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सामाजिक स्तरीकरण क्या है?

सामाजिक स्तरीकरण क्या है? 

सामान्य: समाज की श्रेष्ठता एवं निम्नता के आधार पर विभिन्न सामाजिक् समूहों का वर्गीकरण किया जाना ही सामाजिक स्तरीकरण कहलाता है। स्तरीकरण शब्द अंग्रजी के भाषा के Stratification का हिन्दी रूपान्तर से है। यहाँ Stra शब्द का तात्पर्य स्तर है। अर्थात हम स्तरीकरण द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों के सामाजिक उच्चता एवं निम्नता का अर्थ ययन करते हैं। परिभाषा-समाज शास्त्रियों ने सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। स्तरीकरण को परिभाषित करते हुए जिस्बर्ट महोदय ने कहा कि, "सामाजिक स्तरीकरण का तात्पर्य समाज की ऐसी विभिन्न स्थायी श्रेणियों और समूहों में विभाजन है, जे उच्चता और अधीनता के सम्बन्धों से परस्पर सम्बद्ध होते हैं।" मूरे महोदय ने सामाजिक 44 स्तरीकरण को इस प्रकार परिभाषित किया है, " समाजिक स्तरीकरण समाज का उच्च और निम्न सामाजिक ईकाई में समांतर विभाग है।" सदरलैण्ड के अनुसार, "स्तरीकरण मात्र अन्तः क्रियाओं अथवा विभेदीकरण की ही एक प्रक्रिया है, जसके द्वारा व्यक्तियों एवं समूहों को थोड़े यह स्थायी प्रस्थितियों की उच्चता एवं निम्नता के क्रम में श्रेणी बद्ध किया जाता है। उपरोक्त परिभाषाओं के अन्तर्गत यह कहा जा सकता है कि स्तरीकरण सदस्यों का एकमात्र विभाजन नहीं है, बल्कि विभक्त श्रेणियों में एक प्रकार की ऊँच-नीच की भावना भी सम्बद्ध रहती है। अर्थात् समाज किसी न किसी आधार पर एक समूह को दूसरे समूह की तुलत में ऊँचा या नीचा मानने लगता है जिससे समाज के उच्च वर्ग के समूह को अधिक प्रतिष्ठा और सम्मान मिलता है। इसका एक ज्वलंत उदाहरण भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था में देखा जा सकता है।

स्तरीकरण के प्रमुख आधार - सामाजिक स्तरीकरण का निर्धारण प्रायः दो आधारो है, जो निम्नलिखित है- (क) प्रदत्त आधार एवं (ख) अर्जित आधार। (क) प्रदत्त आधार - प्रदत्त आधार उसे कहते हैं जो हमें पैतृक रूप से प्राप्त होता है। यथा-गोरा या काला होना, जाति विशेष का सदस्य होना, पुरूष होना आदि। प्रदत्व के अन्तर्गत निम्नलिखित आधार आते हैं

(i) जाति-जाति स्तरीकरण का प्रमुख आधार है, जिसके अन्तर्गत समाज में ऊंचा-नीचा माना जाता है। यह अपनी इच्छा पर निर्भर न होकर जन्म पर आधारित होता है। हमें

(ii) प्रजाति-प्रजाति के आधार पर भी समाज का स्तरीकरण होता है। यह स्तरीकरण भारत में न होकर पश्चिमी देशों में हाता है। र पर विभक्त किया जाता है।

(iii) प्रजाति के अंतर्गत व्यक्ति को गोरे एवं काले के आधार आयु -प्रदत्त स्तरीकरण का प्रमुख आधार आयु पर भी निर्भर करता है। इसके अन्तर्गत समाज के बुजुर्ग वर्ग को समाज के प्रमुख पदों पर वरीयता दी जाती है। साथ परिवार में भी बड़े यूको को पद प्रतिष्ठा, मान-सम्मान अधिक होता है।

(iv) जो जन्मजात होता लिंग-लिंग के आधार पर समाज में स्त्री-पुरूप का स्तरीकरण होता। है। इस आधार में पुरुषों को स्त्री से अधिक शक्तिशाली मान कर, उनको सामाजिक पदों में वरीयता दी जाती है। परन्तु पितृसत्तात्मक सत्ता होने पर इसका ठीक उल्टा हो जाता है और पुरुष की अपेक्षा महिला को अधिक वरीयता दी जाती है।


(ख) अर्जित आधार - अर्जित आधार उसे कहते हैं, जिसे व्यक्ति स्वयं के प्रयासों द्वारा प्राप्त करता है। यथा-समाज पढ़े-लिखे को अधिक मान-सम्मान प्रतिष्ठा देता है। यदि हम अनपढ़ रहे और कम प्रतिष्ठा पाएँ तो यह हमारा अर्जित गुण है। उसी प्रकार, हम अपनी कम योग्यता के कारण यदि छोटी-मोटी नौकरी पाते हैं तो यह भी हमारा अर्जित गुण है। इसी प्रकार, ऊँचे पद আाली नौकरी करना भी अर्जित गुण है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री पारसन्स महोदय ने छः प्रमुख अर्जित आधारों का वर्णन किया है, जो निम्नलिखित है

(i) अर्जित उपलब्धियाँ- इसके अंतर्गत वे उपलब्धियाँ आती है जिसे व्यक्ति स्वयं द्वारा अर्जित करता है। यथा -इंजीनियर डाक्टर, वकील एवं गायक इत्यादि। इन गायक की आवाज तो जन्मजात होती है परन्तु एक गायक बनना उसकी अपनी निजी योग्यता है जबकि शेष उपलब्धियाँ वह अपनी निजी शैक्षिणिक योग्यता द्वारा प्राप्त करता है।

(ii) शक्ति - किसी व्यक्ति को शक्ति वह क्षमता है जिसके सहारे वह अन्य व्यक्तियों के व्यवहारों को निर्धारित करके उसे एक दिशा प्रदान करता है। यह शक्ति समाज में व्यक्ति को प्रमुख स्थान दिलाती है,यथा-गाँधी जी,लेनिन एवं गौतम बुद्ध आदि महान लोगों की शक्तियाँ।

(iii) व्यक्तिगत समूह की सदस्यता - जन्म से ही व्यक्तिगत विशेषताएं व्यक्ति को प्राप्त होती है। इसके अंतर्गत व्यक्ति की सुन्दरता, शारीरिक शक्ति, मधुर आवाज आदि आते हैं जिसके आधार पर व्यक्ति का स्तरीकरण किया जाता है।

(iv)नातेदारी समूह की सदस्यता - यह आधार व्यक्ति को जन्म से प्राप्त होता है। जन्म से ही व्यक्ति को जो प्रस्थिति प्राप्त होती है वह उसकी पारिवारिक प्रस्थिति के अनुरूप होती है। राजपरिवार में जन्में व्यक्ति की प्रस्थिति आरम्भ से ही ऊँची मानी जाती है। इसके विपरीत निम्न श्रेणी के परिवार के व्यक्ति की प्रस्थिति निम्न होती है। अपने परिवर्तित स्वरूप में यही आधार भारत में जाति का रूप ले लेता है।

(v) सत्ता - सत्ता व्यक्ति को संस्थात्मक स्वरूप प्रदान करती है जिसके आधार पर वह अन्य व्यक्तियों या सम्पूर्ण के व्यवहारों आदि को निर्धारित करता है। संस्थात्मक सत्ता दो प्रकार की होतो है

(अ) औपचारिक सत्ता - अनौपचारिक संस्थात्मक सत्ता के उदाहरण प्रशासन के क्षेत्र में देखे जा सकते है। जैसे-एक ऑफिसर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को किसी कार्य के लिए आदेश दे सकता है और अधीनस्थ कर्मचारी को उसका पालन करना पडता है। इस प्रकार की सत्ता को वैधानिक मान्यता मिली रहती है।

(ब) अनौपचारिक सत्ता - अनौपचारिक संस्थात्मक सत्ता के अन्तर्गत हम पिता के अधिकारों को ले सकते हैं। अर्थात् पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अंतर्गत परिवार में पिता के अठि किर परमपराओं एवं प्रचलनों के द्वारा मिले है। इस प्रकार, आपचारिक संस्थात्मक सत्ता एवं अनौपचारिक संस्थात्मक सत्ता के आधार पर भी प्रस्थिति का निर्धारण हो सकता है, जो सामाजिक स्तरीकरण प्रक्रिया का एक मुख्य तत्व है। (vi) दिव्य-इसके अंतर्गत हम उन वस्तुओं का रखते हैं, जो हमारे सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाते हैं। यथा-आभूषण, मकान, धन, कार, मोटरसाइकिल, वी.सी.आर.एवं टी.वी.
आदि।

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