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सोमवार, 6 जुलाई 2020

पूर्वी समस्या के सन्दर्भ में बार्लिन महोत्सव (सम्मेलन)

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पूर्वी समस्या के सन्दर्भ में बार्लिन महोत्सव (सम्मेलन) 


आधुनिक यूरोप में इतिहास के पूर्वी समस्या का महत्त्व बहुत अधिक रहा है। इसने विभिन्न समयों पर विभिन्न रूप धारण किया और यूरोप के विभिन्न राष्ट्रों की राजनीति को बड़ा प्रभावित किया। इस समस्या के महत्त्व तथा इसकी जटिलता के कारण कई बार इसक समाधान करने से उद्देश्य से यूरोप के राष्ट्रों के सम्मेलन इस काल में हुए किन्तु वे इस समस्य का समाधान करने में पूर्णतया असफल रहे जिसके कारण यह सदैव यूरोप के राजनीतिज्ञों के लिए सिरदर्द बनी रही। पूर्वी समस्या का अर्थ-पूर्वी समस्या के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों ने अपने मत प्रकट किय हैं। ठनके उद्धरणों से इस समस्या का अर्थ कुछ समझ में आ जायेगा। ये उद्धरण निम्नलिखित

(1) एक प्रसिद्ध रूसी राजनीतिक के अनुसार-'पूर्वी समस्या उस भयंकर गठिया रोग के समान है जो कभी टाँगों को जकड़ लेती है तो कभी हाथों को बेकार कर देती हैं।'

(2) लार्ड मोले के अनुसार-"पूर्वी समस्या प्रतिस्पर्धित जातियों एवं विरोधी धर्मों के परस्पर हितों की एक ऐसी परिवर्तनशील उलझी हुई गुत्थी है जो न सुलझाये सुलझती है, और न किसी स्थान पर स्थिर रहती है। प्रिंस बिस्मार्क के अनुसार-"पूर्वी समस्या सारहीन एवं निरर्थक थी। उसका न कोई महत्त्व था और न कोई मूल्य था। प्रिंस बिस्मार्क इस समस्या का कोई महत्त्व नहीं समझता था, जबकि अन्य दो महान् व्यक्ति इसकी गम्भीरता तथा गहनता को बहुत समझते थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि दोनों राज्यों-इंग्लैण्ड और रूस-का समस्या निकटतम सम्वन्य था। दोनों के हित एक दूसरे से परस्पर इस क्षेत्र में टकराते थे। इस समस्या को भली प्रकार समझने के लिये तुर्की साम्राज्य की आन्तरिक दशा को समझना अत्यन्त आवश्यक है। तुर्की साम्राज्य दक्षिण के पूर्वी भाग में स्थित था। यूरोप का पूर्वी भाग टर्की साम्राज्य के अन्तर्गत था जिसमें अधिकांश ईसाई धर्म के लोग निवास करते थे और जो विभिन्न जातियों के थे। फ्रांस की राज्यक्रान्ति के कारण इन जातियों में राष्ट्रीय भावना प्रबल हुई और इन्होंने अपने को तुर्की-साम्राज्य से मुक्त करने के प्रयास आरम्भ किये। जब जब वहाँ स्वतंत्रता के लिये इन जातियों ने तुर्की साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध किये, इस समस्या ने भीषण रूप धारण किया।

(i)टकी साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर हो रहा था और उसमें इतनी शक्ति और सामर्थ्य नही थी कि वह अपने साम्राज्य को दृढ़तापूर्वक संगठित रख सके।

(ii) इसके अतिरिक्त कुछ यूरोप के राष्ट्र भी इस प्रदेशों को अपने प्रभाव-क्षेत्रों में लाना चाहते थे, इनमें रूस और आस्ट्रिया प्रमुख थे। रूस इस ओर से बाल्टिक तथा भूमध्य सागर तक अपना साम्राज्य फैलाना चाहता था तथा वह मध्य एशिया में भी अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था जिससे इंग्लैण्ड सदा सशंकित रहा। इंग्लैण्ड का हित इसी में था कि तुर्की साम्राज्य दृढ़ और संगठित हो ताकि रूस ठस ओर अपना प्रसार करने में सफल नहीं हो सके। आस्ट्रिया भी इन राज्यों को अपने प्रभाव-क्षेत्र में लाना चाहता था रूस के जार ने इनके प्रति जातीय प्रेम का दर्शाना आरम्भ किया, और उसने पैन-स्लेव आन्दोलन को बड़ा प्रोत्साहन प्रदान किया, जिससे बाल्कन प्रायद्वीप में निवास करने वाली जातियों ने तुर्क साम्राज्य के विद्रोह करने आरम्भ किये। इस प्रकार तुर्क साम्राज्य में इंग्लैण्ड और रूस की विचारधारायें भिन्न थीं और बाल्कन प्रायद्वीप के सम्बन्ध में आस्ट्रिया और रूप में बड़ी प्रतिद्वन्दिता थी। इन्हीं सब बातों के कारण इस समस्या का बहुत अधिक महत्त्व यूरोपीय राजनीति में रहा और इसका प्रभाव यूरोप के राज्यों की राजनीति पर विशेष रूप से पड़ा।

बर्लिन सम्मेलन या महोत्सव -रूस के सहमत होने पर यूरोपीय राज्यों का एक महोत्सव अथवा सम्मेलन जर्मन चांसलर बिस्मार्क की अध्यक्षता में बर्लिन में सम्पन्न हुआ। इस महोत्सव अथवा सम्मेलन में बिस्मार्क ईमानदार एजेण्ट की भूमिका निभाने का आश्वासन दिया यह सम्मेलन 13 जून से 31 जुलाई 1878 तक चला। इसमें सान-स्टेफानो की सन्धि के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्स करने के बाद कुछ निर्णय लिए गए। जिन्हें बर्लिन सन्धि के रूप में स्वीकार किया गया है बर्लिन के महोतसव (सम्मेलन) अथवा बर्लिन कांग्रेस में आस्ट्रिया, रूस, तुर्की, इटली, इग्लैण्ड, फ्रांस आदि राजयों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में इंग्लैंड के प्रधानमंत्री तथा जर्मनी चांसलर बिस्मार्क की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी किन्तु बिस्मार्क ने, ईमानदार एजेंण्ट की भूमिका से
कछ होते हुए रूसी हितों की अपेक्षा ऑस्ट्रिया के हितों पर अधिक महत्त्व दिया। बल्गारिया विभाजन पर रूस ब्रिटिश मतभेदों को उसने कुशलता कृषक समाधान किया । इजराइली की सक्रियता और उसके प्रभाव को बिस्मार्क तक ने स्वीकार किया। बालिंन सन्धि-बर्लिन सम्मेलन (महोत्सव) में बालिन की सन्धि के प्रस्ताव तैयार किए गए जिस पर 13 जुलाई 1878 को प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर किये गए। सम्मेलन में पूर्वी समस्या के हल के लिए अग्रलिखित निर्णय लिए गए 0 सर्बिया, मॉन्टिनोग्रो और रोमानिया पर से टंकी का आधिपत्य समाप्त कर दिया गया। इन तीनों को पूर्ण स्वतन्त्र राज्य मान लिया गया। (2)दोबुजा का प्रदेश रूस से लेकर रोमानिया को दे दिया गया और बेसारबिया का प्रदेश रोमानिया से लेकर रूस को दिया गया। (3) बर्लिन की संधि द्वारा विस्तृत बल्गेरिया राज्य को 3 भागों में विभक्त किया गया। पहले भाग में मेसेडोनिया पर टी का पूर्ण आधिपत्य माना गया। दूसरे भाग में रोमेलिया को टकीं के अधीन स्वशासन का अधिकार दिया गया। यह भी तय हुआ कि पूर्वी रोमेलिया का गवर्नर ईसाई होगा जिसे टर्की का सुल्तान नियुक्त करेगा। तीसरे भाग में बल्गेरिया खास को टर्की के सुल्तान को वार्षिक कर अदा करने से मुक्त कर दिया गया।

(4) ब्रिटेन को साइप्रस पर आधिपत्य और हुकुमत करने का अधिकार मिला तथा कार्स और बाटुम पर रूस का अधिकार रखा गया। (5) बोस्निया और हर्जेगोविना के प्रदेश नाममत्र के लिये टी के अधीन रखे गये। इन दोनों पर शासन करने का अधिकार आस्ट्रिया को दिया गया। इस प्रकार व्यवहार में ये दोनों प्रदेश आस्ट्रिया को मिल गये आस्ट्रिया को यह भी अधिकार मिला कि वह सर्बिया और मॉन्टेनीग्रो के बीच नोविबाजार तथा संजक नामक दुर्गों में सैनिक रख सकेगा। बर्लिन सम्मेलन में फ्रांस ने ऐप्स टेनिस इटली ने अल्बानिया एवं ट्रिपोली और यूनान ने क्रौट, थाली तथा मेसेडोनिया पर दावा किया, बल्कान रियासतों ने भी अपनी-अपनी माँगे रखीं। पर उस समय इन दावों पर कोई निर्णय नहीं हुा। केवल बर्लिन कांग्रेस ने टी सुल्तान से यह सिफारिश की कि वह थाली और प्रिंस का हिस्सा यूनान को दे दे। सुल्तान ने 3 वर्ष बाद मजबूर होकर ऐसा ही किया। एक बात यह रही कि जर्मनी ने किसी प्रदेश पर दावा नहीं किया और इसलिये तुर्की का सुल्तान सदैव के लिये जर्मनी का ऋणी हो गया। सिसे भविष्य में जर्मनी को भारी लाभ हुए। बलिंन सन्धि या बर्लिन व्यवस्था का मूल्याकंन एवं महत्त्व यूरोप के आधुनिक इतिहास में बलिन संधि का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है निकट पूर्व की जटिल समस्या को सुलझाने की दिशा में यह निश्चय ही एक उत्साहवर्धक कदम था। लेकिन, विभिन्न दोषों के कारण बर्लिन व्यवस्था समस्या का कोई अन्तिम निदान प्रस्तुत नहीं कर सकी, उल्टे उसने कुछ ऐसे असन्तोषों और कारणों को जन्म दिया जो बल्कान युद्धों और प्रथम महायुद्ध के विस्फोट के लिये उत्तरदायी बने। यह संधि लम्बे अर्से तक बड़ी शक्तियों में तनाव का कारण रही। इस प्रकार बर्लिन व्यवस्था को भूलों के विनाशकारी परिणाम निकले 19121913 में बल्कान युद्ध हुए और तब प्रथम महायुद्ध की ज्वाला-फूट पड़ी। इस प्रकार लगता है कि यह संधि के प्रकार से समझौता मात्र थी और प्रत्येक समझौते के समान इसमें भी कई कठिनाइयों के बीज विद्यमान थे, कि बर्लिन कांग्रेस बल्कान राज्यों की पेचीदा समस्या का कोई भी स्थायी हल न खोज सकी, कि बर्लिन सम्मेलन एक प्रकार से पूर्व नियोजित सुखांत या. कि बर्लिन संधि के साथ यूरोपीय इतिहास का एक युग समाप्त हो गया और विश्व राजनीति प्रारम्भ हुई। जो भी हो-गम्भीर त्रुटियों के बावजूद भी बर्लिन समझौता एक पीढ़ी तक चला और उसमें कोई दरार नहीं पड़ी।

बर्लिन सन्धि इसलिए जीवित रह सकी कि इसके द्वारा इंग्लैण्ड, आस्ट्रिया और रूस में पारस्परिक हितों में सामन्जस्य स्थापित करने का प्रयत्न किया गया। सान-स्टेफानो की सन्धि से केवल रूस ने ही लाभ उठाया था, पर बर्लिन की सन्धि द्वारा इंग्लैड और आस्ट्रिया भी लूट के बँटवारे में रूस के साझेदार हो गयी बर्लिन व्यवस्था पर अन्त्राष्ट्रीय तनावों में वृद्धि करने का आरोप लगाया जाता है, पर इस सम्बन्ध में टेलर का यह विचार सारपूर्ण है कि 'यूरोप के इतिहास में बर्लिन कांग्रेस एक जल-विभाजक' (Water shed) बन गयी थी। वल्लिन सम्मेलन से पहले के 30 वर्षों के संघर्ष और विद्रोह होते रहे थे जबकि सम्मेलन के बाद 34 वर्षों में शांति बनी रही। 1913 तक यूरोप के किसी भी राज्य की सीमा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, और दो नगण्य या छोटे युद्धों को छोड़कर यूरोप में कहीं भी गोली नहीं चलाई गयी। फिर भी जैसा कि टेलर ने लिखा है , "इस महत्त्वपूर्ण उपलब्धि (शान्ति बने रहने की उपलब्धि) का श्रेय केवल मात्र यूरोपीय राजनीतिज्ञों को नहीं दिया जा सकता।"

बर्लिन सन्धि के कुछ निर्णय दोषपूर्ण और भावी संकट के बीच लिए हुए थे, इस पर लगभग सभी इतिहासकार सहमत हैं। जो इतिहासकार इस सन्धि के बाद के कुछ दशकों में यूरोप में शान्ति बने रहने का तर्क केवल संधि के महत्त्व और इसकी उपयोगिता की ओर संकेत करता है, इसके दोषों का निराकरण नहीं करता। वास्तव में बर्लिन सन्धि एक विशेष और एक अत्यन्त विस्फोटक स्थिति का सामना करने और बड़ी शक्तियों के बीच शान्ति बनाये रखने के लिए तैयार की गयी थी और इसने इन तत्कालीन उद्देश्यों को पूरा किया। बर्लिन संधि से यह आशा करना कि वह किसी स्थायी शान्ति को जन्म देने वाली रामबाण औषधि थी, इतिहास के तथ्यों को झुठलाना होगा। विरोधी हितों और दावों की टकराहट के बीच विस्फोट को टालना ही सन्धि का उद्देश्य था जिसमें वह सफल हुई। सन्धि में दोष थे और वे भावी संकटों को जन्म देने वाले थे तो बड़ी शक्तियों का कर्त्तव्य था कि वे भविष्य में उपर्युक्त समय पर सन्धि की व्यवस्था में संशोधन करने के बारे में लचीला रुख अपनाते । बर्लिन कांग्रेस में एकत्रित राजनीतिज्ञों पर अदूरदर्शिता अथवा द्वेष का आरोप लगाना ठीक नहीं क्योंकि उस समय राजनीतिज्ञों से राष्ट्रीयता की भावना की कल्पना करने की आशा नहीं की जा सकती थी। 1875 के पहले यूरोपीय राज्य बल्कान क्षेत्र के ईसाइयों को तुर्की शासन से मुक्त करने के विचार को रूस की कूटनीतिज्ञ चाल समझते थे। अत:

बर्लिन कांग्रेस में एकत्रित राजनीतिज्ञों ने जो भूलें की वे किसी दुर्भावना के कारण नहीं बल्कि उनकी अनभिज्ञता के कारण हुई थीं। परन्तु कभी-कभी अनभिज्ञता जानलेवा भी हो जाती है।

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