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सोमवार, 6 जुलाई 2020

समाजशास्त्र का इतिहास, अर्थशास्त्र एवं मनोविज्ञान से क्या सम्बन्ध है?

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 समाजशास्त्र का इतिहास, अर्थशास्त्र एवं मनोविज्ञान से क्या सम्बन्ध है? 

समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र- सम्बन्ध-समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। इनके मध्य सम्बन्धों की जानकारी इस बात से हो जाती है कि यदि हम विभिन्न उत्पादन, वितरण या विनिमय की प्रक्रियाओं को गहराई से जाँचते हैं तो इनके पीछे सामाजिक सम्बन्धों रीति-रिवाजों और परंपराओं का प्रभाव पाते हैं। उत्पादन की गति कहीं तेज होती है, तो परंपरागत समाजों में यह गति धीमी होती है क्योंकि वहाँ के लोग भाग्यवादी होते हैं। सारांश यह है कि आर्थिक और सामाजिक सम्बन्ध आपस में जुड़े हुए हैं, और समय-समय पर एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं। इनमें एकतरफा सम्बन्ध नहीं होता। दूसरी ओर, यह भी सत्य है कि प्रत्येक सामाजिक सम्बन्धों की जड़ में आर्थिक सम्बन्ध होते हैं। परिवार, जाति, वर्ग आदि में आर्थिक हितों के आधार पर सहयोग एवं संघर्ष पाया जाता है। कुछ ऐसे सामान्य विषय हैं जिनका दोनों में ही अध्ययन होता है जैसे-आर्थिक प्रगति,बेरोजगारी, उद्योगीकरण, श्रम-कल्याण, जनसंख्या आदि। वर्तमान युग मशीनीकरण का है,जो भिन्न-भिन्न उद्योगों में देखा जा सकता है। इसका प्रभाव समाज की विभिन्न संस्थाओं पर गहरे रूप से पड़ा है। अन्तर-समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र के मध्य धन्य सम्बन्ध होते हुए भी कतिपय विषम्ताएं भी दिखाई पड़ती हैं जिनका विवरण निम्नलिखित है

(1) समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है, जबकि अर्थशास्त्र विशिष्ट विज्ञान है।

(2) समाजशास्त्र के अंतर्गत मनुष्य के सामाजिक जीवन के लगभग सभी पक्षों का अध्ययन होता है. जबकि अर्थशास्त्र सामाजिक जीवन के केवल आर्थिक पहलू का अध्ययन करता है।

(3)अर्थशास्त्र के अंतर्गत किसी घटना की व्याख्या के लिए आर्थिक कारणों की खोज की जाती है जबकि समाजशास्त्र में सामाजिक, आथिक एव राजनीतिक कारणों के योगदानों की चर्चा हो। सकती है।

समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र- समाजशास्त्र एवं राजनीतिशास्त्र के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत कानन, राज्य, संप्रभुता एवं प्रशासन आदि की अध्ययन किया जाता है। परन्तु किसी भी देश की राजनीतिक प्रक्रिया वहाँ को सामाजिक परिस्थितियों एवं संस्कृति से जुड़ी होती है अत: समाजशास्त्र का राजनीतिशास्त्र से गहरा सम्बन्ध है। मैक्स वेबर एवं परेटो (Pareto) ने कुछ राजनीतिक प्रक्रियाओं का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया है, जिससे इनके बीच गहरा सम्बन्ध होने का आभास मिलता है।

राजनीतिक व्यवस्था काफी हद तक हमारी सामाजिक व्यवस्था की देन होती है। विश्व के विभिन्न देशों में प्रजातंत्र सफल नहीं हो पाया है। पड़ोसी देशों में भी तानाशाही देखने को मिलती है, परंतु भारत के मूल्य-प्रतिमान आदि कुछ ऐसे रहे हैं जो प्रजातांत्रिक व्यवस्था के पक्ष में अधिक जाते हैं।

आधुनिक भारत की राजनीतिक प्रक्रियाएँ काफी हद तक सामाजिक परिस्थितियों से संचालित है। मतदान-व्यवहार में जाति का योगदान तथा अन्य सामाजिक कारणों का योगदान-जैसे क्षेत्रीयता, सामाजिक पिछड़ापन आदि-यह सिद्ध करते हैं कि राजनीतिक प्रक्रियाएँ सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है।

अन्तर-इनके मुख्य कतिपय अन्तर भी दिखाई पड़ते हैं, जो निम्नलिखित हैं

(1) समाजशास्त्र में अध्ययन की इकाई राजनीतिशास्त्र की तुलना में छोटी होती है, जैसे-समाज, संस्कृति, परिवार, समूह आदि। लेकिन, राजनीतिशास्त्र में अध्ययन की इकाई बड़ी हो सकती है जैसे-राज्य, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध आदि।

(2) राजनीतिशास्त्र हमारे सामाजिक जीवन के केवल राजनीतिक पक्ष का अध्ययन करता है, जबकि समाजशास्त्र सामाजिक जीवन की संपूर्णता का।

(3) समाज के सभी प्रकार के संघर्ष एवं सहयोग की प्रक्रिया का अध्ययन समाजशास्त्र में होता है, जबकि राजनीतिशास्त्र में उन संघर्षी या सहयोगात्मक प्रक्रियाओं का अध्ययन होता है जिनका सम्बन्ध राज्य या उसके संगठनों से होता है।

समाजशास्त्र एवं मानवशास्त्र- समाजशास्त्र एवं मानवशास्त्र कोताही एकदूसरेके पूरक हैं। समाजशास्त्र के अन्तर्गत जो भी अध्ययन किया जाता है, वह मानव से ही सम्बन्धित होता है। अतः दोनों आपस में सधन भाव से सम्बद्ध है। हर्सकोविज ने कहा है कि मानवशास्त्र मनुष्य एवं उसकी कृतियों का अध्ययन है। इन कृतियाँ में मुख्यत: संस्कृति ही आती है पर प्रथाएं, परंपराएँ आदि भी सम्मिलित की जाती है। समानताएं-

(1) मानवशास्त्री अपने अध्ययन में समाजशास्त्र के अंतर्गत दी गई अवधारणाओं एवं सिद्धांतों का उपयोग करते हैं।

(2) सामाजिक मानवशास्त्र मुख्य रूप से छोटे छोटे समुदायों का अध्ययन करते हैं; जैसे-आदिवासी समुदाय में पाई जानेवाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। इन अध्ययनों की प्रक्रिया में जिन अवधारणाओं का विकास किया गया है उनका उपयोग समाजशास्त्रियों ने भी आधुनिक और जटिल समाजों के अध्ययन में किया है।

(3) पद्धति के आधार पर भी सामाजिक मानव शास्त्र एवं समाजशास्त्र में समानता है।

(4) सामाजिक मानवशास्त्र, जो कि मानवशास्त्र की एक शाखा है, के कुछ विचारकों (जैसे-एल०एच० मार्गन, दुर्थीम आदि) के योगदान समाजशास्त्र के लिए भी समान रूप से उपयोगी सिद्ध हुए हैं। भारत में प्रोफेसर एम०एन० श्रीनिवास प्रोफेसर एस०सी०दुबे, प्रोफेसर एन०के० बोस, प्रोफेसर देवी आदि विद्वानों के विभिन्न अध्ययन दोनों ही विषयों में एकसमान महत्वपूर्ण हैं।

(5) मानवशास्त्र में मनुष्यों द्वारा निर्मित संस्कृति, सभ्यता आदि का अध्ययन किया जाता है। समाजशास्त्र में भी इसका अध्ययन किया जाता है।

(6) इन दोनों में ही मानव समूहों के अंत:सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। इस विचार की पुष्टि हॉवेल ने भी की है। अन्तर- उपरोक्त समानताओं के अतिरिक्त इनके मध्य कुछ अंतर भी पाये जाते हैं, जो

निम्नलिखित है-

1) मानवशास्त्र के अंतर्गत मुख्य रूप से छोटी इकाईवाले समुदायों का अध्ययन किया गया है, जबकि समाजशास्त्र के अंतर्गत आधुनिक और जटिल समाजों पर अधिक बल दिया गया है। इसके बावजूद यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि जटिल समाजों पर भी मानवशास्त्रीय अध्ययन हुए हैं। लेकिन, तुलना करने पर यह प्रतीत होता है कि मानव शास्त्रियों के बीच आदिवासियों आदि का अध्ययन अधिक प्रचलित रहा है।

2) आदिवासी समाज में धर्म, ज्यादा. राज्यपाल, नातेदारी व्यवस्था आदि मानवशास्त्रिय के विचार के लिए मुख्य केंद्र बिंदु हैं। इसके विपरीत, समाजशास्त्रियों ने मुख्य रूप से सामाजिक अतःक्रिया एंव उससे उत्पन्न सामाजिक सम्बन्धों आदि पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। इसके अतिरिक्त, समा एवं विभिन्न संस्थाओं को भी समाजशास्त्र ने अपना अध्यन-क्षेत्र बनाया है।

(3) समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में पद्धति के स्तर पर समानता दिखाई पड़ता है। यह पहस्पष्टकर देना उचित होगा कि मानवशास्त्र में सहभागी अवलोकन का उपयोग अधिकहुआहाजबांक समाजशास्त्र में तथ्य संकलित करने के लिए अनुसूचित एवं प्रश्नावली का अधिक उपयोग होता है। समाजशास्त्र एवं इतिहास- समाजशास्त्र एवं इतिहास के मध्य इतनी नजदीकिया है कि दोनों को पृथक-पृथक करके अध्ययन करना एक दुष्कर कार्य होगा। पिछले लगभग 25-30 वर्षों से विद्वानों में इस प्रश्न पर जोरदार चर्चाएं हुई है। अब ऐसा समझा जा रहा है कि इतिहास केवल विभिन्न साम्राज्यों के उत्थान एव पतन की कहानी ही नहीं है बल्कि उन सामाजिक स्थितियों की विवेचना भी है जो इतिहास के विभिन्न चरणों में सक्रिय होती रही है। आधुनिक इतिहासकार एवं सामाजिक इतिहास की चर्चा अधिक करते हा इरफान हबीय, आर०एस० शर्मा आदि इतिहासकारों के योगदान इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इरफान हबीब की प्रसिद्ध पुस्तक द एग्रेरियन सिस्टम ऑव मुगल इंडिया केवल इतिहास के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि समाजशास्त्रियों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। उसी प्रकार, प्रोफेसर आर०एस० शर्मा ने प्राचीन भारत की सामाजिक व्यवस्था का जो चित्रण प्रस्तुत किया है वह समाजशास्त्रियों के लिए भी अतिशय उपादेय है।

मार्क्स का समाजशास्त्रीय सिद्धांत मुख्य रूप से इतिहास की व्याख्या पर आधृत है। ऑर्नल्ड ऑयनबी की प्रसिद्ध कृति स्टडी ऑव हिस्ट्री समाजशास्त्र के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है। इस प्रकार उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इतिहास एवं समाजशास्त्र में अत्यन्त निकटतम सम्बन्ध है। अन्तर- इतिहास एवं समाजशास्त्र के मध्य निकटतम सम्बन्धों के बावजूद इनमें कतिपय क्षमता भी हैं, जो निम्नलिखित है -

(1) इतिहास में वर्णित घटनाओं का पुन:परीक्षण संभव नहीं है क्योंकि सामान्यत: ये एक बार घटती हैं। अत:, इनके निष्क्षों का भी पुनःपरीक्षण कठिन है। जबकि समाजशास्त्र में निष्कर्षों का परीक्षण एवं पुनः परीक्षण संभव है।

(2) समाजशास्त्र और इतिहास की अध्ययन-पद्धति के स्तर भी भिन्न है। समाजशास्त्रीय विश्लेषण एवं निष्कर्ष में वैज्ञानिकता लाने के लिए अनेक विधियों का उपयोग किया जाता है,जो इतिहास में नहीं होता।

(3) इतिहास का सम्बन्ध मुख्यतः भूतकाल से है, जबकि समाजशास्त्र का वर्तमान काल से। (4) इतिहास मूल रूप से वर्णनात्मक है, जबकि समाजशास्त्र विश्लेषणात्मक।

समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान अन्य सामाजिक विज्ञानों की भांति समाजशास्त्र का मनोविज्ञान के साथ भी घनिष्ठ सम्बन्य है,सामाजिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की ही एक शाखा है, ने तो दोनों विज्ञानों को और नजदीकला दिया है। मनोवैज्ञानिक अध्ययन में व्यक्ति अथवा उसका व्यक्तित्व केंद्रीय विषय रहता है। इस तरह, मनोविज्ञान में व्यक्ति केंद्रबिंदु होता है, न कि उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ। व्यक्ति की मानसिक स्थितियाँ जैसे संवेग, प्रेरक, प्रत्यक्षीकरण सीखना आदि मनोविज्ञान की विषय-वस्त हैं। इसके विपरीत,समाजशास्त्र में सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन होता है। समूह, संस्थाएँ, रोतियाँ, सामाजिक संरचना और उसमें परिवर्तन आदि समाजशास्त्र की मुख्य विषय-वस्तु है। सामाजिक मनोविज्ञान के अंतर्गत जिन प्रक्रियाओं का अध्ययन होता है उनमें भीड़-व्यवहार, जनमत प्रचार आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार के अध्ययनों से प्राप्त निष्कर्ष समाजशास्त्र के लिए उपयोगी हो सकते हैं। दोनों विषयों में अध्ययन पद्धति के स्तर पर समानता देखने को मिलती है। अन्तर-इनमें निष्ठा एवं समानता के साथ ही कतिपय क्षमता भी पायी जाती है, जो निम्नलिखित है-

(1)समाजशास्त्र के अंतर्गत विभिन्न सामाजिक प्रक्रियाओं का जो अध्ययन होता है उसमें संतों का समूहों पर पड़नेवाले प्रभाव को भी देखा जाता है, जबकि मनोविज्ञान में समाहों के नाम प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जो व्यक्ति पर प्रभाव डालता है।

(2) व्यक्ति की मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के कारण मनोविज्ञान के अध्ययन की एक सीमा है, जबकि समाजशास्त्र के अध्ययन की सीमा निर्धारित करना कठिन है।

(3) मनोविज्ञान के अंतर्गत व्यक्ति की मानसिक विशेषता एवं व्यक्तिगत व्यवहार का अध्ययन होता है, जबकि समाजशास्त्र में समूह, संस्था, सामाजिक परिवर्तन आदि का अध्ययन होता है

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