यहां आप राजनीतिक विज्ञान, इतिहास, भूगोल और वर्तमान मामलों और नौकरियों के समाचार से संबंधित उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री प्राप्त कर सकते हैं.

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत का संक्षिप्त वर्णन करते हुए इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए

कोई टिप्पणी नहीं :

राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत का संक्षिप्त वर्णन करते हुए इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए


राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धान्त राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यह सिद्धान्त सबसे पुराना है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति ईश्वर द्वारा हुई है। ईश्वर ही इसका वास्तविक नियन्ता है। वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष ढंगों से इसका शासन करता है। वह किसी शासक द्वारा राज्य का शासन करता है। इस प्रकार शासक ईश्वर का प्रतिनिधि है, वह अपने सारे राज्य के कार्यों के लिए ईश्वर के समक्ष उत्तरदायी है। अत: उसकी आज्ञाओं का पालन प्रजा का कर्तव्य है। उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन ईश्वर के प्रति पाप है। इस प्रकार जो राज्य शासक ईश्वर का प्रतिनिधि कहलाता है, जिसके द्वारा शासित होता है, उसे ईश्वर द्वारा शासित राज्य कहा जाता है। दैवी सिद्धान्त की प्रारम्भिक विचारधारा प्राचीन काल में इस प्रकार के राज्यों में जो दैवी सिद्धान्त पर आधारित थे, यहूदियों के राज्य प्रमुख थे। प्राचीन लेखों और अवशेषों से हमको पता लगता है कि ईश्वर द्वारा ही राजा का चुनाव होता था, वही उसका राज्याभिषेक करता था एवं अनुचित कार्य करने पर वही उसको मार भी डालता था। इस प्रकार शासन अपने कार्यों के लिए केवल ईश्वर के समक्ष ही उत्तरदायी था। ईश्वर के अतिरिक्त वह जनता और राज्य पर पूर्ण प्रभुता वाला था। यूनानी और रोमन राज्यों में भी आरम्भिक काल में यह विचारधारा थी। यूनानी विचारधारा बताती है कि राज्य अप्रत्यक्ष प्रकार से देवा शक्तियों पर आधारित है।

दैवी-सिद्धान्त और गिरजाघर-दैवी सिद्धान्त के द्वारा शासन की एक झलक हमको पूर्वकालीन चर्च अथवा गिरजाघरों के उन प्रभुत्वशील पुजारियों के प्रबंधों से भी मिलती है जिनको पिता अथवा फादर कहा जाता था और जिनकी शिक्षाएँ सेन्ट पॉल की रचनाओं और उपदेशों पर आधारित थीं, जो रोमन लोगों को दी गई थीं। इस विचारधारा के अनुसार संसार की सम्पूर्ण शक्तियों का उद्गम ईश्वर ही है। इस प्रकार मध्यकाल में इन चर्च अधिकारियों ने अपने राज्यों की स्थापनाएँ और उसका विस्तार करने का बहुत प्रयत्न किया, जबकि दूसरी तरफ ऐसे भी राज्य थे जो इन बच्चों के फादर्स (पिताओं) के नियमों से अपने को पूर्ण स्वतंत्र रखते थे। अत: उस का दो प्रकार के राज्यों में विरोध और संघर्ष उत्पन्न हो गया था। एक चर्च से फादर लोगों की शक्ति जो अपने को ईश्वर का प्रतिनिधि शासक बतलाते थे और दूसरे वे जो दैवी-सिद्धान्तों को नहीं मानते थे। परिणामस्वरूप चर्च के पिताओं को सैनिक संगठन का रूप दे दिया गया और 16वीं अथवा 17वीं शताब्दी तक उन्होंने पूर्णतया अपने को शासकीय ढंगों में, बदल दिया और राज्य के दैवी अधिकारों के सिद्धान्त का रूप ले लिया जो फादर लोगों अथवा दैवी शासकों को प्राप्त थे। इस परिवर्तित दैवी सिद्धान्त के रूप में मुख्य शासक जेम्स प्रथम इंग्लैण्ड में हुआ था। दैवी-सिद्धान्त का सार- अत: यह स्पष्ट है कि राज्य की उत्पत्ति का यह दैवी-सिद्धान्त निम्नलिखित धातुओं पर आधारित था

1. राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है।

2. राज्य का वास्तविक सत्ताधारी ईश्वर है।

3. ईश्वर को छोड़कर राजा की पूर्ण स्वामित्त्वशीलता है।

4. राजा की आज्ञाएँ, ईश्वर की आज्ञाएँ हैं।

5. राजा के उत्तराधिकारी का वास्तविक अधिकारी केवल ठसका वंशज ही है।

दैवी-सिद्धान्त की विशेषतायें

1. आन्तरिक व्यवस्था का प्रतीक-जब मनुष्य सभ्यता के अंधकार से शनैः-शनैः सभ्यता के उजाले में आ रहा था और जिस समय उसे अपनी क्रियाओं में नियन्त्रण और व्यवस्था के किसी महत्त्व का ज्ञान नहीं था तब किसी अदृश्य सत्ता की शक्तिशाली कल्पना उसकी असभ्य और बर्बर क्रियाओं को नियन्त्रित, संगठित और उत्तरदायित्व पूर्ण क्रियाओं के लिए विवश करती थी। इस प्रकार समाज के अन्दर कोई भी शासक अत्याचारी शासन की स्थापना अथवा स्वेच्छाचारी विधान की मनमानी रचना नहीं करता था। उसे विश्वास था कि वह राज्य ईश्वर का है जिसके हानि या लाभ का वह ईश्वर के समक्ष उत्तरदायी है।

2. अनुशासन- इस सिद्धान्त का दूसरा लाभ यह हुआ कि इसने मनुष्य के मन में अनुशासन की भावना को दूर किया जो उसके राजनैतिक विकास में बहुत अधिक सहायक हुई।

3. नैतिक विकास- के सिद्धांत का सबसे प्रमुख और महत्त्वपूर्ण लाभ यह है कि यह मनुष्य की सर्वोच्च भावनाओं की जो उसे सर्वोच्च हितों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन देती हो,जाता है तथा उसके नैतिक विकास को उन्नत कर उसके आध्यात्मिक विकास को प्रगतिशील बनाता है।

दोष- 

1. शासक की स्वेच्छाचारिता- क्योंकि राजा अपने कार्यों का उत्तरदायी केवल ईश्वर के ही समक्ष चा, जो कि एक अमूर्त सत्ता है और जिसका कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं, इसलिये उसमें स्वेच्छाचारिता की भावना बढ़ती चली गई और एक समय यह आया जब उन्होंने अपने को ही ईश्वर कहना आरम्भ कर दिया।

2. शोषण- और जब एक राजा जो कि मनुष्य ही होता था अपने को पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समझ लेता था तो वह बजाय जनता का हित करने और उसको सुख पहुँचाने के उसका शोषण ही करने लगता था।

3. अनुत्तरदायित्त्व- और जब राजा अपने ऊपर किसी शक्ति के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं समझता वह अनुत्तरदायित्त्व हो जाता था।

4.स्वतंत्र विकास में बाधा-क्यों राजा ही प्रत्येक मनुष्य की मृत्यु और जीवन मालिक होता था। अत: लोगों का स्वतन्त्र विकास असम्भव हो जाता था। इस प्रकार वह सिद्धान्त, जिसमें राजा ही ईश्वर का प्रतिनिधि और रूप था जिसमें उत्तराधिकार का अधिकार राज्य वंश के व्यक्ति को ही मिलता था, जिसमें राजा को केवल ईश्वर के समक्ष ही उत्तरदायी होना था और राजा का उल्लंघन पाप था समाप्त हो गया। राज्य की उत्पत्ति का शक्ति सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के द्वितीय सिद्धान्तों में शक्ति सिद्धान्त का नाम आता है। इस सिद्धान्त के समर्थकों का मानना है कि राज्य की उत्पत्ति शक्ति के बल पर हुई है। यह सिद्धान्त राज्य को ईश्वरीय या दैवीय संस्था न मानकर मानवीय संस्था मानता है। इस सिद्धान्त का प्रथम प्रणेता ओपेन हाइमर को माना जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार, राज्य की उत्पत्ति शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा बल प्रयोग करके निर्बल व्यक्ति को अपने आधिपत्य में करने की प्रवृत्ति के द्वारा हुई है अर्थात् दूसरे शब्दों में, शक्ति संपन्न व्यक्तियों द्वारा निर्वल व्यक्तियों पर शासन ही इस सिद्धांत का प्रमुख आधारभूत तत्त्व है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह सिद्धान्त अत्यन्त प्राचीन है। पोलिबियस को इस सिद्धान्त का प्रतिपादक माना जाता है। प्राचीन यूनान के सोफिस्टों का विश्वास था कि राज्य की उत्पत्ति शक्ति के कारण ही हुई है। राज्य के विरुद्ध होने पर तथा धर्म की सत्ता को उससे श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए मध्य युग में ईसाई पादरियों ने शक्ति को राज्य की उत्पत्ति का आधार माना। आधुनिक काल में मेकियावेली ने सर्वप्रथम राज्य की उत्पत्ति के इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। 18वीं शताब्दी में ह्यूम ने राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त का समर्थन करते हुए कहा कि जिस समय किसी मानव दल के नेता ने शक्तिशाली और प्रभावशाली होकर अनुयायियों पर अधिकार कर उन पर अपनी हुकूमत लादी होगी, उसी समय राज्य की उत्पत्ति हुई होगी। इस सिद्धान्त का वाल्टेयर ने भी समर्थन किया। व्यक्तिवादी, अराजकतावादी, साम्यवादी तथा अधिनायकवादी इस सिद्धान्त के प्रबल समर्थक हैं व्यक्तिवादियों ने व्यक्तियों के बीच प्रतियोगिता पर बल देते हुए कहा कि जो शक्तिशाली होता है वही बचता है। इस मान्यता के आधार पर उन्होंने कहा कि राज्य की उत्पत्ति का आधार शक्ति है। हर्बर्ट स्पेंसर ने शक्ति को राज्य का कारण माना। अराजकतावादियों ने राज्य को एक अनावश्यक बुराई मानते हुए कहा कि इसका जन्म शक्ति से हुआ है। साम्यवादियों ने वर्ग संघर्ष को राज्य की उत्पत्ति का कारण माना है। वह (राज्य) वर्ग-विशेष का प्रतिनिधित्त् और उसके हितों की रक्षा करता है। शक्तिशाली और शोषक वर्ग कमजोर और शोषितों का शोषण करता है। राज्य शोषक वर्ग का रक्षक होता है और उसके हितों की रक्षा करता है। शक्तिशाली और शोषक वर्ग कमजोर और शोषितों का शोषण करता है। राज्य शोषक वर्ग का रक्षक होता और उसके हितों की रक्षा करता है। अधिनायकवादी दार्शनिकों ने भी इसी सिद्धांत का समर्थन किया है। वर्डहार्डी और नीत्से इस सिद्धान्त के प्रबल समर्थक हैं। सभी अधिनायकवादी सिद्धान्ततः और व्यवहारतः दोनों ही दृष्टियों से इसी सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। ओपेनेहाइमर वर्तमान समय में इस सिद्धान्त के प्रबल समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने मनुष्य की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं का विश्लेषण करते हुए कहा है कि वह अपने श्रम अथवा बल-प्रयोग कर दूसरे के श्रम से उनकी पूर्ति करता है। पहला ढंग आर्थिक और दूसरा राजनीतिक है। राज्य की उत्पत्ति का ढंग राजनीतिक है अर्थात् सबलों ने निर्बलों के श्रम से अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए राज्य को जन्म दिया। सिमेल, जेंक्स, वार्ड और स्माल आदि भी इस सिद्धान्त के समर्थक हैं।

शक्ति सिद्धान्त के आधारभूत तत्त्व- शक्ति सिद्धान्त के मूलतः चार आधारभूत प्रमुख तत्त्व हैं जो अनलिखित हैं

1.राज्य की उत्पत्ति शक्ति से हुई है अर्थात् शक्तिशाली लोगों ने निर्बलों पर आधिपत्य जमा कर राज्य को जन्म दिया।

2. मनुष्य स्वभाव से अधिकार लोलुप और झगड़ालू है। अत: वह निर्बलों पर आधिपत्य जमाना चाहता है। इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप राज्य की उत्पत्ति हुई है।

3. शक्ति ही न्याय है, यह प्राकृतिक नियम है।

4. युद्ध के कारण राजा पैदा हुआ।

शक्ति सिद्धान्त का महत्त्व यद्यपि आज भी इस सिद्धान्त के अनेक प्रबल समर्थक हैं तथापि राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में इस सिद्धांत को मान्यता देने की कटु आलोचना की जाती है। इस आलोचना के बावजूद यह बात इनकार नहीं की जा सकती है कि अनेक राज्यों का जन्म युद्ध से हुआ तथा आज भी प्रत्येक राज्य सिद्धान्ततः युद्ध की आलोचना करते हुए व्यवहारतः उनमें विश्वास करता है। पुलिस और सेना सभी राज्यों के आधार हैं। आन्तरिक शान्ति एवं व्यवस्था तथा बाह्य आक्रमणों से रक्षा के लिए राज्य शक्ति का ही सहारा लेते हैं। यह एक सत्य है परन्तु विश्लेषण से बात स्पष्ट हो जाती है कि राज्य के लिए यही सब कुछ नहीं है। यह एक आंशिक सत्य है। उपर्युक्त विवेचना के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि राज्य की उत्पत्ति के अन्य सिद्धान्तों की तरह यह सिद्धान्त भी आलोचनाओं से अछता नहीं है फिर भी राज्य की उत्पत्ति में शक्ति सिद्धान्त का महत्त्वपूर्ण योगदान है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शक्ति के अभाव में किसी भी राज्य का अस्तित्त्व असंभव है।

कोई टिप्पणी नहीं :

टिप्पणी पोस्ट करें