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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

सामाजिक अध्ययन का सामाजिक निरीक्षण

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सामाजिक अध्ययन का सामाजिक निरीक्षण 


सामाजिक निरीक्षण पद्धति अर्थ :-निरीक्षण पद्धति का प्रयोग केवल सामाजिक विज्ञानों में ही नहीं अपिता प्राकृतिक विज्ञानों में भी होता है। निरीक्षण का शाब्दिक अर्थ 'देखना या अवलोकन करना है। परन्तु सामाजिक अनुसंधान की एक व्यवस्थित पद्धति के रूप में इसका एक पृथक् अर्थ है। डॉ० पी0 वी यंग के अनुसार "निरीक्षण को नेत्रों द्वारा सामूहिक व्यवहार एवं जटिल सामाजिक संस्थाओं के साथ-ही-साथ सम्पूर्णता की रचना करने वाली पृथक इकाइयों के अध्ययन की विचारपूर्ण पद्धति के रूप में समझा जा सकता है। प्रो0 सी० एo मोजर ने लिखा है कि"ठोस अर्थ में निरीक्षण में कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग है।

 निरीक्षण पद्धति की विशेषताएँ :

 (1) निरीक्षण पद्धति में मानवीय ज्ञानेन्द्रियों का पूर्ण उपयोग होता है। निरीक्षणकर्ता जो भी कुछ देखता है वही संकलित कर लेता है।

(2) इस पद्धति में निरीक्षण सदैव ही उद्देश्यपूर्ण व सूक्ष्म होता है क्योंकि इसमें निरीक्षण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन के उद्देश्य के अनुसार किया जाता है।

(3) इसमें प्रत्यक्ष अध्ययन होता है। अनुसंध कर्ता स्वयं ही निरीक्षण करके आंकड़ों का संकलन करता है। (4) इसका उद्देश्य पारस्परिक एवं कार्य-कारण सम्बन्धों को मालूम करना होता है।

(5) इस पद्धति के द्वारा सामूहिक व्यवहार का अध्ययन सबसे उत्तम ढंग से हो सकता है।

निरीक्षण के प्रकार : - निरीक्षण चार प्रकार के होते है - (1) सहभागी निरीक्षण, (2) असहभागी निरीक्षण (3) अर्द्ध-सहभागी निरीक्षण, और (4) सामूहिक नीरक्षण।

(1) सहभागी निरीक्षण :-सहभागी निरीक्षण शब्द का प्रयोग सबसे पहले सन् 1924 में श्री लिण्डमैन ने किया था। इस प्रकार के निरीक्षण के निरीक्षणकर्ता उस समूह में, जिसका कि उसे अध्ययन करना है, जाकर बस जाता है और समूह के सभी क्रिया-कलापों में उस समूह के एक सदस्य के रूप में हिस्सा लेता है और उस रूप में निरीक्षण का कार्य भी करता है कि इसमें निरीक्षणकर्ता एक समूह या समुदाय के जीवन में स्वयं भी भागीदार बन जाता है इस कारण इसे सहभागी निरीक्षण कहते है सर्वत्र मैलिनोवस्की चार्ल्स बूथ, प्ले आदि विद्वानों ने सहभागी निरीक्षण के द्वारा अनेक अध्ययन-कार्य किए है।

सहभागी निरीक्षण के गुण ये है-

 (अ) इसमें सामाजिक परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अध्ययन सम्भव होता है।

(ब) निरीक्षण सहभागी होने के कारण अध्ययन ग्रहन और सूक्ष्म हो सकता है।

(स) अध्ययन किए जाने वाले समुदाय के रूप में अनुसन्धानकर्ता के लिए वास्तविक व्यवहारों का अध्ययन सम्भव होता है और वह गुप्त से गुप्त बातों का भी पता चला सकता है पर सहभागी निरीक्षण के अपने कुछ दोष व सीमाएँ भी है जैसे

(क) पूर्ण सहभागिता सम्भव नही होती है इस कारण सूचनाएँ भी बिल्कुल सही नहीं प्राप्त होती है,

(ख) सामूहिक जीवन में घुल-मिल जाने के कारण निरीक्षणकर्ता अनेक सामान्य बातों को समझकर छोड़ देता है जोकि वास्तव में अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है,

(ग) यह पद्धति अत्यधिक खर्चीली है और अधिक समय भी लगता है।

(2) असहभागी निरीक्षण : इस प्रकार के निरीक्षण में निरीक्षणकर्ता समुदाय या समूहों का न तो अस्थाई सदस्य बनता है और न ही उसकी क्रियाओं में भागीदार बनता है। वह तो कभी-कभी समुदाय में जाकर एक तटस्थ व्यक्ति की भाँति वैज्ञानिक भावना से अपनी आवश्यकतानुसार निरीक्षण करता है ।

असहभागी निरीक्षण के लाभ :

(अ) इसमें निरीक्षण वस्तुनिष्ठ तौर पर सम्भव है क्योंकि निरीक्षणकर्ता अपने को समुदाय के कार्यो में बिल्कुल घर-मिला नहीं देता (बस के द्वारा विश्वसनीयता सूचनाओं को प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि निरीक्षण तटस्थ भाव से होता है,

(स) इसमें समय व धन अपेक्षाकृत कम खर्च होता है। पास पद्धति के अपने कुछ दोष व सीमाएं भी है और वह यह कि

(क) इसमें निरीक्षणकर्ता बाहरी  व्यक्ति होता है इस कारण घटनाओं को अपने दृष्टिकोण से देखता है, न कि समुदाय के लोगों दृष्टि से.

(ख) इसमें सामुदायिक जीवन की अनेक गुप्त बातों का पता नहीं चल पाता है।

(3) अर्द्ध-सहभागी निरीक्षण-असहभागी निरीक्षण सहभागी और असहभागी निरीक्षण के बीच की स्थिति है। इसमें अनुसन्धानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समुदाय के कुछ क्रिया-कलापों में वास्तविक रूप में भागीदार बनता है और उस रूप में उनका निरीक्षण करता पर अधिकांश वह तटस्थ भाव से बिना भाग लिए ही घटनाओं का निरीक्षण करता है। इस प्रकार अर्द्ध-सहभागी निरीक्षण में सहभागी और असहभागी निरीक्षण दोनों के ही लाभ प्राप्त होने की सम्भावना रहती है।

(4) सामूहिक निरीक्षण - इस प्रकार के निरीक्षण में एक ही समस्या या सामाजिक घटना का निरीक्षण कई अनुसन्धानकर्ताओं के द्वारा होता है जोकि उस सामाजिक घटना के विभिन्न पहलुओं के विशेषज्ञ होते है। श्री मान श्री योग (Hsin Pao Yang) के शब्दों में,

"इसमें कई व्यक्ति मिलकर सामग्री एकत्रित करते है, बाद में एक केन्द्रीय व्यक्ति के द्वारा सभी व्यक्तियों द्वारा प्राप्त तथ्यों का संकलन एवं उससे अन्तिम निष्कर्ष निकाला जाता है।"

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