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सोमवार, 6 जुलाई 2020

समाजशास्त्र और समाज दर्शन का संक्षिप्त वर्णन

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 समाजशास्त्र और समाज दर्शन का संक्षिप्त वर्णन 

समाजशास्त्र और समाज दर्शन दोनों सम्बन्ध समाज के अध्ययन से है। लेकिन आधुनिक युग में आते-आते समाज दर्शन का क्षेत्र समाजशास्त्र से पर्याप्त रूप से पृथक् हो गया। समाज शास्त्र ने समाज दार्शनिक को एक राष्ट्र या समाज का निरीक्षक व द्रष्टा माना है। समाजशास्त्रियों का प्रयास रहा है कि समाज दर्शन के अन्तर्गत वैज्ञानिकता का समावेश किया जा सके। सिम्मेल का मत है कि समाज शास्त्र ने समाज दर्शन के मुख्य विषयों को निम्नलिखित तीन प्रकर से अपना लिया है। सामान्य समाज विज्ञान समाज के विविध विशिष्ट विज्ञानों- अर्थशास्त्र मनोविज्ञान राजनीतिशास्त्र आदि का समन्वित अध्ययन करता है और इस प्रकार विशिष्ट विज्ञानों के समन्वय के द्वारा समाज आकारिक दर्शन का काम करता है। आकारिक समाजविज्ञान सामूहिक जीवन की सामान्य विशेषताओं का विश्लेषण करके समाज दर्शन के सामान्य विश्लेषणों को अपना लेता है। दार्शनिक समाज विज्ञान को सामाजिक विज्ञान की तत्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा बताता है।

विचारकों का मत है कि समाजशास्त्र द्वारा उपरोक्त लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करने के कारण समाज दर्शन का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है परन्तु ऐसा कथन युक्तिसंगत नहीं है। वास्तव में समाजशास्त्र के इस प्रकार विकसित होने से समाज दर्शन को अपने विश्लेषण में विशेष लाभ हुआ। समाजशास्त्र और समाज दर्शन के अध्ययन क्षेत्र अलग-अलग है, दोनो को विधियाँ अलग-अलग है और दोने के लक्ष्य भी अलग-अलग हैं। समाज शास्त्र मुख्य रूप से 'समाज क्या है' की विवेचना करता है, जबकि समाज दर्शन की विवेचना का विषय है, समाज को क्या होना चाहिए'। समाजशास्त्र सामाजिक या सामाजिक जीवन के विभित्र घटकों के सह सम्बन्ध का अध्ययन करता है, जबकि समाज दर्शन इनके आदर्श रूपों की विवेचना करता है। समाज शास्त्र की विधि प्रत्यक्षात्मक है, जबकि समाज दर्शन की विधि प्रातिभा तथा बुद्धिवादी है। समाजशास्त्र को हम व्यावहारिक या यथार्थमूलक विज्ञान कह सकते हैं और समाज दर्शन एक आदर्शमूलक या नियामक विज्ञान है। उसका विषय सामाजिक मूल्यों व आदर्शों की स्थापना करना है। समाजशास्त्र में समाज दर्शन के अस्तित्व को उसी प्रकार किसी प्रकार का संकट नही है, जिस प्रकार विज्ञान के आविर्भाव से दर्शन को कोई खतरा नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का अन्तर विज्ञान और दर्शन के अन्तर की ही तरह है। यह तथ्य यहाँ पर उल्लेखनीय है कि अपने लक्ष्यों की सिद्धि में समाज दर्शन को समाजशास्त्र से कुछ सहायता अवश्य प्राप्त होता है, क्योंकि आदर्शों की स्थपना में तथ्यों का ज्ञान पर्याप्त भूमिका अदा करता है। ठीक उसी प्रकार इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि समाज दर्शन, समाज शास्त्र के विकास में भी सहायक होता है, क्योंकि बिना आदर्शों की स्थापना के तथ्यों की विवेचना का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। दर्शन के अपेक्षित रूप में कम है। समाज दर्शन केवल राज्य के बारे मे ही नहीं अपित परिवार, विवाह, सदाचार, धर्म शिक्षा आदि की भी विवेचना करता है।

 इस संदर्भ में राजनीति की अपेक्षा समाज दर्शन का क्षेत्र अधिक व्यापक है। परन्तु कुछ विचारकों का तर्क है कि जिन संस्थाओं और संगठनों का समाज दर्शन से सम्बन्ध है, वे सभी राज्य से ही सम्बन्धित होते है, और इस प्रकार समाज दर्शन और राजनीति दर्शन का क्षेत्र एक ही है। वैसे समाज और राज्य का एकीकरण उचित नहीं है। समाज पर राज्य के प्रभाव या उसके नियंत्रण से इन्कार नहीं किया जा सकता है, परन्तु राज्य का अस्तित्व समाज के लिये है कि समाज का अस्तित्व राज्य के लिये है। इसी प्रसंग में साम्यवादियों की यह धारण उल्लेखनीय है कि ऐसा समाज असम्भव है जिसमें राज्य का लोप हो जाय। वे सर्वोदयी विचारकों की तरह समाज को राज्य से बडी संस्था मानते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि समाज दर्शन का क्षेत्र राजनीति शास्त्र के क्षेत्र से अधिक व्यापक और विस्तृत है। वैसे उपरोक्त दोनों विज्ञानों के घनिष्ठ सम्बन्ध से इन्कार नहीं किया जा सकता। प्लेटो,अरस्तु, रूसो, लॉक तथा लॉस्की आदि के सिद्धांतों से इस विचारधारा की पुष्टि होती है।

 वस्तुत: कई ऐसे विचारक हुये है जिन्होंने राजनीति दर्शन और समाज दर्शन की क्षेत्रों में अपना अप्रतिम योगदान दिया है जिनमें प्लेटो, अरस्तु, लॉक, हीगेल, मार्क्स और गांधी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यदि राजनीति और समाज दर्शन को अलग कर दिया जाय तो राजनीतिशास्त्र समाज दर्शन का ही व्यापक और व्यावहारिक रूप है। इतना घनिष्ट सम्बन्ध होते हुये भी उपरोक्त विज्ञानों में पर्याप्त भित्रता भी है। जहाँ समाज दर्शन एक नियामक विज्ञान है, वहीं पर राजनीति शास्त्र एक विधायक विज्ञान है। समाजदर्शन विधि द्वारा सामाजिक समस्याओं की विवेचना करता है परन्तु राजनीति शास्त्र वैज्ञानिक विधि द्वारा राजनीतिक सिद्धान्तों की स्थापना करता है। वैसे अधिकांश विचारकों ने इन दोनों को एक दूसरे का पूरक माना है क्योंकि राजनीति शास्त्र के बिना समाज दर्शन अपूर्ण,एकांगी और अधरा है, तथा समाज दर्शन के बिना राजनीति शास्त्र का कोई मूल्य और उपयोग नहीं रह जायेगा। एक सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्ति किसी न किसी व्यवस्था,शासन, नेता, नियम, कानन और न्याय की अपेक्षा करता है ठीक इसी प्रकार राजनीतिक व्यवस्था और उपरोक्त अवधारणों के समुचित और सुसंगत मूल्यांकन के लिए समाज दर्शन द्वारा स्थापित आदर्शो, मूल्यों और सिद्धान्तों की आवश्यकता पडती है। इस प्रकार निष्पक्ष रूप से देखें तो उपरोक्त दोनों विज्ञान एक दसरे के पूरक है।

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