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सम्प्रभुता (प्रभुसत्ता) का अर्थ एवं परिभाषा देते हुए इसके दार्शनिक सिद्धान्त की आलोचना

सम्प्रभुता (प्रभुसत्ता) का अर्थ एवं परिभाषा देते हुए  इसके दार्शनिक सिद्धान्त की आलोचना 


सम्प्रभुता राज्य के आधारभूत तत्वों से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। यदि राज्य के आवश्यक तत्त्व के अन्तर्गत सम्प्रभुता को अलग कर दिया जाय तो निश्चित भूभाग एवं जनसंख्या से युक्त समुदाय को राज्य की संज्ञा नहीं दी जा सकती। यहाँ पर प्रो० लास्की का यह कथन सर्वथा उपयुक्त है "सम्प्रभुता के कारण ही राज्य अन्य मानव समुदायों से पृथक् है।"

इस आधार पर संप्रभुता को राज्य का आवश्यक तत्त्व ही नहीं वरन् राज्य की आत्मा कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में सम्प्रभुता ही वह महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो राज्य को अन्य मानवीय समुदायों से अलग करता है। सम्प्रभुता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी दार्शनिक जीन बोंदा ने अपनी पुस्तक 'Desk Republica' में किया। आधुनिक समय में सर्वाधिक मान्य सम्प्रभुता सम्बन्धी सिद्धान्त जान आस्टिन का है। आस्टिन ने सम्प्रभुता के वैधानिक अद्वैतवाद सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। सम्प्रभुता का अर्थ सुस्पष्ट करने हेतु सर्वप्रथम उसका विवेचन आवश्यक है जो इस प्रकार है

सम्प्रभुता अंग्रेजी शब्द 'Sovereignty का हिन्दी रूपान्तर है जो लैटिन शब्द 'Superanus' से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है सर्वोच्च शक्ति। आशय यह है कि राज्य के ऊपर कोई अन्य शक्ति नहीं है, वह असीमित, अमर्यादित तथा निरंकुश शक्ति है। उसे कोई अन्य शक्ति, चाहे, वह राज्य के अंदर हो या बाहर नियंत्रित नहीं कर सकती। परिभाषाएँ बोंदा- "सम्प्रभुता नागरिकों तथा प्रजा पर सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति है जिस पर कोई कानूनी बंधन नहीं है।"

प्राइस-"प्रभुसत्ता उस व्यक्ति की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति है जिसके कार्य अन्य किसी के अधीन नहीं होते और जिनकी इच्छा कोई टाल नहीं सकता वह शासन करने की नैतिक शक्ति होती है।"

ब्लैक स्टोन-"संप्रभुता का अनिवार्य, सर्वोच्च तथा अनियंत्रित सत्ता है जिसके आश्रित बड़े-बड़े नाखून रहते हैं।"

वुडरो विल्सन- "सम्प्रभुता वह शक्ति है जो सदा सक्रिय रहकर कानून बनाती है और

उसका पालन कराती है।"

विलोबी- "सम्प्रभुता राज्य की सर्वोच्च इच्छा है।"

बर्गेस- "सम्प्रभुता जनता तथा जनता के सभी संघों पर मौलिक निरंकुश तथा असीमित शक्ति होती है।"

ड्यूवी- "सम्प्रभुता वह शक्ति है जो सदा सक्रिय रहकर कानून बनाती है और उनका

पालन कराती है।"

ऑस्टिन- "यदि एक निश्चित उच्च कोटि का मनुष्य जो स्वयं अपने समान किसी दूसरे मनुष्य की आज्ञा का पालन करने का अभ्यासी न हो और जिसके आदेशों का पालन समाज के अधिकांश लोग स्वाभाविक रूप से करते हों, तो उस समाज में वह निश्चित मानव सम्प्रभु है और उस निश्चित कोटि के संप्रभु सहित वह समाज राजनीतिक और स्वतंत्र समाज है।"

संप्रभुता का दार्शनिक सिद्धान्त संप्रभुता के दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार, राज्य में सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित है। आधुनिक युग में इस सिद्धान्त को स्पष्ट प्रतिपादित करने का श्रेय जीन जैक्स रूसो को प्राप्त है। यह सिद्धान्त ही आधुनिक प्रजातन्त्र का आधार स्तम्भ है। रूसो से पूर्व कई अन्य विचारकों ने भी यह कहा था कि राज्य में जनता ही यथार्थ-सत्ता है तथा राज्य-कार्य के संचालन हेतु जनता द्वारा शासकों को अधिकार प्रदान किये गये हैं शासकों का अधिकार मौलिक नहीं है, अतएव यदि वे अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग करें तो जनता उन्हें पदच्युत कर उनके स्थान में नये शासकों को नियुक्ति कर सकती है। आधुनिक युग के पूर्व प्राचीन यूनान, रोम तथा मध्यकाल में भी यह विचार कुछ मात्रा तक प्रचलित था कि जनता में ही सर्वोच्च शक्ति निहित है। प्लेटो तथा अरस्तू के अनुसार, व्यक्ति तथा राज्य में किसी भी प्रकार का विरोधाभास नहीं था। राज्य व्यक्ति का ही विराट एवं विस्तृत स्वरूप है। रोमन विचारों के अनुसार, शासकों को जनता द्वारा शक्ति प्रदान की गई थी। मध्ययुग में भी कुछ विचारकों ने जिनको "राजतन्त्र विरोधी' कहा जाता है जनता को ही राज्य में सर्वोच्च शक्ति बतलाया। यद्यपि ये विचारक राजतन्त्र के विरोधी थे तथापि साधारणतः इनका विचार यह था कि राज्य शक्ति उच्च वर्ग के हाथ में होनी चाहिये। अतएव इनको प्रजातन्त्र का समर्थक नहीं कहा जा सकता है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि उनकी सहानुभुति प्रजातन्त्र विरोधी थी। इन लेखकों ने यद्यपि स्थापित सरकार के विरुद्ध सार्वजानिक संप्रभुता को राज्य की यथार्थ सत्ता के रूप में बतलाया तथापि उन्होंने इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का कोई भी सन्तोपजनक उत्तर नहीं दिया कि यह संप्रभुता क्या है तथा "जनता से क्या तात्पर्य है? सार्वजनिक संप्रभुता के स्वभाव के ऊपर उन्होंने कोई प्रकाश नहीं डाला। इन विचारकों के अनुसार सम्पूर्ण समाज ही संप्रभुता नहीं था परन्तु केवल समाज का शासित भाग। संप्रभुता जनता से आशय सम्पूर्ण राज्य शासक तथा प्रजाजन दोनों ही- नहीं था परन्तु केवल राज्य का शासित भाग। वास्तव में ये त्रुटियाँ इस कारण थीं कि ये विचारक मुख्यतः व्यावहारिक दृष्टिकोण के सन्दर्भ में लिख रहे थे।

कैथोलिक राज्यों में प्रोटेस्टेण्ट मतानुयायी था प्रोटेस्टेंट राज्यों में कैथोलिक धर्मावलम्बी लेखक अपने-अपने शासकों के विरुद्ध लिख रहे थे। अतः यह स्वाभाविक था कि उन्होंने सैद्धान्तिक प्रश्नों के विमर्श पर मूलरूप से ध्यान नहीं दिया। सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में महान राज्य क्रान्ति के पश्चात् इंग्लैंड में लॉक ने यह विचार प्रकट किया कि राज्य में सर्वोच्च-सत्ता जनता है तथा शासनों की स्थापना जनता द्वारा अपनी विद्यार्थी की गई है और यदि शासक अपने कर्तव्यों का उचित रोति से पालन नहीं करते है तो जनता का यह नैसर्गिक अधिकार है कि उनका सत्ताच्युत कर नये शासकों की नियुक्ति करे। उसके अनुसार जनता ही राज्य-सत्ता का रात है परन्तु जनता स्वयं शासक नहीं है। लॉक ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि, "इस स्थिति में समाज ही सर्वदा सर्वोच्च-सत्सा कहा जा सकता है परन्तु यह सरकार के किसी स्वरूप के यथा इच्छा के अन्तर्गत नहीं है क्योंकि जनता की यह शक्ति तब तक कार्य में नहीं आती जब तक कि सरकार भंग न हो जाय। "लॉक ब्रिटिश संविधान को ध्यान में रखते हुए लिख रहा था। इसी कारण वह समझता है कि प्रतिनिधि व्यवस्था द्वारा जनता का सरकार के ऊपर नियन्त्रण बना रहेगा। लॉक के काल में इंगलैंड में प्रजातन्त्र केवल नाममात्र को ही था। मतदान का अधिकार केवल कुछ ही व्यक्तियों को था और ये सम्पत्तिशाली थे। अतएव 16वीं शताब्दी के"राजतंत्र-विरोधी" विचारों की ही भांति लॉक भी आधुनिक अर्थ में प्रजातन्त्र का समर्थक नहीं कहा जा सकता है। वह यह नहीं चाहता है कि सम्पूर्ण जनता के हाथों में शक्ति हो। उसका मूल ध्येय व्यक्ति के अधिकारों को सरकार के हस्तक्षेप में रक्षा करना था। इन अधिकारों में सबसे मुख्य वह सम्पत्ति का अधिकार मानता था। लॉक मध्यम-वर्ग का दार्शनिक था। व्यक्ति के अधिकारों के रक्षा हेतु वह उत्तरदायित्त्वपूर्ण शासन की स्थापना करना चाहता था। लॉक के विचारों की प्रमुख त्रुटि यह है कि वह 'जनता' शब्द का अर्थ उचित रूप से नहीं समझ सका। जनता से उसका आशय केवल व्यक्तियों के समूह से है। इससे प्रत्येक व्यक्ति कुछ अधिकारों द्वारा विभूषित है जो कि नैसर्गिक है तथा जिनका उपभोग वह प्राकृतिक-अवस्था से कर रहा है। लॉक के लिए अधिकार व्यक्तित्व के विकास के लिये, समाज द्वारा अनुमोदित तथा मान्य, आवश्यक दशाएँ नहीं है। अधिकार समाज से स्वतंत्र हैं। अत: यह स्वाभाविक है कि उसके लिये समाज में आंगिक एकता नहीं है। लॉक यह नहीं देख सका कि यदि समाज को व्यक्तियों का समूह-मात्र ही मान लिया जाय तो समाज की कोई सत्ता नहीं रह जाती है। व्यक्ति ही यथार्थसत्ता हो जाता है क्योंकि लॉक का प्राथमिक उद्देश्य सार्वजनिक-संप्रभुता का समर्थन करना न हो कर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना था। अतः उसके हाथों में भी संप्रभुता का दार्शनिक-सिद्धान्त अपूर्ण ही रह गया। लार्ड बाइस के शब्दों में, "लॉक अपूर्ण प्रजातांत्रिक है क्योंकि वह व्यक्तिवादी है।"

रूसो:- रूसो ने सर्वप्रथम इस सिद्धान्त का पूर्णरूप से प्रतिपादन किया उसने स्पष्ट रूप से समाज की आंगिक एकता को देखा तथा यह समझा कि संप्रभुता सम्पूर्ण समाज की-शासक तथा शासित दोनों वर्गों की सत्ता है। रूसो भी सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का अनुयायी है। हॉब्स की ही तरह वह व्यक्तिवाद से आरम्भ करता है तथा समष्टिवाद में अन्त करता है। समझौते के फलस्वरूप जिस समष्टि की रचना होती है वह केवल व्यक्तियों का समूह-मात्र न हो कर स्वयं एक नैतिक व्यक्तित्व है। अतएव प्राकृतिक अवस्था के व्यक्ति समझौते के बाद समाज के सदस्यों के रूप में दिखाई देते हैं। रूसी में विशेष बात यह है कि समाज तथा व्यक्ति दो पृथक् तथा विरोधी सत्ता नहीं है। समझौते के बाद व्यक्ति तथा समाज एक ही इकाई के दो पहलू मात्र हैं। रूसो लिखता है, "समझौते से जिस नवीन व्यक्तित्व की स्थापना होती है वही निश्चेष्ट अवस्था में राज्य कहलाता है तथा सचेष्ट-रूप में संप्रभु। इसके सदस्य संयुक्तरूप से 'जनता पृथक्-पृथक् नागरिक तथा इसके कानूनों के अधीन होने के कारण 'प्रजा' कहलाते हैं। नागरिक से आशय यह है कि वह संप्रभु-सत्ता का एक अंग है। रूसो में जनता का आशय समाज के सदस्यों से है- शासक तथा शासित दोनों रूपों से। हॉब्स के समझौते के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति अपने सभी अधिकार एक मनुष्य अथवा एक सभा को सौंप देता है। जबकि लॉक के अनुसार, समझौते द्वारा व्यक्ति केवल एक हो अधिकार समाज को देता हैं अन्य अधिकार वह अपने पास ही रखता है। रूसो में हॉब्स की ही तरह समझोते द्वारा व्यक्ति अपने समस्त अधिकार दे देता है। मनुष्य अथवा सभा विशेष को न प्रदान कर सम्पूर्ण समाज को ही दिए जाते हैं यहाँ लॉक का प्रभाव स्पष्ट है। इस समझौते के फलस्वरूप जो नवीन सत्ता स्थापित होती है वह "सम्पूर्ण समाज" ही है। इसकी एकता, प्राण तथा इच्छा इसी समझौते के फल हैं। सारांशः समझौते के द्वारा व्यक्तियों के अलग-अलग व्यक्तित्व के स्थान पर एक नवीन नैतिक-व्यक्तित्व की स्थापना होती है। प्रत्येक व्यक्ति इसका एक अविभाज्य अंग है। रूसो के शब्दों में, सामाजिक समझौते का सार यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने  शरीर तथा समस्त शक्तियों को "सार्वजनिक इच्छा" के नियन्त्रण के अधीन कर देता है।यह सार्वजनिक इच्छा ही राज्य में संप्रभु-सत्ता है, तथा इसकी अधीनता ही व्यक्ति की यथा्र्थ स्वतन्त्रता है।

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