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राज्य की गाँधीवादी दृष्टिकोण की विवेचना

राज्य की गाँधीवादी दृष्टिकोण की विवेचना 

गाँधी जी एक आध्यात्मिक विचारक थे उन्होंने राजनीति का अध्यात्मीकरण किया और धर्म तथा राजनीति में समन्वय स्थापित किया। उनके राज्य सम्बन्धी विचार नैतिकता से परिपूर्ण है। ऐसा प्रतीत होता है गाँधी जी की राज्य सम्बन्धी अवधारणा टालस्टाय जैसे अराजकतावादियों से प्रभावित है। गाँधी जी अपने समकालीन अनेक राज्यों की गतिविधियों का अवलोकन किया था और उनकी हिंसा तथा बर्वरता का भी गहरा अनुभव किया था। इसलिए राज्य के विरोधी बन गए थे। और उन्हेंने एक राज्य विहीन आदर्श समाज अथवा रामराज्य की परिकल्पना की थी जो एक आदर्शवादी अथवा कल्पनालोकी विचारधारा थी जो यर्थाथ में कमी सम्भव नहीं है। फिर भी उनकी अवधारणा अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। राज्य एक बुराई-गाँधी जी 'टालस्टाय' के अराजकतावादी विचारों से बहुत प्रभावित थे। टालस्टाय की भाँति वे भी राज्य को एक अनावश्यक बुराई मानते थे जो मानव जीवन के नैतिक मूल्यों पर आयात करता है। गाँधी जी ऐतिहासिक, आर्थिक तथा नैतिक आधार पर भी राज्य को निरर्थक समझते थे। आध्यात्म से प्रभावित होने के कारण गाँधी जी यह चाहते थे कि मानव के समस्त कार्य स्वतः और स्वेच्छा से किए जाने चाहिए परन्तु राज्य रूपी संस्था इस कार्य में बाधा उत्पन्न करती है और इसी कारण गाँधी जी राज्य के विरोध में अधोलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं

(1) राज्य हिंसा का प्रतीक-गाँधी जी का कहना है कि राज्य हिंसा का प्रतीक होता है। उनके अनुसार चाहे राज्य का स्वरूप कितना ही लोकतान्त्रिक क्यों न हो, उसका मूल हिंसा ही है। हिंसा में शोषण का भाव निहित होता है और शोषण सदा निर्धनों का होता है। गाँधी जी के शब्दों में-"राज्य की शक्तियों में वृद्धि को मैं सबसे अधिक भय की दृष्टि से देखता हूँ क्योंकि यद्यपि वह शोषण को कम करके भलाई करते हुए दिखाई पड़ता है तथापि व्यक्तित्व का विनार करके, जो प्रगति का मूल है मानव जाति को सबसे बड़ी क्षति पहुंचाता है। राज्य हिंसा का संगठित रूप है। व्यक्ति की आत्मा होती है परन्तु राज्य तो एक आत्महीन मशीन है उसे हिंसा से कभी अलग नहीं किया जा सकता है जिसके कारण उसका जन्म हुआ है।

(2) राज्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विरोधी-गाँधी जी का मत है कि राज्य व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का प्रबल विरोधी है। उसे व्यक्ति के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप कना चाहिए। वे 'ब्यूरो' के इस मत से सहमत हैं कि वही शासन सर्वोत्तम है जो कम से कम शासन करता है। गांधी जी का कहना है कि-"वह राज्य पूर्ण तथा अहिंसात्मक है जिसमें जनता पर सरकार का कम से कम शासन है। विशुद्ध अराजकता का निकटतम दृष्टिकोण अहिंसा पर आधारित लोकतन्त्र है।"

(3) राज्य साध्य नहीं साधन है-गाँधी जी के विचारों में राज्य एक साधन है साध्य नहीं। गांधी जी के अहिंसात्मक राज्य का उद्देश्य सर्वोदय या सर्व हित है इस उद्देश्य को प्राप्ति के लिए अहिंसक राज्य व्यक्ति को अधिक से अधिक विकास के अवसर प्रदान करेगा। आधुनिक राज्य, जिसकी उत्पत्ति हो हिंसा से हुई है निर्धनों का शोषण करता है। राज्य स्वशासन में हस्तक्षेप करता है। 2 जुलाई 1931 के यंग इण्डिया पत्र' में गाँधी जी ने लिखा था कि-
"मेरे लिए राजनीति सत्ता एक साध्य नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उसे करने का एक साधन है। राजनीतिक सत्ता का अर्थ है राष्ट्र के प्रतिनिधियों द्वारा राष्ट्रीय जीवन को नियमित करने की शक्ति। यदि राष्ट्रीय जीवन इतना पूर्ण हो जाता है कि वह आत्म अनुशासित बन सके तो किसी प्रतिनिधि की कोई आवश्यकता नहीं है वह एक ज्ञानमय अराजकता की स्थिति होगी। ऐसी अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपना शासक होगा। यह अपने कपर इस प्रकार शासन करेगा, जिससे कि वह अपने पड़ोसियों के लिए एक बाधा न बने। इसलिए एक आदर्श अवस्था में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होगी, क्योंकि उसमें कोई राज्य न होगा।

(4) राज्य के कार्य क्षेत्र का विस्तार-गाँधी जी के अनुसार आधुनिक राज्य का कार्य क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होता रहा है उनकी कमना के अहिंसात्मक राज्य में जीवन की सरलता, विकेन्द्रीकरण, वर्ग संघर्ष का अभाव तथा असैनिकवाद होगा। राज्य के कार्यों में कमी हो जायेगी तथा वे स्वैच्छिक संस्थाओं में हस्तांतरित हो जायेंगे। राज्य शक्ति का भी कम से कम प्रयोग करेगा।

(5) आदर्श समाज-गाँधी जी सभी अपराधों को परिस्थितिजन्य समझते थे उनका कहना है कि अहिंसक आदर्श समाज में व्यक्ति अपराध रहित हो जायेंगे दण्ड व्यवस्था तथा बल प्रयोग की कोई आवश्यकता न रहेगी। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि गांधी जी 'वैकुनिन' तथा 'प्रिन्स क्रोपोटकिन के समान हिंसावादी अराजकतावादी नहीं थे। वे वर्तमान समाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए हिंसा को आवश्यक नहीं समझते थे। गांधी जी एक आदर्श अहिंसक राज्य अथवा समाज को कल्पना करते थे। उनका रामराज्य स्वराज्य का आदर्श थे। इसका अर्थ है न्याय और प्रेम का राज्य है अहिंसक स्वराज अथवा जनता का राज्य है।

आदर्श राज्य : अहिंसात्मक राज्य महात्मा गांधी ने जिस आदर्श समाज (कार्य) की व्यवस्था की स्थापना की अथवा परिकल्पना की ठसे वे रामराज्य की संज्ञा देते हैं। गांधीजी ने प्लेटो के समान ही दो आदर्शों का वर्णन किया है-प्रथम पूर्ण आदर्श जिसे वे राम-राज्य कहते हैं और द्वितीय, उप-आदर्श जिसे वे 'अहिंसात्मक समाज कहकर पुकारते हैं। उनके पूर्ण आदर्श सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत राज्य के लिए कोई स्थान नहीं है वे राज्यविहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे। इसलिए उनके द्वारा व्यावहारिक दृष्टिकोण से उप आदर्श की कल्पना की गयी है।

उनके उप-आदर्श राज्य की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

1. अहिंसात्मक समाज-गाँधी जी अपने आदर्श राज्य को अहिंसात्मक समाज के नाम से भी पुकारते हैं। गाँधी जी के इस आदर्श समाज में राज्य संस्था का अस्तित्व रहेगा और पुलिस,जेल, सेना तथा न्यायालय आदि शासन की बाध्यकारी सत्ताएँ भी होंगी। फिर भी यह इस दृष्टि से अहिंसक समाज है कि इसमें इन सत्ताओं का प्रयोग जनता को आतंकित और ठत्पीड़ित करने के लिए नहीं वरन् उसकी सेवा करने के लिए किया जायेगा ।

2.शासन का लोकतांत्रिक स्वरूप-गाँधी जी के आदर्श समाज में शासन का रूप पूर्णतया लोकतांत्रिक होगा। जनता को न केवल मत देने का अधिकार प्राप्त होगा वरन् जनता सक्रिय रूप में शासन के संचालन में भी भाग लेगी। शासन सत्ता सीमित होगी और सभी सम्भव रूपों में जनता के प्रति उत्तरदायी होगी।

3. आर्थिक क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण-गाँधी जी के आदर्श राज्य में आर्थिक क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण को अपनाने का सुझाव दिया गया है। विशाल तथा केन्द्रीयकृत उद्योग लगभग समाप्त कर दिये जायेंगे और उनके स्थान पर कुटीर उद्योग चलाये जायेंगे। उन मशीनों का तो प्रयोग किया जा सकेगा जो व्यक्तियों के लिए सुविधाजनक होंगी किन्तु मशीनों को मानवीय श्रम के शोषण का साधन नहीं बनाया जायेगा। इस प्रकार आर्थिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और शोषण का अन्त हो जायेगा।

4.नागरिक अधिकारों पर आधारित राजव्यवस्था-गांधी जी का आदर्श समाज-स्वतंत्रता, समानता तथा अन्य नागरिक अधिकारों पर आधारित होगा। उस समय में प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने और समुदायों के निर्माण की स्वतंत्रता होगी। इस समाज के अन्तर्गत जाति, धर्म, भाषा, वर्ण और लिंग आदि भेदभाव के बिना सभी व्यक्तियों को समान सामाजिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त होंगे।

5. निजी सम्पत्ति का अस्तित्व-(ट्रस्टीशिप की अवधारणा) इस आदर्श राज्य में निजी सम्पत्ति की प्रथा का अस्तित्व होगा, किन्तु सम्पत्ति के स्वामी अपनी सम्पत्ति का प्रयोग निजी स्वार्थ के लिए नहीं वरन् समस्त समाज के कल्याण के लिये करेंगे। वे यह समझ कर कार्य करेंगे कि उनके पास जो सम्पत्ति है उनका वास्तविक स्वामी समाज ही है और समाज के द्वारा उन्हें इस सम्पत्ति का सुरक्षा या ट्रस्टी नियुक्त किया गया है।

6. वर्ण व्यवस्था-गाँधी जी का आदर्श समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित होगा। प्राचीन काल की भांति समाज चार वर्गों में विभाजित होगा-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रा। प्रत्येक वर्ण वंश-परम्परा के आधार पर अपना कार्य करेगा, किन्तु विविध वर्गों के व्यक्तियों को सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्र में समान अधिकार प्राप्त होंगे और किसी प्रकार की ऊँच-नीच की भावना नहीं होगी।

7.अस्पृश्यता का अन्त-गाँधी जी अस्पृश्यता को भारतीय समाज के लिए कलंक मानते थे और उनके आदर्श समाज में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं था।

8.धर्मनिरपेक्ष समाज-इस समाज में किसी एक विशेष धर्म को राज्य का आश्रय प्राप्त नहीं होगा। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान होंगे और सभी धर्मों के अनुयायियों को समान सुविधाएँ प्राप्त होंगी।

9. गो-वध निषेध-गांधी जी भारत जैसे राज्य में धार्मिक तथा आर्थिक दोनों ही दृष्टि से गाय की रक्षा को बहुत अधिक आवश्यक मानते थे। इसलिए उनके द्वारा अपने आदर्श समाज में गौ हत्या का निषेध किया गया है।

10. मद्य-निषेध-गांधी जी का निश्चित विचार था कि मद्य और अन्य मादक पदार्थों का प्रयोग व्यक्तियों का चारित्रिक पतन करता है। अत: उनके आदर्श समाज में मादक पदार्थों का न तो उत्पादन होगा न उसकी बिक्री।

11. निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा-गाँधी जी के आदर्श समाज में गाँव-गाँव में बुनियादी तालीम देने के लिए स्वावलम्बी पाठशालाएँ होंगी, जिससे प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम प्राथमिक शिक्षा निःशुल्क प्रदान की जायेंगी।

12, पुलिस और सेना-गाँधी जी मानते थे कि सभी व्यक्ति अहिंसावादी नहीं हो सकते। समाज विरोधी तत्वों का दमन करने के लिए पुलिस की आवश्यकता यदा-कदा पड़ सकती है परन्तु आधुनिक पुलिस से उसका स्वरूप भिन्न होगा। व्यक्ति नौकरी पाने के लिए नहीं अपित जनता की सेवा की भावना से पुलिस में भर्ती होंगे चूँकि आदर्श राज्य केवल एक देश तक सीमित नहीं है, वह सम्पूर्ण विश्व के लिए एक आदर्श व्यवस्था है। ऐसी स्थिति में संसार के देश यु प्रिय नहीं, शान्ति प्रिय होंगे। शान्ति के लिए यदि किसी सेना की आवश्यकता हो तो वा होगी-शान्ति सेना। आदर्श राज्य में डॉक्टरों की लम्बी-चौड़ी फौज की आवश्यकता नहीं होगी कार्य करने की परिस्थितियाँ स्वस्थ होंगी। बड़े-बड़े नगर और मशीनें नहीं होंगी। रोग और गन्दगी का अभाव होगा फिर भी यदि कुछ डॉक्टर हुए तो वे समाज-सेवी होंगे, धन-लोलुप नहीं। गांधी जी के आदर्श राज्य की व्यवहारिकता गाँधी जी का अहिंसक समाज क्या इस पृथ्वी पर सम्भव है ? अथवा उनका चिन्तन प्लेटो की भाँति कल्पना लोक का ही विषय है? गाँधी जी स्वयं मानते थे कि उनके आदर्श समाज की स्थापना पूर्ण रूप से कभी सम्भव नहीं है। उन्हीं के शब्दों में, "एक सरकार कभी भी पूर्णरूप से अहिंसक नहीं बन सकती है क्योंकि इसमें सभी प्रकार के व्यक्ति रहते हैं मैं ऐसे स्वर्ण युग की कल्पना नहीं करता जब ऐसा समाज स्थापित होगा किन्तु मैं ऐसे समाज की स्थापना में विश्वास रखता हूँ जो प्रधान रूप से अहिंसक हो और मैं इसके लिए प्रयत्न कर रहा हूँ। अगर हम ऐसे समाज के लिए प्रयत्न करते रहे तो वह किसी हद तक धीरे-धीरे बनता रहेगा और उस हद तक लोगों को उससे फायदा पहुंचेगा।"

गाँधी जी : एक दार्शनिक अराजकतावादी-राज्य के सम्बन्ध में गाँधी जी की विचारधारा अराजकतावादी दार्शनिक क्रोपाटकिन और विशेष रूप से दार्शनिक अराजकतावादी टॉलस्टॉय के विचारों से प्रभावित है। गाँधी जी ने नैतिक, दार्शनिक और ऐतिहासिक तीनों दृष्टिकोणों के आधार पर राज्य की कटु आलोचना की है। गाँधी जी राज्य को एक ऐसी हिंसक संस्था मानते हैं जिसका कार्य निर्धन वर्ग का शोषण करना है। राज्य द्वारा नैतिकता का हनन किया जाता है। अतः या तो राज्य को समाप्त हो जाना चाहिए अन्यथा उसे व्यक्तिरूपी पुस्तक का अन्तिम अध्याय होना चाहिए। स्वयं गाँधी जी के शब्दों में,"राज्य केन्द्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति एक सचेतन आत्मवान प्राणी है किन्तु राज्य एक ऐसा आत्महीन यन्त्र है जिसे हिंसा से पृथक् नहीं किया जा सकता क्योंकि इसकी उत्पत्ति ही हिंसा से हुई है।"

गाँधी जी के राज्यविहीन समाज में सभी व्यक्ति पूर्णतया अहिंसक होंगे। उनकी सभी आवश्यकताएँ पूरी होंगी। अतः अपराध नहीं होंगे। फिर पुलिस की आवश्यकता है ही नहीं। यदि कहीं छुट-पुट अपराध हुए तो उनका निर्णय ग्राम पंचायत कर लिया करेगी। ऐसे समाज में सभी अपने शासका होंगे। वे अपने ऊपर इस प्रकार शासन करेंगे कि दूसरों के मार्ग में बाधक न बनें। . जीवन स्वच्छ, निर्मल और सादा होगा। न बड़े-बड़े नगर होंगे, न गन्दी बस्तियाँ न आधुनिक सभ्यता की तड़क-भड़क होगी और न उससे उत्पन्न रोग। न बढ़ी-बड़ी मशीनें होंगी और न ही मनुष्य का शोषण।

सिद्धान्त रूप में राज्य के अस्तित्व के विरुद्ध होने पर भी गाँधी जी वर्तमान परिस्थितियों में राज्य को समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे। उनका विचार था कि वर्तमान समय में मानव जीवन इतना पूर्ण नहीं है कि वह स्वयं संचालित हो सके, इसीलिए समाज में राज्य और राजनीतिक शक्ति की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ-साथ ही उनका विचार है कि राज्य का कार्यक्षेत्र न्यूनतम होना चाहिए। इस प्रकार गाँधी जी के राज्य सम्बन्धी विचारों को "सैद्धान्तिक दृष्टि से अराजकतावादी तथा व्यवहार में व्यक्तिवादी कहा जा सकता है किन्तु गाँधी जी न तो क्रोपाटकिन और बाकुनिन की तरह हिंसा के आधार पर राज्य को समाप्त करने के पक्ष में थे और न ही उनका व्यक्तिवाद वह पाश्चात्य व्यक्तिवाद है जिसका परिणाम पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना होती है।

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