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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन के मापदण्ड

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 सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन के मापदण्ड

 सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन के आधार (Base of Delimitation of Cultural Regions).
सांस्कृतिक प्रदेशों तथा सांस्कृतिक परिमण्डलों की सीमा का निर्धारण समान सांस्कृतिक लक्षणों (विशेषताओं) के आधार पर किया जाता है। सांस्कृतिक परिमंडल की सीमा प्राकृतिक अथवा राजनीतिक सीमा का अनुसरण नहीं करती है। किसी एक सांस्कृतिक परिमंडल के अंतर्गत कई प्रकार के प्राकृतिक पर्यावरण मिल सकते हैं। इसी प्रकार किसी बहत प्राकृतिक प्रदेश के अंतर्गत एक से अधिक सांस्कृतिक प्रदेश या परिमंडल पाये जा सकते हैं। स्पेंसर और थामस (1969) ने सांस्कृतिक तत्वों के अंतर्गत धर्म, भाषा, प्रथा, जीवन पद्धति, अधिवास, कृषि, उद्योग, व्यापार आदि आर्थिक प्रणाली, राजनीतिक दशा, सामाजिक संगठन, भोजन, वस्त्र, कला, संगीत, मनोरंजन आदि विविध तत्वों को सम्मिलित करने पर बल दिया है। इनमें कोर्ट तत्व हैं जिनके विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त करना कठिन नहीं है, किन्तु अमूर्त तत्वों के विषय में विश्व स्तर पर सूचना एवं आंकड़ों के अभाव में सही जानकारी कर पाना अत्यंत कठिन है इसीलिए भौगोलिक अध्ययनों में मूर्त तथा दृश्य लक्ष्णो (material culture) पर अधिक बल दिया जाता है। विश्व के सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन हेत स्थल तथा वृहत क्षेत्रीय तत्वों को आधार बनाया जाता है और सूक्ष्म सांस्कृतिक तत्वों पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

 अतः सांस्कृतिक परिमण्डलों का सीमांकन किसी एक तत्व या एक से अधिक तत्वों की समानता के आधार पर किया जाता है। इसके लिए प्रयुक्त आधारों में जीवन पद्धति, प्रौद्योगिकीय विकास,धार्मिक विश्वास, भाषा, प्रजाति, जीवन-दर्शन, भौगोलिक सम्बद्धता आदि प्रमुख हैं। जीवन पद्धति (Way of life) मनुष्य स्वयं सर्वप्रमुख सांस्कृतिक तत्व है जो अपनी आवश्यकता, रूचि तथा क्षमता (कौशल) के अनुसार प्राकृतिक पर्यावरण के तत्वों में परिवर्तन करके सांस्कृतिक तत्वों या सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण करता है। एक परिमंडल के अंतर्गत सामान्यतः मनुष्यों के जीवन यापन के ढंग लगभग समान प्रकार के होते हैं। ध्रुवीय सांस्कृतिक परिमंडल में रहने वाले एस्किमो, लैप्स, समोयद, चुकची आदि जातियों का रहन-सहन अत्यंत शीतल टुण्ड्रा प्रदेश के अनुकूल है और ये लोग स्थानीय रूप से प्राप्त पदार्थों का प्रयोग करके जीवन निर्वाह करते हैं। बर्फीले प्रदेश के पशुओं के आखेट से प्राप्त मांस का भोजन, चमड़े का वस्र, बर्फ के टुकड़ों द्वारा निर्मित गृह (इगलू) बिना पहिये की स्लेज गाड़ी आदि इनकी जीवन पद्धति के प्रमुख लक्षण हैं। इसी प्रकार घुमक्कड़ पशुचारण पर आधारित जीवन पद्धति सहारा से मध्य एशिया तक विस्तृत पूरे शुष्क सांस्कृतिक परिमंडल में देखी जा सकती है। जीवन पद्धति कई अन्य सांस्कृतिक तत्वों की संयुक्त परिणाम होती है। प्रौद्योगिकीय विकास (Technological Development) सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन में प्रौद्योगिकी के विकास स्तर को प्रमुख मापदण्ड के रूप में प्रयोग किया जाता है। तकनीकी विकास का सीधा सम्बन्ध आर्थिक विकास से होता है। आर्थिक विकास के स्तर के आधार पर ही देशों को विकसित, विकासशील और अल्पविकसित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। संस्कृति का इतिहास मुख्य रूप से तकनीकी विकास के इतिहास से जुड़ा हुआ है।

यूरोपीय सांस्कृतिक मण्डल को सामान्यतः तीन परिमंडल- (1) उत्तरी पश्चिमी यूरोपीय परिमंडल. (2) पूर्वी यूरोपीय परिमंडल और (3) भूमध्य सागरीय (दक्षिणी यूरोपीय) परिमंडल में विभक्त किया जाता है। इस विभाजन का मौलिक आधार तकनीकी एवं आर्थिक विकास का स्तर ही है। ज्ञातव्य है कि उत्तरी-पश्चिमी यूरोपीय देशों-ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैण्ड आदि में तकनीकी विकास का स्तर उच्च है और आर्थिक विकास की दृष्टि से यहाँ के निवासी सम्पन्न हैं और इनका जीवन स्तर ऊँचा है। पूर्वी यूरोपीय देशों में तकनीकी और आर्थिक विकास का स्तर मध्यम श्रेणी का है और भूमध्य सागरीय क्षेत्रों में तकनीकी तथा आर्थिक विकास का स्तर अपेक्षाकृत निम्न है और इसके अंतर्गत अनेक देश विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं। धार्मिक विश्वास या धर्म (Religious Faith or Religion) धर्म संस्कृति का एक प्रमुख तत्व है। वास्तव में धर्म प्राचीन काल से ही मानव संस्कृति का पोषक, वाहक और नियामक रहा है। प्राचीन काल में भारत में वैदिक, बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ। इन धर्मों में विशेष रूप से बौद्ध धर्म का प्रचार श्रीलंका, दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा पूर्वी एशिया तक हो गया।मानव प्रवास के साथ-साथ वैदिक (हिन्दू धर्म का प्रसार मारीशस और पूर्वी अफ्रीका के देशों में भी हुआ।मध्य काल में दक्षिणी-पश्चिमी एशिया में इस्लाम धर्म का उदय हुआ जिसका प्रसार सम्पूर्ण उत्तरी अफ्रीका के शुष्क प्रदेशों और दक्षिणी-पश्चिमी एशिया के साथ ही मध्य एशिया तक हो गया। यूरोपीय उपनिवेश के विस्तार के साथ ही ईसाई धर्म का प्रसार भी विश्व के बड़े क्षेत्र पर हुआ। धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव मनुष्य के आचार-विचार रहन-सहन, आदतों (खान-पान आदि),रीति रिवाज, परम्पराओं आदि पर निश्चित रूप से पड़ता है जो मानव जीवन शैली के रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार विश्व के विभिन्न भागों में हिंदुत्व पर आधारित भारतीय संस्कृति बौद्ध धर्म पर आधारित दक्षिण-पूर्वी एशियाई एवं चीनी संस्कृति, ईसाई धर्म पर आधारित रोमन संस्कृति, प्रकृति पर आधारित अफ्रीकी संस्कृति का विकास हुआ। इस्लाम (मुस्लिम) आधारित अरब बर्बर परिमंडल उत्तरी अफ्रीका के पश्चिमी (अटलांटिक) तट से लेकर मध्य एशिया तक विस्तृत है। प्राचीन काल में धर्म सबसे सशक्त और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कारक था जिसके कारण प्राचीन सांस्कृतिक परिमंडलों की सीमाएं मुख्यतः धर्म से नियंत्रित थीं और धर्म प्राकृतिक पर्यावरण की विशिष्टता एवं तत्कालीन सामाजिक आवश्यकता पर आधारित थे। अतः सांस्कृतिक परिमंडलों के सीमांकन हेतु धर्म को एक प्रमुख मापदण्ड के रूप में प्रयोग किया गया है। भाषा संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है। भाषा संस्कृति के प्रसार का अधिक सशक्त साधन भी है। एक समुदाय अन्य समुदाय की संस्कृति को भाषा से ही ग्रहण करता है। भाषा और धर्म का भी प्रायः घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। विश्व में अनेक भाषाएं प्रचलित हैं जिनकी संख्या कई हजार होने का अनुमान है किन्तु लगभग 140 भाषाएं ऐसी हैं जिनके बोलने वालों की संख्या 10 लाख से ऊपर है। इनमें 14 भाषाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं जिनमें से प्रत्येक के बोलने वालों की संख्या 5 करोड से ऊपर है। बोलने वालों की संख्या के क्रम से ये भाषाएं हैं-चीनी (मन्डारिन), अंग्रेजी, रूसी.हिन्दी, स्पेनी,जर्मन, जापानी, अरबों, बंगला, पुर्तगाली, मलय,फ्रांसीसी, इतालवी और उर्दू। भाषा की भिन्नता के आधार पर अमेरिकी सांस्कृतिक मंडल को दो परिमण्डलों में विभक्त किया गया है-(एंग्लो अमेरिका (Anglo America), और (1) लैटिन अमेरिका (Latin America]। एंग्लो अमेरिका के अंतर्गत संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा सम्मिलित हैं जहाँ अंग्रेजी भाषा की प्रधानता है। लैटिन अमेरिका के अंतर्गत मैक्सिको से लेकर सम्पूर्ण मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका के भूभाग आते हैं जिसके विभिन्न देशों में किसी लैटिन भाषा की प्रमुखता है। लैटिन भाषा कई यूरोपीय भाषाओं का समूह है जिसके अंतर्गत फ्रेंच. इतालवी, स्पेनी, पुर्तगाली, रोमन,प्रोवेन्कल, केटेलन आदि समाहित हैं। इसी प्रकार भूमध्य सागरीय परिमंडल की भाषा भी लैटिन है। भारतीय परिमंडल में हिन्दुस्तानी, चीनी परिमंडल में चीनी (मंदारिन आदि),पश्चिमी यूरोपीय परिमंडल में अंग्रेजी और जर्मन भाषाओं का प्रमुख स्थान है। शुष्क परिमंडल की भाषाओं में अरबी और फारसी प्रमख है। प्रजातीय समूह (Racial Group) सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन में मानव प्रजातियों के वितरण को भी आधार बनाया जाता है क्योंकि प्रकृति एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कारक है जिसका प्रभाव जीवन यापन के ढंग, आदतों  परम्पराओं, रीति-रिवाज आदि पर देखा जा सकता है। विश्व के विभिन्न भागों में विविध प्रजातीय समूह पाये जाते हैं जिनमें कुछ अपने मौलिक रूप में हैं तो अनेक पारस्परिक सम्पर्क से परिवर्तित हो गये हैं और संपर्क समूह (वर्ण संकर) के रूप में मिलते हैं। नीग्रिटो, नीग्रो आस्ट्रेलाइड, काकेशाइड भूमध्यसागरीय).नार्डिक, मंगोलाइड आदि बृहत मानव प्रजातियां हैं। आर्कटिक प्रदेश और मध्य एवं पूर्वी एशिया में मंगोल प्रजाति, उत्तरी-पश्चिमी यूरोप में नार्डिक प्रजाति, उत्तरी-पश्चिमी यूरोप में नार्डिक प्रजाति, मध्य एवं दक्षिण अफ्रीका में नीग्रोइड (नीग्रिटो तथा नीग्रो) प्रजाति, दक्षिण-पूर्व एशिया और आस्ट्रेलिया में आस्ट्रेलाइड प्रजाति के लोगों का बाहुल्य है। भारत में कई प्रजातियों का मिश्रण पाया जाता है जिनमें इण्डो-आर्य, द्रविड़, मंगोल और भूमध्य सागरीय प्रमुख हैं। अतः सांस्कृतिक परिमंडलों की सीमा निर्धारण में प्रजाति को महत्वपूर्ण कारक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। प्रजातीय आधार पर निर्धारित परिमंडलों में प्रमुख हैं-पूर्वी एशियाई या चीनी परिमंडल (मंगोल), उत्तरी पश्चिमी यूरोपीय परिमंडल (नार्डिक), भूमध्य सागरीय परिमंडल (भूमध्य सागरीय) अफ्रीकी नीग्रो परिमंडल (नीग्रो एवं नीग्रिटो), एशियाई अरब-बर्बर या तुर्क-मंगोल परिमंडल (भूमध्य सागरीय, मंगोल) आदि। यद्यपि विश्व की विभिन्न सभ्य जातियों में दीर्घकालीन संपर्क से प्रजातीय मिश्रण एक सामान्य घटना है किन्तु अनेक आदिम जातियाँ आज भी शुद्ध प्रजातीय प्रतिनिधि के रूप में विद्यमान है।

जीवन दर्शन (Attitude of Life) संस्कृति का एक प्रमुख तत्व होने के कारण मानव के विचार, दृष्टिकोण, व्यवहार आदि को भी सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन में मापदण्ड के रूप में प्रयोग किया जाता है। विश्व के विभिन्न भागों में जीवन के प्रति मानव दृष्टिकोणों में पर्याप्त भिन्नता पायी जाती है जो उनके जीवन पद्धति, धर्म,प्रथाओं आदि के रूप में परिलक्षित होती है। प्राचीन कालीन संस्कृतियाँ मुख्यतः प्रकृति आधारित अथवा अध्यात्म आधारित थीं किन्तु आधुनिक काल में औद्योगिक क्रान्ति, तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास, अधिकाधिक भौतिक सुविधा एवं साधन प्राप्त करने की प्रबल इच्छा तथा प्रतिस्पर्धा, बाह्याडंबर आदि ने मानव जीवन दर्शन में उल्लेखनीय परिवर्तन किया। इन संस्कृति परिवर्तनों का प्रभाव सांस्कृति परिमंडलों की सीमाओं पर भी पड़ा जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान सांस्कृतिक परिमंडल की सीमाएँ प्राचीन सांस्कृतिक परिमंडल की सीमाओं से भिन्न हैं। यूरोप वासियों के पहुंचने से पहले उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में जनजातीय जीवन प्रकृति आधारित था किन्तु आधुनिक अमेरिका प्रधानतः भौतिकवादी संस्कृति का पोषक है जो मूलतः यूरोप से आयातित है। पाश्चात्य संस्कृति (Occidental or western Culture) और प्राच्य संस्कृति (Oriental or Eastern Culture) का विभाजन मूलतः क्षेत्र आधारित नहीं बल्कि जीवन दर्शन आधारित कहा जा सकता है। पाश्चात्य संस्कृति भौतिकवादी है जो वर्तमान भोग विलास पर बल देती है जबकि पूर्वी संस्कृति आध्यात्मिक दृष्टिकोण में विश्वास रखती है और यहाँ के निवासी थोड़े में भी संतुष्ट रहते हैं तथा परलोक सुधारने पर बल देते हैं और प्रायः धर्मभीरू होते हैं। इस प्रकार पूर्वी संस्कृति मंडल के सभी प्रमंडलों-भारतीय, चीनी तथा मलय का जीवन दर्शन मुख्यतः आध्यात्म तथा मानव मूल्यों पर आधारित है। यहाँ के लोग 'वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास करते हैं. थोड़े मैं भी संतोष कर लेते हैं और भौतिकता की दौड़ में विश्व प्रतिस्पर्धा नहीं रखते। अफ्रीका में प्रकृति आधारित मानव दृष्टिकोण पाया जाता है और लोग प्रकृति की सत्ता में ही विश्वास करते हैं किन्तु पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से अफ्रीकी तथा एशियाई जीवन दर्शन तथा मानव मूल्यों में उल्लेखनीय परिवर्तन हो रहे हैं जिसका प्रसार पहले नगरों में और फिर मांवों की ओर होता है।

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