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सहयोग का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप

सहयोग का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप 


सहयोग का अर्थ एवं परिभाषा: किसी समान उद्देश्य की पूर्ति के लिए किए गये पृयत्न का सहयोग के नाम से सम्बोधित किया जाता है। प्रो० ग्रीन ने सहयोग की परिभाषा करते ए लिखा है कि"सहयोग दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा समान रूप से इच्छित क्रिसी कार्य को करने या किसी लक्ष्य तक पहुँचने के निरन्तर एवं सार्वजनिक प्रयत्न को कहते है।"

श्री वी०वी० श्रकोलकर के शब्दों में," सहयोग व्यवहार का सार-तत्व यह है कि सम्बन्धित व्यक्तियों (या समूहों) का एक सामान्य लक्ष्य होता है और वे अपने व्यवहार का अनुकूलन एक-दूसरे के साथ इस भाँति करते हैं कि लक्ष्य की प्राप्ति हो सके "

उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है कि जब जनता किसी आक्रमणकारी या शासक के विरुद्ध एक होकर उठ खड़ी होती है, जय जुलाहे की पत्नी कपड़ा बुनने के कार्य में अपने पति का हाथ बॅटाती है,जब लड़की या बहू अपनी माँ या सास को खाना पकाने में सहायता करती है अथवा जब पति अपनी पतनी को पारिवारिक जीवन से सम्बन्धित विषयों में सहायता प्रदान करता है- तब सहयोग की ही स्थिति विद्यमान होती है। सहयोग के प्रकार या स्वरूप : श्री ग्रीन ने सहयोग को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया है

1. प्राथमिक सहयोग : इस प्रकार के सहयोग में व्यक्ति अपने को समूह के साथ बिल्कुल घुला-मिला देता है और समूह के स्वार्थ को ही अपना स्वार्थ समझने लगता है। वह समूह के साथ इसीलिए सहयोग करता है कि उसका अपना 'समूह खूब फले-फुले, और समूह द्वारा उसका अपना भी कल्याण हो। उदाहरणार्थ, परिवार के सुख समृधि के लिए माता-पिता प्रत्येक सम्भव त्याग करते हैं।

2. द्वितीयक सहयोग - इस प्रकार के सहयोग में व्यक्ति अपनी स्वार्थ पूर्ति की दृष्टि से सरों के साथ सहयोग करता है। इस प्रकार के सहयोग की महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें निः स्वार्थ भाव नहीं होता। व्यक्ति सहयोग करता है, केवल सहयोग के लिए ही नहीं, वरन अपने लिए भी। आधुनिक समाज में इसी प्रकार के सहयोग की प्रमुखता होती है। 3. तृतीयक सहयोग : जब मनुष्य परिवर्तित अवस्थाओं के साथ अनुकूलन करने के लिए दूसरों के साथ सहयोग करता है तो उसे तृतीयक सहयोग कहते हैं। उदाहरणार्थ, एकाएक युद्ध बिजाने पर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में जो परिवर्तन हो जाता है, उसके साथ अनुकूलन ने के लिए व्यक्ति को सरकार के साथ सहयोग करना पड़ता है। व्यवस्थापन Accommodation) तृतीयक सहयोग का ही एक उदाहररण है। सर्वश्री मैकाइवर तथा पेज ने सहयोग के निम्नलिखित दो प्रकारों का वर्णन किया है-

1. प्रत्यक्ष सहयोग - जब समान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दो या दो अधिक व्यक्ति एकसाथ मिलकर एक सा' कार्य करते हैं तो उसे प्रत्यक्ष सहयोग कहते हैं, उदाहरणार्थ- फुटबाल खेलना, ताश खेलना इत्यादि।

2. अप्रत्यक्ष सहयोग -व्यक्ति आपस में सहयोग करते हुए भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों को करते हैं, तो उसे अप्रत्यक्ष सहयोग कहते हैं। श्रम-विभाजन अप्रत्यक्ष सहयोग का एक अति उत्तम उदाहरण है। कपड़ा तैयार करने की एक मिल में एक ही उद्देश्य में रत-श्रमिक भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य करे है-यही अप्रत्यक्ष सहयोग है।

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