से भाग पर यूरोपीय राष्ट्रों का अधिकार था। 1806 में इंग्लैंड ने हालैंड से केप कॉलोनी का प्रदेश छीन लिया था और 1843 में नेटाल पर अधिकार कर लिया था। 1830 में फ्रांस अल्जीयर्स अपना अधिकार स्थापित कर चुका था। पुर्तगाल के पास पूर्वी तट पर मोजाम्बिक और पश्चिमी तट पर अगोला के तटीय प्रदेश थे, पर 1870 के बाद तो यूरोपीय राष्ट्रों में अफ्रीका की लूट के लिये होड़ सी लग गयी। विभिन्न राष्ट्र एवं अफ्रीका इंग्लैंड और अफ्रीका-थाईलैंड से प्राप्त की कॉलोनी से अफ्रीका में ब्रिटिश राज्य की नींव पड़ी। यह राज्य बढ़ते-बढ़ते दक्षिण अफ्रीका संघ में परिणत हुआ जिसमें केपकोलोनी के अतिरिक्त ट्रांसलेट,ऑरेंज फ्री-स्टेट, नेटाल तथा कुछ अन्य छोटे छोटे राज्य थे। ये इंग्लैंड को पिछले बोअर युद्ध के फलस्वरूप मिले थे अफ्रीका में इंग्लैंड का दूसरा महत्त्वपूर्ण अधीनस्थ राज्य मिस्र था। आर्थिक और राजनीतिक नियन्त्रण तो 1889 में ही हो गया था, प्रचम महायुद्ध के प्रारम्भ होने के बाद 1915 में इंग्लैंड ने किस को अपना संरक्षित अधिराज्य घोषित कर दिया। इंग्लैंड सूडान को भी अपने अधिकार में लेने के लिये उत्सुक था। मिस्र का अधिकार पहले से सूडान के कुछ भाग पर था। अत: अंग्रेजों ने पहले उस भाग को अपने अधिकार में ले लिया। फिर उन्होंने धीरे-धीरे शेष सूडान में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया। सूडानियों के विद्रोह करने पर लार्ड किचनर ने विशाल सेना भेजकर 1898 में पूरे सूडान को अपने अधिकार में ले लिया।

अंग्रेज व्यापारियों ने अफ्रीका महाद्वीप में नयी-नयी कम्पनियाँ स्थापित की। कम्पनियों ने नये-नये उपनिवेशों की स्थापना की। इस प्रकार मध्य अफ्रीका के बहुत बड़े भाग पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने नाइजीरिया, से लोन, गोल्ड कोस्ट, गोम्बिया तथा अन्य भागों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। पूर्वी अफ्रीका में अंग्रेजों ने अपना साम्राज्य युगांडा केनिया, जंजीबार तथा सोमालीलैंड तक फैला दिया। सैसिलरोड नामक व्यक्ति ने उत्तरी और दक्षिणी रोडेशिया को ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना दिया। इस प्रकार अफ्रीका महाद्वीप में अंग्रेजों का विशाल साम्राज्य स्थापित हो गया। बेल्जियम एवं अफ्रीका-बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड ने अफ्रीका में अनुसंधानों से, लाभ उठाने के लिये 1873 में एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना करायी ठसने स्टानले को इस संस्था में शामिल कर लिया जो एक अंग्रेज था और जिसकी इच्छा यही रही थी कि इंग्लैंड ठसके अनुसंधान के लाभ उठायें। इंग्लैंड के उदासीन रहने पर इस महान् अन्वेषक ने लियोपोल्ड से बात-चीत की। तत्पश्चात् वह कुछ लोगों को साथ लेकर अफ्रीका लौट गया। उसने कांगो प्रदेश के सरदारों से संधियाँ की जिसके फलस्वरूप समस्त कांगो-प्रदेश पर लियोपोल्ड का अधिकार । हो गया। अब अन्य यूरोपीय राज्य लियोपोल्ड से ईर्ष्या करने लगे। ब्रिटेन और पुर्तगाल ने विशेष तौर पर विरोध किया। पुर्तगाल ने कांगो के विश्व प्रदेश पर दावा करके अपना अधिकार जमा लिया। यूरोपीय राज्यों के इस ओर आकृष्ट होने पर स्थिति बहुत जटिल हो गयी इस समस्या को सुलझाने के लिए 18841885 में बर्लिन में एक सम्मेलन हुआ जिसमें कांगो-फ्री-स्टेट नामक राज्य की स्थापना हुई। कांगो का प्रदेश नाम के लिये तो अन्तर्राष्ट्रीय राज्य बन गया, पर 1905 तक वास्तव में वह लियोपोल्ड का व्यक्तिगत राज्य बना रहा। बाद में अन्य देशों के विरोध के कारण उसने अपना राज्य बेल्जियम सरकार को सौंप दिया। इस प्रकार कांगो-फ्री-स्टेट का प्रदेश बेल्जियम का एक प्रदेश बन गया। फ्रांस एवं अफ्रीका-फ्रांस सम्पूर्ण उत्तरी अफ्रीका में अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। मिस्र, अल्जीरिया, ट्यूनिस और मोरक्को पर फ्रांस का झंडा लहराये यह उसका लक्ष्य था।। पर अंग्रेजों का मुकाबला न कर सकने पर फ्रांस को मिस से हटाना पड़ा। 1857 में फ्रांस ने अफ्रीका के पूर्वी तट पर स्थित सोमालीलैंड के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया। 1869 में एक फ्रांसीसी ने स्वेज नहर का निर्माण किया और उसके बहुत से हिस्से खरीद लिये। 1881-1898-1905 एवं 1911 में फ्रांस का क्रमशः ट्यूनिश, फर्शोदा,

मोरक्को एवं पश्चिम अरब राज्य पर अधिकार हो गया। अंग्रेजों के विरोध के कारण फ्रांस को फशोदा से हट जाना पड़ा। 1890 और 1896 के बीच फ्रांस तथा इंग्लैंड में दो कार समझौते हुए जिनके अनुसार मेडागास्कर, मध्य सूडान और कांगो घाटी के बहुत बड़े भाग पर फ्रांस का अधिकार स्थापित हो गया। इटली एवं अफ्रीका-इटली संपूर्ण उत्तरी अफ्रीका पर आधिपत्य स्थापित करना चाहता था, पर उसके मैदान में आने से पहले यूरोप के अन्य राष्ट्रों ने उत्तरी अफ्रीका के अनेक भागों पर अधिकार जमा लिया। इससे इटली को परेशानी बढ़ गयो, किन्तु उसने हिम्मत से काम लिया। 1870 में उसने इरीट्रिया पर और 1889 में सोमालीलैंड के एक भाग पर अधिकार कर लिया। उसका अबीसीनिया पर अधिकार करने का प्रयत्न असफल रहा 1912 की सन्धि के अनुसार ट्रिपोली, लीबिया और साइरेनेका के प्रदेश भी इटली के अधिकार में आ गये।

जर्मनी एवं अफ्रीका-1890 के बाद जर्मनी भी उपनिवेश स्थापना की होड़ में शामिल हो गया। जर्मन-सम्राट ने अनेक जर्मनों को अफ्रीका में वहाँ के सरदारों से सन्धियाँ करने के लिये भेजा कार्ल पीटर के श्रम से पूर्वी अफ्रीका के बड़े भाग पर जर्मनी का आधिपत्य स्थापित हो गया। जर्मनी ने प्रशांत महासागर के सामोआ द्वीप और प्रिन्स बिस्मार्क-द्वीप-समूह पर अधिकार कर लिया।

स्पेन एवं अफ्रीका-स्येन भी अफ्रीका में प्रवेश करके कुछ साम्राज्य हस्तगत किया। अफ्रीका में उत्तर-पश्चिमी किनारे पर उसे कुछ प्रदेश प्राप्त हुए। 1906 में जिब्रास्टर के सामने के समुद्री किनारे पर स्पेनिश पैर रखने का अवसर मिल गया। पुर्तगाल एवं अफ्रीका-पुर्तगाल ने बेल्जियम की काली-घाटी के उपनिवेश के दक्षिण में अपने उपनिवेश बसाने का प्रयत्न किया। जहाँ पुर्तगाली अधिकार में पहले कुछ समुद्री स्टेशन थे, वहाँ अब अंगोला (Angola) नाम के पूरे प्रदेश पर पुर्तगाल का अधिकार हो गया। अफ्रीका के पूर्वी छोर पर भी पुर्तगाल ने एक उपनिवेश बनाया जिसे मोजायिक या पुर्तगाल पूर्वी अफ्रीका कहा जाता था पुर्तगाल चाहता था कि उसका अधिकार अफ्रीका के आर-पार के उस सम्पूर्ण प्रदेश पर हो जाये जो उसके पूर्वी और अफ्रीका के प्रान्तों को मिस्ताता था, लेकिन इस दिशा में पुर्तगाली आशायें पूरी नहीं हुई। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व तक यूरोपीय के देशों ने अफ्रीका के खण्ड-खण्ड कर डाले और उन्हें उन्होंने अपने अधिकार में ले लिया। यद्यपि अफ्रीका का यह विभाजन शान्तिपूर्वक ढंग से हुआ, लेकिन कटुतापूर्ण अवश्य रहा और कुछ छोटे मोटे संघर्ष भी ई। अफ्रीका का सबसे बड़ा और सबसे अच्छा भाग इंग्लैंड तथा फ्रांस को प्राप्त हुआ। जर्मनी का हिस्सा छोटा था और उसके बाद इटली और स्पेन का स्थान था। यूरोपीय राज्यों में विभिन्न कारणों को लेकर आपसी मनमुटाव पहले ही चल रहे थे, अफ्रीका के कारण ये मनमुटाव और अधिक बढ़ गये।

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