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बुधवार, 8 जुलाई 2020

राज्य के सावयव सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

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राज्य के सावयव सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण 

राज्य की सावयव सिद्धान्त - सावयव सिद्धान्त के अन्तर्गत राज्य को शरीर का रूप माना गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग होने हैं और वह नसे मिलकर बनता है। उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अंग होते हैं। और यह उनसे मिलकर बनता जिस प्रकार शरीर अंगों का समूह होता है और उसका उन अंगों से पृथक भी अस्तित्व होता है, सी प्रकार यद्यपि व्यक्तियों से मिलकर राज्य का निर्माण होता है। किन्तु इन व्यक्तियों से पृथक भी राज्य का अपना एक अस्तित्व होता है, जिस प्रकार शरीर से पृथक अंगो का कोई अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार राज्य से पृथक व्यक्तियों का कोई अस्तित्व नही होता है। प्राणी शरीर के समान्य ही राज्य भी विकासशील होता है। इस प्रकार सावयव सिद्धान्त राज्य को कल्पना मात्र न मानकर उसको एक वास्तविक व्यक्ति शरीर मानता है और इसके अनुसार राज्य और व्यक्ति में उसी प्रकार की अंतर्निर्भरता का सम्बन्ध है, जिस प्राकर का सम्बन्ध शरीर और उसके विभिन्न शारीरिक अंगों में होता है। गार्नर के अनुसार "सावयव सिद्धान्त एक प्राणिवैज्ञानिक धारणा है, जो राज्य को जीवधारी व्यक्ति मानता है, उसका निर्माण करने वाले व्यक्तियों को जीवधारी शरीर के कोष्ठों के समान समझाता है और राज्य तथा व्यक्ति के बीच ठीक उसी प्रकार के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध की कल्पना करता है, जैसा सम्बन्ध शरीर और उसके अंगों के बीच होता है। सिद्धांत एवं विकास - वस्तुत: सावयव सिद्धांत, उतना ही पुराना है, जितना कि स्वतः राजनीतिक विचारधारा। प्लेटो ने राज्य का एक वृहत् आकार का मनुष्य बतलाकर व्यक्ति तथा राज्य बीच पूर्ण सादृश्य स्थापित किया है। उसने समाज को तीन वर्गों में विभाजित किया-शासक, सिद्धा तथा श्रमिक और इस विभाजन का आधार मानव आत्मा के तीन गुण-बुद्धि, साहस, तथा इन्द्रिय तृष्णा-माने हैं। अरस्तु ने भी राज्य तथा उसे नागरिक की तुलना शरीर तथा अंगों से की है मन विद्धान सिसरो भी इसी विचारधारा का समर्थन है और वह राज्य के प्रधान को मानव शरीर र शासन करने वाली आत्मा की उपमा देता हैं मध्य युग में जॉन ऑफ सैलिबसरी,मार्सिग्लिआ ऑफ पेडुआ, ओक्हम, अल्थ्यूश्यिस, थामस एक्वीनास, आदि कई मध्यकालीन लेखक ने भी स सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इनके याद हॉब्स और रूसो ने भी इसी प्रकार के विचारों का उत्पादन किया। हॉब्स ने अपनी राजय-विषयक पुस्तक का नाम लेवायथन' (Levaithan) र्थात्' "विशालकाय जलीय जन्तु" रखा है, परन्तु हॉब्स और रूसो की विवेचना और तुलना त्यधिक अतिशयोक्तिपूर्ण है।

19वीं सदी के प्रारम्भ में राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सामाजिक समझौता सिद्धान्त का हास होने के साथ ही सावयव सिद्धान्त को नवीन अभिव्यक्ति प्राप्त हुई । ग्राचीन युग और म युग के विचारों ने तो मानव शरीर के बीच तुलता ही उपस्थित की थी, उनका यह विचार था कि विम्य मानव शरीर या जीवधारी से मिलता-जुलता है, किन्तु 19वीं सदी तक विचारक इससे आगे गये और उन्होंने राज्य को जीवधारी या मानव शरीर ही माना। विस्तार के साथ, इस प्रकार की धारणा का प्रतिपादन किया गया और उस काल में राज्य रूपी शरीर के साथ पोषक व्यवस्था जैविक प्रणाली, परिचालन व्यवस्था, आदि गुण भी जोड़ दिये गये। राज्य के सम्बन्ध में इन पान विचारधारा का जन्म जर्मनी मे हुआ। और वहाँ इसे फिक्टे और ब्लंटशली की विचारधारा प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ। ब्लंटशली ने तो इस सिद्धान्त को पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया।

असमानताएँ-इतना साम्य होते हुए भी स्पेन्सर स्वीकार करता है कि राज्य व मानव शरीर में प्रमुख रुप से दो भेद हैं

(1) पारस्परिक निर्भरता की सीमा में भेद- जीवन रूपी शरीर के अंग यदि एक सरे या शरीर से अलग हो जाएँ, तो उनका अस्तित्व नहीं रहता, जैसे- हाथ या पैर को शरीर से लग कर देने पर उसका कोई उपयोग और महत्व नहीं रहेगा, लेकिन यदि राज्य के अंग अलग कर दिये जॉय तो भी उनका महत्व बना रहता है। उदाहरण के लिए, राज्य के नष्ट हो जाने पर भी उसे अंग मनुष्य का कुछ महत्व बना रहेगा।

(2) चेतना शक्ति का भेद - शरीर के अन्तर्गत समस्त चेतना शक्ति मस्तिष्क में केन्द्रित होती है. और शरीर के अंगों की अपनी कोई पृथक चेतना नहीं होती, किन्तु राज्य में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी पृथक-पृथक चेतना शक्ति होती है, ज़ो दूसरों से पूर्ण तथा स्वतन्त्र होती है।

इस समानताओं के आधार पर स्पेन्सर ने यह निष्कर्ष निकाला कि समाज में प्रत्येक के कल्याण की बात सोची जाती है। और समाज का अस्तित्व अपने सदस्यों के कल्याण हेत ही होता है। समाज के सदस्य इसके कल्याण का साधन मात्र नहीं है। स्पेन्सर के व्यक्तिवादी दृष्टिकोण का यही केन्द्रीय भाव है। स्पेन्सर के अतिरिक्त जिन लेखकों ने सावयव सिद्धान्त का व्यापक रूप में प्रयोग किया है, उनमें आस्ट्रियन विचारक एलबर्ट स्कैफिल,रूसी विद्धान पॉल लैनिनिफील्ड, फांसीसी विद्धान रेन वर्म्स , काम्टे, गमप्लाविज, आदि प्रमुख हैं। आलोचना - साहित्यिक दृष्टि से प्राणी शरीर तथा राज्य की तुलना भले ही रूचिकर प्रतीत हो, किन्तु वास्तविक अर्थ में राज्य और मानव शरीर के बीच समानता नहीं है और न ही सावयव सिद्धान्त राज्य के स्वरूप की पूर्णतया सन्तोषजनक व्याख्या है। लार्ड एक्टन ने तो इस प्रकार की समानताओं,रूपकों एवं अलंकारों के मायाजाल के विरूद्ध चेतावनी दी है।" जेलीनेक का कथन है कि सकती है।

" इस सिद्धान्त की प्रमुख रूप से निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जा सकती है

(1) समानता पूर्ण नहीं है- कई बातों के सम्बन्ध में शरीर तथा राज्य में कोई समानता नहीं है। जिन तत्वों से शरीर बनता है, उनकी तुलना व्यक्ति से नहीं की जा सकती है, शरीर के घटकों का कोई पृथक व्यक्ति, इच्छा व चेतना नहीं होती है, वे पदार्थ के अंशमात्र होते हैं, किन्तु व्यक्ति का एक पृथक अस्तित्व इच्छा एवं चेतना शक्ति होती है। यह सत्य है कि समाज तथा राज्य के बिना व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कर सकता है, परन्तु वह उसके बिना जीवित अवश्य ही रह सकता है।

(2) व्यक्ति का स्थान पूर्व-निर्धारित नहीं होता - शरीर के अन्तर्गत विभिन्न अंगों का स्थान पूर्व-निर्धारित होता है। शरीर के प्रत्येक अंग के स्थान एवं कार्य कुछ प्राकृतिक शक्तियों द्वारा निश्चित किये जाते हैं, किन्तु व्यक्ति समाज में अपने स्थान और भाग्य का स्वयं ही निर्माता होता है तथा समाज में उसका स्थान पूर्व निर्धारित नहीं होता।

 (3) जन्म, विकास तथा मृत्यु के नियम भिन्न हैं- एक जीवित शरीर दो प्राणियों के संसर्ग से जन्म लेता है, किन्तु राज्य की उत्पत्ति के लिए दो राज्यों के बीच किसी क्रिया या संसर्ग की आवश्यकता नहीं है, इसके अतिरिक्त जीवित शरीर जिस प्रकार जन्म, विकास और मृत्यु के अनिवार्य नियमों में बैठा हुआ है,राज्य इस प्रकार के किसी नियम विशेष से बंधा हुआ नहीं है। एक जीवित शरीर से बढ़ता है और वृद्धि व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं करती है। किन्तु राज्य बदलता रहता है और उसकी उन्नति में उसके सदस्यों के प्रयत्नों एवं इच्छा का बहुत योग होता है। अन्त में, प्राणी शरीर विकासशील होता है। और शरीर वृद्ध होकर मृत्यु को प्राप्त होता है, किन्तु इसके विपरीत राज्य स्थायी होता है। जेलीनेक के शब्दों में," विकास, पतन तथा मृत्यु राज्य के जीवन की आवश्यक प्रक्रियाएँ नहीं है, यद्यपि प्राणी शरीर के जीवन से इन्हें अलग नहीं किया जा सकता, जिस प्रकार एक वृक्ष अथवा प्राणी शरीर नया नया जीवन ग्रहण करता है, उसी प्रकार राज्य का प्रादुर्भाव या पुनरुद्धार नहीं होता है।"

(4)राज्य के कार्यक्षेत्र की सन्तोषजनक व्याख्या नहीं-सावयव सिद्धान्त, राज्य को क्या करना चाहिए? हमारे इस प्रश्न का समाधान नहीं करता है। सावयव सिद्धान्त के विभिन्न समर्थको ने राज्य के कर्तव्यों के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकाले हैं और इस सिद्धान्त का प्रयोग व्यक्तिवाद तथा निरंकुश शासन तक किसी भी प्रकार की परस्पर विपरीत विचारधारा की समर्थन करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, स्पेन्सर ने इस सिद्धान्त का प्रयोग अपन व्यक्तिवाद के समर्थन हेतु किया है, परन्तु हक्सले ने इस निष्कर्ष को गलत बताते हुए कहा है कि
प्राणी शरीर में मस्तिष्क शरीर के अन्य अंगों पर निरंकुश शासन करता है। इसलिए यदि समाज को शरीर माना जाय तो राज्य कर्तव्य सम्बन्धी सिद्धान्त निरंकुश शासन होगा, व्यक्तिवाद नही। ल ने ठीक ही कहा है कि "सावयव सिद्धान्त राज्य की प्रकृति की कोई विश्वसनीय व्याख्या नहीं और न ही हमारा कुछ पथ-प्रदर्शन कर सकती है।"

(5) सावयव सिद्धान्त के भयंकर परिणाम हो सकते हैं-सावयव सिद्धान्त को स्वीकार करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बहुत अधिक भयंकर परिणाम हो सकते हैं। यदि राज्य को व्यक्ति शरीर माना जाय तो शरीर के अंगों के समान व्यक्ति साधन मात्र रह जायेगा। इस सिद्धान्त के स्वीकार करने के परिणामस्वरूप राज्य के व्यक्तित्व में व्यक्ति का व्यक्तित्व समाहित हो जाता है। ये मान्यताएं तानाशाही को जन्म देने वाली और निश्चित रूप से अप्रजातान्त्रिक हैं।

(6)स्पेन्सर द्वारा सिद्धान्त का त्रुटिपूर्ण प्रयोग- सावयव सिद्धान्त का सबसे प्रमुख रूप में हरबर्ट स्पेन्सर द्वारा प्रयोग किया गया है और उसके द्वारा इस सिद्धान्त के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकाले गये हैं जिनका सावयव सिद्धान्त से कोई मेंल नहीं बैठता है। स्पेन्सर द्वारा सावयव सिद्धान्त के आधार पर व्यक्तिवाद का समर्थन किया गया है, किन्तु जैसा कि बार्कर ने कहा है कि "प्राणी विज्ञान तथा व्यक्तिवाद दो ऐसे अनमेल घोड़े सिद्ध हुए है जो गाड़ी को दो विरोधी दिशाओं में खींचते हैं।"

सावयव सिद्धान्त का महत्व - उपर्युक्त आलोचनाओं से यह नहीं समझा जाना चाहिए |कि सावयव सिद्धान्त का कोई मूल्य और महत्व नहीं है। वस्तुतः राज्य के स्वरूप तथा व्यक्ति और राज्य के पारस्परिक सम्बन्ध को समझने के लिए यह सिद्धान्त अत्यन्त उपयोगी है। एम. कैचने (M.Kechnae) ने तो इस सिद्धान्त को समस्ता राजनीतिक दर्शन की आधारशिला माना है। गैटल ने इस सिद्धान्त में निम्नलिखित गुण बताएं हैं

(1) यह सिद्धान्त राज्य का ऐतिहासिक विकास का महत्व बतलाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य एक कृत्रिम वस्तु नहीं है, अपितु उसका विकास हुआ है।

(2) यह सिद्धान्त इस तथ्य पर विश्वास करता है कि मनुष्य स्वभावतया एक सामाजिक प्राणी है और उसकी सामाजिक प्रवृति ही राज्य को जन्म देती है।

(3) यह राज्य और नागरिकों की पारस्परिक निर्भरता पर बल देता है।

(4) यह समाजिक जीवन की मौलिक एकता पर जोर देता है।

(5) यह सिद्धान्त इस तथ्यों को स्पष्ट करता है समाज केवल बिखरे हुए व्यक्तियों का समूह मात्र नहीं है। समाज के सभी व्यक्ति एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं और सब मिलकर समाज पर निर्भर करते हैं । इस सिद्धान्त का महत्व इस विचार में निहित है कि सबके कल्याण में ही व्यक्ति का कल्याण निहित है। इस प्रकार राज्य के स्वरूप में शरीर रूप में प्रतिपादित करने वाले उप्युक्त विद्वानों के विचारों में हमें दो प्रकार की विचारधाराओं के दर्शन होते हैं। प्रथम विचारधारा वह है जिसे अपनाते हुए प्लेटो, अरस्तू, सिसरो और जॉन ऑफ सैलिसबरी, आदि विचारों ने राज्य को शरीर के समान बतलाया है। द्वितीय विचारधारा ब्लंटशली और प्रमुख रूप से स्पेन्सर द्वारा अपनायी गयी है, जिसके अनुसार राज्य न केवल शरीर के समान है वरन् सचमुच एक शरीर ही है। इनमें से प्रथम विचारधारा को स्वीकार करते हुए यह तो माना जा सकता है कि राज्य मानव शरीर के समान है, लेकिन राज्य मानव शरीर ही है, इस बात को स्वीकार किया ही नहीं जा सकता है। वास्तव में राज्य और शरीर के बीच समानता को महत्व देना ठीक नहीं है।

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