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बुधवार, 8 जुलाई 2020

सामाजिक विभेदीकरण की परिभाषा एवं विशेषताए

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सामाजिक विभेदीकरण की परिभाषा एवं विशेषताए 


 सामाजिक विभेदीकरण की परिभाषा - लम्ले (Lamley) के अनुसार, 'विभेदीकरण से हमारा तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा व्यक्ति भिन्नताओं का पोषण करता है, जिन्हें एक साथ रखने पर आर्केस्ट्रा के विभिन्न वादकों की तरह एक पूर्ण तथा समन्वययुक्त सम्पूर्ण संगीत की रचना होती है।"

न्यूमेयर (Newmeyer) के अनुसार, "सामाजिक विभेदीकरण वह प्रक्रिया है जो अनेक जैवकीय, आनुवंशिक एवं भौतिक विशेषताओं जैसे- आयु, लिंग, प्रजाति, वंश, व्यवसाय सांस्कृतिक पृष्ठिभूमि सामाजिक स्थिति, उपलब्धियों, समूह की रचना तथा सामाजिक सम्बन्ध के आधार पर व्यक्तियों और समूहों के बीच विभिन्नता को स्पष्ट करती है। इस प्रकार सामाजिक विभिन्नतायें विभेदीकरण की प्रक्रिया का आधार भी है और उपज भी है।"

जार्ज लुण्डबर्ग (George Lundberg) के अनुसार, "सामाजिक विभेदीकरण वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत सामूहिक रूप से इस तथ्य को मान्यता दी जाती है अथवा ऐसा मान लिया जाता है कि विभिन्न व्यक्तियों, श्रेणियों अथवा समूहों की विशेषताएं एक-दूसरे से भिन्न होती है।"

उपरोक्त परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकलता है कि जब एक समाज में व्यक्तियों तथा समूहों के बीच आयु, लिंग, सम्पत्ति, धर्म, प्रजाति, शिक्षा, संस्कृति अथवा व्यवसाय के आधार पर विभेद तो किया जाता हो किन्तु इन आधारों पर उनके बीच किसी भी प्रकार का संस्थाग स्तरीकरण न हो तो विभाजन की इस प्रक्रिया को हम सामाजिक विभेदीकरण कहते हैं, अथाट समाजिक विभेदीकरण समाज का एक समतल विभाजन है, न कि उदग्र विभाजन।

सामाजिक विभेदीकरण की विशेषतायें :

(1) एक तटस्थ प्रक्रिया (Natural Process)-सामाजिक विभेदीकरण एक सो प्रक्रिया है जिसके द्वारा पूर्ण समाज विभिन्न आधारों पर अनेक छोटे-छोटे समूहों में विभाजित हो. जाता है। जैसे किसी समुदाय के लोगों के बीच आयु अथवा लिंग के आधार पर सरलतापूर्वक विभेदीकरण किया जा सकता है किन्तु यह प्रक्रिया यह नहीं घतलाती कि लिंग के आधार पर स्त्रियों व पुरुषों में से कौन दूसरे से उच्च है अथवा आयु के आधार पर युवां प्रीकृ तथा वृद्ध व्यक्तिक्यों में किसे अधिक महत्व दिया जाय।

(2) एक सर्वव्यापी प्रक्रिया (An Universal Process)- ऐसा कोई भी समय अथवा समाज देखने को नहीं मिलता जिसमें किसी न किसी आधार पर सामाजिक विभेदीकरण को प्रक्रिया न पायी जाती हो। विभेदीकरण का इतिहास उनता ही प्राचीन है जितना कि मानव सभ्यता का सभ्यता के प्रारम्भिक स्तर पर आयु तथा लिंग सामाजिक विभेदीकरण के मुख्य आध र ये जयकि आज प्रजाति, शिक्षा तथा सम्पत्ति की भिन्नता के आधार पर भी सामाजिक विभेदीकरण एक स्पष्ट रूप देखने को मिलता है इसलिये सामाजिक विभेदीकरण को एक म्व्यापी प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जाता है।

(3) स्वाभाविक प्रक्रिया (Natural Process)-विभेदीकरण की प्रक्रिया इस अर्य में स्वाभाविक है कि इसके अन्तर्गत न तो योजनाबद्ध रूप से विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से पृथक किया जा सकता है और न यह किसी प्रकार की सामाजिक नीति पर आधारित होती है। सके अन्तर्गत विभिन्न समूहों के बीच जिन समानता को स्पष्ट किया जाता है वह बहुत कुछ मुतिक और स्वाभाविक होती है।

(4) अवैयक्तिक प्रक्रिया (Impersonal Process)- सामाजिक विभेदीकरण की प्रक्रिया कभी भी वैयक्तिक नहीं होती है। उदाहरणार्थ, संघर्ष एक वैमक्तिक, प्रक्रिया है जिसमें
संपर्क करने वाले दोनों पक्ष एक-दूसरे के व्यवहारों तथा साधों की अधिक से अधिक जानकारी करके उन्हें हानि पहुंचाने का प्रयास करते हैं। जबकि दूसरी ओर विभेदीकरण इस अर्थ में अवैयक्तिक है कि इसके अन्तर्गत हम किसी व्यक्ति विशेष के प्रति ईर्ष्या द्वेप या विरोध प्रदर्शित नहीं करते वरन उन सभी को अपने से कुछ भिन्न समझते हैं जिनकी जैवकीय सामाजिक और आर्थिक विशेषतायें हमसे भिन्न होती हैं। जैसे - विभेदीकरण की प्रक्रिया यह तो स्पष्ट करती है कि शवेत प्रजाति के सभी लोग नीग्रो प्रजाति के लोगों को अपने से निम्न समझें अथवा उनसे संपर्ष करें।

(5) वैयक्तिक चेतना का समावेश (Individual Conciousness)- सामाजिक विभेदीकरण की प्रक्रिया ऐसी है जिसके प्रति सभी व्यक्ति चेतन अधवा जागरूक रहते हैं। इसका अर्थ है कि विभिन्न प्रकार को समानता के लिए व्यक्तियों को कोई निर्देश न मिलने पर भी सभी व्यक्ति यह जानते है कि वे किस श्रेणी में आते हैं। तथा किस प्रकार अन्य लोगों से भिन्न है। क्ति मानसिक रूप से इस तथ्य के प्रति सचेत रहते है कि वे उन लोगों से भिन्न है जिनकी आयु, लिंग, शिक्षा, प्रजाति अथवा वेश-भूषा उससे भिन्न है।

(6) सामाजिक मूल्यों का समावेश (Socially Oriented) सामाजिक विभेदीकरण की एक विशेषता यह है कि इसके प्रमुख आधारों का निर्धारण सामाजिक मूल्यों के अनुसार होता जैसे - आदिम समाजों में आयु और लिंग का अधिक महत्व होने के कारण यहाँ इन्हें सामाजिक विभेदीकरण के सबसे अधिक महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जाता है, जबकि पशिचमी समाजों के सामाजिक मूल्यों में आयु और लिंग का अधिक महत्व न होने के कारण नीति शिक्षा, धर्म, सामाजिक विभेदीकरण के मुख्य आधार है। जो समाज भौतिक रूप से काफी आगे बढ़ गये हैं यह धन सम्पत्ति के आधार पर एक स्वाभाषिक विभेदीकरण विकसित है।

(7) मूर्त तथा बाह्य आधार (Concrete and External Bases)- सामाजिक दीकरण का निर्धारण केवल उन्हीं आधारों पर हो सकता है जो मूर्ठ, मापनी तथा बाह्य हो। जैसे - आयु, लिंग, प्रजाति, धर्म, शिक्षा, सम्पत्ति तथा सांस्कृतिक व्यवहार ऐसी विशेषताये हैं जिन्हें स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जबकि दूसरी और व्यक्तित्व सम्बन्धी भिन्नतायें, योग्यता स्वभाव, शक्ति एवं ज्ञान ऐसे आधार हैं जो बाह्य हैं और न ही इनकी कोई सर्वसम्मत माप की जा सकती है। ये ऐसे आधार हैं जिन पर सामाजिक स्तरीकरण तो सम्भव है किन्तु सामाजिक विभेदीकरण नहीं।

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