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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

राज्य के उदारवादी दृष्टिकोण (सिद्धान्त) की विवेचना

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राज्य के उदारवादी दृष्टिकोण (सिद्धान्त) की विवेचना 


राज्य की प्रकृति अथवा कार्यक्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में जानने से पहले उदारवाद क्या है। यह जानना जरूरी है। सामान्यतया उदारवाद को अनुदारवाद का विपरीतार्थक मान जाता है। अनुदारवादी प्रायः उन लोगों को कहा जाता है जो पूर्व में प्रचलित राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं, परम्पराओं, रूढ़ियों को बनाये रखने में विश्वास रखते हैं तथा इस वर्ग के लोग सुधार अथवा परिवर्तन से डरते हैं और उनका विरोध करते हैं, इसके विपीत्त उदारवादी भविष्य की प्रगति की ओर देखते हैं अतीत से उन्हें कोई मोह नहीं होता इसलिए वे परिवर्तनों का स्वागत करते हैं और प्रायः क्रान्ति से भी नहीं डरते। वास्तव में उदारवाद के सम्बन्ध यह दृष्टिकोण सही नहीं है। वास्तविकता यह है कि उदारवादी लोकतन्त्र तथा व्यक्तिवाद का मिश्रण है। प्रायः लोकतन्त्र को उदारवाद का नाम से भी सम्बोधित किया जाता, लेकिन यह सीमित अर्थ में सही है। आधुनिक लोकतन्त्र बहुसंख्यक वर्ग की सत्ता में विश्वास करता है, लेकिन उदारवाद सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में बुहसंख्यक वर्ग की अपेक्षा अल्पसंख्यक वर्ग के हित के रक्षा के प्रति अधिक जागरूक है। इस प्रकार उदारवाद लोकतंत्र से कुछ अधिक हो जाता है। उदारवाद परिवर्तन एवं प्रगति का सन्देश देता है और व्यक्तिवाद तथा लोकतंत्र भी इसमें शामिल है। इस सन्दर्भ में मैक्गवर्न का कथन है "एक राजनीतिक सिद्धान्त के रूप में उदारवाद दो पृथक तत्वों का मिश्रण है। इनमें पहला तत्त्व लोकतंत्र और दूसरा व्यक्तिवाद राजनीतिक शब्दकोश के अनुसार, "उदारवाद वैयक्तिक अधिकारों में विश्वास का बुनियादी सिद्धान्त है। सामान्य शब्दों में उदारवाद की संज्ञा एक विशाल नदी से की जाती है, जिसमें कई छोटी-छोटी नदियाँ आकर मिलती हैं और एक साथ प्रवाहित होती हुई विभिन्न शाखाओं प्रशाखाओं में फूट निकलती हैं।"

उदारवाद के मूलभूत सिद्धान्त (राज्य की प्रकृति के उदारवादी दृष्टिकोण) उदारवाद के मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं जिनका वर्णन अग्रलिखित शीर्षकों के आधार पर किया जा सकता है

1. मानवीय स्वतंत्रता की अवधारणा में विश्वास- उदारवाद नागरिक (मानवीय) स्वतंत्रता का प्रबल पोषक है। नागरिकों को विधि के द्वारा आवश्यक स्वंत्रता प्रदान की जानी चाहिए। यह निश्चित विधान एवं विधि की व्यवस्था चाहता है, ताकि स्वेच्छाचारी शासन का अंत हो सके तथा व्यक्ति का विकास तीव्र गति से सम्भव हो सके।

2. मानवीय विवेक में आस्था- उदारवाद बुद्धि एवं विवेक का समर्थक है तथा भावना एवं विश्वास पर विवेक का अधिकार चाहता है। इससे ऐसा लगता है कि उदारवाद इच्छा पर विवेक को प्रधानता देकर स्वतंत्र चिंतन के महत्त्व को प्रतिपादित करना चाहता है। उदारवादियों के अनुसार, किसी भी निर्णय की कसौटी अंधविश्वास या परम्परा नहीं है, अपितु बुद्धि है।

3. व्यक्ति साध्य तथा समाज और राज्य साधन- उदारवाद व्यक्ति की गरिमा और प्रतिष्ठा को बनाये रखना चाहता है। समाज और राज्य व्यक्ति की प्रगति और उत्थान के साधन हैं। इस विचारधारा के समर्थकों का कथन है कि समाज व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और सरकार समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है।

4. रूढ़ियों तथा परम्पराओं का विरोध- उदारवाद व्यक्ति को प्राचीन रूढ़ियों एवं परम्पराओं का दास नहीं बनना चाहता। परम्पराएँ चाहे कितनी ही अच्छी हों, किन्तु उनकी अंधभक्ति का उदारवादी विरोध करते हैं। प्रगति एवं विकास के लिए यदि परम्पराओं का विरोध भी करना पड़े, तो किया जाना चाहिए।

5. व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों की अवधारणा में विश्वास-उदारवादी कुछ प्राकृतिक या नैसर्गिक अधिकार मानते हैं, जो जन्म लेते ही व्यक्ति को मिल जाते हैं। लॉक ने जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता को नैसर्गिक अधिकार ही बतलाया था। राज्य को इनकी रक्षा करनी चाहिए।

6. लोकतंत्र में आस्था- आधुनिक उदारवाद अन्य शासन-प्रणालियों की अपेक्षा लोकतंत्र को उत्कृष्ट शासन-प्रणाली मानता है। लोकतंत्र में शासकों को आसानी से बदला जा सकता है| तथा लोकतंत्र जनता के अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।

7.राज्य का उचित हस्तक्षेप- आधुनिक उदारवाद राज्य के उचित हस्तक्षेप का विरोधी नहीं है। लोक कल्याण एवं सार्वजनिक हित की भावना से राज्य द्वारा पूँजीपतियों एवं शोषणकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं। राज्य द्वारा मजदूरों के हित के लिए उचित विधियों का निर्माण किया जा सकता है।

8.कल्याणकारी राज्य की व्यवस्था- आधुनिक उदारवाद राज्य के लोक कल्याणकारी स्वरूप को स्वीकार करता है। राज्य को व्यक्ति के सुख एवं सुविधा के लिए अधिक से अधिक कार्यों का संपादन करना चाहिए।

9.धर्मनिरपेक्ष राज्य का आदर्श- उदारवाद धर्मनिरपेक्ष राज्य की संकल्पना में अगाध श्रद्धा रखता है। राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए जकड़ा जाना चाहिए। और व्यक्ति को घार्मिक बंघनों में नहीं जकङा जाना चाहिए।

10. नैतिक और भौतिक आवश्यकताओं में मिश्रण- आधुनिक उदारवाद न केवल नैतिकता पर बल देता है, अपितु भौतिक उपलब्धियों को भी आवश्यक मानता है। भौतिक उन्नति नैतिक उन्नति का पूरक है, किन्तु वह अनुचित एवं अनैतिक साधनों का विरोधी है।

11. अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना- उदारवादी विचारधारा के अनुसार, विश्व के सभी राष्ट्रों को पारस्परिक सहयोग के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करना चाहिए। उदारवादियों के अनुसार, सभी राष्ट्रों को उन्नति के समान अवसर मिलने चाहिए। उदारवाद की आलोचना- एडमंड बर्क के अनुसार, उदारवाद ऐतिहासिक परंपराओं की उपेक्षा करता है। परम्पराएँ ऐतिहासिक अतीत के अनुभवों का संचन है जिनकी उपेक्षा अनुचित है। परम्परागत उदारवाद भावनाओं की अपेक्षा विवेक पर बल देती है, जो ठीक नहीं। भावनाएँ, विवेक और घटनाएँ मिलकर ही जीवन की प्रगति का निर्धारण करती हैं उदारवाद स्वतंत्रता और वैयक्तिक अधिकार की इकाई होता है, बाद में राज्य की सत्ता को स्वीकार कर लेता है अतः प्रारंभ में राज्य के हस्तक्षेप का विरोधी तथा राज्य का समर्थक बन जाता है। और राज्यवाद के लिए मार्ग प्रशस्त करने लग जाता है। निष्कर्ष-उदारवाद की उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद उसके महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। उसके द्वारा 'मुक्त व्यापार पर बल दिया गया, घर्म और राजनीति को पृथक् किया गया, स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र का समर्थन किया गया। यह एक प्रगतिवादी और रचनात्मक विचारधारा है, जो वर्तमान में लोकतांत्रिक समाजवाद और कल्याणकारी राज्य के रूप में प्रकट हुई है।

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