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राज्य के मार्क्सवादी अवधारणा पर समीक्षा

राज्य के मार्क्सवादी अवधारणा पर समीक्षा


राजनीतिशास्त्र के अन्य विचारकों की भाँति मार्क्स ने भी राज्य के स्वरूप तथा उत्पत्ति पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। राज्य के संदर्भ में मार्क्स द्वारा व्यक्त विचारों की राज्य के मार्क्सवादी अवधारणा के नाम से जाना जाता है। पाश्चात्य राजनीतिक चिंतक प्लेटो और अरस्तू राज्य को स्वाभाविक तथा नैतिक संस्था मानते हैं वहीं मार्क्स राज्य को कृत्रिम एवं वर्गीय संस्था मानता है। राज्य के संदर्भ में मार्क्स का कहना है, आदिम अवस्था में समाज के सदस्यों के मध्य हितों का कोई टकराव नहीं था, अतः समाज के सभी सदस्य मिल बैठकर अपने मामर्लो का निस्तारण स्वयं करते थे और राज्य नामक संस्था का कोई समाज में अस्तित्व ही नहीं था परन्तु कालान्तर में दास प्रथा युग में स्थिति में परिवर्तन आया, इस युग में सम्पत्ति का सम्पूर्ण स्वामित्त्व स्वामी वर्ग के हाथों में था लेकिन समाज में दासों की संख्या अधिक होने पर उन पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु स्वामी वर्ग के लोगों ने 'सरकार की स्थापना की। इसी संस्था के अन्तर्गत सेना पुलिस, जेलखाने आदि की व्यवस्था की गई। इन संस्थाओं के अस्तित्त्व में आने के साथ ही समाज शोषक और शोषित दो वर्गों में विभक्त हो गया। यहीं से राज्य नामक दमनकारी संस्था का उदय होता है। राज्य के सन्दर्भ में एक अन्य जगह पर मार्क्स ने लिखा है, "राज्य केवल एक ऐसा यंत्र है। जिसकी सहायता से एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करता है। अर्थात् राज्य एक ऐसी वर्गीय संस्था है जिसका उद्देश्य शोषक वर्ग के हितों की रक्षा करना है और उसे शोषित वर्ग के और अधिक शोषण के लिए उत्प्रेरित करना है। राज्य के वर्गीय स्वरूप के सम्बन्ध में लेनिन का मत है कि, "राज्य की उत्पत्ति का कारण वर्ग-विभाजन है एवं समाज की प्रत्येक अवस्था में राज्य एक वर्ग विशेष के हित का साधन रहा है." मार्क्स का विचार था कि शोषक वर्ग राज्य का दुरुपयोग श्रमिकों पर अपना नियंत्रण बनाये रखने के लिए करता है। साम्यवादी दल के नेतृत्व में श्रमिक सफल क्रांति करेंगे तथा राज्य पर अपना अधिकार करेंगे तब राज्य का प्रयोग प्रति क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए किया जायेगा। इस प्रकार इस अन्तरिम काल में सर्वहारा वर्ग की तानाशाही बनी रहेगी। इस काल में भी राज्य का प्रयोग एक वर्गीय संस्था के रूप में होगा। जब पूँजीवाद का पूर्ण रूप से नाश हो जायेगा तव राज्य भी समाप्त हो जायेगा। इस प्रकार एक वर्गहीन और राज्यहीन समाज की स्थापना होगी।

राज्य के सम्बन्ध में वर्ग सिद्धान्त की मान्यतायें- इसकी प्रमुख मान्यताएँ इस प्रकार हैं-

1. मार्क्सवादी दृष्टिकोण की यह स्पष्ट धारणा है कि राज्य एक वर्गगत संस्था है। सामान्यतः जो वर्ग किसी युग विशेष में उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है, उसी के पास राज्य का स्वामित्व होता है और उस वर्ग के द्वारा ही राज्य की शक्तियों का प्रयोग भी होता है।

2. मार्क्स की धारणा है कि आदिम साम्यवादी युग में राज्य का अस्तित्त्व नहीं था। धीरे घीरे जब समाज और सभ्यता का विकास हुआ और उत्पादन के साधनों पर एक वर्ग विशेष का आधिपत्य स्थापित हो गया, तो समाज में दो स्पष्ट आर्थिक वर्गों यानी साधन-सम्पन्न तथा साधन विहीन अथवा शोषक एवं शोषित का आविर्भाव हो गया। फलस्वरूप दोनों वर्गों में एक दूसरे के हितों के बीच विरोध एवं संघर्ष होने के कारण राज्य अस्तित्व में आया। यह राज्य एक वर्ग विशेष के हितों का संवर्द्धन करता है दूसरे वर्ग के शोषण को जारी रख कर।

3. राज्य का जन्म ही वर्ग संघर्ष के कारण हुआ इसलिए यह एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग का शोषण करने में अपना पूर्ण योगदान करता है और यह शोषण बिना दमनकारी गतिविधियों के सम्भव नहीं होता। इसलिए मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार राज्य निश्चय ही एक दमनकारी संस्था का स्वरूप ही धारण करता है।

4. राज्य का स्वरूप हमेशा ही अधिनायकवादी रहा है। यह बात जरूर है कि इस अधिनायकत्व की डोर अलग-अलग वर्ग में हो सकती है। क्रांति के पहले अधिनायक के रूप में पूंजीपति प्रतिष्ठित हो सकता है वर्ग के नियंत्रण में चली जायेगी। और क्रांति के बाद इस अधिनायकत्त्व की बागडोर सर्वहारा

5. जब समाज में परिवर्तन आता है तो राज्य का स्वरूप परिवर्तित होता हुआ दिखाई पडता है परंतु पूंजीवादी वर्ग के हाथ में होने के कारण उसकी शोषण की मूल प्रवृत्ति अन्त तक किसी न किसी रूप में बनी रहती है।

6.सर्वहारा वर्ग की क्रांति के पश्चात् सर्वहारा वर्ग का राज्य पर अधिकार स्थापित हो जायेगा और यह क्रांति के विरोधियों का दमन करने के लिए इसका प्रयोग करेगा। इस प्रकार संक्रमण काल में भी इसका वर्गीय स्वरूप बना रहेगा।

7.जब क्रांति के विरोधियों का पूर्ण रूप से दमन हो जायेगा और पूँजीपति वर्ग पूर्ण रूप से समाप्त हो जायेगा तब एक वर्गविहीन समाज की स्थापना होगी और राज्य भी लुप्त हो जायेगा।

वर्ग-सिद्धान्त की आलोचना- अनेक विद्वानों ने इस सिद्धान्त की आलोचना की है जिसका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-

1. राज्य एक वर्ग संगठन नहीं है, वरन् नैतिक संगठन है- मार्क्सवाद के आलोचकों के अनुसार राज्य एक वर्ग संगठन नहीं है, वरन् एक स्वाभाविक तथा नैतिक संगठन है।

2. वर्तमान राज्य सर्वहारा वर्ग का शत्रु नहीं मित्र है- आधुनिक काल में राज्य एक लोक-कल्याणकारी संस्था अथवा संगठन हो गया है और इसका दृष्टिकोण विस्तृत तथा व्यापक हो गया है जो जनता की भलाई के लिए अनेक कार्य करता है। इस प्रकार राज्य सर्वहारा वर्ग का शत्रु न होकर मित्र हो गया है। लास्की के अनुसार, "प्रजातंत्र की मूल मान्यता यह है कि राज्य समाज का तटस्थ तत्त्व है।"

3.राज्य अस्थायी नहीं स्थायी संस्था है- मार्क्स राज्य को अस्थायी संस्था मानता था और आशा करता था कि राज्य समाप्त हो जायेगा परन्तु राज्य के विलुप्त होने का कोई लक्षण नहीं है। वस्तु राज्य अस्थायी संस्था नहीं है, वरन् यह स्थायी संस्था है।

4. राज्य के विलुप्त होने की धारणा कपोल-कल्पित है- मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि राज्य धीरे-धीरे विलुप्त हो जायेगा, परन्तु राज्य विलुप्त नहीं हुआ। राज्य के विलुप्त होने की धारणा कपोल-कल्पित है। राज्य की प्रकृति के वर्ग-सिद्धान्त की अलोचना उचित मालूम होती है क्योंकि यह एक कटु सत्य है कि राज्य एक स्वाभाविक संस्था है। मानव स्वभाव तथा जीवन के साथ सदैव सम्बद्ध रहने के कारण इसमें स्थायित्त्व पाया जाता है। इसके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि राज्य कल्याणकारी संस्था बन गयी है जो श्रमिक वर्ग के हितों के लिए अनेक लाभकारी कानून बनाती है परन्तु फिर भी यह निश्चित तथा सत्य है कि पूँजीपतियों के हितों की रक्षक बनी हुई है। अतः इसे विकृति से बचाया जाना चाहिए। वस्तु राज्य संस्था का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो उन परिस्थितियों को सुचारू रूप से उत्पन्न करने में समर्थ हो, जिसमें व्यक्ति की सर्वतोन्मुखी उन्नति सम्भव हो सके।

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