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समुदाय से आप क्या समझते हैं?

समुदाय से आप क्या समझते हैं?

समुदाय की परिभाषा- समुदाय का तात्पर्य प्रारम्भ में ऐसे भू-भाग से था जिसमें लोग उत्तर- पारस्परिक आर्थिक कार्यों को सम्पन्न करते थे। राजनीतिक दृष्टि से समुदाय के पास अपनी एक स्वायन्त शासन की इकाई होती थी। इस प्रकार समुदाय का अर्थ एक संरचना मात्र था, जिसके अन्तर्गत लोग या परिवार एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते थे। यथा-गाँव, कस्वा एवं शहर आदि । समुदाय के प्रति सही दृष्टिकोण संरचनात्मक था। लिंडमेन महोदय ने अपने विचारों में समुदाय के संरचनात्मक और प्रकार्यात्मक दोनों पहलुओं पर बल दिया है वे समुदाय की परिभाषा देते हुए लिखते हैं कि यदि हम समुदाय के स्पष्ट तत्वों की परिभाषा दें तो यह एक जागरूकता से बनाया गया संघ है जो कि एक निश्चित क्षेत्र या बस्ती में रहता है। इसके पास सीमित्त राजनीतिक अधिकार होता है और यह सामाजिक संस्थाओं जैसे स्कूल, मंदिर, गिरजाघर आदि पर देखरेख रखता है। समुदाय के प्रकार्यात्मक पहलुओं का उल्लेख करते हुए लिंडमेन आगे लिखते हैं यदि हम समुदाय के अस्पष्ट तत्वों की परिभाषा दें तो यह सामाजिक अन्तःक्रियाओं की एक प्रक्रिया है कि जो कि अधिक गहरी या विस्तृत धारणाओं को पैदा करती है, जिसमें पारस्परिक निर्भरता (सहकारिता),सहयोग और एकीकरण होते हैं। उपरोक्त परिभाषाओं से समुदाय के सम्बन्ध में दो तथ्य बहुत स्पष्ट हैं

(1) समुदाय व्यक्तियों का एक संगठन है जो कि एक निश्चित भू-भाग में स्थित होता है।

(2) अस्पष्ट रूप से समुदाय सामाजिक अन्तः क्रिया सहयोग, संघर्ष,संपर्क आदि की एक प्रक्रिया है। यह समुदाय का क्रियात्मक रूप है। लिंडमेन के साथ कतिपय अन्य विचारकों ने भी समुदाय की व्याख्या की है। ऑगवर्न एवं निमकॉफ महोदय ने समुदाय को एक सीमित क्षेत्र में सामाजिक जीवन के सम्पूर्ण संगठन से परिभाषित किया है। मेन्जर महोदय ने अपनी परिभाषा में भू-भाग पर अधिक विस्तार दिया है। उनके अनुसार, "वह समाज.जो किसी निश्चित भौगोलिक स्थान पर रहता है, समुदाय कहा जा सकता है। इस तरह समुदाय में जहाँ लोग एक निश्चित भू-भाग में रहते हैं, वहीं उनमें कुछ निश्चित सामाजिक प्रक्रियाएँ भी होती है। इस प्रकार समुदाय जहाँ एक संरचना है, वहीं एक प्रक्रिया भी है। समुदाय के आधारभूत तत्व (लक्षण/विशेषताएं किसी भी समुदाय के अपने कुछ आधारभूत तत्व भी होते हैं। इन आधारभूत तत्वों से ही वह एक निश्चित पहचान पाता है। इस प्रकार किसी भी समुदाय में निम्नलिखित आधारभूत तत्व विद्यमान रहते हैं

(1) समुदाय में स्थानीयता होती है- प्रत्येक समुदाय में स्थानीयता पाई जाती है। जहाँ लोग अपनी जमीनों से जुड़े होते हैं। लोगों का एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र के अन्दर रहने वाले लोगों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन एक सूत्र में बंधा हुआ होता है। प्रत्येक गाँव की चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, एक सीमा होती है। हमारे देश की भी भौगोलिक सीमाएँ है, इन सीमाओं में रहने वाले लोग ही भारतीय समुदाय कहे जाते हैं। एक ही भौगोलिक पर्यावरण में रहने के कारण लोगों का जीवन भी एक जैसा ही बन जाता है। दक्षिण भारत में रहने वाले लोग ढीले ढीले कपड़े पहनते हैं क्योंकि यहाँ गर्मी अधिक होती है। कश्मीर और लेह के लोग ठंडी जलवायु के कारण गर्म कपड़े अधिक पहनते हैं। सर्दी के मौसम में घरों में सिगड़ियाँ रखते हैं। इस भौंति समुदाय का बहुत बड़ा और प्रधान गुण भौगोलिक स्थान है।

(2) स्थायित्व- मनुष्यों द्वारा बनायी गयी समितियों की अपेक्षा समुदाय स्थायी होता है। यथा-सहकारी समिति या मजदूर संगठन द्वारा बनायी गयी समितियाँ होती हैं जो अस्थायी होती है। दिल्ली, आगरा और बम्बई जैसे शहरों के समुदाय ऐतिहासिक है, इन्होंने साम्राज्य को उठते हुए और गिरत हुए देखा है। इतिहास ने कितनी ही करवटें ली है, कितने ही उठा पटक हुए हैं, पर ये समुदाय आज भी अपने अस्तित्व की घोषणा करते हैं। इसी भाँति देश के लाखों गाँवों के समुदाय स्थायी हैं। क्रान्तियाँ आई, राज्य बदले उतार और चढ़ाव आये, पर ये समुदाय विस्मृति के गर्त में नहीं ड्वे,आज भी अपना स्थायित्व बनाए हुए हैं। स्थायित्व, समुदाय की विशेषता है।

(3) सामुदायिक भावना (हम की भावना)-हम की भावना का होना समुदाय की एक प्रमुख विशेषता है। समुदाय के लोग एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहते हुए, एक जैसा जीवन यापन करते है। छोटे समुदाय में एक व्यक्ति का सुख-दुख सबका सुख-दुख हो जाता है, एकता की भावना जितनी सुदृढ़ होगी उतनी ही समुदाय में सामाजिक सुदृढ़ता होगी। एक ही सामाजिक, आर्थिक जीवन बिताने से लोग भावनात्मक रूप से एक कड़ी में बंध जाते हैं। गाँवों में देखें तो ज्ञात होगा कि वर्षा होने के बाद पूरा का पूरा गाँव एक ही दिन बुवाई कटाई करता है, और एक साथ ही होली और दीपावली मनाता है। यह गाँव हमारा है-यह सामुदायिक भावना है। समुदाय में हम की भावना सुदृढ़ होती है। प्रत्येक सदस्य में जीवन की विभिन्नता के होते हुए भी हम इस समुदाय के है, यह भावना दृढ़ होती है जो लोग समुदाय के सदस्य होते हुए भी समुदाय की भावना को महत्व नहीं देते या ठेस पहुँचाते हैं, समुदाय उन्हें हेय दृष्टि से देखता है। सामुदायिक भावना का महत्वपूर्ण तत्व हम की भावना है। यह भावना मोहल्ले वालों गाँव वाले और राष्ट्र के लोगों में देखी जा सकती है। हम भावना का मूल कारण एक ही स्थान पर रहने वाले लोगों के हितों की समानता है। सामुदायिक भावना में दूसरा महत्वपूर्ण तत्व योगदान की भावना है। समुदाय में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी एक स्थिति होती है। इस स्थिति से जुड़े कार्य होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्थिति के अनुसार कार्यों को करता है।

(4) आश्रितता की भावना- आश्रित की भावना भी समुदाय की एक विशेषता है। इसी भावना के तहत व्यक्ति स्वयं को समाज पर आश्रित समझता है। इसी भावना के आधार पर वह सामान्यतया समाज का विरोध नहीं करता है।

(5) विशिष्ट नाम-समुदाय का अपना कोई एक विशिष्ट नाम अवश्य होता है, जिसके द्वारा वह सम्बोधित अथवा जाना जाता है। इसका एक निश्चित स्वरूप होता है, यह मूर्त होता है, इसे हम देख सकते हैं। मूर्त स्वरूप होने के कारण इसका नाम भी होता है। गाँव व नगर में रहने वाले समूह का नाम गाँव या नगर पर पड़ जाता है। इन समुदायों में रहने वाले सदस्य भी अपने को व्यापक समुदाय के साथ जोड़ने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। मैं एक भारतीय हूँ, लखनवी है या इलाहाबादी हूँ आदि अभिव्यक्तियाँ समुदाय के विशिष्ट नाम को घोषित करती हैं।

(6) सामान्य जीवन-व्यक्तिगत रूप से समुदाय के प्रत्येक सदस्य अपने जीवन का प्रतिमान स्वयं निश्चित करते हैं, परन्तु सभी सदस्यों का जीवन लगभग एक जैसा होता है। एक ही भौगोलिक स्थान में रहने के कारण भी उनका आर्थिक एवं सामाजिक जीवन एक जैसा बन जाता है। गाँव सबके समाज में व्यक्तियों कंधों को संगठित तो नहीं करता, पर प्राय: पर्यावरण के कारण लोग खेती-बाड़ी करते हैं या इससे सम्बन्धित कोई अन्य धन्धा अपनाते हैं। शहरों में लोग व्यापार करते हैं या दफ्तरों, कारखानों या औद्योगिक क्षेत्रों में काम करते हैं। इस प्रकार साधारण जीवन की दृष्टि से समुदाय के जीवन में बड़ी समानता होती है। समाज एवं समुदाय में भेद-समुदाय एवं समाज एक दूसरे के पूरक हैं। ये दोनों ही व्यक्तियों के समूह है।

 इसके बावजूद दोनों में कुछ भिन्नताएँ दिखाई पड़ती है, जो निम्नवत है

(1) समाज में सम्बन्ध सहयोगी और असहयोगी दोनों होते हैं-समाज के सदस्यों में एकता की भावना होती है, पर उनके आपसी सम्बन्ध जहाँ प्रेम, सहयोग और सहानुभूतिपूर्ण होते हैं, वही प्रतियोगिता और संघर्षपूर्ण भी होते हैं। समाज के सदस्यों में तीव्र विजातीयता होती है। लोग एक दूसरे के विरोधी होते हैं, वहाँ समुदाय में सामान्य जीवन होने के कारण सजातीयता अधिक होती है।

(2) समाज का स्वरूप अमूर्त है, समुदाय का अमूर्त-समाज का स्वरूप इतना अमूर्त है कि इस देखा नहीं जा सकता, पर हम समुदाय के स्वरूप को देख सकते हैं क्योंकि यह मूर्त रूप में होता है। भारतीय समाज को जब हम बात करते हैं तो इसकी कल्पना मात्र ही की जाती है, पर जब लखनऊ शहर कि समुदाय की हम चर्चा करते हैं तो हमारे सामने स्पष्ट हो जाता है कि इस भू-भाग में रहने वाला समुदाय लखनऊ का है, इसके बाहर का नहीं।

(3) समाज के लिये निश्चित भू-भाग नहीं होता, समुदाय में निश्चित भू-भाग होता है के सामाजिक सम्बन्ध गोत्र होते हैं। सामान्यतया इसमें भौगोलिक क्षेत्र नहीं होता।

उदाहरण के लिये, भारतीय समाज का सदस्य अमेरिका में रहकर भी भारतीय समाज का सदस्य बना रहता है। इसलिये यदि समाज में भौगोलिक क्षेत्र जोड़ दिया जाए तो यह समुदाय बन जाता है और समुदाय में से भौगोलिक क्षेत्र निकाल दिया जाए तो यह समाज बन जाता है। अर्थात समुदाय में निश्चित भू-भाग अवश्य होता है।

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