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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

प्रस्थिति का अर्थ एवं परिभाषा और इसके प्रमुख प्रकार

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प्रस्थिति का अर्थ एवं परिभाषा और इसके प्रमुख प्रकार

अर्थ एवं परिभाषा-प्रस्थिति का तात्पर्य समाज में व्यक्ति की स्थिति से है। अंग्रेजी भाषा के शब्द Status (स्टेट्स) का हिन्दी रूपान्तरण प्रस्थिति अथवा पद है। प्रस्थिति किसी व्यक्ति की समूह अथवा समाज में उसके पद का सूचक होता है। इस प्रकार "समूह या समाज में व्यक्ति का जो पद होता है, उसे ही उसकी प्रस्थिति कहते हैं।" यह पद व्यक्ति को समाज द्वारा दिया जाता है। कभी-कभी व्यक्ति स्वयं के गुणों एवं योग्यता के आधार पर भी पद को प्राप्त करता है। यह पद एक व्यक्ति की तुलना में दूसरे व्यक्तियों से होती है। प्रत्येक समाज में कार्यों के विभाजन की एक व्यवस्था होती है, जिससे व्यक्ति सम्बद्ध रहता है। प्रत्येक कार्य के साथ ही एक विशेष प्रकार की शक्ति व प्रतिष्ठा जुड़ी होती है, जो व्यक्ति का समाज में प्रतिष्ठा दिलाती है। यही प्रतिष्ठा समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धारण करती है।

परिभाषा-(1) लिण्टन महोदय ने प्रस्थिति की परिभाषा देते हुए कहा है, कि "किसी व्यवस्था विशेष में किसी व्यक्ति विशेष को किसी समय विशेष में जो स्थान प्राप्त होता है, वही उस व्यवस्था के सन्दर्भ में उस व्यक्ति को प्रस्थिति कही जाती है।"

(2) वीरस्टीड के अनुसार, "सामान्यत: एक प्रस्थिति समाज का एक समूह में एक पद है। (3) ऑगबर्न तथा निमकॉफ-ऑगबर्न तथा निमकॉफ के मतानुसार,"समूह में या दूसरों के साथ सम्बन्धों के क्रम में व्यक्ति का जो स्थान है, वहीं सामाजिक प्रस्थिति है।"

(4) लेपियर-"समाज में व्यक्ति का दर्जा है, उसी से व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति समझा जाता है।"

(5) किम्बल यंग-यंग के मतानुसार, प्रत्येक समाज तथा समूह में प्रत्येक व्यक्ति को कुछ कार्यों को सम्पन्न करना होता है, जिसके साथ शक्ति तथा प्रतिष्ठा की कुछ मात्रा सम्बद्ध है। शक्ति अके प्रतिष्ठा की जिस मात्रा का हम प्रयोग करते हैं, वही प्रस्थिति है।"

इस प्रकार सामाजिक प्रस्थिति का अभिप्राय उस सामाजिक पद से हैं जिसमें उसे वहन करने वाले को एक निश्चित शक्ति तथा सामाजिक आदर प्राप्त रहता है। दूसरे शब्दों में किसी सामाजिक प्रणाली के अन्तर्गत किसी निर्धारित समय में व्यक्ति का दर्जा होता है, उसे ही हम सामाजिक प्रस्थिति कहते हैं प्रस्थिति के प्रकार अथवा वर्गीकरण-समाज में व्यक्ति को प्रस्थिति को लिण्टन महोदय ने दो वर्गों में विभाजित किया है, जो है-1) प्रदत्त प्रस्थिति तथा (2 ) अर्जित प्रस्थिति।

(क) प्रदत्त प्रस्थिति- प्रदत्त प्रस्थिति समाज द्वारा व्यक्ति को दी जाती है। कभी कभी यह जन्मजात भी मिल जाती है। इस परिस्थिति में व्यक्ति के गुणों, योग्यताओं एवं कार्यकुशलता का कोई महत्व नहीं होता है। या-जो व्यक्ति राजघराने में उत्पन्न होगा स्वाभाविक है कि वह सामान्य घराने में उतपन्न होने वाले बालक की स्थिति में ऊँचा या श्रेष्ठ होगा, जाति, कुल, आयुभेद, लिंगभेद, परिवार में बच्चों की संख्या, माता-पिता का निधन आदि कुछ ऐसी स्थितियाँ है, जो व्यक्ति को एक स्थिति प्रदान है,इसे ही हम प्रदत्त स्थिति के नाम से जान सकते हैं।
प्रदत्त प्रस्थिति के अपने कुछ आधार होते हैं, जो निम्नलिखित है

(1) लिंग भेद- व्यक्ति को समाज में प्रस्थिति को सुनिश्चित करने में लिंग भेद महत्वपूर्ण निका निभाता है। सृष्टि की उत्पत्ति से ही लिंग भेद के कारण स्त्री-पुरुष में अन्तर पाया गया। शारीरिक ट से स्त्री को पुरुषों से हीन एवं कमजोर माना गया। यही कारण है कि विश्व के लगभग सभी समाजो स्त्री की स्थिति निम्न मानी गयी है। अनेक समाज ऐसे हैं, जिनमें स्त्रियों को मासिक धर्म के कारण पवित्र माना गया और उनको धार्मिक कार्य करने के अयोग्य तक बना दिया गया। हमारे देश में भी उनकी स्थिति एक अबला दासी के समान रही है। उसे उचित शिक्षा से भी वंचित रखा गया है। आज दो लड़की की स्थिति भारतीय समाज में लड़के की तुलना में निम्न है। उसे कोमल एवं गृहस्थी के कार्यो वं प्रजनन तक ही सीमित कर दिया जाता है। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों में पाई जाने वाली शरीर-रचना को भिन्नता उनकी स्थिति में भिन्नता उत्पन्न करती है।

(2) जन्म-जन्म के आधार पर भी पद का निर्धारण होता है। महाजन के घर में उत्पन्न होने वाले लड़के को साहू कहा जाता है और मजदूर के लड़के को ललुआ। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री के पत्रों की V.I.P. का दर्जा प्राप्त होता है।

(3) जाति-हमारे देश में जाति प्रथा का चलन है। यह स्थिति निर्धारण करने वाला प्रमुख त्व है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कुल में जन्मित बालक की स्थिति, निम्न अथवा अस्पृश्य जातियों में जन्मित बालक से ऊँची मानी जाती है। आज स्वतंत्रता के बाद संवैधानिक प्रयासों के बाद भी उच्च जातियों की स्थिति समाज में उच्च बनी हुई है।

(4) प्रजाति-यह एक जैविकीय धारणा है। शरीर के विभिन्न अंगों की बनावट के आधार पर संसार की जातियों को तीन भागों में विभाजित किया जाता है-श्वेत (काकेशॉयड) पीत (मंगोलायड) तथा श्याम (निग्रायड)। रंगभेद आज प्रमुख समस्या बन गई है। गोरे लोगों की तुलना में नीग्रो अथवा काले लोगों की स्थिति निम्न है।

(5) गोद लेना- गोद लेना एक सामाजिक रस्म है। इसमें गोद लिए हुए बालक अथवा बालिका को वयस्क व्यक्ति की संतान को स्थिति प्राप्त हो जाती है। यह प्रथा हिन्दू समाज में प्रचलित है मुस्लिम समाज में नहीं।

(6) वर्ग- व्यक्ति को अपने माता-पिता के अनुरूप वर्ग प्राप्त हो जाता है तथापि वह अच्छा होने पर उससे उत्तम और निकम्मा होने पर नीचा वर्ग प्राप्त करता है।

(7) नातेदारी-समाज में नातेदारी के आधार पर भी व्यक्ति को अलग-अलग स्थिति प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ-मौसा, चाची, जीजा, साली, सास-ससुर आदि के पद नातेदारी प्रथा के आधार पर ही प्राप्त होते हैं।

(8) आयु भेद- आयु भेद के द्वारा भी समाज में स्थिति का निर्धारण होता है। सभी समाजों में बड़े-बड़ों को सम्मान दिया जाता है। यह माना जाता है कि वृद्ध लोग अनुभवी होते हैं और युवा पीढ़ी का मार्गदर्शन करने में सक्षम होते हैं। युवाओं में जोश होता है तो वृद्धों में दुनियादारी का अनुभव होने के कारण होश। इसलिए समाज के सभी उत्तरदायित्वपूर्ण और उत्तम कार्य करने के लिये ऐसे व्यक्ति चने जाते हैं, जिनमें जोश और होश दोनो ही पाये जाते हो। ऐसे व्यक्तियों की आयु 30-35 के मध्य होती है। इसके अलावा व्यक्ति की स्थिति निर्धारण में प्रथाओं और परम्पराओं का योगदान भी कम नहीं पाया जाता । एस्किमो लोगों का ही उदाहरण ले। वहाँ बूढ़े व्यक्तियों की स्थिति निम्न पाई जाती है।खाद्य वस्तुओं की कमी के कारण अन्य व्यक्ति उनकी हत्या भी कर सकते हैं। इसे एक नैतिक काम माना जाता है।

(ख)अर्जित पस्थिति-अर्जित प्रस्थिति वह स्थिति होती है जिसे व्यक्ति स्वयं के गुण, योग्यता एवं कार्य-कुशलता से प्राप्त करता है। इस प्रस्थिति को वही व्यक्ति प्राप्त करते हैं जो साहसी,योगय निपुण एवं धैर्यवान होते हैं। इस प्रस्थिति का अच्छा उदाहरण भारत की पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादर शासत्री है जो एक साधारण स्थिति से प्रधानमंत्री के पद तक पहुँचे।

अजित प्रस्थिति के भी कुछ आधार होते है,जो निम्नलिखित है-

(1 )शिक्षा- शिक्षा अर्जित स्थितियों का आधार बनती है। उदाहरणार्थ विभिन्न सेवाो प्रशासनिक और सुधार सेवाओं में शिक्षा की न्यूनतम योग्यता निर्धारित होती है। समाज में जो शिक्षित व्यक्ति होते हैं, उन्हें अशिक्षित व्यक्ति की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त होता है।

 (2) प्रशिक्षण-समाज में अनेक स्थितियाँ प्रशिक्षण द्वारा प्राप्त होती हैं, जैसे-डॉक्टर, इंजीनिया और अध्यापक आदि। यह प्रशिक्षण औपचारिक व अनौपचारिक दोनों हो सकता है।

(3) धन-दौलत- धन दौलत की भी स्थिति निर्धारण में प्रमुख भूमिका होती है। आज समाज में जिनके पास धन-दौलत है, उन्हें ऊँची स्थिति प्राप्त होती है, लेकिन यह भी सही है कि अनेक ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिनके पास धन-दौलत नहीं होती तथापि ठनकी समाज में ऊँची स्थिति होती है यथा-विद्वान, विचारक आदि।


(4) शारीरिक शक्ति-पिछड़े विशेषकर आदिवासी समाजों में जो व्यक्ति जितना शारीरिक रूप से शक्तिशाली होता है, उसकी स्थिति उतनी ही ऊँची मानी जाती है। आज इसका महत्व कम होता जा रहा है।

(5) विशेष उपलब्धियाँ-यदि व्यक्ति, शिक्षा, खेल, कला आदि में विशेष उपलब्धि प्राप्त कर लेता है, तो अपेक्षाकृत उसकी स्थिति उच्च हो जाती है।

(6) व्यवसाय-जिन व्यक्तियों का व्यवसाय ऊँचा होता है, उनकी स्थिति ऊँची मानी जाती है। व्यापारी की स्थिति मजदूरों की स्थिति से ऊँची होती है।

(7) राजनीतिक सत्ता-जिस व्यक्ति के पास राजनीतिक सत्ता या बल है उसकी स्थिति साधारणजन से ऊँची होती है। नेताओं को स्थिति ऐसी ही है। उदाहरणार्थ प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में शासक दल के लोगों की तुलना में विपक्षी दल के लोगों की स्थिति नीची होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रदत्त एवं अर्जित परिस्थितियों समान रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। प्रदन्त प्रस्थिति द्वारा जहाँ व्यक्ति के सामाजिक स्थिति का निर्धारण होता है, वहीं अर्जित प्रस्थिति द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण होता है।

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