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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

राजनीतिशास्त्र के परम्परागत उपागम

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राजनीतिशास्त्र के परम्परागत उपागम 


राजनीतिशास्त्र एवं अन्य सामाजिक शास्त्रों में अध्ययन के विविध उपागम (दृष्टिकोण) प्रचलित है। उनमें प्रमुख है परम्परागत उपागम के अन्तर्गत ऐतिहासिक उपागम या दृष्टिकोण, समाजशास्त्रीय उपागम (दृष्टिकोण) दार्शनिक दृष्टिकोण, व्यवहारवादी और उत्तर व्यवहारवादी उपागम (दृष्टिकोण) है। यहाँ पर प्रारंभ में हम परम्परागत उपागम के अन्तर्गत ऐतिहासिक उपागम समाजशास्त्रीय उपागम तथा दार्शनिक उपागम का विश्लेषण करेंगे। ऐतिहासिक उपागम (दृष्टिकोण) ऐतिहासिक उपागम इस धारणा पर स्थित है कि राजनीतिक सिद्धान्त की सामग्री सामाजिक -आर्थिक संकटों और उनके द्वारा महान् विचारकों के मन-मस्तिष्क पर छोड़ी गई प्रतिक्रियाओं से उत्पन्न होता है। इसका यह आशय है कि राजनीतिक सिद्धान्त को समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि इसका विकास किस देश, काल और परिस्थिति में हुआ। इस बात की बिलकुल आवश्यकता नहीं है कि राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्री घटनाओं की रचना या समस्याओं के समाधान में वास्तव में, भाग ले। वहरहाल, इस बात की जरूरत है कि वह इससे प्रभावित हो या वह इन्हें किसी-न-किसी तरह प्रभावित करे। अत: सेवा के अनुसार, "राजनीतिक सिद्धान्त, राजनीतिक और सामाजिक संकटों के अन्तरालों में छिपे हुए हैं। वास्तव में, उनका जन्म संकटों से नहीं होता वल्कि मनों पर उनकी प्रतिक्रियाओं से होता है जिसमें संवेदनशीलता और बौद्धिक अन्वेषण होता है। इसीलिए प्रत्येक राजनीतिक सिद्धान्त में पर्याप्त विशिष्ट परिस्थिति की ओर निर्देश किया जाता है जिसे समझना आवश्यक होगा यदि हमें दार्शनिक के चिन्तन को समझना है। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्नों के बारे में ऐतिहासिक उपागम कई तरह से भिन्न होता है क्योंकि यह किसी विद्वान् के चयन के प्रयास पर निर्भर है जो वह इस प्रयोजन के लिए अपनाता है। यदि मैक्यावली ने रोमनों की उपलब्धियों को उत्कृष्ट सिद्ध करने में इतिहास का सूझ-बूझ युक्त उपयोग किया और उसने अपने शासकों का आवाहन किया कि वे महान रोमन साम्राज्य के ऐश्वर्य को पुनः स्थापित करें, तो वर्क और ओकशाद ऐतिहासिक दृष्टिकोण का अनुसरण करते हैं ताकि वे अपनी रूढ़िवादी घारणाओं को दार्शनिक औचित्य प्रदान कर सकें। बर्क ने 1789 की फ्रेंच क्रान्ति के दर्शन की जोरदार शब्दों में आलोचन [2:04 PM, 7/8/2020] Sis Jio: की और इसके बजाए ब्रिटिश राजनीतिक संस्थाओं की उनकी स्थिरता के नाम पर प्रशंसा की जिनके कारण उनके ऐतिहासिक विकास में ढूँढे जा सकते हैं। ऐतिहासिक उपागम में भी कुछ त्रुटियाँ हैं। उदाहरण के लिए जैसा जेम्स ब्राइस ने कहा है, यह सतही सादृश्यों से भारित होता है। इस नाते ऐतिहासिक समान्तर कई वार ज्ञानवर्धक किन्तु कई बार भ्रामक भी होते हैं। इस उपागम के बारे में थोड़ा कम अनुकूल दृष्टिकोण अपनाते हुए सिजविक की यह मान्यता है कि राज्य विज्ञान का मूल उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि क्या होना चाहिए, जहाँ तक सरकार के गठन और कार्य का सम्बन्ध है, सरकार के रूपों व कार्यों के ऐतिहासिक अध्ययन से इस लक्ष्य को नहीं खोजा जा सकता। उसने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है, "मैं नहीं समझता कि व्यवहारपरक राजनीति की समस्या के तर्कसंगत समाधानों को प्राप्त करने के प्रयास में मूल-रूप में ऐतिहासिक उपागम का इस्तेमाल किया जा सकता है।"

फिर भी ऐतिहासिक उपागम के वास्तविक महत्त्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। इसका महत्त्व राजनीतिक संस्थाओं की उत्पत्ति और विकास की सार्थकता का अध्ययन करने में है। इसी कारण, स्वाइन,गेटेल, मैकिलवेन, ए० डब्लू कारलायल, जी० कैटलिन,टी० आई० कुक,सी० ई० वाघां जैसे विचारों के राजनीतिक सिद्धान्त पर लिखे ग्रन्थों का विशेष महत्त्व है। प्राचीन युग में प्लेटो और अरस्तू से लेकर आधुनिक युग में लियो स्ट्रॉस और लासवेल तक के महान् राजनीतिक और सामाजिक सिद्धान्तशास्त्रियों के अभिप्रायों को समझने के लिए उपागम की विशेष उपयोगिता है। यदि राजनीतिक सिद्धान्त का स्वरूप विश्वव्यापी और सम्मानीय है तो इसका कारण इस दृष्टि में ढँढ़ा जाना चाहिए कि इसकी जड़ें ऐतिहासिक परम्परा में निहित हैं। समाजशास्त्रीय या समाज वैज्ञानिक उपागम (दृष्टिकोण) राजनीति शास्त्र के अध्ययन के आधुनिक उपायों में समाजशास्त्रीय (समाज वैज्ञानिक उपागम) का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। जब से फ्रांसीसी विचारक अॅगस्ट काम्टे और इंग्लैण्ड के दार्शनिक हर्बर्ट स्पेन्सर ने समाजशास्त्र के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया है, राजनीतिशास्त्र के विचारकों ने राजनीति के अध्ययन के लिए समाजशास्त्रीय उपागम की सार्थकता का एहसास किया। हाल ही के वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका ने उल्लेखनीय प्रगति की है। जहाँ आर.एम.मैकाइवर, डेविड ईस्टन और जी.ए. एमण्ड ने इस आवश्यक तत्त्व को मान्यता प्रदान की है कि समाजशास्त्र के क्षेत्र में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। जिसकी सहायता से राजनीति व्यवहार के व्यवहारपरक नियम निर्धारित किये जा सकते हैं। एक अग्रणी जर्मनी समाजशास्त्री मैक्सवेबर ने समाज विज्ञान को राजनीति का आधार माना है और ईस्टन ने देवर की उन मान्यताओं के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था के कुछ सिद्धांत का विकास किया जिनकी पुनः व्याख्या और पुनः संयोजन टैलकोट पार्सन्स और राबर्ट मैटर्न ने की है। इसके परिणाम स्वरूप एक नवीन विषय अस्तित्व में आया जिसे राजनीति शास्त्र में समाजशास्त्रीय उपागम के रूप में जाना जाता है। इस उपागम में इस बात पर बल दिया जाता है कि समाज में रहने वाले लोग राजनीति व्यवहार को समझने और उसकी व्याख्या करने के लिए कितना जरूरी संदर्भ है सामाजिक क्षेत्र में ही हम व्यक्तियों को अपनी हैसियत का एहसास होने और अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए देख सकते हैं जिनका निर्धारण कुछ विशेषताओं से होता है और जो आवश्यक संशोधनों के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में प्राप्त हो जाती है इसे 'राजनीतिक समाजीकरण' कहा जाता है। इसका बाहरी संपूर्ण लोगों की राजनीतिक संस्कृति है जो स्वतंत्रता, समानता, अधिकारों, न्याय, लोकतंत्र, विधि के शासन आदि जैसे राजनीतिक मूल्यों में उनकी प्रतिबद्धताओं और विश्वासों को प्रदर्शित करती है हर देश की राजनीतिक व्यवस्था उस देश के लोगों की राजनीतिक संस्कृति से प्रभावित होती है। अतः यह स्पष्ट है कि यह उपागम राज्य को मूलरूप से सामाजिक संगठन मानता है जिसके घटक अंग लोग हैं और इसकी विशेषताओं और गुणवत्ताओं को निगमित करने का प्रयास करते है।

समाज को राजनीतिक तथा अन्य सभी विज्ञानों का आधार माना जाना चाहिए। यह विभिन्न संघों और समूहों का जाल है जिसकी किसी देश की राजनीति में अपनी विशेष भूमिका होती है। रक्त सम्बन्ध, जातिवाद, धर्म, भाषाई-सम्बन्ध आदि जैसे कारक समाजशास्त्रीय अध्ययन का अंग बनते हैं, लेकिन किसी राजनीतिक व्यवस्था के व्यवहारपरक अध्ययन के अन्तर्गत निजी देश की राजनीतिक प्रक्रिया में उनकी भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती। राज्य के कानून का पालन करना अनिवार्य है, क्योंकि उनके पीछे कुछ अंधविश्वास काम कर रहे हैं या यदि उनका उल्लंघन किया गया तो दण्ड का भय हो सकता है और इसलिए संरचनावादी हमें यह सलाह देता है कि किसी देश के राजनीतिक यथार्थ को समझने और उसकी व्याख्या करने से पूर्व हमें लोगों की सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करना चाहिए। इसके बारे में जो बात सबसे उल्लेखनीय है वह यह कि कुछ लेखकों ने राजनीति के अध्ययन में समाज विज्ञान के महत्त्व पर बल दिया है और वे किसी देश के सामाजिक ढाँचे के कुछ पहलुओं की सहायता से कुछ सिद्धांत का विकास करने की सीमा तक गए हैं। इस प्रकार समाजशास्त्रीय उपागम की कई किस्में हो गई हैं यहाँ तक की कुछ लेखक 'समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण शब्द का इस्तेमाल करना पसन्द करते हैं। संरचनावादियों की ओर से इस बात का भी आग्रह किया जाता है कि अगर हम लोगों के समाजशास्त्रीय ढाँचे के किसी विशेष पहलू को संशोधित करें या उसका नवीनीकरण करें तो राजनीतिक व्यवस्था को सबल बनाया जा सकता है। समाजशास्त्रीय उपागम की प्रशंसा की जाती है क्योंकि वह सर्वांगपूर्ण है। चूंकि सर्वांगपूर्ण यह समाज का उसके सभी पक्षों का अध्ययन करता है और फिर राजनीति को ठन समाज वैज्ञानिक शक्तियों के साथ जोड़ने की कोशिश करता है इसलिए संकीर्ण होने के नाम पर इसकी आलोचना नहीं की जा सकती है। एकमात्र भय है कि समाज विज्ञान की भूमिका और उपयोग पर इतना अधिक बल देने के बाद यह राज्य विज्ञान के विषय की स्वायत्ता के साथ खिलवाड़ करने की सीमा तक जाता है। इससे इस बात की भी आशंका हो सकती है ऐसा अध्ययन राजनीति को समाजशास्त्र की दासी बना सकता है लेकिन इस उपागम के नये समर्थक इस बात को अस्वीकार कर देते हैं। उनका अभिमत है, महान् समाजशास्त्री जैसे एमाईल दुखीम, मेलेनोवस्की, शील्स आइजन, स्टाइट पार्सन्स, और मर्टन उपयोगी यंत्र और सामग्री राजनीति शास्त्र को प्रदान करते हैं। अत: इनकी सहायता से हम राजनीतिशास्त्र के अध्ययन को विज्ञान के स्तर पर ले जा सकते हैं। यदि राजनीति शास्त्र का मूल उद्देश्य संघों से निपटना है जैसे कि प्रसिद्ध विचारक डी.वी.मिलर का अभिमत है तो समाजशास्त्र ऐसे तनावों के कारण जानने और उनके समाधान ढूंढने में हमारी सहायता करता है। दार्शनिक उपागम (दृष्टिकोण) दार्शनिक उपागम को कल्पनात्मक, नैतिक, आध्यात्मिक या तत्त्वमीमांसा उपागम के नामों से भी जाना जाता है। यहाँ राज्य, शासन, सत्ता और राजनीतिक प्राणी के रूप में मनुष्य का अध्ययन कुछ लक्ष्यों, शिक्षाओं, सत्यों या उच्च सिद्धान्तों को प्राप्त करने से घनिष्ट रूप में जुड़ा हुआ है जो सभी प्रकार के ज्ञान और यथार्थ में अन्तर्निहित है। इस उपागम में राजनीति शास्त्र का अध्ययन कल्पनात्मक स्वरूप धारण कर लेता है क्योंकि दार्शनिक शब्द ही चिन्तन के बारे में चिन्तन का निर्देश करता है; दार्शनिक विश्लेषण किसी विषय के स्वरूप के सन्दर्भ में विचार को स्पष्ट करता है तथा इसके अध्ययन के लिए लक्ष्यों और साधनों को स्पष्ट करने का प्रयास है। जो सिद्धांत शास्त्री इस उपागम के समर्थक हैं वे आचार-शास्त्र (दर्शनशास्त्र)के जगत् के बहुत निकट आ जाते हैं और शासकों व संगठित समाज के सदस्यों को यह सझाव देते हुए प्रतीत होते हैं कि वे कुछ ऐसे उच्च आदर्शों का अनुसरण करें जिन्हें हम तर्क बुद्धि से समझ सकें। जाहिर है कि प्लेटो, मूर, बेकार, हैरिंगटन, रूसो, कैंट, हीगल, ग्रीन, बोसांके, नेटिललिप, लिंडसे, हॉबहाउस, ओकशॉट, लियो स्ट्रॉस और जान रॉल्स जैसे महान् विचारकों के अध्ययन को अरक्तता के बहुत उच्च स्तर तक ले जाती है और वे मूल्यों की प्रणाली को एक आदर्श सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था के उच्च मानकों से मिलाने का प्रयास करती है। ऐसे उपागम के उपयोग से राजनीति शास्त्र का अध्ययन इसे राजनीतिक दर्शन में परिवर्तित कर देता है। इससे बाहा यथार्थ के पीछे छिपे यथार्थ को समझने का प्रयास किया जाता है। बाह्य यथार्थ विज्ञान का विषय है, जबकि आन्तरिक यथार्थ दर्शन का विषय है। स्वाभाविक है कि राजनीतिक दर्शन, विशुद्ध विज्ञान के मुकाबले में अधिक गंभीर है सेनापति का लक्ष्य है विजय, जवकि राजमर्मज्ञ का लक्ष्य है सर्वजन हिताय। विजय से जो अभिप्राय है वह जरूरी नहीं कि विवादास्पद हो, लेकिन समान हित का अर्थ आवश्यक रूप में विवादास्पद होता है। राजनीतिक लक्ष्य की अस्पष्टता इसके शुद्ध और सर्वांगपूर्ण स्वरूप के कारण है। इसलिए, यह प्रलोभन होता है कि राजनीति के विस्तृत या इससे बचा जाए और राजनीति को बहुत से भागों में से एक भाग माना जाए परन्तु यदि हमें मनुष्यों के रूप में इस संपूर्ण स्थिति का सामना करना है तो हमें इस प्रलोभन से दूर रहना चाहिए। दार्शनिक उपागम की आलोचना- दार्शनिक (आधार शास्त्रीय या आध्यात्मिक) उपागम की इस आधार पर आलोचना की जाती है कि यह कल्पनात्मक और अमूर्त है। ऐसा कहा जाता है कि यह हमें यथार्थ की दुनिया से बहुत दूर ले जाता है। रूसो और हीगल ने इसके प्रयोग से राज्य के अध्ययन को रहस्यमयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यह वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में देखने की बजाए उनके अमूर्त स्वरूप और प्रयोजन की जाँच करता है। इसका यह परिणाम होता है कि राजनीति एक औसत सूझबूझ वाले व्यक्ति की समझ से परे हो जाती है जो शायद ऐतिहासिक और निश्चयवादी दृष्टिकोणों से राजनीति का अध्ययन करने में अधिक सुख का अनुभव करेगा। एक और दृष्टिकोण से राजनीति अध्ययन के लिए दार्शनिक उपागम की सराहना की जा सकती है। यह कहना सही है कि हर दार्शनिक उन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना चाहता है जो उसके समक्ष आते हैं। प्राचीन यूनानियों की परिस्थितियों ने प्लेटो और अरस्तू को प्रभावित किया कि वे अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान ढूँढे। इसी प्रकार, इंग्लैंड में हठी राजतन्त्र और उभरते हुए मध्यवर्गीय लोगों के बीच संघर्ष ने हॉब्स और लॉक को प्रेरित किया कि वे राजनीतिक आभार का कोई वैध आधार ढूँढे। दूसरे शब्दों में, यह कहना सही है कि मैक्यावली ने किसी विशिष्ट 'नरेश के लिए लिखा जो महान् रोमन साम्राज्य का गौरव पुनः स्थापित कर सके। हाब्स ने उस लेवियाथन की खोज की जो अपने देश में शान्ति व्यवस्था बनाए रख सके, लॉक ने इंग्लैंड में संसद की सर्वोच्चता को दार्शनिक औचित्य प्रदान किया। लेकिन इन सभी दार्शनिक वार्ताओं का वास्तविक गुण यह है कि इनमें जो समाधान प्रस्तुत किए है है उन्हें आवश्यकतानुसार समान परिस्थितियों में कहीं भी लागू किया जा सकता है। समय को देखते हुए इन दार्शनिकों से दूरी हमें इस योग्य बनाती है कि हम उनकी रचना को दर्शन के रूप में न कि पक्षपातपूर्ण तर्क के रूप में देखें।

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