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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

राजनीति विज्ञान के व्यवहारवादी उपागमों का वर्णन

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राजनीति विज्ञान के व्यवहारवादी उपागमों का वर्णन 

व्यवहारवाद दूसरे विश्व युद्ध के बाद परम्परागत राजनीति विज्ञान के विरोध में एक व्यापक क्रान्ति की शुरुआत हुई, जिसने समस्त समाज विज्ञानों को प्रभावित किया। इस क्रान्ति को व्यवहारवाद (व्यवहारवादी उपागम) के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यह व्यवहारवादी उपागम नूतन राजनीति विज्ञान' के साथ इनता अधिक जुड़ा हुआ है कि इसे राजनीति के वैज्ञानिक अध्ययन का सहचर कहा जा सकता है। व्यवहारवाद अथवा व्यवहारवादी उपागम राजनीतिक तथ्यों की व्याख्या और विश्लेषण की एक विशेष तकनीक है, जिसे दूसरे विश्व युद्ध (महासमर) के बाद अमेरिका के राजनीतिक वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया गया यद्यपि इसकी जड़ें विश्वयुद्ध के पूर्व प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्र ग्राह्मवाल्स एवं ब्रेड आदि की ग्रन्थों में देखने को मिलती है। यह उपागम राजनीतिशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में मुख्यतया अपना ध्यान राजनीतिक व्यवहार पर केन्द्रित करता है और इस बात पर जोर देता है राजनीतिक गतिविधियों का वैज्ञानिक अध्ययन व्यक्तियों के राजनीतिक व्यवहार आधार पर किया जा सकता है। प्रसिद्ध राजनीति शास्त्री रॉबर्ट डहल ने व्यवहारवाद को परिभाषित करते हुए लिखा है- "वह राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत एक ऐसा विरोधी आन्दोलन है जिससे राजनीति विज्ञान में आनुभाविक प्रास्थापनाओं और कुछ सीमा तक व्यवस्थित सिद्धांत का विकास किया जा सके। जिनका परीक्षण राजनीतिक घटनाओं का अधिक निकट से और अधिक प्रत्यक्ष और अधिक कठोरता से नियंत्रित प्रेक्षणों के द्वारा किया जा सके। डेविड मैन के मतानुसार,-"व्यवहारवाद का मूल उद्देश्य राजनीति विज्ञान के अधिकांश परम्परागत क्षेत्रों का अन्ततः एक नवीन और विस्तृत रूप प्रदान करना है।" व्यवहारवाद को परिभाषित करते हुए राबर्ट डहल ने एक अन्य स्थान पर लिखा है, "यह परम्परागत राजनीति विज्ञान से असंतुष्ट राजनीति शास्त्रियों विशेष रूप से अमेरिकी राजनीतिशास्त्रियों का उसके विरुद्ध एक आंदोलन है। यह ऐतिहासिक दार्शनिक वर्णनात्मक तथा संस्थापक आदि जैसे परम्परागत उपागमों के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया के रूप में है। यह ऐसा आन्दोलन है जो राजनीति शास्त्र के मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में विकसित आधुनिक सिद्धांत, पद्धतियों शोधों और दृष्टिकोणों निकट सम्पर्क में लाने पर बल देता है।"

व्यवहारवादी राजनीति के विकास के सन्दर्भ में यदि हम गहनता से अध्ययन एवं विश्लेषण करते हैं तो सर्वप्रथम इस उपागम का संकेत चार्ल्स मेरियम की कृति 'न्यू ऑस्पक्ट ऑफ पॉलिटिक्स में मिलते हैं जिसका प्रकाशन सन् 1925 में हुआ था। अर्थात् व्यवहारवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने का श्रेय चार्ल्स मेरियम को ही जाता है। इसके पूर्व इस सिद्धान्त की कल्पना मैक्स वेबर, कार्ल मार्क्स फ्रायड, दुर्खीम, परेटो, मोस्का जैसे दार्शनिकों ने की थी। इन सभी चिन्तकों का मत था कि राजनीति विज्ञान को कल्पना पर आधारित नहीं होना चाहिए। इन लोगों ने मानव व्यवहार का विश्लेषण करके अपनी मान्यताओं को उन पर आधारित करने की पुर जोर कोशिश अमेरिकी विचारक ग्राहम बल्लास आर्थर वेण्टले, स्टर्टराइस, कैटलिन ने इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन सभी अमेरिकी विद्वानों का स्पष्ट मत था राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध वास्तविक मानव व्यवहार से होना चाहिए तथा यह वास्तविक तथ्यों के विश्लेषण पर आधारित होना चाहिए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 19451970 में व्यवहारवाद के विकास में लासवैल, राबर्ट डहल, डेविड ईस्टन,आमण्ड, कोलमैन तथा एडवर्ड का नाम विशेष उल्लेखनीय है। डेविड ईस्टन के व्यवहारवाद के साथ उतर व्यवहारवाद के प्रतिपादन का भी श्रेय प्राप्त है। सारांशतः व्यवहारवाद परम्परागत राजनीति विज्ञान के विरुद्ध एक क्रांतिकारी आन्दोलन है यह उसे यथार्थवाद और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करता है। यह मानवीय व्यवहारवाद का व्यापक सिद्धान्त है जो राजनीति शास्त्र को दर्शन विधि और इतिहास पर निर्भरता समाप्त कर ठसे राजनीति एवं राजनीतिक प्रक्रिया के यथा वादी अध्ययन का सामाजिक विज्ञान बनाता है। यह उसे विशुद्ध राजनीतिक अध्ययन के विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास कर रहा है। परम्परागत दृष्टिकोण (परम्परावादियों) द्वारा व्यवहारवाद की आलोचना परम्परागत दृष्टिकोण द्वारा व्यवहारवाद की कटु आलोचना की गई है। इन आलोचकों में परम्परावादी विचारक प्रो० सिवनी तथा लिटोस्ट्रान प्रमुख हैं।

 प्रो० सिवनी के अनुसार- "व्यवहारवाद की अपनी सीमायें है जिनके कारण राजनीतिक शोध के मामले में व्यवहारवादी उपागम पर्याप्त सिद्ध नहीं हो सकता है।" प्रो० सिबली ने व्यवहारवाद की सीमायें नाम लेख में उसकी क्षमता को चुनौती देते हुए यह प्रश्न किया है क्या व्यवहारवादी दृष्टिकोण राजनीति को समझने के लिए पर्याप्त है? उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वयं कहा है राजनीति को समझने और जानने की दृष्टि से कहीं अधिक होनी चाहिए क्योंकि यह इसके लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए राजनीति के ज्ञाता को केवल व्यवहारवादी ही नहीं अपितु इतिहास वेत्ता, विधि वेत्ता, आधारशास्त्री भी होना चाहिए। उसमें एक कलाकार की अन्तरदृष्टि तथा वैज्ञानिक की भांति निश्चित भविष्यवाणी करने का गुण होना चाहिए। परम्परावादियों ने व्यवहारवाद की जो आलोचना की है वह अनलिखित है प्रथम आलोचकों के अनुसार व्यवहारवादी जिस अर्थ में राजनीति शास्त्र को विज्ञान बनाना चाहते हैं वह उस अर्थ में विज्ञान नहीं बन सकता हैं क्योंकि राजनीतिक घटनाओं और मानवीय व्यवहार के बारे में वस्तुनिष्ठ अर्थात् आनुभविक पद्धति के आधार पर अध्ययन सम्भव नहीं है इस आधार पर मानव व्यवहार के सम्बन्ध में स्थायी नियमों का निर्धारण संम्भव नहीं है। द्वितीय आनुभविक परीक्षण संपूर्ण अध्ययन का केवल एक अंश होता है। राजनीतिक घटनाओं को ईमानदारी से समझने के लिए उनका सामाजिक वातावरण के सन्दर्भ में अध्ययन होना चाहिए। तृतीय व्यवहारवादी शोध उद्देश्य के बजाय नवीन तकनीकों के प्रयोग पर अधिक जोर देते हैं तथा वह यह भूल जाते हैं सामाजिक तथ्य कभी भी वस्तुनिष्ट नहीं हो सकते। चतुर्थ माडलों अर्थात् प्रतिमानों के निर्माण पर अधिक ध्यान देने के कारण उनमें से कम ही लोग समाज की मुख्य समस्याओं के बारे में अध्ययन का प्रयास करते हैं। पाँचवीं व्यवहारवादी यह भूल जाते हैं कि महत्त्वपूर्ण विज्ञान राजनीतिक प्रश्न नैतिक प्रश्नों से जुड़े होते हैं तथा उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाधान नहीं किया जा सकता है। वे यह भी भूल जाते हैं शोध कर्ता मूल्य सम्वन्धी मान्यताओं से अपने को पूरी तरह पृथक् नहीं कर सकता है, उनके शोध पर उनका किसी न किसी रूप में प्रभाव होता है। छठी विशुद्ध वैज्ञानिक शोध पर बल देने के कारण व्यवहारवादी वास्तविक राजनीतिक समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान में सहायक सिद्ध होने वाले सिद्धान्तों का प्रतिपादन नहीं कर पाते हैं। सातवीं वे राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो ऑकड़े संकलित करते हैं वे सत्य नहीं होते। आठवीं व्यवहारवादी नवीन अप्रचालित शब्दों का प्रयोग तथा नवीन अवधारणा का प्रतिपादन कर अपने पांडित्य का प्रदर्शन करते हैं और राजनीतिक वास्तविकता से मुँह मोड़ लेते हैं। नौवीं राजनीति शास्त्र एक आदर्शात्मक सामाजिक विज्ञान है जबकि व्यवहारवादी उसके अध्ययन को मूल्य बनाकर उसकी प्रकृति के विपरीत कार्य करते हैं।

 व्यवहारवाद की सामान्य आलोचना प्रत्येक सिद्धान्त में अच्छाइयाँ एवं बुराइयाँ दोनों होती है व्यवहारवाद भी इससे अछूता नहीं है। व्यवहारवाद की सबसे प्रमुख कमी इसका मूल्य निरपेक्षता है जिसके कारण यह राजनीति विज्ञान नीति निर्माण, सक्रिय राजनीति और समाज की तत्तकालीन समस्याओं से पूर्णतः पृथक हो गया है, इस उपागम के संदर्भ में आलोचकों का कथन है यदि मूल्य निरपेक्षता ही हमारा लक्ष्य है तो लोकतंत्र और निरंकुश तंत्र में कुछ भी अंतर नहीं है। आलोचकों का दूसरा मत है व्यवहारवाद मानव व्यवहार के अध्ययन पर बल देता है परन्तु वह मानव व्यवहार के विज्ञान को उपस्थित करने में असफल है तीसरा आलोचकों का मानना है अध्ययन पद्धति पर आवश्यकता से अधिक जोर देना भी व्यवहारवाद की एक महान दुर्वलता है। चौथा व्यवहारवादी आंकड़ों के संकलन पर अधिक जोर देते है अनके बार वे महत्त्वपूर्ण तथ्यों को भी भुला देते हैं। पाँचवा व्यवहारवाद का सिद्धांत एवं व्यवहार में भी विरोधाभास है। उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद भी वर्तमान युग में इसकी लोकप्रियता मे ह्रास नहीं हुआ है। डेविड ईस्टन ने इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है," व्यवहारवाद मानवीय विज्ञानों में विश्लेषणात्मक व्याख्यात्मक सिद्धान्त के प्रारम्भ का सूचक है। समाज के विभिन्न परिवर्तनशील अववोधन उपागमों की एक लम्बी पंक्ति में यह एक नूतन विकास है। उत्तर व्यवहारवाद सत्तर के दशक के मध्य में अमेरिका एवं अन्य देशों में व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया आरम्भ हो गयी थी। सन् 1965 के बाद के काल को उत्तर-व्यवहारवाद की संज्ञा प्रदान करते हैं। यह प्रतिक्रिया अभी भी चल रही है। इस काल में व्यवहारवाद की कटु आलोचना हुई तथा राजनीतिक विचारों में पुनः परिवर्तन हुआ। अतः इसे भी एक क्रान्ति की संज्ञा दी गई। सत्तर के दशक के अन्त में डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद की मान्यताओं पर प्रवल प्रहार किया यद्यपि व्यवहारवाद के विकास में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी सितम्बर, 1969 में न्यूयार्क में अमेरिकन पोलिटिकल एसोसिएसन के पैसठ अधिवेशन में अपनी अध्यक्षीय भाषण के अन्तर्गत ईस्टन ने अनुसन्धान की स्थिति पर गहरा असंतोष व्यक्त किया जिसमें राजनीति के अध्ययन को कठोर वैज्ञानिक अनुशासन में ढालने की कोशिश की जा रही थी। अतः उसे नयी दिशा देने के लिए डेविड ईस्टन ने उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति का उद्घोष किया। डेविड ईस्टन ने तर्क दिया कि साठ तथा सत्तर के दशक में बहुत सारा समय बेकार के शोध अथवा अनुसन्धानों में लगाया गया है तथा विचारों आमतौर पर अपने विश्वविद्यालय परिसर के शीशमहल में बैठे तरह-तरह की दीपावली तथा संकल्पनात्मक ढाँचे तैयार करने में लगे हैं, परन्तु इन्हें यह ज्ञात नहीं कि बाहर की दुनिया कितने जबरदस्त सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संकट से जूझ रही है। उधर न्यूक्लीयरबम (परमाणु बम) का खतरा, इघर अमेरिका में बढ़ते हुए मतभेद जिनमें गृहयुद्ध की ज्वाला भड़क सकती है या तानाशाही आ सकती हैं। उघर वियतनाम की लड़ाई जिसकी बाकायदा घोषणा तक नहीं हुई और जिसने विश्व की नैतिक चेतना को झकझोर कर रख दिया है। वे सव ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनकी सूचना किसी ने न दी थी। अतः उस अनुसन्धान से क्या लाभ जिसका सामाजिक समस्याओं और व्याधियों से कोई सम्बन्ध न हो।

इस काल में प्राय: दो प्रमुख तथ्यों पर विशेष प्रकाश डाला गया

1. प्रासंगिक

2. कार्य संगति का अर्थ है कि राजनीतिक समस्याओं का सम्बन्ध वास्तविक समस्याओं से होना चाहिए कल्पना से नहीं। राजनीतिक विचारकों का शोध के कार्यों में वर्तमान समस्याओं से अपनी संगति प्रारम्भ करनी चाहिए तथा इनके विरुद्ध कार्यशील होना चाहिए। इस काल के सभी विचारकों ने इन दोनों पर बल दिया है।

इस समय में राजनीतिक विचारों के जिस स्वरूप की प्रगति हुई है, उसकी मुख्य विशेषताओं का उल्लेख डेविड ईस्टन ने किया है-

1. राजनीतिक अनुसन्धान में तथ्यों को तकनीक या प्राविधियों से प्राथमिकता मिलनी चाहिए। शोध में वर्तमान समस्याओं से संगति होनी चाहिए। केवल पद्धति का विकास अर्थहीन है। इटली के विचारक साटम ने अपनी पुस्तक डेमोक्रेटिक थ्योरी' में कहा है कि व्यवहारवाद का पद्धति सम्बन्धी आग्रह जबरदस्ती का लघुकरण है।

2.व्यवहारवाद सामाजिक स्थिरता पर बल देता है तथा इसने अपना ध्यान तथ्यों के वर्णन तथा विश्लेषण तक सीमित रखा है, परन्तु राजनीतिक विज्ञान को समाजिक परिवर्तन की आन मुड़कर इन तथ्यों को व्यापक सामाजिक संदर्भ के साथ सम्बद्ध करना चाहिए।

3. उत्तर-व्यवहारवादी समर्थकों के अनुसार व्यवहारवाद धीरे-धीरे यथार्थ से सम्बन्ध तोड़ लेता है। यथार्थ का स्वरूप परिवर्तनशील होता है, यथास्थितिवादी नहीं। भौतिक सुख, समृद्धि के बावजूद वर्तमान समय संकट, संघर्ष और चिन्ता का विषय है इनसे उबरने का तरीका खोजना राजनीति विज्ञान का कार्य है।

4. व्यवहारवाद ने मूल्यों की अत्यन्त उपेक्षा की थी, परन्तु उत्तर-व्यवहारवादियों का मानना है, राजनीतिक शोध एवं अध्ययन कभी भी मूल्य रहित नहीं हो सकता। अतः विज्ञान के नाम पर मूल्यों को राजनीति विज्ञान की परिधि से बाहर नहीं धकेला जा सकता। यदि ज्ञान का उपयोग उचित साधनों की सिद्धि के लिए करना है तो मूल्यों को पुनः स्थान देना होगा।

5. सभी प्रकार के बुद्धिजीवियों के कुछ उत्तरदायित्व होते हैं उनका एक महत्वपूर्ण कार्य सभ्यता के मानव मूल्यों को संरक्षित करना है। यदि तटस्थता के नाम पर वे सामाजिक समस्याओं से सम्पत रहते हैं तो बुद्धिजीवी कहलाने के अधिकार से वे वंचित हो जायेंगे।

6.वैज्ञानिक का कार्य मात्र ज्ञान का उपार्जन करना ही नहीं वरन् ज्ञान का किसी उद्देश्य हेतु प्रयोग करना प्रमुख कर्तव्य है। चिन्तापरक विज्ञान 19वीं शताब्दी तक तो ठीक था, जबकि विभिन्न राष्ट्रों की नैतिक मान्यताएँ एक जैसी थीं परन्तु इस समय इतने तीव्र वैचारिक मतभेद हैं कि इन्हें दूर करने कार्य का युग है। के लिए कार्य के मैदान में उतर आना चाहिए। आज का युग

7. जब यह स्वीकार कर लिया जायेगा कि बुद्धिजीवियों को एक सकारात्मक भूमिका निभानी है तो सभी व्यवसायों व संघर्षों को राजनीति में सम्बन्ध करना आवश्यक तथा वांछनीय होगा। इस प्रकार इसने व्यवहारवाद का विरोध किया, परन्तु इस आलोचना के बावजूद इसने परम्परावाद को पुनः स्थापित करने का समर्थन नहीं किया। उसने व्यवहारवादी युग की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए राजनीति विज्ञान को एक नये क्षितिज की ओर ले जाने का प्रयास किया ताकि यह सामाजिक पुर्ननिर्माण में सहायक हो सके। यह अपने स्वरूप में अतीतोन्मुख न होकर भविष्योन्मुख है। प्रसिद्ध दार्शनिक माइकेल हेस तथा थियोडोर बेकर के अनुसार 1970 के बाद का व्यवहारवाद संश्लेषणात्मक तथा बहुपद्धति विज्ञानात्मक हैं, परन्तु पिछले सात-आठ वर्षों से उत्तर व्यवहारवाद की कोई ऐसी ठोस उपप्लव्य देखने में नहीं आई जिससे यह सिद्ध हो सके कि उसने व्यवहारवाद को सचमुच किसी नयी विधा में परिणित कर दिया है।

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