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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

सम्प्रभुता के एकलवादी सिद्धांत की विवेचना

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सम्प्रभुता के एकलवादी सिद्धांत की विवेचना 


संप्रभुता को राज्य का एक आवश्यक तत्व माना जाता है। राजनीति विज्ञान में यह घारणा प्राचीन काल से विद्यमान है कि सम्प्रभुता के विना राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। संप्रभुता के महत्त्व के अभिवृद्धि में एकलवादी (अद्वैतवादी) सिद्धान्त ने महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। एकलवादी अथवा अद्वैतवादी सिद्धान्त जिसका प्रमुख समर्थक जर्मन दार्शनिक हीगल था, यह मानता है संप्रभुता राज्य की शक्ति है और इसलिए वह एक मात्र सर्वोच्च संस्था है। परन्तु वर्तमान समय में अनेक लेखकों एवं विद्वानों ने सम्प्रभुता के एकलवादी या अद्वैतवादी सिद्धान्त को चुनौती दी है। उनके अनुसार राज्य के अतिरिक्त भी अन्य अनेक समुदाय व्यक्ति के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं और इसलिए उनको राज्य के समान ही महत्त्व दिया जाना चाहिए। सम्प्रभुता को सर्वोच्चता पर प्रहार करने वाली इस विचारधारा को राजनीतिशास्त्र में बहुलवाद के नाम से जाना जाता है। वहुलवादी विचारधारा के बीज हमें उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध विचारक ऑटोफॉन ग्रीक और एफ० डब्ल्यू० मेटलेट की रचनाओं में मिलता है, किन्तु वास्तविक अर्थ में उसका विकास 20वीं शताब्दी में हुआ। हेराल्ड जे० लास्की ने सर्वप्रथम बहुलवादी शब्द का प्रयोग किया। इंग्लैण्ड में इसके अतिरिक्त जे० एन० फिगिस, ए० डी० लिण्डसे, जी० डी० एच० कोल और एस० जी० हॉब्सन आदि प्रसिद्ध बहुलवादियों की अनेक आलोचनाओं एवं प्रस्तावों को स्वीकार किया है, किन्तु वे उग्र सिंद्धान्तों से सहमत नहीं हैं। वस्तु: बहुलवादियों पर इस युग की दो विचारधाराओं का विशेष प्रभाव परिलक्षित होता है। एक तरफ वे जे० एस० मिल आदि जैसे दार्शनिक से प्रभावित हैं, जिन्होंने व्यक्ति के आध्यात्मिक मूल्य नैतिक स्वतंत्रता के नाम पर राज्य के प्रभुत्व का विरोध किया और दूसरी ओर उन्हें उन समाजशास्त्रियों और विधिशास्त्रियों से प्रेरणा मिली है, जो समाज में विद्यमान समुदायों की स्वतंत्रता को महत्त्व देते हैं तथा राज्य के आक्रमण से उनकी रक्षा करना चाहते हैं। बहुलवाद एक नवीन राजनीतिक विचारधारा है जो अराजकतावाद से पर्याप्त रूप से समानता रक्त ही दोनों में अन्तर केवल इतना है अराजकतावाद राज्य के समूल विनाश की बात करता है जबकि बहुलवाद राज्य के अस्तित्व को बनाये रखते हुए उसकी प्रभुसत्ता को अन्य समुदायों में विखण्डित कर देना चाहता है। इस विचारधारा के समर्थक राज्य को व्यक्तियों का समूह न मानकर समुदायों का समूह मानते हैं। संप्रभुता के साथ-साथ अन्य राजनीतिक सिद्धान्तों पर भी बहुलवादियों ने अपना मत व्यक्त किया है जो संक्षेप में निम्नवत् हैं

(1) जहाँ तक संप्रभुता का प्रश्न है बहुलवाद को सीमित संप्रभुता में विश्वास है। बहुलवादी हीगल जैसे अन्य आदर्शवादियों के समान राज्य को एक सर्वोच्च तथा सर्वशक्तिमान संस्था नहीं मानते हैं। तथा वे अराजकतावादियों के समान राज्य को एक अनावश्यक बुराई के रूप में भी स्वीकार नहीं करते हैं। उनका मानना है राज्य विभिन्न समुदायों का समूह है। यदि राज्य के अस्तित्व को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया जायेगा तो समाज के विभिन्न समुदाय परस्पर संघर्षरत हो जायेंगे और समाज में शांति-व्यवस्था समाप्त हो जायेगी।

(2) बहुलवादियों के अनुसार राज्य  भी अन्य समुदायों की भांति एक समुदाय है।

(3) बहुलवाद राज्य के विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखता है।

(4) बहुलवादियों के अनुसार राज्य और समाज में अन्तर है।

(5) कानून के संदर्भ में बहुलवादियों का मत है यह (कानून) राज्य से स्वतंत्र तथा उच्च है।

6) बहुलवादी अपने उद्देश्यों के संपूर्ति हेतु सांवैधानिक साधनों को अपनाने में विश्वास करते हैं।

(7) बहुलवाद जनतंत्र तथा अंतर्राष्ट्रवाद का समर्थन करता है।

(8) बहुलवाद व्यावसायिक प्रतिनिधित्त्व का समर्थन करता है लेकिन प्रादेशिक प्रतिनिधित्व को अनुचित और दोषपूर्ण मानता है।

बहुल वादियों द्वारा संप्रभुता के सिद्धान्त का खण्डन (आलोचना)

1. बहुलवादी सर्वप्रथम ऐतिहासिक दृष्टि से संप्रभुता के एकलवादी सिद्धांत की आलोचना करते हैं। उनका विचार है कि राज्य एक अत्यन्त पुरानी संस्था है, परन्तु वह सदा प्रभुत्वसम्पत्र नहीं रही है। संप्रभुता की कल्पना, वर्तमान युग की उपज है और उस पर इस युग की विशेष राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की छाप है। बोदां तथा हाव्स आदि विचारकों ने प्रभुसत्ता से सिद्धान्त को नये ढंग से विकसित किया और सिखाया कि किसी संगठित राजनीतिक समाज के लिए आवश्यक है कि वह प्रभुत्वसम्पन्न हो। इस प्रकार संप्रभुता का सिद्धान्त 'विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज है, वह राज्य का निरपेक्ष और अनिवार्य तत्त्व नहीं है। राज्य पहले भी थे, परन्तु वे प्रभुत्त्वसम्पन्न नहीं थे।

2.संप्रभुता के परम्परागत सिद्धान्त (एकलवादी सिद्धान्त) के विरुद्ध बहुलवादियों की यह धारणा है कि उनकी परिभाषा ही त्रुटिपूर्ण तथा असंगत है। ऑस्टिन के अनुसार, स्वतंत्र राजनीतिक समाज में प्रभु निश्चित और निरपेक्ष होता है तथा उसकी सत्ता असीम, अविभाज्य और असंक्राम्या होती है। लास्की का कहना है कि यदि ऑस्टिन के इस मत को स्वीकार कर लिया जाय तो संघ राज्य में सम्प्रभुता का पता लगाना ही असम्भव हो जायेगा।

3. व्यवहार में भी संप्रभुता का एकलवादी सिद्धान्त असम्भव है। बहुलवादियों की धारणा है कि यदि कानूनी दृष्टि से सम्प्रभुता सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाये, तो भी यह मानना पड़ेगा कि यथार्थ में वह अव्यावहारिक है और अव्यावहारिक रहा है। विश्व में कोई कभी ऐसा प्रभु नहीं हुआ, जिसकी शक्ति असीम रही हो और जब कभी किसी ने असीम शक्ति घारण करने का प्रयत्न किया है तभी उस पर नियन्त्रण लगाने की चेष्टा की गई है।

4. राज्य तथा कानून की दृष्टि से संप्रभुता के सिद्धांत की आलोचना की जाती है। फ्रांसीसी दार्शनिक ने विधि की दृष्टि से प्रभुत्व सिद्धान्त की आलोचना की है। एकलवादी बिहार राज्य को कानून का अनन्य स्रोत मानते हैं। उनका कहना है कि राज्य किसी निश्चित भू-भाग में रहने वाले व्यक्तियों का वह संगठन है जिसके अन्तर्गत सबल लोग निर्बलों पर अपनी इच्छा भोगने का प्रयत्न करते हैं। अत: राज्य को सत्ता का स्वयं कोई औचित्य नहीं है। उसके आदेश को कानून नहीं माना जा सकता। डुग्विट के अनुसार, राज्य प्रभुत्त्वसम्पन्न नहीं हो सकता।

5. राज्य तथा अन्य समुदाय- इंग्लैण्ड के बहुलवादियों ने विभिन्न समुदायों के हितों और अधिकारों का पक्ष लेकर संप्रभुता का खंडन किया है, जो समाज की सरकार का अंग नहीं होते। उनका कहना है कि मनुष्य की सामाजिक प्रकृति की अभिव्यक्ति अनेक समुदायों के द्वारा होती है। लोगों की अनेक प्रकार की भावना रुचियाँ और शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक आवश्यकताएँ होती हैं। उनमें से प्रत्येक की पूर्ति के लिए आवश्यक है कि उसके अनुरूप सामाजिक वातावरण मिले। किसी एक सामाजिक संस्था के द्वारा मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, अतः वह आर्थिक, व्यावसायिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा अन्य प्रकार के अनेक समुदायों का निर्माण करता है। इनमें से कोई एक समुदाय ऐसा नहीं सकता जो नैतिक महत्त्व और व्यावहारिक दृष्टि से दूसरों से श्रेष्ठ हो। अतः राज्य को सब समुदाय से ऊपर और प्रभुत्त्वसम्पन्न नहीं माना जा सकता।

6. राज्य तथा व्यक्ति-बहुल वादियों में लास्की का एक विशेष स्थान है। उस पर 19वीं शाताब्दी के व्यक्तिवाद का गहरा प्रभाव पड़ा था अतः उसने समुदायों की स्वतंत्रता के आधार पर ही नहीं वरन् व्यक्ति को शुद्ध अधिकारों और अंतःकरण की स्वतंत्रता के नाम पर भी संप्रभुता के सिद्धान्त की कटु आलोचना की। वह व्यक्ति को साध्य और राज्य तथा अन्य समुदायों को साधन मानता है, इसलिए उसका बहुलवाद एक ऐसी स्थिति पर पहुँच जाता है, जहाँ उसका आधार समुदाय नहीं, अपितु स्व व्यक्ति है।

7.राज्य तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और व्यवस्था- एकलवादी अद्वैत वादियों के अनुसार, राज्य अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी पूर्णरूप से स्वतंत्र है, अन्य राष्ट्रों के साथ वह जैसा व्यवहार चाहे कर सकता है। इस विषय में भी उस पर कोई कानूनी नियन्त्रण नहीं होता। वास्तव में राज्यों का पारस्परिक सम्बन्ध उस भांति का है जैसा हाब्स के अनुसार प्रकृति की अवस्था में मनुष्यों का था। बहुलवादियों में विशेषता लास्की ने इसका खण्डन किया है। लास्की स्थायी विश्वशान्ति तथा राष्ट्रों के पारस्परिक सहयोग को मानव सभ्यता की रक्षा और विकास के लिए अनिवार्य मानता है। उसका विचार है कि आज के युग में आये दिन जो युद्ध हुआ करते हैं उनका मुख्य कारण राज्यों की प्रभुत्व संप्रभुता है। अतः अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में स्वतंत्र और प्रभुत्त्वसम्पन्न राज्यों की धारा मानवता के कल्याण के लिए घातक है।"

बहुलवाद की आलोचना


बहुलवादी विचारधारा के आलोचकों ने बहुलवाद के विरुद्ध अनेक मत व्यक्त किये हैं। इन विभिन्न मतों का समर्थन करने के लिए बहुलवाद के आलोचकों ने अपने मत के पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये हैं (1) विभिन्न समुदायों में सामंजस्य स्थापित करने की समस्या- आलोचकों का मत है कि बहुलवाद राज्य को अन्य सामाजिक संस्थाओं व समुदायों की स्थिति प्रदान करता है। वह कहता है कि अन्य समुदायों के समान ही राज्य एक संस्था है और उसके पास सर्वोच्च सत्ता नहीं होनी चाहिये। यदि बहुलवादियों की इस विचारधारा को मान लिया जाये तो समाज की अन्य सभी संस्थाएं समान हो जाएंगी और वे सभी एक-दूसरे पर प्रभुत्व  स्थापित करने का प्रयास करेंगी। उस समय समस्त समुदायों में सामंजस्य एवं सन्तुलन स्थापित करना असम्भव हो जाएगा, इसके परिणामस्वरूप समाज में अशान्ति तथा अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी। (2) सामाजिक समुदायों में कर्त्तव्यहीनता- यदि बहुलवादियों के अनुसार, राज्य को अन्य समुदायों की स्थिति प्रदान कर दी जाय तो सामाजिक समुदायों, समितियों व स्थाओं पर सरकार का कोई नियन्त्रण नहीं रह जाएगा और वे अपने कर्त्तव्यों व उद्देश्यों  का समुचित रूप से पालन नहीं कर सकेंगे। अतः इस स्थिति से भी सामाजिक अराजकता की स्थिति उत्पन्न होगी। (3) एक भ्रममूलक अवधारणा- बहुलवादी विचारकों का मत है कि राज्य को अन्य समुदाय के समान समझने पर अन्य समुदायों में संघर्ष की समाप्ति हो जाएगी, किन्तु आलोचकों का मित है कि बहुलवाद की यह विचारधारा भ्रमपूर्ण है। समुदायों में संघर्ष की प्रवृत्ति पाई जाती है ।राज्य का नियन्त्रण हट जाने पर इस संघर्ष की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं के हितों में कभी भी समानता नहीं हो सकती है। (4) सम्प्रभुता सम्वन्धी गलत धारणा- बहुलवादियों ने सम्प्रभुता की विचारधारा को गलत धारणाओं पर आधारित माना है। वे राज्य की संप्रभुता को असीमित तथा निरंकुश मानते है, किन्तु वे इस बात को भूल जाते हैं कि सम्प्रभुता के सिद्धान्त के अधिकांश समर्थक विद्वानों ने कहीं भी सम्प्रभुता को निरंकुश नहीं माना है। उन्होंने यही कहा है कि राज्य की सम्प्रभुता नैतिक सिद्धांतों से प्रतिबन्धित है।

(5) राज्य संबंधी गलत धारणा- बहुलवादी विचारक यह सोचते हैं कि राज्य सभी कार्य स्वयं अपनी शक्ति के बल पर करता है। उनकी यह विचारधारा भी गलत है क्योंकि बल प्रयोग के परिणाम सदैव रक्तपात व युद्ध ही होते हैं आलोचकों का मत है कि बहुलवादी इस बात को भी भूल जाते हैं कि राज्य अपने समस्त कार्यों को स्वयं नहीं करता है वरन् अन्य समुदायों या संस्थाओं के माध्यम से कराता है तथा समुदायों को अपने अधिकार क्षेत्र में कार्य करने की पर्याप्त मात्रा में स्वायत्तता भी होती है।

(6) उद्देश्य की स्पष्टता-बहुल वादियों के उद्देश्य स्पष्ट नहीं हैं। वे एक ओर राज्य की सम्प्रभुता का विरोध करते हैं और दूसरी ओर सभी सामाजिक समुदायों व संस्थाओं में सामंजस्य स्थापित करने की बात करते हैं। उनका यह उद्देश्य भी उसी समय सफल हो सकता है जबकि राज्य के माध्यम से सभी संस्थाएँ या समुदाय नियंत्रित रहें वास्तव में वास्तविक सम्प्रभुता तथा व्यावसायिक संगठनों के मध्य किसी भी प्रकार का कोई भी पारस्परिक विरोध नहीं है।

(7) राज्यविहीन समाज:समस्याओं का गढ़- बहुलवादियों की यह धारणा एकदम निर्मूल है कि राज्य के अभाव में शान्तिमय जीवन सम्भव है। आलोचकों का मत हैं कि राज्यविहीन समाज में हिंसात्मक क्रांति उत्पन्न होंगी। इसलिए बहुलवादियों के राज्यविहीन समाज को मान्यता नहीं दी जा सकती। सामाजिक समस्याओं का हल राज्य द्वारा ही सम्भव है।

(8) राज्य : एक अनिवार्य संस्था- बहुलवादियों का विचार है कि सामाजिक संघर्षों एवं विवादों का समाधान नैतिकता के सिद्धांत के आधार पर हो सकता है, उसके लिए राज्य का होना अनिवार्य नहीं है। आलोचक बहुलवादियों की इस विचारधारा को अराजकता का प्रतीत मानता है। उनका विचार है कि विभिन्न समुदायों के बीच शान्ति तथा अनुशासन बनाए रखने के लिए बहुत यादों को राज्य की संस्था का अस्तित्व स्वीकार करना होगा।

(9) कानून राज्य से ऊपर नहीं-डिग्री तथा कैब जैसे बहुलवादियों की यह धारणा सर्वथा गलत है कि कानून राज्य से स्वतंत्र है और उससे ऊपर है। रीति-रिवाज उसी समय कानून बनते हैं जब राज्य उनको मान्यता देता है।

(10) अंतर्राष्ट्रीय कानून सम्प्रभुता की सीमा नहीं-लास्की ने अन्तर्राष्ट्रीय कानून को सम्प्रभुता की वाहा सीमा माना है। परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय कानून सच्चे अर्थों में कानून नहीं है, राज्य द्वारा इसका पालन स्वेच्छा से और औपचारिकतावश किया जाता है। अतः यह राज्य की सम्प्रभुता को सीमित नहीं करता है।

(11) सभी समुदाय समान स्तर के नहीं हैं- बहुलवादी विचारधारा के विरुद्ध एक प्रमुख तर्क यह है कि यह विचारधारा समाज के सभी समुदायों को समान स्तर का मानती है। परन्तु यह उचित नहीं है क्योंकि राज्य की स्थिति उसके विशेष कार्यों के कारण अन्य सभी समुदायों से भिन्न तथा विशेष होती है।

(12) बहुलवाद अन्तर्विरोधों से परिपूर्ण है- कोकर के मतानुसार, "यह बड़ा मनोरजंक अन्तर्विरोध है। अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए वे बड़े जोश के साथ सम्प्रभुता का विरोध करते हैं.... दूसरी ओर जब वे राज्य के वास्तविक संगठन का वर्णन करते हैं तो उन्हें विवश होकर राज्य की सर्वोपरि स्थिति और संप्रभुता को स्वीकार करना पड़ता है।" यह वाद का मूल्यांकन- यद्यपि बहुलवाद के सम्बन्ध में विद्वानों ने ऐसे तर्क प्रस्तुत किए हैं कि बहुलवादी विचारधारा को वर्तमान युग में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। किन्तु इतना होते हुए भी बहुलवाद आधुनिक दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त बन गया है। बहुलवादी विचारधारा राज्य की सम्प्रभुता की निरंकुशता पर प्रहार करके व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है तथा साथ-ही-साथ लोक-कल्याणकारी भावना को प्रोत्साहन देती है। अत: यह कहा जाता है कि अनेक दोषों के होते हुए भी बहुलवादी विचारधारा आधुनिक राजनीतिक दर्शन में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। गैटिल के शब्दानुसार, "बहुलवाद कठोर और सैद्धान्तिक विधानवादिता तथा ऑस्टिन के सम्प्रभुता सिद्धान्त के विरुद्ध एक सामाजिक और स्वागतयोग्य प्रतिक्रिया है।" बहुलवाद के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए मिस फोलेट का कथन है कि, "वहुलवादी वर्तमान राज्य की सर्वोच्चता के अधिकार को नष्ट करते हैं। वे संघों के महत्त्व को स्वीकार करते हैं और उन्हें मान्यता प्रदान करते हैं व अपने कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में स्वायत्तत्ता देने की आव्श्यकता का प्रतिपादन करते हैं। वे स्थानीय जीवन को पुनः स्थापति करने के पक्ष में हैं। अन्त में सेबाइन के शब्दानुसार हम कहेंगे कि राज्य हित में, "अद्वैतवादी (एकलवादी)या बहुलवादी, जब हमें जो कुछ होना पड़े, होना चाहिए। वैसे हम अद्वैतवादी (एकलवादी)होना पसन्द करेंगे।

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