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सोमवार, 6 जुलाई 2020

समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति क्या है?

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 समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति क्या है?


समाजशास्त्र विज्ञान है या नहीं, इस संदर्भ में यह जानना अति आवश्यक है कि विज्ञान से हम क्या समझते हैं? वस्तुत: विज्ञान एक दृष्टिकोण है। किसी समस्या, परिस्थिति या तथ्य को सुव्यवस्थिः तरीके से समझने के प्रयास को हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण कह सकते हैं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि विज्ञान अपने-आप में एक विषय-वस्तु नहीं है, बल्कि समझने या विश्लेषण की एक विधि है। स्टुअर्ट चेज़, कार्ल पियर्सन आदि ने भी स्पष्ट रूप से यह कहा है कि विज्ञान का सम्बन्ध पद्धति से है, न कि विषय वस्तु से। बर्नार्ड ने विज्ञान को परिभाषित करते हुए छह प्रक्रियाओं का उल्लेख किया है-परीक्षा सत्यापन, परिभाषा, वर्गीकरण, संगठन तथा अभिविन्यास। इस प्रक्रिया में भविष्यवाणी करना और व्यावहारिक जीवन में उसका उपयोग सम्मिलित है। बर्नार्ड द्वारा दी गई इस प्रक्रिया से भी स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिकता का सम्बन्ध पद्धति से है, न कि विषय-वस्तु से।

लुंडबर्ग के अनुसार, वैज्ञानिक पद्धति को उपयोग में लाने के लिए निम्नलिखित चरणों से गुजरना होता है।

(i) समस्या का चुनाव (ii) अवलोकन करना (iii) विश्लेषण एवं व्याख्या (iv) जाँच या परीक्षण (v) उपकल्पना का निर्माण (vi) वर्गीकरण एवं निरूपण (vii) सामान्यीकरण (viii) भविष्यवाणी
अब हम उन तत्वों की चर्चा करेंगे,जो विज्ञान में पाये जाते हैं (I)अवलोकन-विज्ञान में अवलोकन का बहुत अधिक महत्व है। गुडे एवं हैट ने लिखा के विज्ञान अवलोकन से आरंभ होता है और पुन: उसकी पुष्टि के लिए उसे अवलोकन पर ही आना पड़ता है।
(ii) सत्यापन एवं वर्गीकरण-अवलोकन के माध्यम से प्राप्त तथ्यों की सत्यता की परीक्षा जाती है। अर्थात, प्राप्त तथ्यों या निष्कर्षों की प्रामणिकता का पता लगाया जाता है। विभिन्न तथ्यों को उनकी समान विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। (iii) सामान्यीकरण-इसके अंतर्गत तथ्यों के आधार पर किसी सामान्य नियम को जानने की चेष्टा की जाती है। कुछ इकाइयों के अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष को समग्र पर लागू करने की चेष्टा की जाती है।

लगाया (iv)भविष्यवाणी-वैज्ञानिक अध्ययन में भविष्य की घटनाओं का सफलतापूर्वक अनुमान जाता है। वैज्ञानिक अध्ययन में जो तथ्य हमारे हाथ लगते हैं, उनके आधार पर हम ये अनुमान लगाते हैं कि किन-किन स्थितियों में अमुक घटना घट सकती है। (v)वैज्ञानिक प्रवृत्ति-अध्ययनकर्ता की प्रवृत्ति भी वैज्ञानिक होनी चाहिए। कम-से कम समाज विज्ञान में यह तत्व महत्वपूर्ण हो जाता है। अधिकांश स्थितियों में यह देखा जाता है कि अध्ययनकर्ता

अपनी तटस्थता रख नहीं पाता और अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता रहता है। वैज्ञानिक शोध में अध्ययनकर्ता,

के व्यक्तित्व का बहुत अधिक महत्व है। जब हम एक ओर समाजशास्त्रीय अध्ययन और दूसरी ओर विज्ञान के आवश्यक तत्वों की

ओर ध्यान देते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है कि समाजशास्त्रीय अध्ययनों में इन तत्वों का समावेश है। हाँ, इतना अवश्य है कि सभी तत्वों का समावेश समान अंशों में न हो। इस संदर्भ में जॉनसन के विचारों का उल्लेख भी आवश्यक प्रतीत होता है। उसने चार बिंदुओं के अंतर्गत इस बात को सिद्ध करने का प्रयास किया है कि समाजशास्त्र एक विज्ञान है। ये चार विंदु निम्नलिखित है

(i) समाजशास्त्र अनुभवात्मक है, (i) समाजशास्त्र सिद्धांत बद्ध है, (फिल) समाजशास्त्र एक संचयी ज्ञान है, (iv) समाजशास्त्र मूल्य-निरपेक्ष है। निष्कर्ष- इस प्रकार,यह स्पष्ट होता है कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिकता है। यह सही है कि समाजशास्त्रीय अन्वेषण में सार्वभौम सिद्धांतों का निर्माण अब भी संभव नहीं है। यह एक कठिन कार्य है। परंतु इस सीमा के बावजूद समाजशास्त्र को विज्ञान की श्रेणी से नहीं हटाया जा सकती। निष्कर्ष के तौर पर हम यह कह सकते हैं कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिकता है, अत: यह एक विज्ञान है।

अपनी तटस्थता रख नहीं पाता और अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता रहता है। वैज्ञानिक शोध में अध्ययनकर्ता,के व्यक्तित्व का बहुत अधिक महत्व है। जब हम एक ओर समाजशास्त्रीय अध्ययन और दूसरी ओर विज्ञान के आवश्यक तत्वों की ओर ध्यान देते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है कि समाजशास्त्रीय अध्ययनों में इन तत्वों का समावेश है। हाँ, इतना अवश्य है कि सभी तत्वों का समावेश समान अंशों में न हो। इस संदर्भ में जॉनसन के विचारों का उल्लेख भी आवश्यक प्रतीत होता है। उसने चार बिंदुओं के अंतर्गत इस बात को सिद्ध करने का प्रयास किया है कि समाजशास्त्र एक विज्ञान है। ये चार विंदु निम्नलिखित है-

(i) समाजशास्त्र अनुभवात्मक है, (ii) समाजशास्त्र सिद्धांतबद्ध है, (iii) समाजशास्त्र एक संचयी ज्ञान है, (iv) समाजशास्त्र मूल्य-निरपेक्ष है। निष्कर्ष- इस प्रकार,यह स्पष्ट होता है कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिकता है। यह सही है कि समाजशास्त्रीय अन्वेषण में सार्वभौम सिद्धांतों का निर्माण अब भी संभव नहीं है। यह एक कठिन कार्य है। परंतु इस सीमा के बावजूद समाजशास्त्र को विज्ञान की श्रेणी से नहीं हटाया जा सकती। निष्कर्ष के तौर पर हम यह कह सकते हैं कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिकता है, अत: यह एक विज्ञान है।

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