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सोमवार, 6 जुलाई 2020

समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र की विवेचना

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 समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र की विवेचना 

समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र समाजशास्त्र की विषय वस्तु एवं विषय क्षेत्र आपस मैं पनिष्ठ रूप में सम्बद्ध है। इसके बावजूद इसके विषय क्षेत्र को निर्धारित करना एक दुष्कर कार्य है क्योंकि समाज सदैव परिवर्तनशील रहता है, जिसके कारण इसकी आवश्यकता, कार्य आदि भी परिवर्तनशील रहते हैं । अतः ऐसी स्थिति में समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र को निर्धारित नहीं किया जा सकता है। ईकल्स महोदय के अनुसार,
"समाजशास्त्र के अध्ययन की न तो कोई सीमा निर्धारित की जा सकती है और न ही इसके विषय क्षेत्र को स्पष्ट किया जा सकता है।" समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करते की लिए समाजशास्त्रियाँ में दो प्रकार की विचारधाराएँ दिखाई देती है-

(1) स्वरूपात्मक एवं (2) समन्वयात्मक स्वरूपात्मक विचारधारा- सर्वप्रथम जार्ज सिमेल ने इस विचारधारा को जन्म दिया। उनके पश्चात् मैक्स वेवर एवं टॉनीय भी इसी विचारधारा के समर्थक रहे। इस विचारधारा के अनुसार जिस प्रकार भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र आदि विज्ञान की स्वतंत्र शाखा है उसी प्रकार समाजशास्त्र भी एक स्वतंत्र एवं विशेष विज्ञान है। अतः, इसकी विषय-वस्तु स्पष्ट रूप से निश्चित करना आवश्यक है संपूर्ण समाज का अध्ययन करनेवाला शास्त्र यदि इसे बनाया गया तो परिणाम कोई ठोस नहीं होगा। समाजशास्त्र को एक विशिष्ट विज्ञान बनाने के लिए यह आवश्यक है कि इसके अंतर्गत हम सभी प्रकार के सम्बन्ध को नहीं रखें। सम्बन्धों के कुछ विशिष्ट स्वयं को ही हम समाजशास्त्र के अंतर्गत रख सकते हैं। इसी कारण इस वैचारिक परंपरा की स्वरूपवाद कहा जाता है। सिमेल के अनुसार स्वरूप एवं अंतर्वस्तु में अंतर होता है, और येदोनी एक दूसरे को प्रभावित भी नहीं करते। जैसे-एक बोतल में पानी है या शराब, इसका प्रभाव बोतल के स्वरूप पर नहीं पड़ता। समाजशास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों के इसी स्वरूप का अध्ययन होना चाहिए। सहयोग प्रतिस्पर्धा, श्रम-विभाजन आदि सामाजिक सम्बन्धों के मुख्य स्वरूप है। सामाजिक सम्बन्धो के ये स्थरूप जय विभिन अंतर्वस्तुओं जैसे धार्मिक दल, आर्थिक संघ आदिम पाए जाते है तयाना समाजशास्त्र की अध्ययन परिधि से बाहर रखना चाहिए। धार्मिक संगठन, राजनीतिक संगठन या आर्थिक संगठनों का अध्ययन तो अर्थशास्त्र या राजनीतिशास्त्र में होता ही है। वेबर के अनुसार, समाजशास्त्र एक विशिष्ट विज्ञान है, जिसमें सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। उसने आगे यह भी कहा है कि सामाजिक क्रियाएँ वे व्यवहार है जो अर्थपुर्ण होती है और अन्य व्यक्तियों के व्यवहार को या तो प्रभावित करती है या स्वयं प्रभावित होती हैं । सिमेल की तरह गोबर ने यह भी स्वीकार किया कि समाजशास्त्र के अंतर्गत आदि सभी प्रकार के सामाजिक सम्बनयों का अध्ययन होगा तो इसकी विषय-वस्तु और भी अस्पष्ट हो जाएगी इसी दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए वेबर ने यह माना कि समाजशास्त्र में केवल सामाजिक क्रिया का ही अध्ययन करना उचित होगा। आगे चलकर इसी विचारधारा को टॉनीय महोदय ने भी अपने मत में प्रतिपादित किया। परन्तु कालान्तर में यह विचारधारा लोकप्रिय नहीं हो पाई। स्वरूपात्मक विचारकों का यह तर्क कि स्वरूप एवं अंतर्थस्त बिल्कuल
भिन्न है और वे एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करते सर्वथा निराधार माना गया खास तौर पर सोरोकिन इसे स्वीकार नहीं किया है। उनके अनुसार सामाजिक प्रक्रिया के क्षेत्र में स्वरूप एवं अंतर्वस्तु एक-दूसोे, का प्रभावित करते हैं, और कभी-कभी इन दोनों में अंतर करना भी कठिन हो जाता है। इसके अतिरिक्त फिक्टर नामक समाजशास्त्र के स्वरूपात्मक विचारधारा को समाजशास्त्रीय से अधिक दार्शनिक विचारधारा बताया। समन्वयात्मक विचारधारा-समन्वयात्मक विचारधारा के समाजशास्त्रियों में सोरोकिन, दुखाम एवं हाय हाउस का नाम अग्रणी है। इन विचारों ने समाजशास्त्र को सामान्य विज्ञान बनान पर अधिक बल दिया। इस विचारधारा में दो पहलुओं पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाता है। पहला तो यह कि समाज की प्रकृति एवं ढाँचा एक जीवित प्राणी की तरह है। जिस प्रकार शरीर के भिन्न-भिन्न अंग आपस में जुड़े रहते हैं और एक अंग दूसरे अंग को प्रभावित करता है, उसी प्रकार समाज की विभिन्न इकाइयाँ भी आपस में जुड़ी रहती हैं। एक इकाई को समझने के लिए दूसरे को भी समझना आवश्यक है। समाज को इस प्रकार से समझने के लिए यह आवश्यक है कि समाजशास्त्र को एक सामान्य समाज विज्ञान माना जाए। दूसरा यह कि समाज विज्ञान की अन्य शाखाएं समाज के किसी एक ही पक्ष का अध्ययन करती है जैसे-राजनीतिशास्त्र या अर्थशास्त्र समाज के केवल राजनीतिक या आर्थिक पहलू का अध्ययन करता है। ऐसा कोई भी विज्ञान नहीं है जो सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू का अध्ययन करता हो। अत: समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान के रूप में ही स्वीकार करना होगा, जिससे समाज के सभी पक्ष एवं उनके बीच के सम्बन्ध को समझा जा सके। दुर्खीम के अनुसार, "समाजशास्त्र का प्रमुख कार्य सामाजिक तथ्यों का अध्ययन है। इस सन्दर्भ में दुखी महोदय का कहना है कि समाज का स्थान सर्वोपरि होता है। समाज की मान्यताएँ, मूल्य, शक्ति आदि व्यक्ति को सदैव प्रभावित करते हैं। दुखों का यह भी कहना है कि सामजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधित्व का विज्ञान है। इसी सामूहिक प्रतिनिधित्व या चेतना या नियम के रूप में सामाजिक सदस्यों के व्यवहारों का न केवल निर्धारण होता है बल्कि नियंत्रण भी किया जाता है। अतः, समाजशास्त्र का मख्य उद्देश्य इन्हीं सामूहिक प्रतिनिधित्वों या नियमों का अध्ययन करना है। यह दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से समाजशास्त्र को एक समन्वयात्मक रूप प्रदान करता है। दुखीम की भाँति हाब हॉउस भी समन्वयात्मक विचारधारा के प्रमुख समर्थक रहे हैं। हाब के अनुसार, समाज विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के प्रमुख सिद्धांतों के बीच पाए जानेवाले सामान्य तत्वों का पता लगाना ही समाजशास्त्र का प्रमुख उद्देश्य है। इससे विभिन्न विज्ञानों के बीच समन्वय भी स्थापित हो सकता है।

हॉब हाटस की ही भाँति सोरोकिन के विचार भी है। परन्तु सोरोकिन ने इन्हें और अधिक स्पष्ट ढंग से प्रस्तुत किया है। जो निम्नवत् है -

 इस तालिका से यह स्पष्ट होता है कि व्यवहार चाहे आर्थिक होया राजनीतिक, कुछ सामान्य तत्व जैसे abc सभी में वर्तमान है। सोरोकिन के अनुसार, इन्हीं सामान्य तत्वों की खोज करना समाजशास्त्र का मुख्य उद्देश्य है। निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र में दोनों ही दृष्टिकोण हैं और दोनों हो महत्वपूर्ण हैं। समाजशास्त्र के विद्यार्थी के लिए मैक्स वेयर को समझना जितना आवश्यक है, उतना हीदीम को समझना भी। हम समाजशास्त्रीय अध्ययन में सामाजिक घटनाओं के विशिष्ट और सामान्य पक्षी पर समान रूप से बल देते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र एक विशिष्ट विज्ञान के साथ-साथ एक सामान्य विज्ञान भी है। जिन्सबर्ग ने ठीक ही कहा है कि समाजशास्त्र विशिष्ट एवं सामान्य विज्ञान का मिलन है। विशिष्ट विज्ञान के रूप में यह सामान्य नियमों की और सामान्य विज्ञान के रूप में विशिष्ट नियमों की खोज करता है।

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