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सोमवार, 6 जुलाई 2020

राष्ट्र संघ के उद्देश्य संरचना एवं प्रमुख कार्य

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राष्ट्र संघ के उद्देश्य संरचना एवं प्रमुख कार्य


प्रथम महायुद्ध बहुत विनाशकारी सिद्ध हुआ उसमें अपार जन-धन की हानि हुई मनुष्य अशान्ति का परित्याग कर शान्ति की आकांक्षा करने लगे। विश्व में स्थायी शान्ति के लिए विल्सन बहुत लालायित था। वह सामूहिक सुरक्षा तथा पारस्परिक उत्तरदायित्व के लिए अनोखा प्रयोग करना चाहता था। उसने ही विश्व में शान्ति स्थापित करने के लिए राष्ट्र संघ की योजना रखी थी। विल्सन ने अमेरिका के युद्ध में सम्मिलित होने का कारण भी युद्ध का अंत करना तथा शान्ति स्थापना बताया था। राष्ट्र संघ का संविधान-राष्ट्र संघ के संविधान को समझौते का नाम दिया गया है। 19 प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने उसका संविधान बनाया था। अमेरिका का राष्ट्रपति विल्सन सम्मेलन का अध्यक्ष था। राष्ट्र संघ की रूपरेखा विल्सन ने तथा कानूनी ढाँचा ब्रिटेन के प्रतिनिधियों ने प्रतिपादित किया था। राष्ट्र संघ का चार्टर या संविधान बहुत महत्त्वपूर्ण था उसमें एक भूमिका तथा 26 धारायें थीं। 10वीं धारा में राष्ट्र संघ के सदस्य संघ के  सभी सदस्यों की प्रादेशिक एकता तथा राजनीतिक स्वतंत्रता का सम्मान करते थे किसी भी बाह्य आक्रमण के समय वे उसकी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिये वचनबद्ध हैं। 12वीं धारा में सभी सदस्य इस बात पर एकमत हैं कि यदि उनके मध्य कोई विवाद खड़ा हो जाय जो कि युद्ध का रूप ले सकता है तो उसका निर्णय पंचों, न्यायालय या कौंसिल के द्वारा होगा। वे तब तक युद्ध नहीं करेंगे जब तक कि निर्णय तीन महीने न हो गया हो।16वीं धारा में यदि राष्ट्र संघ का कोई सदस्य समझौते की उपेक्षा करके युद्ध प्रारम्भ करता है, तो वह राष्ट्र संघ के सब सदस्यों के विरुद्ध करने वाला समझा जायेगा राष्ट्र संघ के सदस्य उससे व्यापारिक अथवा आर्थिक सम्बन्ध विच्छेद कर देंगे। राष्ट्र संघ के उद्देश्य- अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की वृद्धि करना, (ii) अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की स्थापना करना (ii) युद्ध को रोकना (iv) पेरिस के शान्ति सम्मेलन की सन्धियों का पालन करना।

संगठन-राष्ट्र संघ की प्रथम सात धाराओं में इसकी सदस्यता तथा संगठन का वर्णन है। सदस्यता-इस समझौते पर सर्वप्रथम हस्ताक्षर करने वाले 16 देशों को इसका सदस्य बना लिया गया। इसके दो महीने बाद समझौते को स्वीकार करने वाले देशों को इसका सदस्य बना लिया गया। असेम्बली के 2/3 बहुमत द्वारा किसी देश को सदस्य अथवा सदस्यता से वंचित किया जा सकता था। जो देश सदस्यता से स्वेच्छा से अलग होना चाहते थे उन्हें दो वर्ष पहले नोटिस देना पड़ता था। विश्व का सबसे अधिक शक्तिशाली देश तथा इसका जन्मदाता अमेरिका इसका कभी सदस्य न हुआ। प्रारम्भ में जर्मनी इसका सदस्य नहीं था किन्तु उसे 1926 ई० में इसका सदस्य बनाया गया। 1933 ई० में रूस को इसका सदस्य बनाया गया लेकिन 1940 ई० में उसने फिनलैंड पर आक्रमण कर दिया तथा कौसिल ने उसको सदस्यता से अलग कर दिया। जापान ने 1933 ई० में तथा इटली ने 1937 में राष्ट्र संघ को छोड़ दिया। इस प्रकार कभी भी सभी समकालीन महाशक्तियाँ इसका सदस्य न हो पायीं।

असेम्बली -यह राष्ट्र संघ की प्रमुख संस्था थी। इसमें प्रत्येक राज्य तीन प्रतिनिधि व काका तो। परन्तु प्रत्येक राज्य को एक ही बोट देने का अधिकार था। वर्ष में एक बार इसका अधिवेशन होता था वह अधिवेशन सीन सप्ताह तक चलता था। इसकी सदस्य संख्या अधिक होने के कारण इसका महत्व कौशल से भी अधिक बढ़ गया था। इसके समस्त निर्णय सर्व सहमति से किये जाते थे। कार्य-विश्व शांति को प्रभावित करने वाले विषयों पर यह विचार कर सकती थी। 21 बहुमत से यह संघ बचाती थी, बजट भी यही पारित करती थी। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के जजों को नियुक्ति करती थी। कौसिल चुनाव करती थी। के अस्थायी सदस्यों, सभापति तथा आठ उप सभापतियों का परिषद-यह राष्ट्र संघ की कार्यकारिणी की। उसे एक वर्ष में प्राय: 3 अधिवेशन होते थे। इसकी प्रत्येक बैठक में प्रेम वर्णानुक्रम के अनुसार इसके सभापति का निर्वाचन होता था इसके स्थायी सदस्यों को संख्या 5 यो। अमेरिका, इंग्लैंड प्रेस इी तथा जापान परन्तु अमेरिका इसमें सम्मिलित नहीं हुआ। इसके अस्थायी सदस्यों की संख्या चार थी इसके दो वर्ष पहले इसकी संख्या 8 रही। परन्तु कालान्तर में अस्थायी सदस्यों की संख्या बदकर क्रमशः 6, 9 और ।। कर दी गयी। अस्थायी सदस्यों को कार्य अवधि 3 वर्ष थी। इसके । सदस्यों को प्रतिवर्ष अवकाश प्रहण करना पड़ता था। कार्य-यह राष्ट्र संघ के किसी भी सदस्य को समझौते की अवहेलना करने पर राष्ट्र संघ को सदस्यता से वंचित कर सकती थी। अन्तर्राष्ट्रीय ड़ों का समाधान भी इसी का कार्य था। मैण्डेट सम्बन्य राष्ट्र की रिपोर्ट पर यही विचार करती पी। अस्व-शस्त्रों को कम करने तथा अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने का कार्य भी इसी का दा सचिवालय-इसका प्रधान केन्द्र जेनेवा था। इसका अध्यक्ष महामंत्री कहलाता था इसकी नियुक्ति कौंसिल द्वारा होती थी सचिवालय में 50 देशों के लगभग सादे सात सौ सदस्य कार्य करते थे। इसके सदस्य विभिन्न कार्य करने के लिए ।। विभागों में बंटे हुए थे अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय-20 दिसम्बर, 1920 ई० को रग में इस न्यायालय की स्थापना की गयो प्रारम्भ में इसके जजों को संख्या ।। थी परन्तु 1931 ई० में इसकी संख्या 15 कर दी गयी। इनका कार्यकाल 9 वर्ष का था। ये अपना सभापति एवं उपसभापति चुनते थे इनकी नियुक्ति असेम्बली तथा परिषद की संयुक्त बैठक में होती थी। कार्य-1.विभिन्न देशों के पारस्परिक पेड़ों पर कानूनी राय देना।

2. विभिन्न सन्धियों तथा समझौतों की व्याख्या करना।

3.अंतर्राष्ट्रीय जोड़ों के सम्बन्ध में यह असेम्बली तथा परिषद को सलाह देने का कार्य भी करता था। क्षेत्राधिकार-(1) ऐच्छिक (2) आवश्यकता जिस समय दो या दो से अधिक राष्ट्र अपना विवाद निर्णय के लिए न्यायालय के सम्मुख रखते थे तो वह ऐच्छिक क्षेत्राधिकार कहलाता था। (2) कुछ राष्ट्रों ने सदस्य होते समय अपने गढ़ों का न्यायालय से निर्णय कराने के लिए प्रतिज्ञा की थी यह आवश्यक क्षेत्राधिकार कहलाता था। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघ-राष्ट्र संघ के सभी सदस्य इसके सदस्य हो सकते थे। इसका मुख्य कार्यालय जेनेवा में था। इसकी स्थापना का उद्देश्य था-"मजदूरी करने वाले पुरुषों स्वियों तथा बच्चों के लिए उचित तथा मानवीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करना। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ के निम्नलिखित अंग थे

1.सामान्य सम्मेलन-इसको कानून बनाने का कोई अधिकार न था। यह मजदूरों की उ्रति तथा दशा सुधारने के सम्बन्ध में अनेक प्रस्ताव उपस्थित कर संसार को प्रभावित करने का प्रयास किया करता था। इसमें प्रत्येक राज्य के चार प्रतिनिधि होते थे। दो सरकार के एक मजदूरों का तथा एक मालिकों का प्रतिनिधि होता था।

2.शासन सभा-के सदस्यों की संख्या 32 थी इनमें आठ सदस्य मजदूरों के आठ मिल मालिकों के तथा 16 सदस्य राज्यों के प्रतिनिधि थे, शासक सभा का प्रधान कार्य अन्तर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के डायरेक्टर का चुनाव करना था।

3.अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय-इसका प्रमुख कार्य संसार भर के मजदूरों की दशा सुधारने की परिस्थितियों पर विचार करना था। इस कार्य के सम्पादन के लिए इसने अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया।

राष्ट्र संघ की विश्व शान्ति में भूमिका राष्ट्रसंघ की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य विश्व में शान्ति स्थापित करना एवं युद्धों को रोकना था। प्रारम्भ में इसको कुछ सफलता अवश्य मिली, परन्तु अंत में इसको असफलता का भी सामना करना पड़ा। राष्ट्र संघ की सफलताओं का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

1.सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में लीग ने बहुत कुछ सफलता प्राप्त की, इसने स्त्री पुरुष एवं बच्चों के अवैध व्यापार को रोकने का प्रयास किया। मजदूरों की दशा सुधारने के लिए प्रयास किया। अफीम आदि मादक पदार्थों के प्रयोग पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया टी० बी० मलेरिया, चेचक तथा कालरा आदि भयंकर रोगों के प्रसार को रोकने के लिए भी प्रयास किया।

2. युद्ध से पीड़ित 15 लाख यूनानी तथा 30 हजार बल्गेरियनों को बसाने की व्यवस्था की गयी।

3.विभिन्न 36 देशों के लगभग चार लाख युद्ध बन्दियों को उनके घर पहुँचाया गया।

4. युद्धकाल में कुछ देशों की आर्थिक व्यवस्था बहुत खराब हो गयी थी राष्ट्र संघ, उनके आर्थिक पुनर्निर्माण में बहुत अधिक सहयोग दिया।

5.अन्तर्राष्ट्रीय न्याय का स्थायी न्यायालय भी बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ उसने अपने कार्यकाल में 31 विवादों के सम्बन्ध में अपने निर्णय तथा 26 मामलों में अपने परामर्श दिये।

6. संघ ने अन्तर्राष्ट्रीय कानून को लिपिबद्ध करने का प्रयास किया।

7.लैंगरला महोदय के मतानुसार अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के विकास में राष्ट्र संघ का बहुत हाथ रहा। उपर्युक्त तथ्यों को देखने से विदित होता है कि राष्ट्र संघ की क्रियायें बहुत अर्थो में सफल रहीं। राष्ट्र संघ की असफलता के कारण राष्ट्र संघ का निर्माण अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे के लिए तथा- भविष्य में युद्धों को असंभव बनाने के उद्देश्य से हुआ था। परन्तु राष्ट्र संघ अपने इस उद्देश्य को पूरा करने में असफल रहा। राष्ट्र संघ की असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

1.अमेरिका का सदस्य न बनना- राष्ट्र संघ के निर्माण के पीछे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन की थी। परन्तु दुर्भाग्यवश संयुक्त राज्य अमरीका की सीनेट ने इस विश्व संगठन में अमेरिका की सम्मिलित होने की अनुमति नहीं दी। इसका परिणाम यह हुआ कि संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं बना। यह राष्ट्र संघ के लिए तथा संपूर्ण विश्व के लिए दुर्भाग्य की बात थी।

2. राष्ट्र संघ का सार्वभौम न होना-राष्ट्र संघ की सफलता इस बात पर निर्भर थी कि विश्व के अधिकांश राष्ट्र उसके सदस्य हों। परन्तु राष्ट्र संघ के इतिहास में कभी भी वह मौका नहीं आया जबकि विश्व के सभी बड़े राष्ट्र के सदस्य रहे हों। इसी कारण यह संगठन सफल न हो सका।

3. राष्ट्र के सदस्यों के परस्पर-विरोधी हित-सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था की सफलता के लिए यह आवश्यक था कि संघ के सभी सदस्य राष्ट्रों के हित समान हों। परंतु यह सम्भव नहीं था। राष्ट्र संघों की व्याख्या भी विभिन्न राष्ट्रों ने अपने-अपने परस्पर उद्देश्य के अनुरूप की। जहाँ फ्रांस राष्ट्र संघ को यथापूर्व स्थिति बनाये रखने तथा संधियों का पालन का साधन मानता था, वहीं संघ का सदस्य होने के बाद जर्मनी ने वर्साई संधि की कठोर व्यवस्थाओं को समाप्त कराने का साधन समझने लगा। रूस राष्ट्र संघ को पश्चिमी देशों का साम्यवाद विरोधी गुट समझता था। राष्ट्र संघ को सामूहिक सुरक्षा का साधन यूरोप के कमजोर राष्ट्र मानते थे।

 4.आर्थिक राष्ट्रीयता की भावना-प्रथम विश्वयुद्ध के बाद के विश्व में आर्थिक राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हुई। कुछ तो विश्व युद्ध जनित परिस्थितियों के कारण और कुछ 19291931 ई० आर्थिक मंदी के कारण "अपना माल खरीदो" की भावना ने जोर पकड़ा और चुंगी की ऊंची-दीवारें खड़ी कर दी गयीं। राष्ट्र संघ की सफलता इस बात पर भी निर्भर थी कि यूरोप के राष्ट्र पस में सहयोग करें, परन्तु अत्यधिक मंदी ने इस सहयोग के मार्ग में बड़ी बाधा उपस्थित की।

5. अधिनायकवाद-सामूहिक सुरक्षा और विश्व शांति के लिए एक आवश्यक शर्त यह होती ी कि विश्व के अधिकांश देशों में लोकतांत्रिक शासन हो। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कई कारणों से जर्मनी, इटली और स्पेन में अधिनायकवादी शासनों की स्थापना हुई। मुसोलिनी, हिटलर और जनरल फ्रांकों से शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती थी।

6. राष्ट्र संघ के संविधान का दोषपूर्ण होना-राष्ट्र सं के संविधान का दोषपूर्ण होना राष्ट्र संघ की असफलता का एक प्रमुख कारण या राष्ट्र संघ में अंतराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे के लिए निर्धारित व्यवस्था में दो बड़ी कमिया थीं पहली कमी यह यी कि किसी महत्त्वपूर्ण मामले पर कौसिल का निर्णय सर्वसम्मति से होना अनिवार्य था, परंतु इस प्रकार के निर्णय के होने की संभावना इसलिए कम हो जाती थी कि कौसिल में अक्सर कोई न कोई राष्ट्र ऐसा होता था जो व्यवस्था का उल्लंघन करके युद्ध करने वाले राष्ट्र के साथ देने के लिए तैयार रहता था दूसरी कमी यह थी कि राष्ट्र संघ उन विवादों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था जिनको कोई राष्ट्र अपने घरेलू मामला पोषित कर देता था। राष्ट्र संघ के पास अपनी कोई सेना नहीं थी किसी आक्रांता राष्ट्र के खिलाफ सैनिक कार्यवाहीं करने के लिए कौसिल राष्ट्र संघ के सदस्य राष्ट्रों से सैनिक सहायता मांग सकती थी। परन्तु सहायता देना या न देना सहयोग देने वाले राष्ट्र की अपनी इच्छा पर निर्भर था। आर्थिक प्रतिबंधों को लगाने में भी कठिनाइयां थीं ।आर्थिक प्रतिबंध लगाने में एक कठिनाई यह थी कि राष्ट्र संघ सार्वभौम नहीं था ऐसी स्थिति में अधिक प्रतिबंधों से लक्ष्य प्राप्ति की पूर्व संभावना नहीं रहती थी। उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट हो जायेगा कि राष्ट्र संघ अपने कार्यों में क्यों असफल रहा. अतः

अंतरराष्ट्रीय शांति स्थापना में किसी संगठन को तभी सफलता मिल सकती है,जब विश्व के समस्त देश प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंद्विता द्वेष, कूटनीति, गुटबंदी आदि को भूल जाएं, परंतु यह संभव नहीं है। अतः युद्ध होते रहेंगे एवं शांति स्थापना के लिए निरंतर प्रयल भी होते रहेंगे।

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