सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

समाज शास्त्रीय अध्ययन की समाजमिति पद्धति का वर्णन

समाज शास्त्रीय अध्ययन की समाजमिति पद्धति का वर्णन 

समाजमिति का अर्थ - समाजमिति सामाजिक समूह तथा संस्थाओं के व्यवहार एवं पारस्परिक सम्बन्धे को नापने का एक विधिवत् पैमाना है। इस अर्थ में यह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा हम एक विशेष परिस्थिति में व्यक्तियों या समूह के वयवहारों को जान सकते है। श्री.एच० एच० जेनिंग्स के शब्दों में," समाजमिति किसी समूह-विशेष के सदस्यों के बीच किसी निश्चित समय पाए जाने वाले सम्बन्धों की सम्पूर्ण संरचना को सरल तथा रेखाचित्र में 44 प्रदर्शित करने का एक साधन है।" श्री ब्रांनफेन्द्रेनर के अनुसार, " समाजमिति समूह में व्यक्तियों के बीच स्वीकृति और अस्वीकृति की सीमा को नाप के द्वारा सामाजिक स्थिति,संरचना तथा प्रगति का ज्ञान प्राप्त करने, वर्णन करने तथा मूल्यांकन करने की पद्धति है।" श्री0 जे0 जी0 होम का कहना है कि समाजमिति एक समूह में व्यक्तियों के बीच आकर्प एवं विकर्षण के नाप के द्वारा सामाजिक स्वरूपों की खोज एवं विश्लेषण के लिए एक पद्धति के रूप में प्रयोग की जाती है।

समाजमिति की विशेषताएँ : 

(1) समाजमिति के द्वारा परिमाणत्मक तथा गुणात्मक दोनों ही प्रकार की घटनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

(2) इसमें अध्ययन-विषय की प्रकृति के अनुसार अध्ययनकर्ता कुछ निश्चित पैमानों को तय करता है और फिर उन पैमानों की सहायता से सामाजिक व्यवहारों तथा सम्बन्धों को नापने का प्रयत्न करता है।

(3) इसके द्वारा सामाजिक सम्बन्धों की विशिष्ट प्रकृति को नापा जा सकता है।

(4) यह एक ऐसा पैमाना है जिसके द्वारा सामूहिक स्वीकृति अथवा अस्वीकृति, प्रेम अथवा घृणा की सीमा को नापा जा सकता है।

 (5) इसके द्वारा सामाजिक तथा संस्थागत व्यवहारों तथा सम्बन्धों का प्रदर्शन सरल सारणी, रेखाचित्र अथवा सरल विन्दु-रेखा द्वारा किया जाता है।

(6) अतः स्पष्ट है कि जिस प्रकार शरीर के ताप के उतार-चढ़ाव को नापने के लिए हम थर्मामीटर का प्रयोग करते है उसी प्रकार किसी व्यक्ति या समूह के प्रति किसी अन्य व्यक्ति या समूह के भावनात्मक एवं सम्बन्ध 1-सूचक चढ़ाव-उतार को मापने के लिए समाजमिति का प्रयोग होता है।

(7) यह पद्धति अधि मान्य व्यवस्था (Preferential System) पर आधारित है अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों द्वारा प्रदर्शित प्राथमिकता या अधिमानों के द्वारा हम एक निष्कर्ष पर पहुँचते है। उदाहरणार्थ, यदि राम को श्याम की अपेक्षा एक मित्र के रूप में अधिक लोग प्राथमिकता देते है तो हम इस पैमाने के द्वारा यह निष्कर्ष निकाल सकते है कि राम सबसे अधिक लोकप्रिय मित्र है। समाजमिति की प्रविधि इस विधि में अध्ययन के उद्देश्य के अनुसार बहुत ही सरल ढग का एक पैमाना बनाया जाता है और उसी पैमाने को सम्बन्धित व्यक्तियों पर लागू किया जाता है और उनसे जो प्रत्युत्तर मिलता है उसी के आधार पर प्राथमिकताओं की गणना करके निष्कर्ष निकाला जाता है। उदाहरण के लिए श्री मोरेनो ने एक स्टेट ट्रेनिंग स्कूल की पाँच सौ छात्राओं में से प्रत्येक से यह कहा कि वह ऐसी पाँच छात्राओं को चुने, जिनको वह खेल में, घर मे या काम में अपने साथ रखना सबसे अधिक पसन्द करती हों, तथा पाँच ऐसी छात्राएँ चुने जिनको कि वह उपरोक्त सम्बन्धों में सम्मिलित करना कम-से-कम चाहती हों। श्री मोरेनो का कथन है कि इस अध्ययन से यह पता चला कि कौन सी छात्रा सर्वाधिक लोकप्रिय है और कौन सी कम। वास्तव में उपरोक्त कार्यों में किसी को सम्मिलित करने की इच्छा रखना उसके प्रति आकर्षण का प्रतीक है और नहीं चुनना उसके प्रति विकर्षण का। जितने अधिक लोग किसी को चुनते है उसकी लोकप्रियता उतनी ही अधिक होगी, और कम चुने जाने वालों की उतनी ही कम। वास्तव में इस पद्धति की प्रक्रिया में सर्वप्रथम उन आधारों एवं क्रियाओं को निश्चित करना पड़ता है, जिन पर किसी समूह (अध्ययन करने वाला)के सदस्य मिलकर किया करते है। इसके उपरांत उन्हें दूसरों पर सदस्यों के आकर्षण और विकर्षण की इस भाँति परीक्षा की जाती है कि कौन-कौन व्यक्ति किस-किसको, किस मात्रा में प्राथमिकता अथवा अस्वीकृत  है। इस प्रकार प्राप्त है निष्कर्षों की यदि सत्यता की परीक्षा करनी हो तो सम्बन्धित व्यक्तियों स साक्षात्कार भी किया जा सकता है क्योंकि आकार्षण और विकर्षण के बारे में सम्बन्धित व्यक्ति स प्रत्यक्ष रूप में ही पूछताछ हो सकती है। निष्कर्ष निकलने पर उन्हें और मेटिक्स सारणी (Matrix Table) प्रमुख हैं। उपरोक्त के अतिरिक्त निगमन पद्धति सांख्यिकी पद्धति ऐतिहासिक प्रयोगात्मक पद्धति एवं तुलनात्मक पद्धति का भी प्रयोग समाजशास्त्र में किया जाता है।

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam 1857 के महान विद्रोह (1857 के भारतीय विद्रोह, 1857 के महान विद्रोह, महान विद्रोह, भारतीय सेप्पी विद्रोह) को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। 1857 आंदोलन एक राष्ट्रीय उभर रहा था, जो भारतीयों के दिल में एक मजबूत आग्रह से प्रेरित था, जिससे देश मुक्त हो गया। यह ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय एकल घटना थी। यह भारत में सदी के पुराने ब्रिटिश शासन का नतीजा था। भारतीयों के पिछले विद्रोहों की तुलना में, 1857 का महान विद्रोह एक बड़ा आयाम था और यह समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ लगभग अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करता था। यह विद्रोह कंपनी के सिपाही द्वारा शुरू किया गया था। इसलिए इसे आमतौर पर 'सेप्पी विद्रोह' कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ सिपाही का विद्रोह नहीं था। इतिहासकारों ने महसूस किया है कि यह एक महान विद्रोह था और इसे सिर्फ एक सिपाही विद्रोह कहने के लिए अनुचित होगा। हमारे इतिहासकार अब इसे विभिन्न ना