सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

समाजशास्त्रीय अध्ययन की सामाजिक सर्वेक्षण

 समाजशास्त्रीय अध्ययन की सामाजिक सर्वेक्षण 

सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति इस पद्धति का सर्वप्रथम व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक प्रयोग श्री लीप्ले ने किया था। इसके अतिरिक्त सर्वश्री लिण्ड, एंजिल, राउण्ट्री, आर्थर बाऊले, चार्ल्स बूथ, जॉन ग्रॉण्ट आदि विद्वानी ने भी अपने अध्ययनों में इस पद्धति का प्रयोग किया है। सामाजिक सर्वेक्षण का अर्थ : - 'सर्वेक्षण' शब्द अंग्रेजी के 'Survey' शब्द का रूपान्तर है और यह Survey शब्द दो शब्दों Sor या Sur एवं Veeir से मिलकर बना है जिसका कि सम्मिलित अर्थ to oversee होता है। इस प्रकार 'सर्वेक्षण' का शाब्दिक अर्थ ह यानपूर्वक किसी वस्तु या घटना का निरीक्षण परीक्षण करना है। यदि यह निरीक्षण-परीक्षण सामाजिक जीवन या सामाजिक घटना से सम्बधित है तो उसे मोटे तौर पर सामाजिक सर्वेक्षण कहा जा सकता है। इस दृष्टिकोण से सामाजिक सर्वेक्षण निरीक्षण परीक्षण की वह वैज्ञानिक पद्धति है जोकि किसी सामाजिक समूह अथवा सामाजिक जीवन के किसी पक्ष या घटना के सम्बन्ध में वैज्ञानिक अध्ययन करती है। सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध किसी सामाजिक दशा, स्थिति अथवा परिस्थिति या समस्या से होता है। समाजशास्त्र के शब्दकोश के अनुसार," एक समुदाय के सम्पूर्ण जीवन या उसके किसी एक पहलू जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन के सम्बन्ध में, तथ्यों के बहुत-कुछ व्यवस्थित व विस्तृत संकलन व विश्लेषण को ही मोटे तौर पर सर्वेक्षण कहते है।" वेबस्टर (Webster) शब्दकोश के अनुसार, "वास्तविक जानकारी प्राप्त करने के लिए किया गया आलोचनात्मक निरीक्षण ही सामाजिक सर्वेक्षण कहलाता है।"
इस प्रकार सामाजिक सर्वेक्षण वास्तव मे सामाजिक जीवन के किसी पक्ष, विषय या समस्या के सम्बन्ध में वैज्ञानिक तरीके से निर्भरयोग्य तत्वों के संकलन व विश्लेषण करने की एक प्रणाली है। दूसरे शब्दों में, एक समुदाय के सम्पूर्ण जीवन या उसके किसी विशेष सम्बन्ध में वैज्ञानिक तौर पर तथ्यों के संकलन, विश्लेषण व निष्कर्षीकरण की वैज्ञानिक प्रणाली पक्ष के को ही सामाजिक सर्वेक्षण कहा जाता है। अतः स्पष्ट है, श्री मोर्स के ही शब्दों में," सामाजिक सर्वेक्षण को परिभाषित उद्देश्यों के हेतु किसी विशेष सामाजिक परिस्थिति अथवा समस्या अथवा जनसंख्या का वैज्ञानिक तथा व्यवस्थित रूप में विश्लेषण करने की केवल एक पद्धति है।"

सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति की प्रकृति व विशिष्ट लक्षण :- 

(1) सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध सामाजिक घटनाओं तथा सामाजिक समस्याओं से है। पर इस सम्बन्ध में एक उल्लेखनीय शर्त यह है कि सामाजिक सर्वेक्षण एक ही समय में सम्पूर्ण समाज की सभी घटनाओं या समस्याओं का अध्ययन नहीं करता है। इसका अध्ययन क्षेत्र एक समय में एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के अन्तर्गत सीमित रहता है। श्री हैरीसन के मतानुसार केवल वे ही घटनाएँ सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा अध्ययन की जा सकती है जो भौगोलिक रूप से सीमित हों।

(2) सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति की प्रकृति व लक्षण के सम्बन्ध में एक और उल्लेखनीय बात यह है कि सामाजिक सर्वेक्षण में कुछ अन्तर्निहित उद्देश्य होता है। ये उद्देश्य तथ्य-संकलन व वर्णन दोनों ही हो सकता है।

(3) सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति की प्रकृति व लक्षण के सम्बन्ध में काफी संख्यक विद्वानों का मत है कि सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध किसी तात्कालिक व्याधिकीय समस्या या अवस्था से होता है जैसे अपराध, वेश्यावृति निर्धनता आदि। सामाजिक समस्या को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने हुए सामाजिक सर्वेक्षण का दृष्टिकोण पक्षपांतरहित होता है और वह तथ्यों को संकलन या निरूपण में किसी भी वस्तु स्थिति, या समूह की तरफदारी नहीं करता है।

(4) सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति की प्रकृति व लक्षण के सम्बन्ध में अन्तिम उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक (applied) दोनों ही प्रकार के उद्देश्य निहित हो सकते है। सैद्धान्तिक इस अर्थ में कि सामाजिक सर्वेक्षण के द्वारा संकलित तथ्य एक घटना या समस्या के सम्बन्ध में हमें यथार्थ ज्ञान प्रदान करता है अथवा हमारी जानकारी को विस्तृत करता हैं पर साथ ही, अइस जानकारी के आधार पर समस्या के समाधान हेतु या समाज-सुधार की योजना बनाने के उद्देश्य की पूर्ति के हेतु चूँकि सामाजिक सर्वेक्षण को उपयोगी पाया जा सकता है, इस कारण सामाजिक सर्वेक्षण को व्यावहारिक भी माना जा सकता है।

सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति के प्रमुख चरण इस पद्धति के अन्तर्गत अ६ययन कार्य अनेक स्तरों से गुजरता है:

 (1) सबसे पहले विषय का चुनाव करना होता है और उस विषय के सम्बन्ध में कुछ प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त करनी होती है।

(2) इसके बाद उस विषय से सम्बन्धित वास्तविक तथ्यों को एकत्रित करने के लिए किन प्रविधियों तथा उपकरणों को उपयोग मे लाना है यह निश्चित करने की आवश्यकता होती है। इन प्रविधियों में निरीक्षण , साक्षात्कार (Interview),प्रश्नावली अनुसूची आदि महत्वपूर्ण है।

(3) इसके पश्चात् इन प्रविधियों व उपकरणों की सहायता से वास्तविक तथ्यों को एकत्रित किया जाता है।

 (4) इस प्रकार समस्त तथ्य एकत्रित हो जाने के बाद उनको आवश्यक वर्गों में बौटकर उनका वर्गीकरण और सारणीयन किया जाता है।

(5) इसके बाद तथ्यों का विश्लेषण व व्याख्या करते हुए सर्वेक्षण की रिर्पोट को तैयार करना होता है।

सर्वेक्षण पद्धति के गुण:- 

1) सर्वेक्षण पद्धति में अनुसन्धानकर्ता अपने अध्ययन-विषय के सीधे सम्पर्क में आता है। वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने में सफलता इसी बात पर निर्भर है कि अनुसन्धानकर्ता अपने अध्ययन-विषय से सम्बन्धित परिस्थितियों तथा व्यक्तियों से सीधा सम्पर्क स्थापित करने में कितना सफल होता है।

(2) इसमें मिथ्या-झुकाव और पक्षपात की सम्भावना कम होती है क्योंकि यह वास्तविक तथ्यों पर आधारित होता है।

(3)इस पद्धति के द्वारा सामूहिक जीवन की समस्याओं का वास्तविक अध्ययन सम्भव है।

(4)इस पद्धति की सहायता से सामाजिक घटनाओं को ज्यों-का त्यों प्रस्तुत किया जा सकता है।

(5) सर्वेक्षण पद्धति प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्ति का एक अत्यन्त निर्भरयोग्य साधन है, क्योंकि इसमें अनसन्धानकर्ता की कल्पना पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

 सर्वेक्षण पद्धति की सीमाएँ -

 (1) इस पद्धति के द्वारा केवल उन्ही घटनाओं का अध्ययन किया जा सकता है जिन्हें कि वास्तविक रूप में देखा जा सकता है।

(2) सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति में अधिक खर्च व अधि कि समय की आवश्यकता होती है।

(3) पूर्णरूप से निष्पक्ष रहकर तथ्यों का संकलन प्रायः सम्भव नहीं होता है। अत: इस पद्धति की सहायता से प्राप्त निष्कर्षों की विश्वसनीयता (reliability) पर सन्देह किया जा सकता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे